रविवार, 31 मार्च 2024

नेता की आत्मा

चुनाव के समय आत्मा कचोटती है और अंतरात्मा जागती है। यह सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन आत्मा शरीर छोड़कर भटकने लग जाए ऐसा केस यमलोक में कभी नहीं आया था। तीन दिन पहले, पृथ्वी लोक से इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिली कि एक जीव अपने शरीर को छोड़कर खुला घूम रहा है। फाइलों में तलाशा जा रहा था कि ऐसा कोई विधान, नियम-कानून, प्रक्रिया या कोई रिफरेन्स केस मिल जाए जिसके आधार पर आगे कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। अब तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया था जिसमें कोई जीव अपनी इच्छा से शरीर से बहार निकलकर घूमने लग जाए। फोन के, बिजली के बड़े बड़े बिल और गाडी के चालान देखकर आम आदमी के शरीर से आत्मा निकलने की घटनाएं सुनी गई हैं लेकिन वे तुरंत अपने शरीर में घुस जाती हैं। भटकते हुए ऊर्जा मंत्रालय या सड़क परिवहन मंत्रालय में जाकर मंत्री के ऊपर मंडराने नहीं लगतीं।



यमराज परेशान बैठे थे। उनका सर घूम रहा था। टीवी पर चलते समाचार देखकर और घूम जाता। चित्रगुप्त पच्चीस हज़ार फाइलों को छान चुके थे। एक तरफ क्लाउड पर स्टोर किये हुए आर्काइव फाइलों में भी ढुंढाई चल रही थी और दूसरी तरफ सीसीटीवी फुटेज भी खंगाला जा रहा था। कहीं कुछ मिलता ही न था।

सिक्योरिटी के मद्देनज़र प्रोटोकॉल तो यह था कि आत्मा शरीर को तभी छोड़ सकती है जब कम से कम एक यमदूत सामने हो। यमलोक से प्रक्रिया आरम्भ होती थी, जिसमें रिटर्न आर्डर जारी होता। यमदूत प्राणी के पास पहुँचकर पहले उसका बायोमेट्रिक स्कैन करता और फिर मिलान के पश्चात चित्रगुप्त कार्यालय में अनुमोदन के लिए याचिका भेजता। चित्रगुप्त कार्यालय से ओटीपी मिलने के बाद ही यमदूत कहता चलो शरीर से बहार निकलने का समय आ गया। इसके बाद जीव को सीधा यमपुरी में डिलीवर कर दिया जाता। भटकने का अवसर ही नहीं।

अगर कभी किसी जीव से गलती से उसका शरीर छूट भी जाता तो प्रोटोकॉल के अनुसार उसे शरीर के आसपास रहने की हिदायत थी ताकि वेरिफिकेशन प्रक्रिया आसान हो सके। शरीर से दूर जाने पर उसके भटकने की सम्भावना भी रहती और किसी और भटकते जीव के उस शरीर पर अधिकार जताने की भी।

आत्माएं भटकती हैं लेकिन वो ऐसी आत्माएं होती हैं जिनका अप्रूवल चित्रगुप्त कार्यालय से नहीं आता या जिनका बायोमेट्रिक स्कैन फेल हो जाता। ऐसी आत्माओं के लिए यमलोक का जनसम्पर्क विभाग लोकअदालत के कैम्प लगाकर निपटारे की व्यवस्था भी करता था। लेकिन यह केस अलग था, यह प्राणी जिंदा था। उसका शरीर जेल में था और आत्मा बाहर भटक रही थी। शरीर घर से मंगवाकर खाना खा रहा था। उसका शुगर और बीपी घट बढ़ रहा था। अदालतों के चक्कर काट रहा था। और तो और जिन अदालतों में वकीलों को हिंदी बोलने नहीं मिलती वहां हिंदी में भाषण भी दे रहा था। निश्चित रूप से यह किसी नेता का ही शरीर था।

लेकिन जेल में रहने के बाद भी शरीर का नेतापन गया नहीं था। उसका शरीर जेल में नेतागिरी कर रहा था और आत्मा बहार भटक कर जनसमस्याओं को देख रही थी। हालाँकि जब तक आत्मा शरीर में थी, जनसमस्याएं तो तब भी दिख सकती थीं, लेकिन शरीर आलसी होता है। आत्मा को न घूमने देता है न कुछ देखने देता है। इसलिए जब आत्मा बहार निकली और घूमने लगी तब उसे गन्दी नालियाँ , पानी की सप्लाई , सड़क के गड्ढे, कूड़े के ढेर, अस्वस्थ बूढ़े, धूल में लिथुरे बच्चे और भूखे भिखारी सब दिखने लगे। याद रहे यह सब आत्मा को दिख रहा है। शरीर को तो अभी भी जेल, जेल से बहार निकलने का रास्ता और किसी तरह से आरोप प्रत्यारोप कर के बचने की ही चिंता थी।

