बुधवार, 4 अप्रैल 2018

तिलम-ताड़म महिष रुदनम

एक जंगल में जंगली भैसों का झुण्ड रहता था ।
इन भैसों की दो आदतें थीं । पहली किसी को भी सींग मार देना, और दूसरी जोर जोर से रम्भाना ।
इसके अलावा ये तीसरा काम करते थे, पहले ये गोबर करते फिर पूँछ में गोबर लगा कर चलते चलते किसी को भी पूँछ मार देते ।
सामने वाला गोबर लगते ही छी छी करते रह जाता और भैंसे अपने रस्ते निकल जाते ।

इनका एक और काम था, सुबह सुबह अंड-बंड निगल लेते और दिनभर उसी की जुगाली करते रहते । इनकी जुगाली से जंगल के बाकि जानवर परेशान तो होते ,लेकिन सोचते उनका मुँह, उनका चारा करने दो जुगाली,और दूसरी और चले जाते ।

इन भैंसो ने अपने गुट बना रखे थे, कुछ जंगल की पंचायत की मानते थे, और कुछ पंचायत की हर बात पर बखेड़ा खड़ा कर देते ।
पहले के समय पिछले सरपंचों ने इन भैसों को खूब सर चढ़ा रखा था, यहाँ तक कि जब शिकार पर जाते तो अमन का माहौल बनाने के लिए भैंसे भी साथ जाते ।
भैंसो को खुला चरने की इजाजत दे दी जाती, वे भी मन भर कर सरपंच के संरक्षण में दूसरों के खेत के खेत चार आते । दूसरों को लगता इनके यहाँ कितना भाईचारा है,
शेर बैठ कर भैसों को चराने लाते हैं ।


पंचायत में पैठ होने के कारण इन भैसों को पंचायत के हर फैसले का भान होता, कौन कहाँ शिकार करेगा, किस जानवर को कहाँ जाना है, क्या खाना है और कहाँ और कितना गोबर करना है । इसका फायदा वे दूसरे जानवरों को जानकारी बेचकर खूब उठाते और मन भर के मनपसंद की चीज़े खाते ।


खैर अब वो जमाने लद गए, अब भैंसें अपने ही जंगल की सूखी घास खा लें तो बड़ी बात है । अगर बाहर की हरियाली खानी होती है तो अपनी जिम्मेदारी से जाना होता है ।
भैसों की हालात खराब रहने लगी ।

अब भैसों को न पंचायत के अगले फैसले के बारे में पता होता, न मन का खाने मिलता ।
दुसरे जानवरों ने भी इनकी इज्जत करनी बंद कर दी ।

अब बस इनका एक ही काम रह गया ,सुबह शाम जोर जोर से रम्भाने का । सुबह शाम इकट्ठे हो जाते और दो चार दुसरे जानवरों की सभा बुलाके खूब शोर मचाते ।

लेकिन पूँछ से गोबर उछालने की आदत से जंगल अभी भी परेशान था ।


एक बार पंचायत की एक पंचनी मैडम ने हिदायत छोड़ दी, जो भी भैंस पूँछ में गोबर लगा कर घूमेगी उसे पहले तो खूंटे से बाँध दिया जायेगा और फिर भी न माने तो जंगल से बाहर कर दिया जायेगा ।


भैसों में कोहराम मच गया था । चारों तरफ अम्मा-अम्मा की आवाज़ें आने लगीं ।

एक भैंस बोली-हम गोबर करेंगे तो पूँछ में कुछ तो लगेगा ही ?

दुसरी ने कहा - ऐसे में तो गोबर करने में भी डर लगेगा ।

पहली बोली- अब हम पूँछ उठाएंगे तो करेंगे क्या ?

एल आवाज़ आई -चलते हुए पूँछ रस्ते में चलने वालों को मारना ही तो हमारा मनोरंजन है, अब वो भी न करें ?


