बुधवार, 28 मार्च 2018

सर्व तर्कम स्वाहा

आइये सब कतार में लग जाइये । हमारी दी हुई टोपी से सर ढँक लीजिये । सब लोग अब धीरे आगे बढ़ते रहिये और जैसा बताएं वैसा करते रहिये ।

आइये सबसे पहले वाले काउंटर पर , यहाँ अपना बुद्धि और विवेक जमा दीजिये । कोई पुरानी विचारधारा, तर्क-वितर्क , प्रश्न, एवं शंका हो वह यहीं जमा करा दीजिये । आगे वाले काउंटर पर दिमाग का प्रयोग, प्रदर्शन या धारण वर्जित है ।

इस काउंटर पर अपनी रीढ़ की हड्डी रख दीजिये, अब आपको जहाँ जैसा जब कहा जाये झुकना होगा । अगर आपमें रीढ़ की हड्डी होगी तो आलाकमान के सामने समस्या आएगी ।

चलिए अब अपनी जबान पे ठप्पा लगवा लीजिये । अब आप वही बोलेंगे जो आपसे कहा जायेगा । और अब आप किसी की नहीं सुनेगें - जनता , मीडिया ,विरोधी । आपको मात्र आलाकमान को सुनना है । यंत्र आपके कानों में फिट किये जा रहे हैं ।

अब आप अपने सभी वस्त्र उतार दीजिये, और देह पर अन्य पार्टियो के निशान चेक करा लीजिये । उसके बाद अगले काउंटर से मोटी खाल के वस्त्र पहन लीजिये । आपको अब से कुछ भी चुभना नहीं चाहिए । आपको अब अपनी अंतरात्मा को यहाँ जमा कराना होगा । साथ में यह बांड साइन करना है, की आप अपनी अंतरात्मा का पुनः प्रयोग नहीं करेंगे । कुछ लोग अंतरात्मा की आवाज़ सुनने लगते हैं , उनके लिए विशेष व्यवस्था है । वे अपनी अंतरात्मा से मुक्ति पा सकते हैं ।रकम लेकर सदा के लिए पार्टी को बेच सकते हैं । इसके बदले आपको अच्छी  कीमत दी जा रही है ।

पार्टी की आशा है कि आप वही देखें जो पार्टी के हित में है । और पार्टी क्या दिखाना चाहती है, वह देखने के लिए आपको विशेष चश्मे दिए जा रहे हैं । चश्मे के एक तरफ से आप अपनी पार्टी की अच्छाई देख

पाएंगे दूसरी तरफ से विरोधियो की त्रुटियाँ ।  इस चश्मे से आपको कर्ता के अनुसार सही भी ग़लत दिखेगा और ग़लत भी सही दिखेगा |  चश्मे के साथ आपको दोगलेपन की गोलियाँ भी दी जा रहीं हैं | जिन्हें

आपको सुबह शाम तब तक खाना है जब तक आप के खून मे दोगलापन पूरी तरह समा न जाए |

अगले वाले काउंटर पर आपको अपना दिमाग़, दिल, स्वाभिमान , आत्‍मसम्मान और शर्म की गठरी बना कर उपाध्यक्ष महोदय के चरणों मे अर्पित करनी है |

अब आप पूर्णतः पार्टी के कार्यकर्ता बन चुके हैं | आइए शपथ ले लीजिए कि आज से पार्टी की ग़लतियों को वैसे ही छुपाएँग जैसे आपकी खुद की ग़लती हो | पार्टी के आलाकमान द्वारा की गयी चोरी अब आपकी

अपनी चोरी है | पार्टी अगर रायता फैलाएगी तो आप भी रायता फ़ैलाएँगे | अध्यक्ष महोदय कितनी भी हास्यास्पद या मूर्खतापूर्ण बात क्यों न करें , आप सदा उसे गंभीरता से सुनेंगे और दोहराएँगे |

शपथ ग्रहण के बाद आइए पार्टी के कुल देवी और देवता के दर्शन कर लीजिए और मंत्र दोहराइए-

ओम, पार्टी अध्यक्षाय नमः |
उपाध्यक्षये नमः |
स्वविवेकम स्वाहा |
सर्वतर्कम स्वाहा ||


अध्यक्ष स्त्रोत्र जा जाप करिए
फनी-फेसम् चमचा.दिगण सेवितम् राष्ट्राध्यक्षम् देवं स्वघोषितम् |
स्व-मात-सुतं पार्टी विनाश कारकं नमामि मन्देश्वरपादपङ्कजम्  |

अब क्षमा मांगिए -

राजनीत न जानामि न जानामि च राष्ट्रहितम |
दूजा चैव न जानामि क्षमयताम् पार्टीश्वरम् ||

अपराध सहस्त्रानि क्रियन्ते कुल जीवनम |
कार्यकर्ता जानामि क्षमयताम् पार्टीश्वरम् ||