इधर शरीर जांच एजेंसियों के सामने बातें बना रहा था उधर आत्मा उस नेता की पत्नी के माध्यम से जनसम्पर्क कर रही थी। आत्मा ने कहलवाया कि नेताजी ने कहा है कि - अब वो दिन गए जब काम करवाने के लिए अर्जियां लिखनी पड़ती थीं, दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे, नेता से मिलने और सिफारिश लिखवाने के लिए दौड़ भाग करनी पड़ती थी। अब तो सिर्फ आँख बंद कर के ध्यान लगाने पर ही नेता को अपने आसपास महसूस किया जा सकता है। बस आँख बंद करके ध्यान लगाइए और अपनी शिकायत बताइये। समाधान तुरंत होगा। जेल से आदेश देने से जनसेवा का भाव थोड़ा ज्यादा आता है।

यमराज परेशान इस बात से थे कि आखिर किस प्रक्रिया से यह जीव शरीर छोड़कर भटक रहा है और अगर जीव भटक रह है तो शरीर नेतागिरी जैसे कैसे कर रहा है। इसका अर्थ तो यह था कि आत्मा भी नेता है और शरीर भी। एक साथ दो दो नेता एक मनुष्य की तरह कैसे रह सकते हैं। इस बात से यह तो पता चलता था यह नेता बार बार पलटता क्यों है, लेकिन एक मनुष्य के अंदर दो नेता होना अवश्य कोई विभागीय त्रुटि थी। वह त्रुटि कहाँ हुई है इसी का पता लगाने के लिए सारा यमलोक व्यस्त था।

यमराज एक दूत को धरती पर भेजना चाहते थे, लेकिन डर था कि कहीं ऐसा न हो वह आत्मा उसका पीछा करते करते यमलोक में आ जाए। नेता की आत्माएं तो बहुत आई हैं लेकिन सब नेतागिरी धरती पर छोड़कर आई हैं, यह तो आत्मा स्वयं ही नेता बनी घूम रही है उसने यमलोक में नेतागिरी शुरू कर दी और यमराज को ही भ्रष्ट बताना शुरू कर दिया तो?

डर तो यह भी था कि अगर कोई कार्यवाही न की गई तो वह पृथ्वी पर यह कहता घूमेगा कि यमराज उससे डरते हैं इसीलिए उसे यमलोक में घुसने नहीं दे रहे। यमराज के लिए तो एक तरफ कुआँ और एक तरफ खाई थी। वे चाहते तो यही थे कि किसी तरह आत्मा को ढूंढकर उसे वापस उसके शरीर में ढूंस दिया जाए। दोनों कुछ साल जेल में रहें तो संभवतः उसकी नेतागिरी निकल जाए।

लेकिन किसी सीसीटीवी फुटेज में आत्मा दिखती ही न थी। अफवाह थी कि कोई न कोई आँख बंद करता और झट से आत्मा उसके पास पहुँच जाती। यमराज इसी डर से आँख बंद नहीं कर पा रहे थे कि कहीं उन्होंने आँख बंद की और गड़बड़ हो गई तो? ऊपर से कुछ शरीर ऐसे कपडे पहने घूम रहे थे जिसपर लिखा था मैं भी आत्मा, क्वांटिटी पचास। बताइये क्वांटिटी पचास। ऐसा भी कोई करता है क्या? एक शरीर में एक आत्मा का ही विधान है। जिसमें से कम से कम आत्मा से तो सदाचार की उम्मीद की जाती है। यहाँ शरीर और आत्मा दोनों कुधर हैं और क्वांटिटी पचास।

इतने में नारद जी वहाँ आ पहुँचे, परस्पर अभिवादन के बाद जब उन्होंने यमराज से परेशानी का कारण पूछा तो यमराज ने ऊपर लिखी सारी बातें कह सुनाईं। नारद बोले - "यमदूत को भेजने में समस्या है तो मैं देख आता हूँ। आत्मा मिली तो आदरपूर्वक उसे शरीर में वापस जाने के लिए कह दूँगा।"

यमराज ने उन्हें नेता की आत्मा पर एक रिपोर्ट तैयार करने धरती पर भेज दिया।

नारद जी पहले राजघाट पहुँचे। जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान में देख लिया जीव न दिखा। विधानसभा में भी गए , वहाँ की सूनी कुर्सियाँ बता रही थीं कि जीव यहाँ भी नहीं है। नारद सीधे उस मंत्री के पास पहुँचे जिसके पास नेता के आदेश पहुँच रहे थे, देखा मंत्री कुछ टाइप कर रही थी। नारद ने कहा जैसा नेता वैसी उसकी मंत्री। फिर भी उस मंत्री से पूछा - "यह क्या आदेश टाइप कर रही हो?"

