चुनाव के समय आत्मा कचोटती है और अंतरात्मा जागती है। यह सामान्य
प्रक्रिया है। लेकिन आत्मा शरीर छोड़कर भटकने लग जाए ऐसा केस यमलोक में कभी नहीं
आया था। तीन दिन पहले, पृथ्वी लोक से इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिली कि एक जीव अपने शरीर को छोड़कर
खुला घूम रहा है। फाइलों में तलाशा जा रहा था कि ऐसा कोई विधान, नियम-कानून,
प्रक्रिया
या कोई रिफरेन्स केस मिल जाए जिसके आधार पर आगे कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। अब तक
ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया था जिसमें कोई जीव अपनी इच्छा से शरीर से बहार
निकलकर घूमने लग जाए। फोन के, बिजली के बड़े बड़े बिल और गाडी के चालान
देखकर आम आदमी के शरीर से आत्मा निकलने की घटनाएं सुनी गई हैं लेकिन वे तुरंत अपने
शरीर में घुस जाती हैं। भटकते हुए ऊर्जा मंत्रालय या सड़क परिवहन मंत्रालय में जाकर
मंत्री के ऊपर मंडराने नहीं लगतीं।
यमराज परेशान बैठे थे। उनका सर घूम रहा था। टीवी पर चलते समाचार
देखकर और घूम जाता। चित्रगुप्त पच्चीस हज़ार फाइलों को छान चुके थे। एक तरफ क्लाउड
पर स्टोर किये हुए आर्काइव फाइलों में भी ढुंढाई चल रही थी और दूसरी तरफ सीसीटीवी
फुटेज भी खंगाला जा रहा था। कहीं कुछ मिलता ही न था।
सिक्योरिटी के मद्देनज़र प्रोटोकॉल तो यह था कि आत्मा शरीर को तभी छोड़
सकती है जब कम से कम एक यमदूत सामने हो। यमलोक से प्रक्रिया आरम्भ होती थी,
जिसमें
रिटर्न आर्डर जारी होता। यमदूत प्राणी के पास पहुँचकर पहले उसका बायोमेट्रिक स्कैन
करता और फिर मिलान के पश्चात चित्रगुप्त कार्यालय में अनुमोदन के लिए याचिका
भेजता। चित्रगुप्त कार्यालय से ओटीपी मिलने के बाद ही यमदूत कहता चलो शरीर से बहार
निकलने का समय आ गया। इसके बाद जीव को सीधा यमपुरी में डिलीवर कर दिया जाता। भटकने
का अवसर ही नहीं।
अगर कभी किसी जीव से गलती से उसका शरीर छूट भी जाता तो प्रोटोकॉल के
अनुसार उसे शरीर के आसपास रहने की हिदायत थी ताकि वेरिफिकेशन प्रक्रिया आसान हो
सके। शरीर से दूर जाने पर उसके भटकने की सम्भावना भी रहती और किसी और भटकते जीव के
उस शरीर पर अधिकार जताने की भी।
आत्माएं भटकती हैं लेकिन वो ऐसी आत्माएं होती हैं जिनका अप्रूवल
चित्रगुप्त कार्यालय से नहीं आता या जिनका बायोमेट्रिक स्कैन फेल हो जाता। ऐसी
आत्माओं के लिए यमलोक का जनसम्पर्क विभाग लोकअदालत के कैम्प लगाकर निपटारे की
व्यवस्था भी करता था। लेकिन यह केस अलग था, यह प्राणी जिंदा
था। उसका शरीर जेल में था और आत्मा बाहर भटक रही थी। शरीर घर से मंगवाकर खाना खा
रहा था। उसका शुगर और बीपी घट बढ़ रहा था। अदालतों के चक्कर काट रहा था। और तो और
जिन अदालतों में वकीलों को हिंदी बोलने नहीं मिलती वहां हिंदी में भाषण भी दे रहा