अब आप लोग अपना अपना विसर्जन पार्टी मे कर दीजिए ||


सोमवार, 26 मार्च 2018

वी.आई.पी. दर्शन

शंख ,घंटे, डमरू सब भक्ति में खुद ही बज उठे । थोड़ी देर पहले जिस जगह से केवल बढ़ते रहिये, रुकिए मत जैसे धक्कान्तकारी-मन्त्र सुनाई दे रहे थे, वहीँ से अब वेद मन्त्र आने लगे । पुजारियों ने सुर में सुर मिलाया मंत्रध्वनि से वातावरण भक्तिमय हो गया । जल रही धूपबत्ती ने भी थोडा जोर लगाया और खुद आउटडेटेड चन्दन की होते हुए एक्जॉटिक लैवेंडर की खुशबु से वायु को सुगन्धित कर दिया । दिया जो फड़फड़ा के खुद को जल्दी बुझा देने के लिए अंधाधुंध जले जा रहा था वह भी थोडा शांत हो गया और शालीनता से जलने लगा। इधर उधर बिखरे फूल खुद उठे और कतारों में लग कर सज्जा में बदल गए।डालडा और तेल से बना प्रसाद थोडा पीछे हो गया और घी से बने भोग के लिये जगह बना दी। जल पात्र में बिसलेरी का जल डाला गया । भगवान के गले में पड़ी गेंदे की मालाओं ने अपना स्थान छोड़कर जाने में भलाई समझी वहाँ अब गुलाब की माला आने वाली थी । भगवान् की मूर्ति को थोडा व्यवस्थित कर दिया गया | जैसे परिजन बच्चों को किसी मेहमान के आने की सूचना पर बच्चों को कर देते हैं , और ताकीद देते हैं देखो तमीज से पेश आना , और मेहमान आएं तो उनको नमस्ते कहना । जूनियर पुजारिओं को वी. आई. पी पूजा विधि और स्त्रोत्र समझ दिए गए , और ऑब्सर्व करने को कहा गया । सभी आने वाले भक्तों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया प्रांगण का फर्श भी साफ़ किया जाने लगा, ताकि वी.आई.पी, चरण कमल मैले न हो सकें । मंदिर के बाहर भक्त और भिक्षुक दोनों वी.आई.पी जी ,के दर्शन को कतारों में लग गए ।
भगवान तो मंदिर में ही रहने थे पर ये बड़े वी. आई. पी हैं , कभी कभी ही दर्शन देते हैं । वी.आई. पी दर्शन को सब तत्पर और उत्सुक थे । वी. आई. पी जी सपरिवार पधारे, उनके चरण धुलाये गए, माला पहना के उनका स्वागत किया गया, विशेष चन्दन से तिलक किया गया । और तसल्ली से मंत्रोच्चार के बीच हवन-पूजन -आरती हुई । (भगवान की या वी. आई. पी जी की पाठक के विवेक पर ) । तत्पश्चात सोलह सौ रुपये की आधा किलो मिलने वाली मेवे की मिठाई का प्रसाद खिलाया गया । पूजन से आत्मविभोर हुए वी.आई. पी ने गुलाबी रंग के दो नोट पूजा के थाल में रखते हुए भगवान से कहा - प्रभु कोई आवश्यकता हो तो याद कीजियेगा ।

मेघ-सेवा का ब्रह्मज्ञान

महामुनि स्काइप से नदारद थे  , सो उनको उनके द्वारा रखी मीटिंग में प्रकट होने का आह्वान 
व्हाट्सएप्प पर किया गया । कुछ देर में मुनि प्रकट हुए और आत्मप्रसंशा , व्यंग्य और औपचारिक क्षमायाचना के मिले जुले स्वरुप में बोले मैं तनिक व्यस्त था ।
दरअसल महामुनि ने यह मीटिंग, डेवर्षियों  के साथ मेघ-सेवा का ब्रह्मज्ञान प्रदान करने के लिए रखी थी ।
अगर आप डेवर्षि न समझे हों तो बता दूं, डेवलपमेंट यज्ञ करने वाले ऋषिओं को डेवर्षि कहा गया है ।
ये सभी वेबर्षि के पोते परपोते हैं । 
नारद मुनि डेवर्षियों से बोले - 
अहम् ब्रह्स्मि । कल ही ब्रह्मदेव् से मिला । बढ़िया लग रहे थे ।
मैं नारायण से तो हफ्ते में दो तीन बार मिलता ही हूँ । नारायण भी बढ़िया लग रहे थे । कह रहे थे डेवर्षि कोई यज्ञ नहीं कर रहे आजकल ?
इंद्रलोक से इंद्रदेव आजकल वरुणदेव के साथ मेघों में जल भर रहे हैं ।
एक ने पूछने की कोशिश की किंतु मेघ में जल भरने की प्रक्रिया हमें भी तो बताइये । हम डेवर्षि है, हमें भी ट्रेनिंग दीजिये ।
डेवर्षि सोच रहे थे कितना बोल रहे हैं ,कुछ काम का बोल दें । पूछ बैठे  ... "मुनिवर... वो ब्रह्मज्ञान ?"
एक आईडिया बृह्मदेव को दिया हैं। अगर उन्हें अच्छा लगा तो करोड़ों बचेंगे ।

अभी अभी गणपति से मिल कर आ रहा हूँ ।

डेवर्षि समूह के दो अन्य भेद भी हैं, ऑप्सर्षी जो ऑपरेशन्स सँभालते हैं और टेस्टरर्षि जो टेस्टिंग के यज्ञ करते हैं । 

थोड़ी दाढ़ी बढ़ा ली है । मैं भी दाढ़ी बढ़ाउंग और हरे रंग के बाल उगाऊंगा ऊगा तो सफ़ेद भी सकता हूँ लेकिन सफ़ेद दाढ़ी में स्कोप नहीं है । 

