शुक्रवार, 29 मार्च 2019

अब राष्ट्र नहीं रुकेगा


भारत एक बड़ा राष्ट्र है और यहाँ प्रत्येक क्षण किसी किसी स्थान पर कुछ विशेष घट रहा होता है. यह राष्ट्र जितना विशाल है उतना ही क्रियाशील भी है. रुकना भारत ने कभी नहीं सीखा, सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मृत्यु, शांति-युद्ध, बाढ़-सूखा सभी कुछ यह दिव्य राष्ट्र समभाव से देखता हुआ आगे बढ़ता जाता है और यहाँ तो इतना कुछ एक साथ होता रहता है कि किसी भी घटनाक्रम को राष्ट्र घटित होते हुए देख ही रहा होता है और दूसरा घटनाक्रम शुरू हो जाता है.
किन्तु कुछ विशेष वर्ग हैं जो राष्ट्र को रोकने की भरपूर चेष्टा करते हैं. कोई कोई बहाना चाहिए कि गति पर विराम लगाया जा सके. बंद बुलाने वाले, रेल रोकने वाले, संसद में काम रोकने वाले, आवश्यक निर्णय टालने वाले या अन्य प्रकार के अनावश्यक विवाद खड़ा करने वाले सभी इसके दोषी हैं.
विशेषकर जब भी चुनाव आते हैं तब सरकार के हर कदम को केवल और केवल चुनाव से जोड़कर देखा जाने लगता है और चुनाव कहीं कहीं होते ही रहते हैं और आम चुनाव कोई एक दो दिन में तो होते नहीं, इस बार लगभग ढाई माह चुनाव में लगने वाले हैं. तो क्या ढाई महीने सारा राष्ट्र निष्क्रिय हो जाए? चुनाव के समय सरकार से अपेक्षा की जाती है कि सरकार कुछ करे. सरकार का हर निर्णय संदेह की दृष्टि से देखा जाता है.
सरकार तो एक तरफ राष्ट्र में होने वाली किसी भी सामान्य घटना को भी शंका की दृष्टि से देखा जाता है. यह सब इसलिए क्योंकि नेहरू के समय से ऐसा होता रहा है. अगर कोई आर्थिक गतिविधि होती है तो विपक्ष कहता है चुनाव के कारण हुई है, अगर कोई सुरक्षा से सम्बन्धित गतिविधि सामने आती है तो भी उसपर प्रश्न किया जाने लगता है.
पुलवामा की घटना होती है, तो सरकार की विफलता बताते हुए विपक्ष मुखर हो उठता है और जब सरकार उत्तर देती है तो इसे चुनाव से जोड़कर प्रश्न करने लगते हैं. अगर देश में चुनाव हैं उस समय कोई आकर हमपर आक्रमण कर दे और हम उत्तर भी दें, क्योंकि चुनाव है? राष्ट्र की सुरक्षा को चुनाव से अलग कर देना आज के समय की मांग है. सुरक्षा स्वाभाविक है और किसी दल का नहीं सरकार का विषय है.
उसी प्रकार अंदर के शत्रुओं पर जब कोई सुरक्षा एजेंसी कार्यवाही करती है तब भी प्रश्न क्यों उठाए जाते हैं, यह समझ से परे है. अगर चुनाव चल रहे हैं तो क्या किसी अपराधी को खुला छोड़ दिया जाना चाहिए? आयकर विभाग की रेड हो या किसी भी अन्य विभाग का सामान्य कामकाज, चुनाव से जोड़ कर देखना कितना उचित है? इसका एक कारण हमेशा से इन विभागों का होता रहा राजनैतिक दुरुपयोग है.
आज जो कांग्रेस कर्णाटक में आयकर विभाग के सामने बैठी है कल तक उसने राजनैतिक लाभ के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी. एक दशक पूर्व ही आयकर विभाग के छापे समर्थन लेने देने के लिए प्रयोग होते थे. वो तो भला हो जनता का जिसे समझ गया कि सत्ता की चाबी अगर एक को नहीं दी तो सारे मिलकर नोच लेंगे देश को और अधिकतर सरकारें पूर्ण बहुमत के साथ आईं.
इसके परे एक मत यह है कि अगर ये विभाग स्वतंत्र हों तो चुनाव हों या हों अपना काम करती रहें. जो अपराधी है सो है , चुनाव की आड़ में किसी को बचने देना अपने आप में एक अपराध है.
इसका एक सीधा उपाय यह है कि विभाग अपना काम करते रहें , विपक्ष आरोप  लगाए और सरकार उसका श्रेय ले. जो विभाग कर रहे हैं वह उनका कर्त्तव्य है, उसपर प्रश्न उठा कर विपक्ष स्वयं सरकार को उसका श्रेय लेने का अवसर  देता है.
ऐसा ही कुछ देखने को तब मिला जब प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के एक अंतरिक्ष महाशक्ति बन जाने की घोषणा की. यह किसी दल की घोषणा नहीं थी, सरकार की घोषणा थी.प्रधानमंत्री ने भी अपनी बात रखते हुए विशेष ध्यान रखा कि सन्देश प्रधानमंत्री से जनता को जाए, उसमें दल बीच में आए. प्रधानमंत्री ने श्रेय वैज्ञानिकों को दिया, कि खुद लिया. लेकिन बात स्वयं कही, क्योंकि उसके बाद उत्तर उन्हें विश्व को देना है.
अगर अन्य देशों से कुछ प्रतिक्रियाएं आती हैं तो उनको भी प्रधानमंत्री को ही झेलना है. विपक्ष इसे राष्ट्र की बड़ी उपलब्धि बता कर वैज्ञानिकों को बधाई दे सकता था, किन्तु विपक्ष को एक मौका मिला उपहास करने का , और बीच में नेहरू को ले आएवे शायद इस उपलब्धि तो काम आंक रहे हों या समझ ही पा रहे हों लेकिन उनका इसे चुनाव से जोड़ देना अपने आप में आश्चर्य का विषय है. वैज्ञानिकों ने यह एक दिन में नहीं किया होगा इसमें वर्षों तक परिश्रम किया होगा और जब यह  उपलब्धि प्राप्त हुई तो प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को तुरंत सूचित किया. इसमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण है पूरे मिशन को इतना गुप्त रखा गया कि किसी ने कल्पना भी नहीं की. उसके बाद विपक्ष के आरोप कि चुनाव के समय यह नाटक किया, तो प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता को प्रणाम है.
जिन्होंने इस पन्द्रह मिनट के भाषण के लिए वर्षों पहले ही वैज्ञानिकों को काम पर लगा दिया, फिर कुछ माह पहले लक्ष्य करने के लिए एक (या एक से अधिक भी) सैटलाइट अंतरिक्ष में पहुंचा दिए और चुनाव के समय उन्हें भेद कर श्रेय ले लिया. सोचिये उन्होंने और कितने दूर की बात सोच रखी होंगी. कांग्रेस इसमें स्वयं उपहास का पात्र बनी और नेहरुजी को भी उपहास का पात्र बना दिया. बात को राष्ट्र के गौरव से जोड़कर समाप्त किया जा सकता था.
ऐसी ही जाने कितनी घटनाएं होती हैं और हमारे यहाँ एक प्रचलन बन चुका है कि चुनाव है तो अभी यह नहीं करेंगे, वह नहीं होगा. राजनीति को एक तरफ रख कर सोचना आज के समय की मांग है और इस दिशा में वर्तमान सरकार ने उम्दा कार्य किया है. राष्ट्र निरंतर चलता है और व्यवस्था भी निरंतर ही चलनी चाहिए , पदों पर बैठे हुए नेता बदलते रहें, सत्ता में बैठी हुई पार्टियां बदलती रहें, किन्तु राष्ट्र नहीं रुकना चाहिए.