"नेता जी का आदेश है। "

"किसने आदेश दिया है, शरीर ने या आत्मा ने? शरीर से मिलने तो तुम गई नहीं और आत्मा यहाँ दिखती नहीं।"

"उनकी आत्मा तो हम सबके अंदर है। वहीं से आदेश आते हैं। "

"अच्छा, उनकी आत्मा तुम्हारे अंदर है? फिर तुम्हारी आत्मा कहाँ है?"

"हमारी आत्मा भी हमारे अंदर है, उनकी आती जाती रहती है। "

"फिर तुमको कैसे पता चलता है कि आदेश किसकी आत्मा दे रही है? "

"जब भी हमें संदेह होता है या हमारी आत्मा हम पर हावी होने लगता है, तब तो यह कसौटी आजमाते हैं :

हम उनकी शकल याद करते हैं और अपने दिल से पूछते हैं कि जो कदम उठाने का विचार कर रहे हैं, वह उनके लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेंगे? यानि क्या उससे उन लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? या पार्टी को कुछ चंदा मिल सकता है? जब स्वराज्य और चंदा शब्द सुनाई देते हैं तब हमारा संदेह मिट जाता है और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ समाप्त हो रही है। तब हम समझ जाते हैं यह नेताजी की ही आत्मा है जो आदेश दे रही है।"

"अच्छा, तो थोड़ी देर को उनकी आत्मा से बात करवा दो। कुछ पूछताछ करनी है। "

"पूछताछ के लिए जेल जाइए, शरीर अभी पूछताछ के लिए जेल में उपलब्ध है। आत्मा अभी व्यस्त है।"

"चलिए बातचीत ही कर लेने दीजिये, बुलाइए।"

"वो तो यहाँ नहीं नहीं।"

"फिर कहाँ हैं?"

"यह नहीं पता। आप जाइए यहाँ से।"

नारद वहाँ से निकले, सोचने लगे कहाँ हो सकती है वह आत्मा। एक दुखी आवाज़ सुनकर समझ गए कि हो न हो आत्मा वहीं होगी। उस कमरे में पहुँचे जहाँ प्रेस कांफ्रेंस की रिकॉर्डिंग हो रही थी। वे जानते थे, आत्मा कहीं भी भटकती रहे लौटकर इस कमरे में जरूर आएगी।

उस नेता की पत्नी ने सन्देश पढ़ना शुरू किया – "जी मैं -मैं नेताजी की पत्नी। नेताजी बड़े निडर और ईमानदार हैं, सच्चे देशभक्त। देशभक्ति उनके रोम रोम में है। रोम इटली में है। इटली से तो पता ही है कौन आया है। इटली यूरोप में है। यूरोप में यूके भी है। यूके में लन्दन है। लन्दन में आजकल हमारे एक नेता हैं। उनकी आत्मा अभी अभी उनको छोड़कर वापस आई है। शरीर उनका अब भी लन्दन में ही है। लेकिन मेरी आत्मा तो यहीं है। आपके बीच में।

नेताजी को आपकी बड़ी चिंता है। वे जानते हैं कि आपको भी उनकी बड़ी चिंता है। आप उनके लिए व्रत कर रहे हैं। मन्नत मांग रहे हैं। आप उनको आशीर्वाद दीजिये। यही हमारा अभियान होगा। आप उनको सन्देश दीजिये, आपके सन्देश उनतक टिफिन में रखकर पहुँचा दूँगी। आशीर्वाद सबको देना पड़ेगा, कोई थोड़ा दे दे कोई ज्यादा देदे, जिसको और ज्यादा देना हो और ज्यादा दे दे।"

नारद ये सब सुनकर घूम गए। कहने लगे - नारायण नारायण, गज़ब नौटंकी है।

इतने में नेता की पत्नी आँख बंद करके उसे याद करने लगी, लेकिन आत्मा वहाँ नहीं आई। नारद ने सोचा आश्चर्य है, कोई आनगांव का आदमी याद करे तो आत्मा वहाँ पहुँच जाती है, लेकिन पत्नी के याद करने पर यहाँ नहीं आई? यह आत्मा भी अन्य पतियों की तरह पत्नी पीड़ित जान पड़ती है। जब जगह घूम लेगी लेकिन पत्नी के सामने आने में प्राण सूखते हैं।

नारद जी ने सोचा अब तो जेल चलकर उस शरीर से ही मिल लेना चाहिए। ऐसे विचित्र प्राणी के दर्शन साक्षात करना चाहिए। नारद जी जेल पहुँचे। देखा तो वह नेता वहाँ पुलिस वालों से कह रहा था - "इतने छोटे घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया है तुम लोगों ने। इतने में तो चांदनी चौक का पॉकेटमार भी गिरफ्तार न हो। तुम लोगों को हाय लगेगी।"

पुलिस वाले बोले - "छोटा?"

"१०० करोड़ में होता क्या है आजकल नेताओं का?"

"वो तो तुम बताओ क्या होता है?"