मैं भोलेनाथ से प्रायः मिलता ही रहता हूँ । आजकल मगन है ध्यान में । बस मैं ही हूँ , जो इन सबसे मिलता रहता हूँ नहीं तो पता नहीं इन त्रिदेवों का क्या हो ।

बस एक बार जल भर जाये तो हम जहाँ चाहेंगे वहाँ बरसा देंगे । हमें इस बार मेघों का ऑप्टीमल प्रयोग करना है ।

महामुनि बोले हाँ बताता हूँ , जो मेघ होता है वह मे.घ. होता है । और उसमे जल होता है । जल मेघ में वरुण देव भरते हैं , मैं नहीं बस उनको भरते हुए देखता हूँ ।जल ही जीवन है । और जीवन की रक्षा करते हैं सूर्यदेव , मैं गया था उनसे मिलने ।
मैंने उनको अपने विचार बताये, तो बड़े प्रसन्न हुए । प्रसन्न तो मुझे शंघाई में बैठे डेवर्षी भी लगे । उनसे मेरी रोज बात होती है ।
मुनि बोले हाँ बड़ा जटिल है । बड़ी मुश्किल से समझ आता है । इंद्रलोक वाले जानते हैं । मैं तो जनता ही हूँ । पहले मैं भी एक वेबर्षि था । सब यज्ञ और मन्त्र जनता था । अब मैं सबको केवल आइडिया देता हूँ । 

देख लो मैं बढ़ रहा हूँ पहले वेबर्षि था, मन्त्र पढता था । फिर डेवर्षि बना और बहुत यज्ञ किये । और अब देखो महामुनि हूँ । सबसे मिलता हूँ और मीटिंग करता हूँ । तुम लोग भी कुछ कर लो तो दृश्यमान हो जाओ । तुम लोग तो सप्तलोकों में सदृश हो ही नहीं ।
डेवर्षि सोच रहे थे फालतू टाइम ख़राब कर रहा है कोई चुप कराये इन्हें । ब्रह्मज्ञान तो दूर इन्हें भ्रम ज्ञान भी नहीं है । बस टाइम पास कर रहे हैं।
सवा घंटे तक जब आत्ममुग्ध मुनिवर ने अपनी वाणी को विराम नहीं दिया और मेघ-सेवा के स्थान पर आत्मप्रसंशा के स्तोत्र पढ़ते रहे, तो डेवर्षि का धैर्य उत्तर दे गया और बोले मुनिवर पुनः पधारिएगा अभी हमें काम से जाना है । और मुनिवर के स्काइप मीटिंग से अंतर्ध्यान हो गए ।

रविवार, 25 मार्च 2018

अंधेरा कायम है ...

इसे आप रोशनी नही है का दूसरा भाग भी कह सकते हैं | जिसने अभी तक वो कहानी ना पढ़ी हो तो यहाँ पढ़े -

http://sirajay.blogspot.in/2015/02/blog-post.html


रोशनी के जाने के बाद पायल के जीवन में वही हुआ जो होता है, या जिसकी अपेक्षा की जा सकती है । अँधेरा छा गया ।

और पायल ने भी वही किया जो अँधेरे में लोग करते हैं, कभी मोमबत्ती जलाई तो कभी दिया ।
मतलब अस्थाई रूप से कई लड़कियों को काम पर रखा लेकिन कोई ज्यादा जमी नहीं या ज्यादा टिकी नहीं ।


बीच में बगल की सोसाइटी में खबर उडी कि कुछ एजेंसियों के माध्यम से बांग्लादेशी नौकरानियों ने आतंक मचा रखा है,
और किसी घटना के कारण सोसाइटी में दंगा मचा दिया ।

पहले तो नौकरानी मिलना कठिन था, कोई मिल जाये तो उसके हिसाब से एडजस्ट होने में समय लगता है ।

और जब तक उसके हिसाब से घर वाले एडजस्ट होते हैं तब तक उसका कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो जाता है । ऊपर से ये नया बवाल , बांग्लादेशी ।
किसी के माथे पर तो लिखा नहीं है की वो देशी है या बांग्लादेशी । आधार लेकर तो सब आ जाते हैं । कुल मिलाकर अंधेर मचा है ।



पहले पता नहीं कैसे रामु काका, और रामलाल जैसे नौकर मिल जाते थे । कहने की बात नहीं है लेकिन ठाकुर का रामलाल जो काम करता था,
उसपर लोगों को बहुत शक है अभी तक । ऐसी स्वामिभक्ति बिरली ही होती है । सोचो अगर रामलाल एक दिन नागा कर जाये तो ठाकुर का क्या हो ।
खैर छोड़िये ।

तो पायल को कोई ऐसी नौकरानी चाहिए थी, जिसके हिसाब से उसका परिवार एडजस्ट हो जाये। नौकरानियों से एडजस्ट हो जाने की अपेक्षा करना महापाप है ।

पायल छठ के व्रत के दुसरे दिन चोरी से खाने का पाप तो कर सकती है लेकिन नौकरानी से उम्मीद पालने का पाप नहीं कर सकती ।

बस ऐसे ही एक बार एजेंसी ने अस्थायी तौर पर एक नौकरानी भेजी ।

पायल ने पुछा - क्या नाम है ?

