सर्दियों का मौसम था ।
सुबह की ठण्ड में चाय के साथ आग तापने जब लोग अंगीठी के आसपास जमा होते हैं तो बातों का ऐसा सिलसिला चलता है कि घंटों खत्म नहीं होता । अंगीठी जलती जाती है उसमे लकडी डलती जाती है, बातों के विषय में रूचि और अपने अपने काम के अनुसार लोग आते जाते रहते । लेकिन सिलसिला नही टूटता । शादी के लिए सब रिश्तेदार जुड़े थे । सो अंगीठियां भी लगी थी और गप्पों का सिलसिला भी चल रहा था ।
ऐसी ही एक अंगीठी के पास उत्पल मास्टर आकर बैठे ।
"और बताओ भैया कैसा चल रहा है सब"
"राम राम भैया, सब बढ़िया है रामजी की कृपा से"
"क्या चल रहा , खेती किसानी में? अब तो सब की किसानी डूबी सी है"
"अरे नहीं भैया, ठीक ठाक है, ठीक फसल आई इस बार"
"अरे कहाँ ठीक, किसानों की हालत खराब है देश में, विद्रोह पे उतर आये हैं"
"हमारे यहाँ तो ऐसा कुछ नहीं "
"ऐसे कैसे नहीं है, देखो वो देवीदीन कितना परेशान है, पूरी फसल बर्बाद हो गयी उसकी"
"किसानी है भैया ,हो जाती है किसी किसी की खराब"
"हाँ ,तो सरकार की जिम्मेदारी तो बनती है, कि नहीं"
"दिलवाया था सरपंच ने कुछ मुआवजा लोगों को "
"अरे, मुआवजे से क्या होता है, चारो तरफ हाहाकार मचा है,जब से ये सरकार आई है"
"भैया दो चार की फसल हर साल खराब होती है, वो तो भला हो फसल बीमा का, कि आजकल मदद हो जाती है"
"अरे बीमा से क्या? वो, मनोहर तो जहर खा गया था"
"भैया मनोहर की तो अलग है,अपने घरवालों से लड़झगड़ के गुस्सा गया था, और कोई परेशानी थोड़ी है"
"अरे लेकिन है तो किसान, परेशान है तो सरकार को मदद करनी चाहिए"
"काका कैसी बात कर रहे हो, उसके घर की बातों में कहाँ घसीट रहे सरकार को"
"लेकिन गन्ना किसान परेशान तो है"
"पर हमारे गाँव में गन्ना तो होता ही नहीं"
"तो जहाँ होता है, वहां का परेशान है, कल को तुम भी हो जाओगे"
"पर मैं तो किसान हूँ ही नहीं, मैं तो दूकान चलाता हूँ"
"अरे तो व्यापारी भी तो परेशान है gst से "
"पर गाँव में तो हम gst के दायरे में आते ही नही, छोटी मोटी दुकानदारी है"
"अरे !तो कभी तो आओगे"
"भैया जब आयेंगे तो दे देंगे, अभी तो फ़ालतू बैठे थे, सरकारी योजना से लोन मिल गया, तुम्हारी भौजी के नाम पर |
सो छोटी सी दुकान में बिस्कुट नमकीन बेचना शुरू कर दिया,फिर थोडा किराना,अभी हम gst में नहीं आते। जब आयेंगे तो देने लायक कमाई भी तो होगी"
"पर परेशान तो तुम होंगे ही इस सरकार से, हमें इनको उखाड़ फेंकना है ,हम सब पर अत्याचार हो रहा है। बेरोजगारी पनप रही है , त्राहि त्राहि कर रही है जनता।"
"भैया अब बतायें तो , तीन साल पहले बनी फ़ोर लेन, फिर फ़ोर लेन के किनारे बने ढाबे, फिर ये बिस्कुट की फैक्टरी लग गयी गाँव के बाहर, गांव का बहुत सा मजदूर उसमे लग गया | त्राहि त्राहि हमारे गाँव में तो नहीं दिखती "
"पर जतिन का लड़का तो बेरोजगार है"
" वो अलग नालायक है, दस बार लगी लगाई नौकरी छोड़ चुका है, पिछली बार तो चोरी करते पकड़ा गया औ निकाल दिया गया"
"अरे तो है तो बेरोजगार"
"देखो भैया, ये सब तो हमेशा से होता आया है और होता रहेगा, सब लोग और सब दिन एक से नहीं होते, एक घर के चार लोगों में सबकी कमाई एक सी नहीं होती । कुछ न कुछ परेशानी चलती रहती है |लेकिन समाधान सब मिल के निकालते हैं न की रोते गाते हैं । गाँवों में समस्याएं हैं लेकिन आज की उपजी नहीं है । बस हम समाधान की तरफ कैसे जाते हैं ये महत्त्वपूर्ण है और अभी तो सब ठीक जाते लग रहा है"
"अरे ऐसे कैसे ठीक जा रहा है, तुमने अखबार पढ़ा है?"