"इतने तो खर्च हो जाते हैं। खर्च हो गए तो फिर कैसा घोटाला। छोड़ दो मुझे। "

"छोड़ देंगे बस फोन का पासवर्ड बता दो। "

"तुम लोग भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेज दो चलेगा, लेकिन फोन का पासवर्ड नहीं बताऊंगा?"

"जब साफ़ सुथरे हो तो बता दो। छूट जाओगे फिर अपनी नेतागिरी करते रहना।"

"नहीं दूंगा। तुम मेरा तलाक करवाना चाहते हो।"

"सच्ची बता रहे सिर्फ भ्रष्टाचार की जाँच करेंगे। बाकी कुछ नहीं देखेंगे। कुछ दिखा भी तो देखकर डिलीट कर देंगे। "

"देखकर डिलीट कर दिया होता तो पासवर्ड देने में भी क्या ही दिक्कत थी।"

"तो पड़े रहो यहीं। "

"मेरा शरीर ही कैद कर लोगे न। आत्मा को नहीं कर पाओगे।"

इतने में नारद बोले -"मुझे बता दो आत्मा है कहाँ। जरूरी काम है।"

"तुम कौन? तुमसे मतलब?" वह बोला।

"कुछ नहीं पुरस्कार देना है। सोच रहे है शरीर तो बंद है आत्मा को ही दे दें। मिल ही नहीं रही। "

"नहीं मिलेगी। जैसे इनको पासवर्ड नहीं मिल रहा।"

नारद के दिमाग की बत्ती जली। "नारायण नारायण" कहते हुए वापस यमराज के पास गए और अपनी रिपोर्ट में लिखा - "आत्मा के भटकने की बातें झूठी हैं। नेता ने फैलाई हैं। उसकी आत्मा वही जेल में है। उस फोन में जिसका पासवर्ड पुलिस उससे माँग रही है। पासवर्ड मिलते ही उसकी आत्मा अपने आप उसके शरीर में वापस घुस जाएगी।"

शुक्रवार, 29 मार्च 2024

भारत एक असहमति प्रधान देश है

असहमति लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। हमारे देश में सर्वसम्मति से तो दालभात भी नहीं बनता। लोग दाल पर सहमत हो जाएं तो उड़द-अरहर पर असहमत हो जाएंगे।

इसी सब के चलते भारत असहमति प्रधान देश बन गया है। यहाँ हर कोई एक दूसरे से असहमत है। अवसर मिलते ही असहमति व्यक्त कर दी जाती है। या यूं कहें कि हर व्यक्ति असहमति व्यक्त करने के लिए अवसर की प्रतीक्षा में तत्पर रहता है।
कोई किसी से सहमत नहीं है चाहे वो परिवार हों, पड़ोसी हों, पड़ोस के गांव के हों या राज्य के। कई बार तो आदमी अपने आप से भी सहमत नहीं होता। ऐसे में एक दूसरे का विरोध करने वाले राजनैतिक दलों से क्या ही अपेक्षा की जाए। राजनैतिक दलों का काम ही एक दूसरे से असहमत रहना है। संसद और चुनावी सभाओं में सहमति–असहमति से बोर हो चुके राजनैतिक दल गठबंधन करते हैं। गठबंधन में सहमति और असहमति बिलकुल लिव इन की तरह होती है। दो दल साथ में होते हैं, सारे कर्म और कांड साथ में करते हैं लेकिन अपने रिश्ते से इनकार करते हैं। साथ रहते हैं लेकिन अपने वोटबैंक के सामने स्वीकार नहीं करते। मौका मिलने पर एक दूसरे पर धारा 21 जरूर लगवा सकते हैं। जैसे कह रहे हों हमने साथ में सरकार तो चलाई लेकिन इसमें हमारी सहमति नहीं थी। उन्होंने जबरदस्ती हमसे सरकार चलवा ली।
बिहार में तो रात भर में गठबंधन बदल जाता है। जैसे मुख्यमंत्री कुछ फूंक लेते हैं तो लालटेन टांग लेते हैं और नशा उतरते ही फूल। ये लालटेन और फूल वाले भी चंद्रमुखी और पारो की तरह अपने देवदास को प्रेम करती हैं। पारो ब्याही तो कांग्रेस से है, पर सत्ता के लिए देवदास जब नशे में द्वार पर आता है तो व्याकुल हो उठती है। इधर चंद्रमुखी तो वैसे भी सबको अपने से मिलाने के लिए तैयार बैठी हुई है। देवदास के पहुंचते ही स्वागत को तैयार मिलती है।
यही हाल दिल्ली में है। दिल्ली में जो अच्छा है, पंजाब में खराब है। सोचने की बात है कि क्या कांग्रेस के इतने बुरे दिन आ गए कि अपने आत्म सम्मान को किनारे रखकर उसी के साथ गठबंधन कर लिया जो दिल्ली में उनके पतन का कारण बना। उसपर भी कम सीटों में मान गए, तुर्रा ये कि पंजाब में दोनों अलग लड़ेंगे। मतलब दिल्ली में गले में बाहें डालेंगे और पंजाब जाकर फंदा। सोचकर देखिए प्रचार क्या गजब का होगा। सुबह दिल्ली में कांग्रेस वाले कह रहे हैं, हमारे गठबंधन को वोट दीजिए। हम तो एक माता की दो संतानें हैं और शाम को वही कांग्रेस वाले पंजाब में कह रहे हैं भाई है तो क्या हुआ बात जमीन की आयेगी तो गला काट देंगे। दिल्ली में आप–कोन, पंजाब में आपकौन?
वैसे तो दिल्ली के अवतारी (वे स्वयं कहते हैं कि धरती पर उनका जन्म फलां प्रयोजन से हुआ है) मुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद कांग्रेस के पास अवसर था अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः जगाने का। उनसे गठबंधन तोड़कर अकेले लड़कर शक्ति प्रदर्शन तो कर सकते थे। लेकिन दिल्ली में उनके संगठन ने "पापा नहीं मानेंगे" बोलकर चुप रहना ठीक समझा।
उड़ीसा में शंख और फूल किसी बड़े प्रयोजन का लक्ष्य साध कर गठबंधन करने को सहमत हो गए थे। फिर अचानक असहमत होकर अपने अपने रास्ते चल दिए।
कार्यकर्ता छोड़िए विधायक और सांसद भी अपनी पार्टी के निर्णयों से सहमत नहीं दिखते और जब तब क्रॉस वोटिंग कर देते हैं। कुछ तो सुबह कहते हैं सब अफवाहें फैलाई जा रही हैं और शाम को अपने अपमान से आहत होकर या नेतृत्व द्वारा अनदेखी करने के कारण पलट जाते हैं। लगता तो ऐसा है कि अफवाहें भी स्वयं फैलाते हैं। पार्टी लाइन से असहमत नेताओं में कांग्रेस के आनंद शर्मा भी आ गए, कहने लगे वे पार्टी की जातिगत जनगणना की घोषणा से असहमत हैं। उनकी पार्टी ने इसी बात पर तो चुनाव लडने का मन बनाया हुआ है।
एक तरफ बैंगलोर से एक ऐसे व्यक्ति को टिकट दे दिया जाता है हो दक्षिण भारत को अलग देश बनाने की मांग करता है, दूसरी तरफ भारत जोड़ो यात्रा चल रही है। जब सबको जाति, धर्म, भाषा आदि के आधार पर अलग-अलग करना है तो क्या जोड़ने चल रही है? जाहिर है आप अपने प्रत्याशी के अलगाववादी विचारों से सहमत हैं।