उसने कहा - पंखुरी ।

पायल - वाह क्या नाम है । एकदम अनोखा ।
अच्छा बताओ क्या क्या बना लेती हो?

पंखुरी - सब बना लेते हैं ।

पायल - रोटी बनानी आती है न?

पंखुरी - हाँ , बिल्कुल गोल ।

पायल - पहले कितने घरों में काम किया है ?

पंखुरी - बहुत , घरों में । चालीस पचास  ।


पायल चौंकी की इतने घर में, अगर चालीस साल की भी हो तो इतनी जगह नौकरी कैसे बदल सकती है?

पूछा - इतने सारे घर में? पिछले वाले घर में क्या करती थी?


पंखुरी -बहुत घरों में करती थी।  पिछले वाले में तो बच्चे देखती थी ।


पायल को लगा चलो बच्चे ही देख ले बड़ी बात है । इसी बीच पंखुरी की चाय बन के आ गयी । चाय के स्वाद ने प्रश्नो पर विराम लगा दिया ।
बात आई गयी हो गयी।



दो दिन बाद पायल के भाई स्वामी का घर आना हुआ ।
स्वामी से पायल ने पुछा - चाय या कॉफ़ी?

स्वामी ने बोला चाय ।

पायल - नहीं तू कॉफ़ी पी ले ।

स्वामी - नहीं , चाय ही पीने का मन है ।

पायल - तू कॉफ़ी पी न । मैं  अच्छी कॉफी बनाती हूँ ।

स्वामी - नहीं चाय ही बना दो । कॉफ़ी मुझे पसंद नहीं है ।

पायल - रुक न कॉफ़ी बनाती हूँ ।

स्वामी - पिलाना है तो चाय ही पिलाओ ।


स्वामी को कुछ बात के लिए मना करो तो और ज्यादा उतावला होकर वही मांगता है ।
और नौकरी ने पायल को ऐसा बना दिया है कि जब तक असंभव न हो तब तक असलियत बताये बिना जितना हो सके काम बना देने की आदत लग गयी है ।
लेकिन यहाँ नहीं चलने वाली थी । तब स्वीकारोक्ति आई |


पायल - चायपत्ती नहीं है ।

स्वामी - तो चाय का पूछा ही क्यों?

पायल -मुझे लगा तू मान जायेगा । और दोनों हंस पड़े ।


स्वामी - क्या हुआ, ऐसा होता तो नहीं था । कुछ नया काण्ड हुआ है क्या, नौकरानी नहीं दिख रही?

पायल - पूछो मत , सुबह ही उसे एजेंसी छोड़ कर आई हूँ ।

स्वामी - क्या हुआ , बड़ी दिलचस्प कहानी हुई है इस बार जरा समझाओ ।



पायल ने सुनाना शुरू किया ।

पंखुरी दरअसल उसका नाम पंखुरी नहीं था ,क्या था यह इस समय महत्त्व नही है |
पहले दिन आई तो रात हो चुकी थी, खाना हो चुका था तो सब सो गए ।
सुबह हम सब उठे तो सोचा चलो पंखुरी ने सफाई कर के चाय तो बना ही दी होगी ।

कमरे से बाहर गए तो पंखुरी सो रही थी ।
पायल ने सोच कोई बात नहीं थकी होगी सोने दो । पायल ने चाय बनाई । किचन की खटरपटर से भी उसकी नींद नहीं खुली ।

आठ बजे, बच्ची को स्कूल भेजकर, पायल ने उसे चाय नाश्ता देते हुए जगाया । उठ जाओ ! थोडा काम कर लो । पंखुरी ने चाय पी और सफाई करने लगी ।



पायल ने कहा कि एक काम करो आलू शिमलामिर्च की सब्जी बना लो । और तीन रोटी बना लेना मेरे लिए । बाकी अपने लिए ।

 पायल काम कर रही थी | किचन के आवाज़ आई दीदी, आटा बच गया है तो

उसका क्या करूँ?
पायल  - आटा बचता है तो फ्रिज मे रख देते हैं |
पंखुरी - अच्छा |

दोपहर में पायल खाने बैठी तो , सब्जी बड़ी बेस्वाद लगी । जैसे तैसे खाना खाया ।
पंखुरी से बोला ये सब्जी फिर कभी मत बनाना । और अपने कमरे में चली गयी ।



पंखुरी थोड़ी देर में वापस आई और बोली, दीदी सब्जी बन गयी ।
पायल का दिमाग ठनका, पुछा -कौन सी सब्जी बन गयी?


पंखुरी - आलू शिमलामिर्च ।

पायल - अरे मैंने मना किया था वो सब्जी कभी मत बनाना । फिर क्यों बनाई  ?
पंखुरी - आपको पसंद नही आई ना इसलिए दोबारा बनाई |
पायल - सब्जी कभी मत बनाना |
पंखुरी चली गयी ।
 थोड़ी देर में आई - दीदी अब क्या करूँ ?
 पायल - सब काम हो गया? सफाई, बर्तन, कपडे?

