शनिवार, 31 जनवरी 2015

सबसे सस्ते दिन



ईश्वर का नाम लेकर पांडेजी ने मोटरसाइकल को किक मारी | वैसे तो एक लात में चालू हो जाने वाली उनकी प्रिय बाइक, कभी धोखा नही देती, पर इस बार चालू नही हुई | पांडेजी का हृदय धक से रुका, पर सोचा चलो कोई बात नही हो जाता है कभी-कभी, पहली बार नही तो दूसरी बार सही | पांडेजी ने पुनः प्रयास किया, फिर असफल | उनका हृदय समझ नही पा रहा था की धड़कना बंद करे या तेज़ धड़के | फिर किक मारी गयी, फिर असफल, पांडेजी ने पत्नी, का सौम्य मुख देखा जो रौद्र होने के लिए बस इसी क्षण की प्रतीक्षा मे था | पांडेजी को बीते हुए दो दिनो की याद गयी, उनका वर्णन थोड़ा रुक कर करेंगे, किंतु अभी बाइक चालू नही हो रही थी, पांडेजी का हृदय भी रुकने या बंद होने का निर्णय नही ले पा रहा था | जैसे ही आँखें उपर करते पत्नी का मुख हर बार से अधिक रौद्र प्रतीत होता था | होंठो की लाली आँखों में और आँखों का काजल उनके शब्दों मे उतरने के लक्षण प्रतीत हो रहे थे | अब वो थक गये थे, पर प्रयास जारी था ,जिस क्षण लगा की अब उनकी अर्धांगिनी, रुष्ट होकर पुनः गृह प्रवेश करने जा रही हैं, उसी क्षण बाइक और उनके हृदय ने पुनः धड़कना प्रारंभ कर दिया | हालाँकि पत्नी का मूड बिगड़ गया था पर, शॉपिंग का मामला था, उनको ही जाना था, इसलिए तुरंत मान गयीं, और एकदम मैढक जैसे फुदक कर बाइक पर बैठ गयीं | पांडेजी की जान मे जान आई और वे चल पड़े, आज ट्रॅफिक तो नही था किंतु गर्मी ने प्राण सोख लिए थे, लू की चपेट मे गाड़ी चलना दूभर हो रहा था | परंतु महाराणा प्रताप की भाँति वो अपने घोड़े को वायु की गति से दौड़ा रहे थे |
जैसे तैसे मॉल तक पहुँचे, अब समस्या थी बाइक को कहाँ फँसाया जाए, देखा तो पूरी पार्किंग मे दुपहिया वाहन लगे नही थे एक दूसरे से चिपके खड़े थे, जैसे की बस मे 2 की सीट पर तीन तन्दरुस्त यात्रिओं को बैठा दिया जाता है | लग रहा था जैसे एक बाइक दूसरे से कह रही हो बहन थोड़ी सी जगह दे दे, मेरी किक फँस रही है, दूसरी कह रही हो बहन मैं क्या करूँ बाजू वाली बाइक ने मेरे अगले टायर में अपना साइलेंसर घुसा रखा है | और तीसरी बाइक खुद ही इस संकीर्ण-स्थान के कारण प्राण त्यागने के लिए व्याकुल होती हुई, चिल्ला रही थी, जैसे कि उसका कोई हरण कर के ले जाने वाला हो | उसके चिल्लाने (अलार्म) से परेशान बाकी सभी बाइक चुपचाप खड़ी हो गयी थी, जैसे कि भारी बस मे एक महिला यात्री किसी पुरुष यात्री पर चिल्ला दे तो, सारी बस शांत हो जाती है, चुपचाप सुनने लगती हैं | पांडेजी ने, सोचा अपनी बाइक को कहाँ इस भीड़ मे लगाउँ , बेचारी बाइक, नाज़ों मे पली है, इस निर्मोही निष्ठुर संसार मे इन बाइक की भीड़ मे कहीं कोई चोट लग जाए | हा ! मेरी प्यारी बाइक | किंतु पत्नी का भय, और स्वयं के अगले कई दिनों के खाने की जुगाड़ को ध्यान में रखते हुए, अपनी बाइक, को कहीं कहीं लगाने का फ़ैसला कर चुके थे | अब उन्होने पूरे पार्किंग का एक चक्कर लगाया, और उन्हे दो बाइक के बीच मे उतना स्थान दृष्टि-गोचर हुआ जितना कि होली के पहले दिल्ली से बिहार जाती हुई अंतिम ट्रेन मे घुसे हुए यात्री को किसी सीट पर अपने कूल्हे टिकने भर के लिए स्थान दिखा हो | उन्होने मौका देखते हुए तुरंत अपनी बाइक लगा दी | बाइक फँसा कर लौटे पांडेजी थोड़ा सा निश्चिंत हुए, चलो कुछ तो ठीक हुआ |