"नहीं"
"टीवी पर प्राइम टाइम तो जरूर देखा होगा"
"दूरदर्शन आता है भैया वही समाचार सुनते हैं"
"तब तुम्हे क्या पता होगा"
" बस इतना पता है की अभी अपनी जिंदगी सुकून से कट रही है"
"तुम समझ ही नहीं रहे हो, परिस्थिति बड़ी विकट है"
"जाने दो भैया काम पर, फिर कभी समझाना"
"बैठो थोडा बताते है उस दिन टीवी में क्या आ रहा था"
"भैया क्या बहस करें अब तुमसे, तुम्ही जीते, दुकान खोंले जाकर, शाम को पंगत में मिलते हैं, दोने ले जाना दुकान से , राम राम"
आखिर अंगीठी की सभा उठ ही गयी ।
#angeethi
#अंगीठी
सुबह की ठण्ड में चाय के साथ आग तापने जब लोग अंगीठी के आसपास जमा होते हैं तो बातों का ऐसा सिलसिला चलता है कि घंटों खत्म नहीं होता । अंगीठी जलती जाती है उसमे लकडी डलती जाती है, बातों के विषय में रूचि और अपने अपने काम के अनुसार लोग आते जाते रहते । लेकिन सिलसिला नही टूटता । शादी के लिए सब रिश्तेदार जुड़े थे । सो अंगीठियां भी लगी थी और गप्पों का सिलसिला भी चल रहा था ।
ऐसी ही एक अंगीठी के पास उत्पल मास्टर आकर बैठे ।
"और बताओ भैया कैसा चल रहा है सब"
"राम राम भैया, सब बढ़िया है रामजी की कृपा से"
"क्या चल रहा , खेती किसानी में? अब तो सब की किसानी डूबी सी है"
"अरे नहीं भैया, ठीक ठाक है, ठीक फसल आई इस बार"
"अरे कहाँ ठीक, किसानों की हालत खराब है देश में, विद्रोह पे उतर आये हैं"
"हमारे यहाँ तो ऐसा कुछ नहीं "
"ऐसे कैसे नहीं है, देखो वो देवीदीन कितना परेशान है, पूरी फसल बर्बाद हो गयी उसकी"
"किसानी है भैया ,हो जाती है किसी किसी की खराब"
"हाँ ,तो सरकार की जिम्मेदारी तो बनती है, कि नहीं"
"दिलवाया था सरपंच ने कुछ मुआवजा लोगों को "
"अरे, मुआवजे से क्या होता है, चारो तरफ हाहाकार मचा है,जब से ये सरकार आई है"
"भैया दो चार की फसल हर साल खराब होती है, वो तो भला हो फसल बीमा का, कि आजकल मदद हो जाती है"
"अरे बीमा से क्या? वो, मनोहर तो जहर खा गया था"
"भैया मनोहर की तो अलग है,अपने घरवालों से लड़झगड़ के गुस्सा गया था, और कोई परेशानी थोड़ी है"
"अरे लेकिन है तो किसान, परेशान है तो सरकार को मदद करनी चाहिए"
"काका कैसी बात कर रहे हो, उसके घर की बातों में कहाँ घसीट रहे सरकार को"
"लेकिन गन्ना किसान परेशान तो है"
"पर हमारे गाँव में गन्ना तो होता ही नहीं"