पंखुरी - हाँ हो गए ।

पायल - जाओ फिर आराम करो ।
 चार बज चुके थे , तो पायल को चाय की तलब ए ख़ास होनी लाज़मी थी ।
पायल ने आवाज़ लगाई - पंखुरी चाय ।
साढ़े चार तक चाय की खुशबु आई न बर्तनों की आहट ।
तो पायल ने जाके देखा , पंखुरी तो हॉल में आराम से सोये पड़ी थी ।
 पायल ने खुद ही चाय बनानी शुरू की,
इतने में पंखुरी उठी और पायल की तरफ ऐसे देखा जैसे कह रही हो एक कप हमें भी बना दो ।
पायल ने सोचा चलो छोडो ।
 पायल ने चाय बनाई | उसे लगा जैसे नौकरानी वो खुद है , और मालकिन अभी सो के उठी हैं |

शाम को पंखुरी किचन में थी और पायल काम निपटा कर चाय की आशा से कमरे से निकली , पूछा -  पंखुरी क्या बनना रही हो?


पंखुरी - आलू शिमलामिर्च ।
पायल का दिमाग आलू और जबान मिर्च हो गयी, शिमला केवल नाम की बची थी वो भी सांसो मे |


बोली - तुम्हे समझ नहीं आ रहा, सुबह ही मना किया था की आलू शिमलामिर्च नहीं बनानी है ।
 मत बनाओ हमारा खाना ।


पायल ने सोचा आज के लिए बहुत हो गया । बहार से खाना मंगवाया गया और सन्नाटे में खाया गया ।

दीप भी क्या करते दिन भर के काण्ड उन्हें पता तो थे नहीं ।


सोते समय पायल ने पंखुरी को समझाया देखो, आलू शिमलामिर्च की सब्जी मत बनाना हमको पसंद नहीं है । और सोने से पहले सारे पैरदान-
 फटकार के साफ़ करके रख देना ताकि सुबह फटाफट सफाई कर सको । और
सुबह जल्दी उठ जाना ।

इतना समझा के पायल सोने चली गयी और पंखुरी पैरदान साफ़ करने लगी ।

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे । पायल दीप को दिनभर की कहानी सुना रही थी । दीप ने कहा -पायल ,किचन से आवाज़ आ रही है , देखो ।

पायल उठी तो देखा पंखुरी कुछ बना रही थी ।

पायल ने पूछा क्या बना रही हो ?
पंखुरी - आलू शिमलामिर्च ।


दिन में आज चौथी बार आलू शिमलामिर्च बन रही थी, इतनी सब्जी का क्या हुआ अभी तक यह रहस्य खुलना बाकी था ।

लेकिन पायल के दिमाग में केवल आलू बचा था । दीप ने पायल को पकड़ा ... नहीं... नहीं ... मारना मत उसे ! कण्ट्रोल ! कण्ट्रोल !
और बिना कुछ कहे, घसीट कर उसे कमरे मे ले गये |  दिमाग गरम हो तो नींद भी कहाँ आती है ।

पायल ने शिकायत , क्रोध और आतंकित स्वर के मिश्रित भाव मे बोला ... ये चौथी बार आलू शिमलामिर्च बना रही है आज |
इसके दिमाग़ मे आलू भरा है क्या?

दीप ने पूछा - लेकिन ये इतनी शिमलामिर्च लाती कहाँ से है ?

पायल - तुम्ही ला के रखते हो | खाओ |

सुबह हुई । और जैसी उम्मीद थी पंखुरी सो रही थी । पायल ने आज उसे उठा ही दिया ।
पायल - चार पराठे बना दो टिफिन के लिए ।


पंखुरी - दीदी आटा खत्म हो गया ।

पायल - अरे परसों ही तो दस किलो का पैकेट खोला था । एक दिन में कैसे खत्म हो गया ?

पायल ने जाके देखा आटे का डब्बा वास्तव में खाली था ।
पायल - आटा कहाँ गया?


पंखुरी-कल रोटी बनाई ।

पायल ने रोटी का डब्बा देखा तो भरा पड़ा था । फ्रिज में पांच किलो आटा गूंथा हुआ रखा था ।


पायल ने सौ डिग्री पे पहुँचते हुए पूछा ये क्या किया है?



पंखुरी बोली .. सुबह तीस रोटी बनाई, आटा बचा तो फ्रिज में रखा ।
फिर दोपहर को तीस रोटी बनाई , आटा बचा तो फ्रिज में रख दिया ।
फिर रात को तीस रोटी बनाई और आटा बचा तो फ्रिज में रख दिया ।



पायल - मैंने तीन रोटी बनाने कहा था, तीन । एक - दो- तीन । और बचा आटा फ्रिज में रखने कहा था । सारा आटा गूंथने को नहीं ।

और दूसरी बार तुम्हे रोटी बनानी भी थी तो पुराना आटा फ्रिज से निकाल लेती । सारा आटा ख़राब करने की क्या जरूरत थी ।



पंखुरी - आपने निकालने को तो कहा ही नहीं था ।



पायल- और चार बार जो सब्जी बनायीं उसका क्या किया?



पंखुरी - वो तो डस्टबिन में दाल दी ।

पायल समझ गयी । इससे नहीं बनने वाली ।
 बोली अब सब्जी "मत" बनाना । रोटी भी मत बनाना ।

चावल बस बना लो वो भी बस डेढ़ कटोरी ।

पंखुरी पैरदान झाड़ने लग गयी ।

पायल ने कहा की रात को झाडे थे न , फिर क्यों झाड़ रही हो?