प्रवेशद्वार पर पहुँचे तो देखकर हैरान, बाहर इतनी भीड़, अंदर का माहौल कैसा होगा ये देखकर थोड़े चिंतित हुए ! दरअसल बाहर जो भीड़ थी वो ट्राली के लिए थी, लोगों को ट्राली नही मिलेगी तो ढेर भर का समान कैसे ख़रीदेंगे | फिर कैसे पता चलेगा कि ये दिन सबसे सस्ते दिन हैं !तो अब घोर समस्या थी ट्राली कैसे प्राप्त की जाए | इतनी भीड़, सब ट्राली देख कर झपटने को व्याकुल, किसी भी प्रकार से अपने सभ्य कुल के होने का प्रमाण नही दे रहे थे, पर पांडेजी को सभी स्वयं की तरह मजबूर लगे | हर पुरुष का मुख उन्हे दर्पण मे अपना प्रतिबिंब लगा | हर स्त्री के मुख पर उन्हे खरीददारी करने का अद्वितिय, साहस, बल और ढृढ निश्चय दिखा | समस्या अभी भी वहीं थी, ट्राली कहाँ से लाई जाए | उनकी पत्नी का दिमाग़ दौड़ा, और बोली, चलो हमारे साथ | पांडेजी उनके साथ चलने ही तो आए थे, सो चल दिए, बिना सोचे समझे | पत्नी जी उन्हे कार पार्किंग की तरफ़ ले गयीं | पांडेजी समझे नही कि अचानक उनकी पत्नी को ये क्या सूझा | वहाँ जाकर पांडेज़ी ने देखा कि कुछ कार वाले शॉपिंग कर के ट्राली को कार पार्किंग तक ला कर वही छोड़ गये थे, जहाँ से कदाचित्, थोड़ी थोड़ी देर मे स्टाफ के लोग इकट्ठा कर के ले जाते होंगे | परंतु यहाँ कहानी थोड़ी अलग थी | उनकी पत्नी ने इशारा किया, पांडेजी समझे और लपक कर एक ट्राली पकड़ ली | उसमे अपने बालक को फँसा दिया |और एक विजयी मुस्कान के साथ दोनो अंदर जाने को तैयार हुए | पार्किंग से ट्रॉली को खींच कर लाने मे वैसे तो पांडेजी संकोच करते किंतु आज बात अलग थी आज सबसे सस्ते तीन दिनो का अंतिम दिन, अपार जनसमूह, उस पर ये विजय |धन्य , धन्य हो बाज़ारवाद की नयी परिभाषा | जब कुछ बिक रहा हो तो उसके लिए एक माहौल बना दो |लोगों को लगना चाहिए कि सस्ता मिल रहा है, उसके बाद सबकुछ पत्नियों पर छोड़ दो |
सबसे सस्ते तीन दिन से याद आया कि, पांडेजी को ये तीन दिन कैसे बहुत महँगे पड़े ये बताना बहुत ज़रूरी है|
तो हुआ यूँ कि टी.वी., अख़बार, रेडियो और पोस्टर - बेनरों में सर्वत्र, कुछ दिनों से एक विज्ञापन चल रहा था | सबसे सस्ते दिन | सभी पत्नियों की तरह पांडेजी की पत्नी भी उत्सुक थी, इन सबसे सस्ते दिनों का लाभ उठाने के लिए | तो पहले दिन सुबह सुबह पत्नी जी ने अनुरोध किया - हे प्राण-नाथ, चलिए, कुछ सस्ता सा खरीद लाते हैं | पांडेज़ी बोले -ठीक है प्रिये, शाम को चलेंगे | फूटी किस्मत थी उनकी जो जाते-जाते ये कह गये, शाम को एक मीटिंग गयी और पांडेजी को देर हो गयी | घर पहुँचे तो सुबह जो पत्नी के गुलाबी गाल देख कर गये थे, वो परिपक्व होकर पूर्ण रूप से लाल हो चुके थे | लग रहा था की वो तैयार हुई थी और फिर ... | रहने दीजिए लिखने से क्या फायदा, आप समझ ही गये होंगे | पांडेजी ने समझाने की कोशिश की, किंतु भोजन नही मिला, सोचा चलो आज बाहर से मँगाया जाए , तो शायद पत्नी जी को कुछ तसल्ली मिले | खाना मॅंगा लिया गया, खाया गया और पांडेजी निद्रा मे लीन हो गये | परंतु सर्वविदित है कि  - क्रोधित नारी अत्यंत भारी |