"तो जहाँ होता है, वहां का परेशान है, कल को तुम भी हो जाओगे"
"पर मैं तो किसान हूँ ही नहीं, मैं तो दूकान चलाता हूँ"
"अरे तो व्यापारी भी तो परेशान है gst से "
"पर गाँव में तो हम gst के दायरे में आते ही नही, छोटी मोटी दुकानदारी है"
"अरे !तो कभी तो आओगे"
"भैया जब आयेंगे तो दे देंगे, अभी तो फ़ालतू बैठे थे, सरकारी योजना से लोन मिल गया, तुम्हारी भौजी के नाम पर |
सो छोटी सी दुकान में बिस्कुट नमकीन बेचना शुरू कर दिया,फिर थोडा किराना,अभी हम gst में नहीं आते। जब आयेंगे तो देने लायक कमाई भी तो होगी"
"पर परेशान तो तुम होंगे ही इस सरकार से, हमें इनको उखाड़ फेंकना है ,हम सब पर अत्याचार हो रहा है। बेरोजगारी पनप रही है , त्राहि त्राहि कर रही है जनता।"
"भैया अब बतायें तो , तीन साल पहले बनी फ़ोर लेन, फिर फ़ोर लेन के किनारे बने ढाबे, फिर ये बिस्कुट की फैक्टरी लग गयी गाँव के बाहर, गांव का बहुत सा मजदूर उसमे लग गया | त्राहि त्राहि हमारे गाँव में तो नहीं दिखती "
"पर जतिन का लड़का तो बेरोजगार है"
" वो अलग नालायक है, दस बार लगी लगाई नौकरी छोड़ चुका है, पिछली बार तो चोरी करते पकड़ा गया औ निकाल दिया गया"
"अरे तो है तो बेरोजगार"
"देखो भैया, ये सब तो हमेशा से होता आया है और होता रहेगा, सब लोग और सब दिन एक से नहीं होते, एक घर के चार लोगों में सबकी कमाई एक सी नहीं होती । कुछ न कुछ परेशानी चलती रहती है |लेकिन समाधान सब मिल के निकालते हैं न की रोते गाते हैं । गाँवों में समस्याएं हैं लेकिन आज की उपजी नहीं है । बस हम समाधान की तरफ कैसे जाते हैं ये महत्त्वपूर्ण है और अभी तो सब ठीक जाते लग रहा है"
"अरे ऐसे कैसे ठीक जा रहा है, तुमने अखबार पढ़ा है?"
"नहीं"
"टीवी पर प्राइम टाइम तो जरूर देखा होगा"
"दूरदर्शन आता है भैया वही समाचार सुनते हैं"
"तब तुम्हे क्या पता होगा"
" बस इतना पता है की अभी अपनी जिंदगी सुकून से कट रही है"
"तुम समझ ही नहीं रहे हो, परिस्थिति बड़ी विकट है"
"जाने दो भैया काम पर, फिर कभी समझाना"
"बैठो थोडा बताते है उस दिन टीवी में क्या आ रहा था"
"भैया क्या बहस करें अब तुमसे, तुम्ही जीते, दुकान खोंले जाकर, शाम को पंगत में मिलते हैं, दोने ले जाना दुकान से , राम राम"
आखिर अंगीठी की सभा उठ ही गयी ।
#angeethi
#अंगीठी
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