पंखुरी - गंदे हो गए होंगे ।

पायल - रात में कौन आयेगा इन्हें गंदा करने  ।
 लेकिन और कुछ कहना दीवार पे सर पटकना था सो रह गयी और अपने काम पे लग गयी ।

दोपहर में पायल एक दम चौंकी , पता नहीं क्या ख़याल आया । किचन में जाके कुकर देखा तो पांच किलो का कुकर भरा पड़ा था चावल से ।


एकदम चिल्ला कर बोली ... इतना चावल क्यों बना लिया ?



पंखुरी - नहीं दीदी , और भी है न । और बड़े भगोने में चावल भरे हुए दिखा दिए ।



पायल - मैंने डेढ़ कटोरी चावल बोला था ,न डेढ़। एक और आधा - डेढ़  ।



पंखुरी - उतना ही तो बनाया है दीदी ।

पायल का दिमाग खत्म हो चुका था। समझ नहीं आ रहा था कि हंसे की रोये ।


बोली तुमने हमको हब्शी समझ है? या बकासुर ? जो इतना खाना खा जायेंगे ।


पंखुरी एक अजीब तरह से मुस्कुरा कर रह गयी और पायल बस खुद को कंट्रोल ही कर रही थी ।

पायल ने सोच लिया था इसको निकाल देगी ।

लेकिन उसकी कहानी जाने बिना नहीं । ये मानसिक रूप से विक्षिप्त है । सोचा शाम को ही इससे बात करेगी और अपने काम में लग गयी ।


कुछ देर में किसी ने घंटी बजायी । पायल ने आवाज़ लगाई पंखुरी देख कौन है ।
पंखुरी ने लकड़ी का दरवाज़ा खोला , देखा चार लोग खड़े हैं और बिना कुछ पूछे-कहे चली गयी ।


कुछ देर कोई हलचल न देख कर पायल ने पुछा पंखुरी कौन है ?

वो बोली कोई  बहुत से लोग हैं ।



पायल - नाम पूछा कौन हैं ?


पंखुरी - नहीं ।



पायल - पूछ के आओ |



पंखुरी दरवाज़े पे जाके बोली - कौन?



जवाब मिला - हम पड़ोस में रहते है, पायल से मिलने आए हैं ।



सुनकर पंखुरी चली गयी और अपने काम में लग गयी ।

थोड़ी देर में पायल को लगा अभी तक पूछा नहीं ? बोली - पंखुरी पूछा कौन है?



पंखुरी - हाँ दीदी , पड़ोस के लोग हैं, आपसे मिलने आये हैं ।



पायल - हे भगवान्। तो मुझे बताएगा कौन ?

और खुद ही दरवाज़ा खोलने में भलाई समझी ।

इस बार क्या बला उठा लायी थी पायल ।
खुद ही नहीं समझ पा रही थी ।
 शाम हुई, पंखुरी को बुलाया गया।

पायल ने बड़े प्यार से पुछा  - तुमको कोई दिक्कत है?

पंखुरी - नहीं ।


पायल - अनपढ़ हो?


पंखुरी - नहीं ।


पायल - हिंदी समझ तो आती है न?

पंखुरी - हाँ ।


पायल - तो खाने को लेकर ऐसा क्यों किया?


पंखुरी - दीदी मैं तो अच्छे से करती हूँ । किसी को पसंद नहीं आता | पिछली वाली दीदी को भी सब्जी अच्छी नही लगती थी |



पायल समझ गयी थी की क्यों यह  40-50 घरों में काम कर चुकी थी ।



पायल - पिछले घर में क्या क्या काम करती थी?



पंखुरी- बच्चे देखती थी ।


पायल - तो बच्चे को नहलाती धुलाती थी?



पंखुरी - नहीं वो तो उनकी माँ करती थी ।



पायल - तो तुम खाना खिलाती थी?



पंखुरी - नहीं वो तो उनकी माँ करती थी ।



पायल - तो तुम उनको घुमाती, खिलाती थी?



पंखुरी - नहीं वो तो उनकी माँ करती थी ।



पायल - पंखुरी ! तो तुम क्या करती थी?



पंखुरी - बच्चे देखती थी । मैं देखती थी ।



पायल - मतलब एक तरफ बैठके देखती थी?



पंखुरी- हाँ , वो खेलते थे ।


पंखुरी - दीदी एक बात कहें?

पायल - बोलो |


पंखुरी - मेरा नाम , बांसुरी है । पंखुरी नहीं ।



पायल - तो दो दिन से क्यों नहीं बताया ?



पंखुरी- सोचा आपको बुरा लगेगा ।



पायल - सच बताओ तुम्हारे परिवार में कौन कौन है?



पंखुरी - भैया हैं , भाभी हैं और दो बच्चे हैं ।


पायल - भैया भाभी के बच्चे हैं ?


पंखुरी - नहीं मेरे बच्चे हैं ।काम करते हैं ।


पायल - तुम कह क्या रही हो,तुम्हे पता भी है?  तुम्हारी शादी हो गयी? कहाँ रहते है बच्चे तुम्हारे?



पंखुरी - शादी पहले हुई थी । दो बच्चे हैं , दोनों काम करते हैं ।



पायल समझ गयी थी की यह बीमार है । इससे कुछ भी कहना ठीक नहीं है ।

या तो उसके जीवन में कुछ ऐसा घटित हुआ है जिसके सदमे से वो अभी तक उबर नही पायी
या उसे कोई मानसिक बीमारी है ।

उसे वापस एजेंसी छोड़ने का फैसला तो पायल कर चुकी थी ।
और सुबह ही उसे छोड़ भी आई थी ।
लेकिन उस महिला की वास्तविक कहानी शायद कभी पता नहीं चल पायेगी ।


पायल ने बात ख़तम करते हुए स्वामी से कहा अब समझ आया ? क्या हुआ था ?