विचार तो वैसे नेताओं के होते नहीं, केवल सुविधा और अवसर होते हैं। प्रचार के समय तो कुछ भी कर्ण प्रिय बोल सकते हैं। जनता भी इन के प्रचार करने वालों से पूछ सकती है, आप कौन हैं? पार्टी या ब्रोकर? फिलहाल इनका एक दूसरे के साथ मिलकर चुनाव लडना ब्लाइंड डेट की तरह है, मामला जमा तो ठीक नहीं तो एक दूसरे पर जबरदस्ती का आरोप लगा कर कोर्ट में घसीटते फिरेंगे। इनकी नीयत "फ्रेंड्स विथ बेनिफिट्स" वाली है। चुनाव नेताओं से जो न करवाए वो कम है। चुनाव लडने तक साथ दिखने वाले कब अलग दिशाओं में चल दें कौन जानता है?


शनिवार, 9 मार्च 2024

२०२४ : मुद्दे,चुनाव और विकल्प

विपक्ष के तमाम नेता सरकार बनाने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि मोदी को हटाने की बात कर रहे हैं। इनको कौन समझाए कि भाई मोदी को हटाने से काम नहीं चलेगा, मोदी की जगह कौन लेगा यह भी तो बताओ। सरकार गिराना अलग बात है, सरकार बनाना और चलाना अलग बात है। जहाँ विपक्ष में आपस में इतनी सरफुटौव्वल है कि एक राज्य में साथ हैं दूसरे में विरोध में, तो ये मिलकर सरकार कैसे चलाएंगे? जबकि परिस्थित भी ऐसी है कि कांग्रेस अपने दम पर सौ सीटें लाने की बात सोच भी रही है या नहीं यह निश्चित नहीं है। फिर देश का नागरिक यह प्रश्न क्यों न पूछे कि भाई आपका नेता कौन है?