था। निश्चित रूप से यह किसी नेता का ही शरीर था।
लेकिन जेल में रहने के बाद भी शरीर का नेतापन गया नहीं था। उसका शरीर
जेल में नेतागिरी कर रहा था और आत्मा बहार भटक कर जनसमस्याओं को देख रही थी।
हालाँकि जब तक आत्मा शरीर में थी, जनसमस्याएं तो तब भी दिख सकती थीं,
लेकिन
शरीर आलसी होता है। आत्मा को न घूमने देता है न कुछ देखने देता है। इसलिए जब आत्मा
बहार निकली और घूमने लगी तब उसे गन्दी नालियाँ , पानी की सप्लाई ,
सड़क
के गड्ढे, कूड़े के ढेर, अस्वस्थ बूढ़े, धूल में लिथुरे
बच्चे और भूखे भिखारी सब दिखने लगे। याद रहे यह सब आत्मा को दिख रहा है। शरीर को
तो अभी भी जेल, जेल से बहार निकलने का रास्ता और किसी तरह से आरोप प्रत्यारोप कर के
बचने की ही चिंता थी।
इधर शरीर जांच एजेंसियों के सामने बातें बना रहा था उधर आत्मा उस
नेता की पत्नी के माध्यम से जनसम्पर्क कर रही थी। आत्मा ने कहलवाया कि नेताजी ने
कहा है कि - अब वो दिन गए जब काम करवाने के लिए अर्जियां लिखनी पड़ती थीं, दफ्तरों
के चक्कर लगाने पड़ते थे, नेता से मिलने और सिफारिश लिखवाने के लिए
दौड़ भाग करनी पड़ती थी। अब तो सिर्फ आँख बंद कर के ध्यान लगाने पर ही नेता को अपने
आसपास महसूस किया जा सकता है। बस आँख बंद करके ध्यान लगाइए और अपनी शिकायत बताइये।
समाधान तुरंत होगा। जेल से आदेश देने से जनसेवा का भाव थोड़ा ज्यादा आता है।
यमराज परेशान इस बात से थे कि आखिर किस प्रक्रिया से यह जीव शरीर
छोड़कर भटक रहा है और अगर जीव भटक रह है तो शरीर नेतागिरी जैसे कैसे कर रहा है।
इसका अर्थ तो यह था कि आत्मा भी नेता है और शरीर भी। एक साथ दो दो नेता एक मनुष्य
की तरह कैसे रह सकते हैं। इस बात से यह तो पता चलता था यह नेता बार बार पलटता
क्यों है, लेकिन एक मनुष्य के अंदर दो नेता होना अवश्य कोई विभागीय त्रुटि थी। वह
त्रुटि कहाँ हुई है इसी का पता लगाने के लिए सारा यमलोक व्यस्त था।
यमराज एक दूत को धरती पर भेजना चाहते थे, लेकिन डर था कि
कहीं ऐसा न हो वह आत्मा उसका पीछा करते करते यमलोक में आ जाए। नेता की आत्माएं तो
बहुत आई हैं लेकिन सब नेतागिरी धरती पर छोड़कर आई हैं, यह तो आत्मा
स्वयं ही नेता बनी घूम रही है उसने यमलोक में नेतागिरी शुरू कर दी और यमराज को ही
भ्रष्ट बताना शुरू कर दिया तो?
डर तो यह भी था कि अगर कोई कार्यवाही न की गई तो वह पृथ्वी पर यह
कहता घूमेगा कि यमराज उससे डरते हैं इसीलिए उसे यमलोक में घुसने नहीं दे रहे।
यमराज के लिए तो एक तरफ कुआँ और एक तरफ खाई थी। वे चाहते तो यही थे कि किसी तरह
आत्मा को ढूंढकर उसे वापस उसके शरीर में ढूंस दिया जाए। दोनों कुछ साल जेल में
रहें तो संभवतः उसकी नेतागिरी निकल जाए।
लेकिन किसी सीसीटीवी फुटेज में आत्मा दिखती ही न थी। अफवाह थी कि कोई
न कोई आँख बंद करता और झट से आत्मा उसके पास पहुँच जाती। यमराज इसी डर से आँख बंद