अगले दिन पांडेजी को चाय मिली, नाश्ता, और टिफिन - वो भी बताने की ज़रूरत नही है | पांडेजी समझ चुके थे की मामला कुछ गंभीर हो गया है | परंतु धीर बने रहे, और सुनाते हुए कह गये की आज शाम को जल्दी जाएँगे, तैयार रहना | आज का खाना फिर दफ़्तर की कॅंटीन मे हुआ | जब बुरा समय आता है तो थोड़ा बहुत नही आता, थोक के भाव मे आता है | आज भी पांडेज़ी लाख कोशिश करने के बाद भी समय से दफ़्तर से निकल पाए, भय ने उन्हे ग्रास बना लिया, चेहरा घर पहुँचने से पहले ही उतर गया था, और रात के खाने की फ़िक्र सताने लगी थी | समझ गये थे की आज शाम फिर बाहर का ही खाना है, और कल पक्का उनका पेट जवाब दे देगा |
घर पहुँचे, आज घर पूर्ण रूप से कोप-भवन समान लग रहा था, तात्पर्य यह था कि कैकेयी कोप-भवन मैं बैठी थी और दशरथ की प्रतीक्षा कर रही थी | पांडेज़ी ने याद किया, पर उन्हे अपनी पत्नी के सिवा किसी और से युद्ध हुआ हो ऐसा याद नही आया, उन्हे याद आया की पत्नी कभी सारथि बनके उनके प्राणो की रक्षा करने साथ गयी हो | परंतु अपने शॉपिंग पर ले जाने के वचन अवश्य याद रहे थे | उन्होने आज समझाने की कोशिश नही की, वो जानते थे कोई फायदा नही है | चुपचाप खाना ऑर्डर कर दिया और बोले | कल रविवार है , कल चलते हैं | बाकी उनकी निजी बातें हैं, जो यहाँ लिखना शोभा नही देता | किंतु बस उसके बाद सुबह की घटना का वर्णन मैं उपर कर ही चुका हूँ |
तो वर्तमान मे पांडेजी, मॉल के अंदर थे, ट्रॉली उनके हाथ में थी, और अब बाकी उनकी पत्नी को खरीददारी करनी थी | उन्होने एक सज्जन को अपनी पत्नी से कहते सुना - सुनोजी आज रहने दो बहुत भीड़ है हमसे हो पाएगा| और वे सज्जन सपत्नीक वहीं से बाज़ार को दंडवत करते हुए लौट भी गये, बिना कुछ खरीदे | वे सोचने लगे हे राम !! ये कैसे संभव हुआ | बिना खरीदे कैसे लौट गये ये लोग |काश दोबारा कभी मिलें तो इस रहस्य को भी जाना जाए |
दूसरी तरफ उन्होने देखा बेतहाशा भीड़ मे लोग हर चीज़ उलट पुलट कर देख रहे थे, कीमत का तमगा, उस पर डिसकाउंट का पर्चा, हर तरफ लालच का जाल, कपड़े, बर्तन, आटा, दाल, सब्जी, दूध सब कुछ बिक रहा था डिसकाउंट मे | लूट सको तो लूट लो | एक तरफ खड़े होकर अपनी पत्नी को कुछ सामान पलटते हुए देख रहे थे, तभी एक व्यक्ति आया और बोला, सर, क्रेडिट कार्ड लेंगे? पांडेज़ी ने प्रेम से मना कर दिया | थोड़ी देर बाद यहाँ वहाँ घूम के पांडेजी फिर एक कोने मे खड़े थे, तब फिर वही व्यक्ति आया और बोला, सर क्रेडिट कार्ड लेंगे? पांडेजी ने पुनः मना कर दिया | थोड़ा समय और कटा और फिर पांडेजी 4 कदम चले, फिर वही महनुभाव पधारेऔर फिर पूछा क्रेडिट कार्ड लेंगे? पांडेजी ने कहा भैय्या तीसरी बार पूछ रहे हो अब मत आना | शायद क्रेडिट कार्ड वाला भी भ्रमित था | इतनी भीड़ किस किस को पहचाने |