मोदी को गाली देने से वोट नहीं मिलेंगे, मोदी का विकल्प देने से मिलेंगे। आप अपना पक्ष रखिये। स्पष्ट कीजिये आपकी क्या नीयत और नीति है। अगर कोई नीति है तो पहले वहाँ लागू कीजिये जहाँ आपकी सरकार है। 

लेकिन नहीं, आपने एक लाइन पकड़ रखी है - अडानी-अम्बानी को कोसना और मोदी पर व्यक्तिगत अभद्र टिपण्णी करना। मोदी इस मामले में बहुत किस्मतवाले कहे जाएंगे कि उनके प्रचार के लिए विपक्ष ही पंचलाइन दे देता है। चायवाला से लेकर मौत का सौदागर और चौकीदार ही चोर है तक कहना विपक्ष को भारी पड़ चुका है। इस बार परिवार को लेकर बेमतलब की बयानबाज़ी कर रहे हैं। कभी उनकी माँ को लेकर अभद्र टिपण्णी करते रहे हैं कभी पत्नी को लेकर जिनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है।  ऊपर से परिवार को लेकर टिपण्णी कर कौन रहा है - लालू यादव। जो स्वयं घोटालों में दोषी पाए जाने के बाद भी घटिया न्यायव्यवस्था के कारण जेल से बहार हैं। वो लालू जिनको जब न्यायालय ने सजा दी तो अपनी अंगूठाछाप पत्नी को मुख्यमंत्री बना कर शासन चलाया।  आप मोदीजी का विरोध कर रहे हैं या प्रचार? मोदी का परिवार न होने का अर्थ ये क्यों न निकाला जाए कि उनका कोई स्वार्थ नहीं है। उन्हें अपने पत्नी या बच्चों के लिए कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। जो करेंगे देश के लिए निस्वार्थ करेंगे। वो जब देशवासियों को अपना परिवार कहते हैं तब देशवासी भी यही समझते हैं कि यह व्यक्ति खुद के लिए जोड़कर करेगा भी क्या? 

आपके तो परिवार हैं। आपको अपने परिवार के लिए जोड़ना है। उन्हें राजनीति में फिट करना है। बेटों-बेटियों को मुख्यमंत्री बनाया जाए। आपके बाद आपकी पत्नी, और बच्चे उत्तराधिकारी हैं। आपकी राजनीति पर कब्जे के लिए आपके बच्चे लड़ेंगे। मोदी को चिंता करने की जरूरत नहीं है कि उनके बाद उनका कोई दूर का रिश्तेदार राजनीति में आएगा। आप लोगों की प्राथमिकता अपने परिवार के लिए धन संग्रह है। जिसके लिए आप जमानत पर हैं। जनता इसको कैसे देखेगी अगर थोड़ा दिमाग लगाएं तो समझ पाएंगे।

कुछ लोग लोकपाल और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर राजनीति में आए। लेकिन अब उन्ही भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े होने को उतावले है। भ्रष्टाचारी ही  भ्रष्टाचार बंद करो के पोस्टर लेकर खड़े दिखते हैं। इससे हास्यास्पद दृश्य कम ही देखने मिलता है।  


एक नागरिक की तरह यह पूछना बनता है कि अगर वर्तमान सरकार कुछ गलत कर रही है तो आप क्या विकल्प उपलब्ध करवा रहे हैं।  कुछ बुनियादी प्रश्न हैं।  

आपका नेतृत्त्व कौन करेगा? 

बिना नेतृत्त्व के मोदी के सामने आप खड़े नहीं हो सकते। मोदी के पास लम्बा अनुभव है और अपने आप को उन्होंने स्वयं को साबित किया है। इतने लम्बे राजनैतिक कैरियर के बाद भ्रष्टाचार का दाग नहीं। कठोर निर्णय लेकर कठिन परिस्थितयों में अपने नेतृत्त्व से देश को कई बार निकाला है। लॉकडाउन लगाकर देश को रोक देना और फिर अच्छी गति से चला देना किसी आम नेता के बस की बात नहीं है।

उनके सामने आप किसको खड़ा करना चाहते हैं।  राहुल गांधी को स्वयं कांग्रेसी भी विकल्प नहीं देखते। बाकियों को छोड़िये वे स्वयं को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बताते। बोलते समय परिपक्वता नहीं दिखते। दौड़ने, फुटबाल खेलने,खाना पकाने जैसे दृश्य से आपके कट्टर समर्थक आह-वाह तो करेंगे लेकिन किसी और को प्रभावित नहीं करते। 

केजरीवाल स्वयं को मोदी के सामने रखने का प्रयास करते हैं लेकिन स्वयं ED के समन से ऐसे भागते फिर रहे हैं कि किसी भी समय जेल जा सकते हैं।  उनके मंत्री पहले से जेल में हैं। उनकी छवि एक अर्बन-नक्सल की है। उनको विपक्ष के अन्य दल कभी स्वीकार नहीं करेंगे। दिल्ली वाले भले ही चुनते रहे हैं लेकिन मुफ्त-मुफ्त के अलावा उनका कोई और विज़न नहीं है। उनकी पार्टी ने उनको दिल्ली में मुसलमानों का मसीहा बता कर बड़े हिन्दू वर्ग को सदा के लिए उनसे दूर कर दिया है।  