नहीं कर पा रहे थे कि कहीं उन्होंने आँख बंद की और गड़बड़ हो गई तो? ऊपर
से कुछ शरीर ऐसे कपडे पहने घूम रहे थे जिसपर लिखा था मैं भी आत्मा, क्वांटिटी
पचास। बताइये क्वांटिटी पचास। ऐसा भी कोई करता है क्या? एक शरीर में एक
आत्मा का ही विधान है। जिसमें से कम से कम आत्मा से तो सदाचार की उम्मीद की जाती
है। यहाँ शरीर और आत्मा दोनों कुधर हैं और क्वांटिटी पचास।
इतने में नारद जी वहाँ आ पहुँचे, परस्पर अभिवादन
के बाद जब उन्होंने यमराज से परेशानी का कारण पूछा तो यमराज ने ऊपर लिखी सारी
बातें कह सुनाईं। नारद बोले - "यमदूत को भेजने में समस्या है तो मैं देख आता
हूँ। आत्मा मिली तो आदरपूर्वक उसे शरीर में वापस जाने के लिए कह दूँगा।"
यमराज ने उन्हें नेता की आत्मा पर एक रिपोर्ट तैयार करने धरती पर भेज
दिया।
नारद जी पहले राजघाट पहुँचे। जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान में
देख लिया जीव न दिखा। विधानसभा में भी गए , वहाँ की सूनी
कुर्सियाँ बता रही थीं कि जीव यहाँ भी नहीं है। नारद सीधे उस मंत्री के पास पहुँचे
जिसके पास नेता के आदेश पहुँच रहे थे, देखा मंत्री कुछ टाइप कर रही थी। नारद
ने कहा जैसा नेता वैसी उसकी मंत्री। फिर भी उस मंत्री से पूछा - "यह क्या
आदेश टाइप कर रही हो?"
"नेता जी का आदेश है। "
"किसने आदेश दिया है, शरीर ने या आत्मा ने? शरीर
से मिलने तो तुम गई नहीं और आत्मा यहाँ दिखती नहीं।"
"उनकी आत्मा तो हम सबके अंदर है। वहीं से आदेश आते हैं। "
"अच्छा, उनकी आत्मा तुम्हारे अंदर है? फिर तुम्हारी
आत्मा कहाँ है?"
"हमारी आत्मा भी हमारे अंदर है, उनकी आती जाती
रहती है। "
"फिर तुमको कैसे पता चलता है कि आदेश किसकी आत्मा दे रही है?
"
"जब भी हमें संदेह होता है या हमारी आत्मा हम पर हावी होने लगता है,
तब
तो यह कसौटी आजमाते हैं :
हम उनकी शकल याद करते हैं और अपने दिल से पूछते हैं कि जो कदम उठाने
का विचार कर रहे हैं, वह उनके लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या
उससे अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेंगे? यानि क्या उससे
उन लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? या
पार्टी को कुछ चंदा मिल सकता है? जब स्वराज्य और चंदा शब्द सुनाई देते
हैं तब हमारा संदेह मिट जाता है और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ समाप्त हो रही है। तब
हम समझ जाते हैं यह नेताजी की ही आत्मा है जो आदेश दे रही है।"
"अच्छा, तो थोड़ी देर को उनकी आत्मा से बात करवा दो। कुछ पूछताछ करनी है।
"
"पूछताछ के लिए जेल जाइए, शरीर अभी पूछताछ के लिए जेल में उपलब्ध
है। आत्मा अभी व्यस्त है।"
"चलिए बातचीत ही कर लेने दीजिये, बुलाइए।"
"वो तो यहाँ नहीं नहीं।"
"फिर कहाँ हैं?"