बुधवार, 27 मार्च 2019

आसमानी घोषणापत्र

नब्बे के दशक में छात्र बड़ी दुविधा में रहते थे। शिक्षक पढ़ाते थे प्रधानमन्त्री अमुक महानुभाव हैं, लेकिन परीक्षा के समय बदल जाते थे। कभी कभी तो परीक्षा और परिणाम के बीच में बदल जाते थे। छात्र बेचारे दुविधा में रहते थे कि जो पढ़ा था वो सही है, या जो लिख दिया था वो सही है या जो लिखने के बाद हो गया है वो सही है। वैसा ही कुछ शायद शिक्षकों के मन में रहा करता हो।

पारले जी के पैकेट पर छपे बालक के बाद आजीवन बालक रहने का वरदान केवल एक ही बालक को मिला वो हैं राहुल जी। राहुल जी में जो ये जी है वही उनके जीवन का ग्लूकोस है, और वही कांग्रेस का ग्लू कोष है जिससे कांग्रेस बंधी हुई है।

 राहुल जी जब चुनाव की तैयारी में उतरे तो जी जान लगा दिया जी तैयारी तो उन्होंने यू.पी.एस.सी लेवल की की थी।
सिलेब्स में सब याद कर लिया नीरव मोदी, माल्या, मेहुल चौकसी आदि महापुरुषों का जीवन परिचय तो जुबानी याद था, इतना कि सोते जागते कुछ भी पूछें तो भी सुना देते थे। लेकिन इनके पूर्वजों पर लगे अभिशाप और देश पर परमेश्वर की असीम कृपा से इन महानुभावों को मुँह छुपा कर जीवन यापन करने की नौबत आ गई और एक एक कर धरे जाने लगे।
राहुल जी ने जो कुछ याद किया था उस पर पलीता लग गया। मूल समाप्त हो गया तब परीक्षा में भी इनका औचित्य समाप्त हो गया। बड़ी कठिनाई से तो यह याद किया था,
सिलेबस बदलने से दिल डूबा जा रहा था।
अब कुछ नया चाहिए था। अब परीक्षा सामने थी सिलेबस खुल गया था। यह पता नहीं था कि क्या पढ़ें क्या लिखें।

तब इन्हें बहत्तर का आंकड़ा याद आया। बहत्तर छेद वाली छलनी में से पहले लोग छाने जाएँगे जो बहत्तर  साल से इनकी बातों में बहते रहे हैं। बहत्तर हूरों के लिए मर मिटने वालों को जीते जी मुफ़्त बहत्तर हज़ार मिल जाएँ और क्या चाहिए। यूँ समझिये जीते जी एक हज़ार ही एक हूर है।

अब अपना सिलेबस खुद ही लिख लिया गया है। अब कुछ भी पूछा जायेगा उत्तर बहत्तर ही आएगा। बहत्तर कहेंगे, बहत्तर लिखेंगे। भारत के बहत्तर टुकडे करने का स्वप्न पालने वाले प्रसन्न हैं और विकास की आस लगाने वाले सन्न हैं।

यहाँ छप्पन भोग की थाली परोसने में लगे मोदी के पकवान का स्वाद लोग ले ही रहे थे और उधर बहत्तर टन की बिरयानी परोसने के लिए प्लेटें लगा दी गईं। बिरयानी के लिए चावल कहाँ से आएगा यह पता नहीं, गोश्त किसका नोचा जाना है यह तय है।

कितनी सड़क, कितनी रेल, कितने रोजगार, सुरक्षा, सुविधा यह सब पीछे छूट जाएगा। परीक्षा में अब यह कोई नहीं पूछेगा कि बहत्तर के अलावा और क्या लिखा है उस आसमानी घोषणापत्र में?

मंगलवार, 19 मार्च 2019

जंगल का राजा


एक लोमड़ी सियारों के झुण्ड की तरफ बदहवास सी दौड़ी चली रही थी. सियार एक मरे हुए पशु का मांस नोचते हुए लड़ रहे थे.  कुछ कुत्ते भी वहीं बैठे हुए सूखी हडियों को चूसते हुए गुर्रा रहे थे. दो चार गिद्ध और कौए भी अपना हिस्सा ले कर भागने का मौका ढूंढ रहे थे.