हिट एंड रन वाली बयानबाजी और भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े रहने के कारण उनकी छवि "दिल्ली के पढ़े लिखे लालू" वाली ही है।  उनको अपने चने जैसे आधे राज्य की आवश्यकताओं और पूर्ती का भी अंदाजा नहीं हो पाता। जो बात बात पर कहते नहीं इस बार नहीं हो पाया पाँच साल और दे दो हो जाएगा। हर समय केंद्र और अन्य राज्यों से टकराव की स्थिति बना कर रहना उन के पक्ष में नहीं जाता। वे लोगों को साथ लेकर नहीं चल सकते।  इसका एक उदाहरण तो उनके साथी ही हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी पार्टी से अलग सोच और विचार रखने के कारण निकाल दिया।  

ममता बैनर्जी की छवि बंगाल के बाहर बेहद ख़राब है। नितीश कुमार वापस छिटक कर भाजपा के साथ आ गए। और कोई नेता स्वयं को बड़े मंच पर प्रस्तुत नहीं करता।  मायावती को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की अफवाह उड़ाई जा रही थी उन्होंने स्वयं खंडन कर दिया है।  


 कुल मिलाकर विपक्ष नेतृत्त्व विहीन है। नवीन पटनायक की छवि अच्छी है, वे विकल्प हो सकते थे लेकिन वे अपने राज्य में संतुष्ट दिखते हैं और केंद्र के साथ सहयोग की भूमिका में रहना चाहते हैं।  

अमेठी में आपके समर्थक खून देंगे बदला लेने की बात करते हैं और जब प्रत्याशियों की सूची निकलती है तो आपके नेता का नाम वायनाड से घोषित कर दिया जाता है। अगर दो सीट से लड़ना ही था तो वायनाड बाद में घोषित करते, अमेठी की उम्मीदें जिन्दा रखते। कार्यकर्ताओं में जोश बना रहता। सोनिया गाँधी के राज्यसभा जाने से वैसे भी आपके कार्यकर्ताओं में सन्देश अच्छा नहीं गया होगा।



आप उसके सामने लड़ रहे हैं जिसने सांसद बनने के बाद अमेठी में पर्याप्त समय बिताया है। जनता से जुडी हैं। लेकिन उनके काम की आलोचना की जगह आप उनपर और उनके बच्चों पर अमर्यादित टिपण्णी करते हैं।  आपको चुनाव में हरा दिया तो आप उनके और उनकी पुत्री विरुद्ध अपशब्द कहते हैं, तब आपका महिला सम्मान कहाँ जाता है? 

नीति और नीयत

लोग किसी नेता में यह देखना चाहते हैं कि आप देश के विकास के लिए क्या करेंगे। जब आप आए दिन उद्योगपतियों के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। मेड इन इंडिया, बुलेट ट्रैन, आत्मनिर्भर भारत जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का उपहास करते हैं। देश की क्षमताओं पर प्रश्न करते हैं। कोरोना काल में देश में बनी वैक्सीन पर शंका करते हैं। विदेश से वैक्सीन मंगाने की वकालत करते हैं। बालाकोट-सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्न उठा कर देश की सेना का मनोबल  गिराने का प्रयास करते हैं। खालिस्तानियों के साथ खड़े दिखते हैं।  मोदी का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगते हैं। मोदी का अपमान करते करते देश का अपमान करने लगते हैं। मोदी को वोट देने वाले को राक्षस कहते हैं। तब जनता आपको कैसे देखे?

आप ऐसे नकारात्मक लोगों के साथ दिखते हैं जो देश को बढ़ते नहीं देखना चाहते। रघुराम राजन जैसे भयंकर नकारात्मक व्यक्ति से आर्थिक सलाह ले रहे हैं जिनको देश के विकास की गति का कोई अंदाजा नहीं है।

विपक्ष को बताना चाहिए सड़क/परिवहन में नितिन गडकरी से बेहतर काम करने क्षमता रखने वाला कोई चेहरा आपके पास है?  नागरिक उड्डयन मंत्रालय में सिंधिया से बेहतर व्यक्ति है? आप ही की पार्टी से निकल कर इस तरफ आए हैं। क्यों आने दिया?