पांडेज़ी ने देखा लोगों ने अपने बच्चों को तरह-तरह से ट्रॉली मे भर रखा है, किसी ने सुला रखा है किसी ने बैठा रखा है | बच्चे परेशान हो रहे हैं लेकिन सब शॉपिंग मे मगन | लोगों की ट्रालियाँ भरी हुई हैं, कभी भूसे के ट्रक देखे हैं सड़क पर, लगता है, जाने कब फट पड़ेंगे | बस वैसे ही, ट्रालियाँ ऐसे भरी हुई जैसे बस ज़रा सा धक्का लगे और सब बिखर जाए | तो धीरे धीरे उनकी पत्नी ने भी आटा, दाल से लेकर कपड़े, बर्तन, साबुन तेल, और जाने क्या-क्या खरीद के ट्रॉली भर दी थी | पांडेजी समझ गये थे कि चपत तो लंबी लगने वाली है | पर ज्यों-ज्यों ट्रॉली भरती जाती पांडेजी को एक तो सुकून होता जाता कि चलो और ज़्यादा समय नहीं जल्दी ही यहाँ से निकलने का मौका मिलेगा |परंतु दूसरी बात जो उनको घोर चिंता मे डाल रही थी वो ये कि इतना सामान वो लेकर कैसे जाएँगे | एक बार उनकी पत्नी ने इतनी ही शॉपिंग कर डाली थी, एक साथ, बाइक पर कैसे ले गये थे वो ही जानते हैं | कम से कम 7 बार एक्सीडेंट होते बचा होगा | स्कूटर हो तो भी घर का सामान लाने ले जाने मे आसानी होती है, लेकिन गृहस्थ के लिए बाइक लेकर शॉपिंग पर जाना कितना बड़ा कलेश है वही समझ सकते हैं जो इस प्रक्रिया से गुज़रे हैं |
तो जैसे तैसे ट्रॉली भर चुकी थी | और अब बारी थी बिल कराने की | जब काउंटर पर पहुँचे तो देखा इतनी लंबी कतारें, जैसे किसी हिट फिल्म के टिकट के लिए लोग खड़े हों |एक एक कतार मे 25-25 लोग और हर व्यक्ति के पास ट्रॉली मे 250-250 सामान, एक-एक को बिल करने मे 15-20 मिनिट लग रहे थे | पांडेजी एक वीर की तरह, एक लाइन मे लग गये | लाइन बढ़ने का नाम नहीं ले रही थी, पर वे लगे रहे | फिर वो घटना हुई जिसने इन सबसे-सस्ते दिनो को निचोड़ के रख दिया | तीन दिन बाहर का खाना खा के पांडेजी का उदर गुटर-गुटर तो पहले से कर रहा था, अब लघुशंका से आशंकित हो गये थे, भागने के लिए लालायित थे परंतु समझ नही रहा था कि क्या करें | इतने मे वो क्रेडिट कार्ड वाला पुनः पांडेजी के पास गया, इस बार पांडेजी से रहा नही गया और उसपर खीझ उठे...ला दे ! अभी दे, अभी दे, अभी दे! मुझे अभी चाहिए, एकदम अभी | क्रेडिट कार्ड वाला सकपका के खिसक गया | परंतु पांडेज़ी अपना आपा खो बैठे थे | वैसे तो शांत-चित्त पांडेजी क्रोधित नहीं होते परंतु इन तीन दिनों से धीरे धीरे उनके अंदर ज्वालामुखी भर दिया था |
इतने पर भी पत्नी को दया नही आई, किंतु बालक को उनपर दया गयी, शायद पुत्र से अपने पिता का कष्ट नही देखा गया | और जिस शंका से पांडेजी पीड़ित थे, और बस सोच रहे थे कि क्या करें, उनके बालक ने वो कर दिखाया| और अब इतने सबके बाद उनका बालक रुदन करने लगा | भीड़ कम हो नही रही थी | लाइन आगे बढ़ नही रही थी | बालक रो रहा था | भारतीय स्त्री की एक ख़ास बात है, पति पर क्रोध इतनी जल्दी शांत करती नही, परंतु बच्चे का कष्ट एक क्षण देखती भी नही | बालक को परेशान होते देख कह उठीं चलो अब चलते हैं,छोड़ दो ये सामान यहीं | पांडेज़ी के कानो मे जैसे अमृत घुल गया हो, ये शब्द उन्हे "आइ लव यू" से अधिक अच्छे लग रहे थे | वे समान छोड़ के भागे और भागे भी तो सीधे गुसलखाने की तरफ, अपनी शंका का निवारण करने जो की अत्यंत आवश्यक था |
जब लौटे तो शांत मुद्रा मे बोले क्षमा करना शॉपिंग नही हो पाई | पत्नीजी को भी आख़िर हँसी गयी | बोलीं चलो कुछ खाकर ही घर चलते हैं कम से कम चैन से सो तो लेंगे |