शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

स्वंयवर

अहो ! कैसी सुंदरी है । सभा में बैठे हर पुरुष के चक्षु न केवल सुंदरी के रूप लावण्य पर केंद्रित थे, किन्तु मन उस सुंदरी के सानिंध्य की कल्पना में अनुरक्त था।

अत्यंत रूपवान ,गुणवान, तेजमयी रूपसी | अनेकों श्रृंगार किये हाथ में वरमाला लिए किसी सुयोग्य, समर्थ, सदाचारी एवं संपन्न वर को वरने हेतु तत्पर थी । रूपसी चिरयौवना प्रतीत होती थी, अंग अंग से यौवन अपने अभी अभी होते आगमन का आभास करा रहा था । सुशोभित वस्त्रों से शुभ्र ज्योत्स्ना प्रवाहित होती लग रही थी ।

स्वर्णाभूषणों से रूपसी का रूप पुलकित हो उठा था, और काले कुंतल मोतियों से ऐसे शुशोभित थे जैसे यामिनी का आकाश अनेकों तारामंडलों से शुशोभित हो ।
अहो ! कैसी रूपसी । एक दृष्टि पाकर ही दृष्टा  सदा  के लिए अतृप्त हो जाए  |

उसका तेज , कोटि कोटि सूर्यों को लज्जित करने में सक्षम और वह धन्य हो जाये जिसे वह वरमाला से सुसज्जित कर दे । रूपसी का सानिध्य ही पुरुष को सर्वोच्च , सर्वशक्तिमान राजपुरुषों के मध्य श्रेष्ठतम आसन दे दे ।

वह रूपसी अपने सुकोमल नाना रत्न मणिक्यों से निर्मित कंगनों से सुसज्जित हाथों में वरमाला और ह्रदय में कम्पन तथा नेत्रों में लज्जा का आभूषण धारण करे , स्वयंवर की प्रतीक्षा में थी । नवविंश प्रकार के रत्न और सप्त धातुओं से निर्मित आभूषण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे |

वह सभा में उपस्थित समस्त राजपुरुषों, वीरों और ज्ञानियों को  देख रही थी । सबका अवलोकन कर रही थी । वह कौन होगा जो उसे वर ले जायेगा ।
अहो ! वह कौन भाग्यशाली पुरुष , उसका स्वामी होगा ।

जब सभी गणमान्य उपस्थित हो गए तब स्वयंवर के नियमो की घोषणा की गयी । जो भी स्वयं को श्रेष्ठ मानता हो वह अपने गुणों से समस्त सभा को प्रभावित करे । जिसके प्रति सभा का सर्वाधिक झुकाव होगा वही वरमाला का अधिकारी होगा ।

जो वरमाला पहनेगा वह समस्त सम्पदा का स्वामि होगा । किन्तु उसे अपना जीवन केवल एक प्रकार से रणभूमि में बिताना होगा । उसे सब त्यागना होगा, विवाह के पश्चात ब्रह्मचर्य का व्रत धरना होगा । रूपसी की रक्षा ही परमधर्म मानना होगा और अपनी निष्ठा का प्रण लेना होगा । बताया गया कि कन्या को एक भयावह रोग है, और केवल वही पुरुष आगे आये जो स्वयं को पूर्ण समर्पित कर सके । इस विवाह में तपस्या अधिक है आनंद कम ।

सब ओर सन्नाटा छा गया, घोर गर्जनाएं, शांत हो गयीं । उत्तेजित मनों में अतृप्त आकांक्षाओं ने शयन करने में अपनी भलाई समझी ।

जब देखा कि सभा में कोई पुरुष आगे आने को तत्पर न हुआ तब एक ऋषि ने स्वयं को उपस्थित किया और बोले -

मैं स्वयं उपस्थित होता हूँ ,
यह विष प्याला पी लेने को,
इस रूपसी का करूँ वरण,
हूँ तत्पर प्रण अभी लेने को ।

दीप्त भाल, गौर वर्ण,  विशाल वक्ष और मुख पर तेज़ । ऋषि का स्वरुप और आभामंडल ही सभा को प्रकाशमान कर रही थी ।
रूपसी ने ऋषि को देख कर मन ही मन प्रणाम किया और सोचा, क्या ये?

उधर जब राजपुरुषों ने देखा कि यह रूपसी तो एक साधु के साथ जाती है , तो उन्होंने आपस में मिलकर निर्णय किया और सर्वसम्मति से एक कुमार को प्रस्तुत कर दिया । गौर वर्ण, देव सामान रूप। कपोलों में पड़ते गड्ढे कुमार के राजप्रासादों में ही पलने का प्रमाण देता था । कुमार के सुकोमल अंग, उन्नत देहयष्टि प्रमाण था की वे कभी सूर्य की तपिश में भी बहार नहीं निकले । पहले तो कुमार स्वयं ही छुई मुई हुए जाते थे । अदृश्य भय कम्पन उनके रोम रोम में झंझावात उत्पन्न कर देता । कुमार किसी प्रकार से विवाह हेतु तत्पर नहीं लगते थे । वे या तो स्वयंवर देखने आये थे, या उन्हें भेजा गया था । परंतु जब भद्र पुरुषों ने उन्हें ही अपना प्रतिनिधि बना दिया तब वे कर ही क्या सकते थे ।