अश्विन वैष्णव, निर्मला सीतारमण, अमित शाह सभी मंत्रियों का काम देखकर बताइये आपने पास इनके विकल्प कौन हैं? चिदंबरम? जो कहते थे देश में डिजिटल इंडिया संभव नहीं है? बिहार-बंगाल के वो नेता जो हर सरकार में रेलमंत्रालय के लिए लड़ते रहे हैं।  

इन लोगों के काम में कमियाँ तो निकाली जा सकती हैं। विकल्प न दें तो वही कमियाँ उजागर करें। पर आप अपशब्दों पर अधिक ध्यान देते हैं। हास्यास्पद पंच के बीच में अपशब्दों की कडवाहट में मुख्य मुद्दे दब जाते है।  रेलमंत्रालय की आलोचना आप यह कह के कर सकते हैं कि भीड़ अनियंत्रित है, होली पर भी होगी। लेकिन आप बुलेट ट्रेन, वन्दे भारत जैसी नई परियोजनाओं पर प्रश्न उठाते हैं। भीड़ पर घेरिये। बिना अपशब्दों के रेल के अंदर हो रही असुविधा पर घेरिये। जनता साथ देगी। नितिन गडकरी को बेहिसाब बढे हुए चालान पर घेरिये, टोल पर हो रही वसूली पर घेरिये साथ ही विकल्प भी बताइये कि आप कितना घटाएंगे।  लेकिन आपके नेता ही अपने संसदीय क्षेत्र में बड़ी सड़कों से इतने प्रभावित हैं कि नितिन गडकरी के विरुद्ध बोलने से कतराते हैं।  

नौकरियों की बात करते हैं, लेकिन सब सरकार आती है तो आपने नेता कहते हैं - हमने सरकारी नौकरी की बात नहीं की थी। फिर कोई कैसे विश्वास करे। 

https://x.com/Ra_THORe/status/1755891618303922508?s=20



किसानों की बात करते हैं, MSP की बात करते हैं लेकिन रूप रेखा नहीं बताते। विपक्ष में रहते हुए तो सब तरह के दावे कर देते हैं। जैसे भगवंत मान पंजाब में सरकार बनाने के बाद राज्य सरकार द्वारा ही MSP देने का दावा कर रहे थे सरकार में आने के बाद पलट गए। अब केंद्र पर थोप रहे हैं।  

https://x.com/MP_NavneetRana/status/1764989620272710116?s=20



वास्तविकता की बात कीजिये, वो कहिये जो संभव  हो प्रचार के समय कह देना आसान है बाद में वचन पूरा करने में पसीने आ जाते हैं।  कर्णाटक सरकार हो या पंजाब, जब अपनी चुनावी घोषणाओं की पूर्ती की बात आती है तो केंद्र पर थोप कर पल्ला झाड़ लेते हैं।  या फिर किसी न किसी प्रकार मध्यम वर्ग का बोझ बढ़ा देते हैं। अडानी कितने में शर्ट खरीद रहा है या कौन कहाँ नाच रहा है, मनरेगा में कितने किस जाति के हैं यह सब वोट नहीं दिलाएगा। मुफ्त बिजली की बात करते हैं यह नहीं बताते बिजली कहाँ से आएगी।  ऐसे में प्रधानमंत्री की सूर्योदय योजना स्पष्ट करती है कि बिजली कहाँ से आएगी। इस प्रकार के ब्लूप्रिंट सामने रखिये।  

आपको यह स्पष्ट बताना होगा कि वर्तमान सरकार में कमी कहाँ है और आप कैसे दूर करेंगे। देश में एकता जैसे बनाए रखेंगे। आप संदेशखाली पर चुप रहकर कहीं और हो रहे अपराध पर नहीं बोल सकते। पिछले हफ्ते हुई प्रधानमंत्री की कश्मीर की सभा साबित करती है ३७० अब बीती हुई बात है, उससे आगे बढिये। 

विमुद्रीकरण को आठ साल हो गए, उसके बाद केंद्र में मोदी चुनकर दोबारा आ चुके हैं। कई राज्य के चुनाव जीत चुके हैं। उससे बाहर निकलिये। श्री राम के विरुद्ध बोलना बंद कीजिये।  राम नवमी चुनाव के बीच में पड़ेगी। उस दिन जब श्रीराम का भाल सूर्य की रौशनी से दमक उठेगा तो उनकी चकाचौंध में जलने वाले अंधे हो जाएंगे। विभिन्न वर्गों को लड़ कर ऊर्जा व्यर्थ करने की जगह मुख्यधारा में आने के लिए विकल्प दीजिये। UCC का विरोध की नहीं उसे बेहतर तरीके से लाने की बात होनी चाहिए। राजनीति में आप हैं, मुद्दे खोजिये।  

फिर जब पत्रकार कहते हैं कि देश को मजबूत विपक्ष देना जनता की जिम्मेदारी है तब जनता यह प्रश्न क्यों नहीं पूछे कि देश के पास अभी जो मजबूत नेतृत्त्व है उसे हटा कर लाना किसे है? स्थिर होते देश में १९९० के दशक वाली अस्थिरता क्यों लाइ जाए। जनता क्यों करे? जनता ने ठेका लिया है विपक्ष का? विपक्ष ने विकल्प प्रस्तुत ही नहीं किया। जनता को विश्वास में लिया ही नहीं। सोशल मीडिया पर समर्थकों के अंट-शंट दावों को आपने जमीनी हकीकत मान लिया है। उनको उतना ही पता है जितना आपको अपने AC कमरों में बैठकर गर्मी के विषय में पता होता है।