एक चितकबरी सी भैंस बोली वो तो ठीक है, बेचारी हम अधबूढ़ी भैंसों का क्या होगा जिन्होंने सारी जिंदगी सिर्फ पूँछ से गोबर उछालने में निकाल दी ।अब तो हमारा जीना एकदम क्लास लेस हो जायेगा ।


और उन मुंडी भैंसों का क्या, जिनके सींग न बाल, पूँछ ही उनका हथियार है। विलायती टाइप की भैंसों का सोचो , कीचड में नहाती हैं और बाकियों से छी छी करती फिरती हैं । वो तो सर भी हिला दें तो कीचड उछल जाये । वो भी बँध ही जाएँगी ।


भैंसें, जोर जोर से रोये जा रही थीं । अरे बाँध दिया रे, अरे मार दिया रे । अब कैसे चलेगी जिंदगी ।

एक ने कहा तुम रो तो ऐसे रहे हो जैसे सारा गोबर तुम्ही फैलाते हो और बस ये फरमान तुमको ही बाँधने के लिए आया है?

सारे एकदम चुप हो गए , बोले - हम कहाँ, हम नहीं ,  हम कैसे कर  सकते हैं |

एक भैंसे की पूँछ एकदम हरी हरी हो रही थी , सबने उसे घूरा ...पूछा भाई माजरा क्या है?  कहीं तुम्हारे कारण ही तो हमको बाँधा जा रहा है?

वो बोली नहीं भाई, ये तो दुसरे का गोबर है, हम तो गलती से उसपर बैठ गए । ये हमारा नहीं है ।


सबने कोने मे खड़ी एक कमजोर सी भैंस की तरफ देखा और कहा - तुम भी तो कुछ बोलो । आखिर तुमको भी तो दिक्कटी- दिक्कत होगी -

तीसरी भैंस बोली हम तो ट्विटर जात बकरी हैं । न हमारी पूँछ है न हम गोबर करते हैं ।
छोटी छोटी गोलियां छोड़ते हैं । किसी को लग भी जाएँ तो गन्दा तो न करे । तुम अपना गोबर संभालो या पूँछ , हमें न घसीटो ।


शाम को भैंसों ने "तिलम-ताड़म महिष रुदनम" नामक महासभा बुलाई, और जम के रंभाई । फैसला लिया गया - ये हमारी आजादी पर प्रहार है सरपंच पर धिक्कार है ।

बस इतने में ही सरपंच ने सोचा कहीं से भैंसे हमपर ही पूँछ न पटकने लगें । खुला छोड़ दो इन्हें । पंचनी मैडम वापस ले लो आदेश । भैंसो की एक कमेटि बना दो और कहो भैंसों का गोबर भैंसे ही देखें । पंचायत बीच में नहीं पड़ेगी । पंचायत किसी की पूँछ नहीं उठायेगी ।

मुफ्तखोर सियार ने हुआँ हुआँ कर करके फ़ैसले का स्वागत किया |  और सारी भैंसो ने मिलकर ट्विटर जात की बकरी पर गोबर मे छपी पूंछ मारनी शुरू कर दी ||

1 टिप्पणी:

  1. सर, बहुत सुंदर रचना है।
    पौष्टिक दूध देना छोड़कर गोबरमारी में सिद्धहस्त हुई भैसों के डीएनए में म्युटेशन हो चुका है (आदत खराब हो चुकी है) । सरपंच जी सरपंच साहब बन चुके हैं और न्याय से अधिक कंट्रोल मुखी हो चले हैं।जनता की तरफ से ट्विटर जात बकरी को छोड़ कोई है नहीं, वो क्या कर सकती है, शेर को कैसे ज़िन्दा रखा जाये, सरपंची खानदानी न् बने और ,भैसें दूध देना शुरू करें या कम से कम गोबरमारी तो न् करें ..आप लिखियेगा तो स्पष्ट और रोचक ही होगा।धन्यवाद।

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