उद्घोषक ने प्रश्न किया दोनों महानुभाव अपना परिचय दें ।

ऋषि क्योंकि पहले प्रस्तुत हुए थे सो प्रथम आमंत्रण उन्ही को प्राप्त हुआ । उन्होंने कहना प्रारंभ किया -

मैं रजकण से उत्पन्न पुरुष,
जीता आया हूँ रज में ।
पृष्ठभूमि कुछ नहीं मेरी ,
पडो नहीं कुछ अचरज में ।
अपने तप और पुण्य से,
आज ऋषि हूँ ,
अपने कर्मो के ही प्रताप से,
मैं स्वयं शशि हूँ ।
मैं विरक्त हूँ,
शक्ति भक्त हूँ,
वरमाला का अधिकारी ।
मुझमे है वह प्रताप,
कर सकूँ दूर,
रूपसी की बीमारी ।

इतना कहकर ऋषिवर ने अपना स्थान ग्रहण किया । सभा साधु साधु कर उठी ।

रुपसी अब और किसी का कुछ नहीं जानना चाहती थी, वह वरमाला ऋषि को पहनाकर उनकी हो जाना चाहती थी । उनकी बातों से वह इतनी प्रभावित हुई कि उसे अनुभव हुआ कदाचित ऋषिवर ही उसका जीवन बचा पायेंगे ।

अब कुमार को अपना परिचय देना था । कुमार प्रातः काल और रात्रि के संधिकाल की तरह धीरे धीरे खुले । फिर सकुचाते हुए बोले -

मैं राजकुल का गौरव हूँ,
मेरे परनाना राजा थे,
मेरी दादी रानी थी,
और पिता थे राजकुंवर,

मैं रात्रि को भोर,
समझ उठता हूँ,
देखो मेरे कोमल नयन नक्श,
और कपोलों के दो भंवर ।

मेरे पीछे है कुल मेरा,
सेवक मेरे, जीवन संकुल मेरा

अब उद्घोषक ने प्रश्न किया अपने गुण बताइये  प्रमाण दीजिये कि आप श्रेष्ठ हैं |

ऋषि बोले -

मैं तप्त कनक,
मैं वैरागी,
मैं कर्मयोग का अनुयायी,
सरिता स्वर्ग से लाया हूँ,
उत्तम उद्यम कर आया हूँ

कुमार बोले -

मैं राजवंश का मोती हूँ,
मेरी कीमत खुद पहचानो,
मुझपर मोहित हैं अप्सराएं,
बस मुझे योग्य वर ही जानो

उद्घोषणा हुई अब इनके साथ आये लोग समर्थन में कुछ कहे  ताकि निर्णय हो सके ।

ऋषि के शिष्य बोले -

ये बैरागी बाबा हैं ,
धर्म योग के ज्ञाता है,
ये हैं सेवक पालनकर्ता,
सबके अग्रज भ्राता हैं,
इनके हैं हम सब अनुचर
कौन इनसे सुयोग्य वर
ये जब बोलें सब सुनते हैं
इनकी ही माला गुनते हैं
बस ये समर्थ हैं
बाकि व्यर्थ हैं
अपने अंतर्मन मन की सुनो
हे रूपवती तुम इन्हें चुनो

रूपसी को लगा कि वरमाला तो ऋषि को ही पहना देनी चाहिए । उनसे प्रभावित हुए बिना रह भी कैसे सकती थी । किन्तु कुमार को सुनना अनिवार्यता थी |

कुमार के समर्थकों को लगा की किंचित कुमार पीछे रह गए हैं । अब शुरू किया उन्होंने -

कुमार ही कुलीन हैं,
शांत रहते हैं सदा,
बड़े ही शालीन हैं ।

कर लेंगे काम भी
जब सर पे पड़ेगी,
अभी अनुभवहीन हैं ।

रूपसी का रूप
इनपे ही शोभता है
बड़े नाना के नवासे हैं ।

वर रूप धरें स्वामी अब,
हम भृत्य लोग ,
देखने को प्यासे हैं ।


सभा दो पक्षों में बंट चुकी थी , कोई एक और कोई दूसरी ओर  | निष्पक्षता अपराध थी , हर किसी को एक न एक पक्ष लेना था | अब अंतिम परीक्षण बाकी था | किस पराकाष्ठा तक जाने को तत्पर हैं दोनों महानुभाव | 

उद्घोषक ने पुछा - अब ये बताएं कि अगर आपका विवाह आज रूपसी से नहीं होगा तो आप क्या करेंगे ?

कुमार समर्थक बोले -

फिर भीषण विध्वंस करेंगे , नष्ट करेंगे ये स्वंयवर । चहुँ और हाहाकार मचा देंगे । अगर या विवाह होगा तो कुमार से ही अन्यथा रूपसी का वध होगा |


और ऋषिवर आप ?
हमारा क्या है जी, परिव्राजक हैं, हमारा क्या बिगड़ेगा, हम तो झोला उठाएंगे और चल देंगे ।

इतने में रूपसी बोल उठी - ऋषिवर आप तो झोला लेकर चल देंगे । लेकिन मेरा क्या होगा जो आपको वरने को तत्पर हूँ?
क्या आप इन कुमार के भरोसे मुझे छोड़ देना चाहते है, जिनका एकमात्र गुण इनके गालों में पड़े भंवर हैं?

.... इति  ....

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