स्वामी - अच्छा | चलो ये तो ठीक है की उसे वापस भेज आईं | लेकिन ये बताओ उसे लाइन क्यूँ थी ? पिछली वाली का क्या हुआ जो तीन महीने से थी?

पायल - उसने मेरे घर मे सावधान इंडिया बना दिया |

स्वामी - क्या? इससे पहले मेरा मन किसी ग़लत आदमी पे शक करे, बता ही दो |

पायल - शुक्रवार को रात को तीन बजे तक, मेरे घर पे पुलिस बैठी थी |

स्वामी - क्यों?

पायल - गुरुवार की बात है |


पायल कपड़े धो कर आई , तो पीठ मे स्ट्रेन हो गया, और गिर पड़ी और न उठ सकी न चीख सकी |
बस रोने लगी |

नौकरानी ने दीप को फोन लगा दिया , दीदी गिर गयी हैं | और बहुत रो रही हैं | जल्दी आ जाओ |

वो अपना काम छोड़ कर निकल गये |

थोड़ी देर मे मुझे आराम लगा और मैं बेहतर महसूस करने लगी | इतने मे उसने फिर फोन कर दिया -
और न जाने क्या कह दिया |
दीप शायद लिफ्ट मे ही थे, फ़ोन काट के बुरी तरह घबराए से दौड़ते हुए घर मे आए |

पायल को बैठा देखकर थोड़े शांत हुए , लेकिन भभक पड़े | ऐसे कौन बोलता है | उनका गुस्सा चौबीसवे माले पे था |

पायल - आख़िर क्या बोला इसने ?
दीप - इसने बोला - भैया , दीदी शांत हो गयीं है | मैं क्या समझता बोलो |

नौकरानी को समझाया गया देखो ऐसे नही बोलते हैं | इसका मतलब अलग होता है |
बात ख़तम हुई |


स्वामी - लेकिन इसमे सावधान इंडिया कहाँ से आया |
पायल - वो कभी और सही | बस इतना समझ लो कि इस बार बड़ा कांड होते हुए बचा है | नौकरानी ने छत पे से प्लमबर को घर मे बुलाया था | और..

स्वामी - और...बस रहने दो , अकेले मे दोनो कीर्तन तो कर नही रहे होंगे |

पायल - हाँ ! बस - रात को दोनो को पुलिस के हवाले किया है | बड़ा कांड बचा है घर मे | लेकिन डर लगने लगा है | सुरक्षा  कहीं नही है, और नौकरानियों से तो बहुत डर गयी हूँ |
एक तरफ मजबूरी है , जो जीने नही देती और बीमारी मे भी काम करने को मजबूर करती है | पंखुरी की कहानी बहुत उलझी हुई है | और ये दूसरी वाली, इसने तो खुद ही कुएँ मे कूदने की सोच ली है | http://sirajay.blogspot.in/2018/03/blog-post_25.html

गुरुवार, 22 मार्च 2018

छठी के मास्साब

लोगों को छठी का दूध याद आना सुना होगा । कभी छठी के मास्साब याद आना सुना है? गणित का नाम सुनते ही मन में कौंध जाते हैं हमारे मास्टरजी । उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि वे याद नहीं आते बल्कि मन में कौंध जाते हैं । उनसे हमारा जीवन परिचय छठी कक्षा में हुआ था ।

जी सच समझा आपने , हमें अपने छठी के मास्साब याद आ रहे है और वो भी गणित के । संस्मरण में कुछ छात्रों के कुक्कुट स्वरुप में रूपान्तण ,और उनके अनोखे व्यक्तित्व के सिवा विशेष कुछ नहीं ।
दरअसल उनके व्यक्तिव का घनत्व हमारे गणित के ज्ञान के भार से मेल नहीं खाता था ।

वे कुंटल में पढ़ा के जाते थे, और हमारे दिमाग में मिलीग्राम बचता था । वे एलजेब्रा कहते थे हमें काली सफ़ेद धारी वाला ज़ेब्रा सदृश होता था । छोटे छोटे बाल और उनके नीचे अंडाकार मुख मंडल । बातों में ठेठ देशीपन का तड़का । साधारण कद काठी, बस उनकी बाह्य देहयष्टि की इतनी ही विशेषता थी |

एक बार बस उनके हत्थे चढ़ गए थे । उन्होंने टेबल याद करने बोला -बीस तक । अपन को याद हुई कच्ची पक्की ।  क्लास में घुसते ही उन्होंने धर लिया एक दिन । बोले टेबल याद है , मना तो कर नहीं सकते थे सो हाँ बोल गए । अब उन्होंने खेलना शुरू किया के.बी.सी ।

बताओ - 12 x 12 ? बताओ - 18 x 8 ? बताओ - 16x9 ? अब सब उत्तर निकले 144 ।

और हमारे दिमाग में इसी अंक की धारा  लग गई। उन्होंने जब चौथा पूछा 17 x 9 तो मुह से निकल गया 144 । बस क्या था करारी करारी जलेबी छानी गयी । हमारे साथ समस्या यह थी कि उनका पीरियड भी होता था छठा ।