"यह नहीं पता। आप जाइए यहाँ से।"
नारद वहाँ से निकले, सोचने लगे कहाँ हो सकती है वह आत्मा। एक
दुखी आवाज़ सुनकर समझ गए कि हो न हो आत्मा वहीं होगी। उस कमरे में पहुँचे जहाँ
प्रेस कांफ्रेंस की रिकॉर्डिंग हो रही थी। वे जानते थे, आत्मा कहीं भी
भटकती रहे लौटकर इस कमरे में जरूर आएगी।
उस नेता की पत्नी ने सन्देश पढ़ना शुरू किया – "जी मैं -मैं
नेताजी की पत्नी। नेताजी बड़े निडर और ईमानदार हैं, सच्चे देशभक्त।
देशभक्ति उनके रोम रोम में है। रोम इटली में है। इटली से तो पता ही है कौन आया है।
इटली यूरोप में है। यूरोप में यूके भी है। यूके में लन्दन है। लन्दन में आजकल
हमारे एक नेता हैं। उनकी आत्मा अभी अभी उनको छोड़कर वापस आई है। शरीर उनका अब भी
लन्दन में ही है। लेकिन मेरी आत्मा तो यहीं है। आपके बीच में।
नेताजी को आपकी बड़ी चिंता है। वे जानते हैं कि आपको भी उनकी बड़ी
चिंता है। आप उनके लिए व्रत कर रहे हैं। मन्नत मांग रहे हैं। आप उनको आशीर्वाद
दीजिये। यही हमारा अभियान होगा। आप उनको सन्देश दीजिये, आपके सन्देश
उनतक टिफिन में रखकर पहुँचा दूँगी। आशीर्वाद सबको देना पड़ेगा, कोई
थोड़ा दे दे कोई ज्यादा देदे, जिसको और ज्यादा देना हो और ज्यादा दे
दे।"
नारद ये सब सुनकर घूम गए। कहने लगे - नारायण नारायण,
गज़ब
नौटंकी है।
इतने में नेता की पत्नी आँख बंद करके उसे याद करने लगी, लेकिन
आत्मा वहाँ नहीं आई। नारद ने सोचा आश्चर्य है, कोई आनगांव का
आदमी याद करे तो आत्मा वहाँ पहुँच जाती है, लेकिन पत्नी के
याद करने पर यहाँ नहीं आई? यह आत्मा भी अन्य पतियों की तरह पत्नी
पीड़ित जान पड़ती है। जब जगह घूम लेगी लेकिन पत्नी के सामने आने में प्राण सूखते
हैं।
नारद जी ने सोचा अब तो जेल चलकर उस शरीर से ही मिल लेना चाहिए। ऐसे
विचित्र प्राणी के दर्शन साक्षात करना चाहिए। नारद जी जेल पहुँचे। देखा तो वह नेता
वहाँ पुलिस वालों से कह रहा था - "इतने छोटे घोटाले के आरोप में गिरफ्तार
किया है तुम लोगों ने। इतने में तो चांदनी चौक का पॉकेटमार भी गिरफ्तार न हो। तुम
लोगों को हाय लगेगी।"
पुलिस वाले बोले - "छोटा?"
"१०० करोड़ में होता क्या है आजकल नेताओं का?"
"वो तो तुम बताओ क्या होता है?"
"इतने तो खर्च हो जाते हैं। खर्च हो गए तो फिर कैसा घोटाला। छोड़ दो
मुझे। "
"छोड़ देंगे बस फोन का पासवर्ड बता दो। "
"तुम लोग भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेज दो चलेगा, लेकिन
फोन का पासवर्ड नहीं बताऊंगा?"
"जब साफ़ सुथरे हो तो बता दो। छूट जाओगे फिर अपनी नेतागिरी करते
रहना।"
"नहीं दूंगा। तुम मेरा तलाक करवाना चाहते हो।"
"सच्ची बता रहे सिर्फ भ्रष्टाचार की जाँच करेंगे। बाकी कुछ नहीं
देखेंगे। कुछ दिखा भी तो देखकर डिलीट कर देंगे। "
"देखकर डिलीट कर दिया होता तो पासवर्ड देने में भी क्या ही दिक्कत
थी।"
"तो पड़े रहो यहीं। "
"मेरा शरीर ही कैद कर लोगे न। आत्मा को नहीं कर पाओगे।"
इतने में नारद बोले -"मुझे बता दो आत्मा है कहाँ। जरूरी काम
है।"
"तुम कौन? तुमसे मतलब?" वह बोला।
"कुछ नहीं पुरस्कार देना है। सोच रहे है शरीर तो बंद है आत्मा को ही
दे दें। मिल ही नहीं रही। "
"नहीं मिलेगी। जैसे इनको पासवर्ड नहीं मिल रहा।"
नारद के दिमाग की बत्ती जली। "नारायण नारायण" कहते हुए वापस यमराज के पास गए और अपनी रिपोर्ट में लिखा - "आत्मा के भटकने की बातें झूठी हैं। नेता ने फैलाई हैं। उसकी आत्मा वही जेल में है। उस फोन में जिसका पासवर्ड पुलिस उससे माँग रही है। पासवर्ड मिलते ही उसकी आत्मा अपने आप उसके शरीर में वापस घुस जाएगी।"