लोमड़ी हाँफते हुए आई, पहले तो सियारों ने  गुर्रा कर नए आगंतुक को भगा देना चाहा. जब दुष्टजन सभा कर रहे हों वहां प्राणों का भय रहता ही है. लोमड़ी ने फिर भी एक सांस में कहा –“मैं तो खबर देने आई हूँ. खबर तो सुन लो.“
एक सियार सामने आया और बोला –“जल्दी कहो, लेकिन एक बोटी की भी अपेक्षा मत करना. अभी हम अपना खाना बांटने की परिस्थिति में नहीं हैं.”
लोमड़ी ने कहा -पहले खुशखबरी तो सुन लो शेर एक बीमारी के बाद चल बसा है. जंगल में शोक की लहर दौड़ गई है. शेर के डर से ही सभी जंगल का कानून मानते थे, उसके साथी और मित्र बहुत दुखी हैं. मुझे लगता है तुम सबको भी वहां चलना चाहिए.”
सियार ने लार टपकाते हुए कहा- “ओह शेर चल बसा. ये तो अच्छा ही हुआ अब हमारी बारी है जंगल पर दावेदारी ठोक देने की. अब हम जंगल पर राज करेंगे. चलो बता देते हैं ये सबको कि हम सियार ही अब सबसे शक्तिशाली है.”
लोमड़ी ने कुटिलता से मुस्कुराते होते हुए कहा- “लेकिन ऐसे समय में ये बात कहना ठीक रहेगा, एक दिन तो रुक जाते, उन्हें शोक तो मना लेने देते. “
“शोक! कैसा शोक? ये जो गिद्द की चोंच देख रही हो उस शेर के शव को फाड़ कर खा जाने के लिए अभी से फड़फड़ाने लगी है. हम सब सियार उसके मांस को नोच कर खा जाने को कब से दांत पैने कर तैयार बैठे हैं.”  सियार ने दांत भींचते हुए कहा.
गिद्दों ने कहा –“अच्छा हुआ मर गया, बहुत दिनों से शेर का मांस नही खाया और वे सब उस तरफ उड़ गए. “
लोमड़ी ने समझाने के बहाने उकसाने का  प्रयास किया – “थोडा तो सोचो, जंगल के बाकी पशु क्या कहेंगे? तुम्हें कैसे अपना राजा मान लेंगे? ये तो घोर असंवेदनशील बात कह रहे हो तुम.”
“यह जंगल है, सियार बोला, और यहाँ शक्ति ही सबकुछ है. आज शेरों का झुण्ड कमजोर है और हम ज्यादा है, आज निर्णय  कर के ही रहेंगे. जाओ सबको सूचना देदो हम पूरे झुण्ड के साथ शेर की गुफा पर कब्जा करने आ रहे हैं, जो भाग सकता है वो भाग जाए.”
लोमड़ी ने कहा – “लेकिन जंगल का कानून यह नहीं कहता, नया राजा चुना जायेगा कोई ऐसे ही कब्जा कर के राजा नहीं बन सकता.”
सियार ने अपने राजनैतिक ज्ञान का परिचय देते हुए कहा – “तो क्या और पशु जंगल पर राज करने के लिए नहीं सोच रहे होंगे. जिसमें थोड़ी सी भी शक्ति होगी वह जंगल का राजा बनने का सपना  जरूर देख रहा होगा.”
लोमड़ी ने कहा – “होगा लेकिन कोई ऐसी बातें खुले आम नही कह रहा होगा. थोड़ा धैर्य से काम लो. तुम वैसे तो शेर की एक दहाड़ से डर जाते थे, अब जब वह मृत पड़ा है तो उसका स्थान लेने के लिए लार टपका रहे हो. चाहो तो मैं तुम्हारे पक्ष ने माहौल बना सकती हूँ, ताकि तुम्हे पशु स्वीकार करें ,अन्यथा विरोध बना रहेगा.”