छठा पीरियड कहने को तो छठा होता था, लेकिन लंच के बाद का पहला होता था । और खाना खाने के बाद आती थी नींद । अब आप सोच के देखिये एक तरफ मदमस्त नींद का झोका, और दूसरी तरफ से खोपड़ी की जलेबी बनाने में सिद्धहस्त मास्टरजी दोनों एक साथ क्लास में आते थे ।

खुली आँखों से सोचने की कला हम सबने वहीँ से सीखी । जैसे ही किसी को ऊंघता देखते उसकी जटाओं को मुष्टिका में धर लेते । और खोपड़ी की जलेबी बनाने की प्रक्रिया स्वरुप मुंड को घुमा घुमा कर  कुंडली बना देते ।

इनके भय से छात्रों के झुण्ड के झुण्ड अपनी जुल्फों का परित्याग कर सेना के रंगरूट की हेयर स्टाइल अपना लिए थे । अच्छा जलेबी निर्माण के साथ वह एक मन्त्र भी बोलते जाते, घुग्गू बने बैठे , घुग्गू बने बैठे , पढ़ना लिखना है नहीं घुग्गू बने बैठे ।

कसम खा रहे हैं उन्ही मास्टर जी की, कि हमें कभी समझ नहीं आया की ऐसा क्यों कहते थे । और कौन की हिम्मत की उनसे पूछे ये घुग्गु की होता है । समय बीत और घुग्गु मन में कही छिप गया । वो तो एक दिन अपने बच्चों को चिड़ियाघर घुमाने ले गए वहाँ उल्लुओं के एक पिंजरे पर पढ़ा ... घुग्गु ।

और यकीन मानिये छठी के मास्साब याद आ गए , और हम जोर जोर से ऐसे हंसे की पेट में बल पड गए ।
गणित का बड़ा पुराना सवाल आज हल हुआ था । तब पता चला था कि घुग्गु उल्लुओं की एक प्रजाति है जो दिन में ऊंघती रहती हैं ।

कभी कभी विचार आता है संसद में उंघने वालों की खबर लेने एक बार बस मास्साब पहुँच जाएँ और एक बार बाल पकड़ कर घुमाते हुए कह दें ... काम कल्ले काम ...घुग्गु बने बैठे । कसम से कोई सांसद कभी नहीं सोयेगा संसद में ।

यह कल्पना मात्र नहीं है, वास्तव में वे मास्साब हैं । कहाँ है ये पता नहीं, लेकिन हमारे मन में कौंधते रहते हैं । अब तो बुजुर्ग हो गए होंगे , उनका अभिनंदन और धन्यवाद । नाम लिख सकता हूँ किन्तु नहीं लिखूंगा क्योंकि उनका आदर सर्वोपरि है, उनका मजाक बनाना मेरा  उद्देश्य नहीं ।

यह सब तो मात्र हम सब घुग्गुओं की मनोदशा का रेखाचित्र है ।

बिस्कुट का गबन

एक बार गणित की कक्षा चल रही ही | मास्टर जी ने पूछा , १५० को १० से भाग देने पर क्या मिलेगा?
बच्चे थोड़े अबोध थे तो मजेदार बनाने के लिए मास्टर जी ने सवाल थोड़ा घुमाया |
अगर लाला की दुकान से १५० बिस्कुट ले आएँ और तुम १० बच्चों मे बाँटा जाए तो सबको कितने बिस्कुट पैकेट मिलेंगे ?
मास्टर जी ने उत्तर समझते हुए कहा सबको १५-१५ बिस्कुट मिलेंगे सकते हैं |
बच्चे समझ गये और अगले सवाल पे बढ़ गये |
लेकिन सवाल बगल के मैदान में घास खोद रहे बंटाधारी ने सुन लिया | अब स्कूल मे जब भी बच्चे आते , उनसे पूछता .. क्यों भाई, १५ बिस्कुट मिले क्या ? रोज का नियम बना दिया | रोज पूछता १५ बिस्कुट का क्या हुआ ?
तुम्हारे मास्टर जी झूठे है , इतने दिन हो गये बिस्कुट नही दिए | दुकान के लाला को पैसे दे दिए और बिस्कुट लाए ही नही |
अक्सर कक्षा मे तीन तरह के बच्चे होते हैं | एक समझदार टाइप जो पढ़ाया हुआ समझते हैं , दूसरे होते हैं एवरेज टाइप जो पढ़ाया हुआ रटते हैं लेकिन पास होते रहते हैं , तीसरे टाइप के होते हैं ढपोलशंख जो न समझते हैं ना रटते हैं, दरअसल वे  स्कूल आते नही है भेजे जाते हैं | समझदार बच्चे तो बंटाधारी की बात सुनके सर पीट लेते | कुछ बच्चे सोचते की क्या सच मे बिस्कुट मिलना था? लेकिन आगे बढ़ जाते |

लेकिन तीसरे किस्म के बच्चो को यकीन हो गया कि मास्टर जी उनके बिस्कुट का गबन कर बैठे हैं, और कहते जब तक बिस्कुट नही मिलेंगे स्कूल नही जाएँगे | बंटाधारी इसी से खुश था की चलो जितनों ने छोड़ा , छोड़ा तो | मेरे पीछे घास खोदने दो चार तो रहेंगे |