सियार ने कहा –“तुम्हे ऐसे ही बुद्दिमान नहीं कहते हैं, सोचो हमें जंगल का राज मिलते ही तुम्हे भी खाने के लिए तरसना नहीं पड़ेगा. तुम्हे मुलायम खरगोश पसंद हैं, हम तुम्हारे लिए खरगोशों की कतार लगा देंगे. लेकिन इससे पहले जंगल के पशु किसी को चुन ले जाओ तुम हमारे नाम की घोषणा  कर दो. हम पीछे पीछे आते हैं. “
लोमड़ी को सफ़ेद मुलायम खरगोशों के मांस की गंध आने लगी थी. वह जाकर अपने काम पर लग गई.

शोकमग्न शेर के शावकों को भयभीत करने हेतु कहने लगीअब तो तुम्हारे पिता नहीं रहे यह स्थान छोड़कर चले जाने में भलाई है. जाने कौन तुम्हारे प्राणो का शत्रु हो. “
उधर शेर के मित्रों से कहने लगीअब शेर तो रहा नहीं अब तुम मेरी बात मानो जिसे मैं कहूं उसे समर्थन देकर राजा बनाओ तुम्हे कोई कमी रहेगी.”
लोमड़ी अपने प्रयास में लगी थी, उसे जब विश्वास हो गया था कि सियारों की सत्ता आई ही समझ लो. उसने ये खबर सियारों को देने के लिए दौड़ लगा दी.  
इतने में ही शेर के मित्रों ने कहा - ये सियार हमें शोक करने का समय भी देंगे. अगर हम शोक में डूब गए तो अवश्य ही ये कोई षड्यंत्र कर जंगल का राजपाट हथिया कर सभी पशुओं का जीना मुश्किल कर देंगे . उसपर जो समर्थक शेर के नाम से ही उसके साथ सत्ता से जुड़े थे वे भय या लालच वश कहीं षड्यंत्र का शिकार हो जाएँ, जितना विलंब होगा सत्ता के उतने दावेदार उठ खड़े होंगे, अतः विलम्ब करना उचित नहीं है.
एक विद्वान ने कहा - एक दिन का शोक तो कर लेते आज ही सब करना आवश्यक है क्या?वो तो सियार हैं शव खाते हैं, लेकिन हम सत्ता के लिए अपने संबंधी का शोक भी करें? यह उचित नहीं.
तब एक मंत्री ने उत्तर दिया - हम शोक में पड गए तो सियार धमकेंगे और फिर कोई पशु सुखी रह सकेगा. यह समय कर्म करने का है.
इस प्रकार की मंत्रणा कर शेर के एक कुटुम्बी और दो समर्थकों को संयुक्त रूप से राजा घोषित कर दिया गया.
उधर जब सियारों को यह पता चला कि सत्ता उनके हाथ नही आई वे सब लोमड़ी पर ही टूट पड़े और उसे मार कर खा गए.