मंगलवार, 30 जुलाई 2019

साले आते क्यों है?



कुछ लोगों के आने से घर चहक उठता है लेकिन कुछ लोगों के आने से महक उठता है।  ऐसे ही एक दूर के रिश्ते के साले का कुल्लू-मनाली से लौटते हुए आगमन हुआ। जैसे ही श्रीमान जी ने अपने जूते खोले हम उछल कर सीधे बालकनी मे गिरे । कुल्लू मे शायद सर्दी बहुत रही होगी, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि साले ने वहाँ से लौटने के बाद भी तीन दिन तक न नहाया, वहाँ क्या खाक नहांया होगा। तीसरे दिन जब उन्होने गुसलखाने को धन्य किया तब हमारे प्राणों मे प्राण आए।

हर विवाहित पुरुष के जीवन में सालों का आना जाना सालों से चलता रहा है और चलता रहेगा। पहले के समय में कुछ साले अपनी दीदी के साथ दहेज मे आते थे, और दाम्पत्य जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। न जाने कितने जीजों के पाले हुए साले इधर उधर मिल जाते थे। अब साले दहेज मे तो नही आते लेकिन आते अवश्य हैं। कभी बताकर कभी बिन बताए। बिन बताए अर्थात सरप्राज़ देने आए हुए सालों को अचानक द्वार पर खड़ा हुआ देखकर मन मे एक ही प्रश्न उठता है कि-ये साले कैसे आ गए? और आ गये हैं तो जाएँगे कब? और आए हैं तो किसी काम से आए हैं कि बस आने के लिए आए हैं?

कुछ साले तो काम से ही आते हैं और काम होते ही निकल जाते हैं। उनका आना इतना बड़ा कांड नही होता जितना उन सालों का आना, जो आते तो किसी काम से हैं लेकिन उसके बाद इतनी फ़ुर्सत लेकर आते हैं कि आपके जीवन मे कुलबुली करके ही जाएँ।

कुछ साले बिना काम के यूँ ही चले आते हैं। उनके आने का न कोई समय होता है, न कारण और न अपेक्षा। ऐसे साले आते तो हैं लेकिन जाते नही, आकर बैठ गए तो बैठ गए। उनके आने की तारीख केवल उनको पता होती है और जाने की उनको स्वयं भी पता नही होती। विशेषकर अगर कोई साला दूर की रिश्तेदारी का या कुछ बेरोज़गार टाइप का हो तो समझ लीजिए कि वह आपके घर की कुंडली मे किसी ऐसे ग्रह की तरह आकर बैठेगा कि किसी विशेष पूजा के बाद ही जाएगा। उसपर टिकट कन्फर्म होना एक अलग ही तरह का विवाद है जिसके लिए मैं रेलवे से बहुत नाराज़ हूँ। कोई साला-साली कोटा भी होना चाहिए, जिसमें सैर सपाटे पर निकले सालों को सुविधा अनुसार जल्द से जल्द टिकट उपलब्ध करवाया जा सके। 

अधिकतर साले अकेले आते हैं लेकिन लाव लश्कर के साथ आने वाले सालों की बात ही अलग होती है। वे कहीं भी अकेले नहीं जाते, जब जाते हैं दस बारह को साथ लेकर ही निकलते हैं। उसके बाद आप अपने ही घर में पाहुने हो जाते हैं। 

एक तो मुझे यह समझ कभी नही आता कि सब सालों को कुल्लू-मनाली क्यों जाना होता है। आज तक घोर तपस्या के बाद भी यह पता नही लगा पाया हूँ की किसी न किसी साले को हर दूसरे महीने कुल्लू-मनाली जाने की क्यों पड़ती है? तुम्हारी कोई कुलदेवी का मंदिर है वहाँ? जो दर्शन करने निकल पड़ते हो। नही है, लेकिन नही ! जाना होता है। इसमें हमारा अपराध केवल इतना समझिए कि मध्यप्रदेश और हिमाचल प्रदेश के बीच मे हमारा प्रदेश पड जाता है, साले महमूद ग़ज़नवी की तरह दिल्ली को कूच करते हैं और जीवन का सुख चैन लूट पाट कर निकल जाते हैं। 

इस संसार में तरह तरह के साले होते हैं। कुछ साले तो समझ नहीं आता कि भगवान ने उन्हें ऐसा बनाया है या वे अपने जीजा को देखकर ऐसे बन जाते हैं । और एक प्रकार के साले होते हैं अकड़ू, जो साले अपने आप को न जाने क्या समझते हैं। कुछ साले इतने व्यवहार कुशल होते हैं, जीजा जो चूना भी लगाते रहते हैं और जीजा को पता भी नहीं चलता। कुछ ऐसे तुर्रम ख़ान साले होते हैं जो अपनी बहन की सगाई में ही जीजा को उसके आने वाले भविष्य की झलक दिखा देते हैं, भूखे जीजा के सामने आकर प्लेटें भर कर आइस-क्रीम लपेट रहे होते हैं और भूखा जीजा कुढकर चुपचाप देखता रहता है। मन मे सोचता है साले, भूख मुझे भी लगी है, कम से कम पूछ तो लेता, तू बाद मे मिल।

हालाँकि सालों से शिकायतें तो बहुत हैं, लेकिन फिर भी सोचता हूँ, साले हैं तो वो भी पुरुष ही। हमारे घोर रूखेपन के बाद भी झुककर बेशर्मी से चले आते हैं तो अपनी बहन के लिए, उनकी बहन न हो तो आयें ही क्यों? और फिर मूल बात यह कि उन सालों की बहन से कौन झगडे। इसलिए महान संत श्री उदय शेट्टी के शब्दों में  - "सह लेंगे थोड़ा"  कहते हुए अपने आप में मग्न हो जाना ही श्रेष्ठ है। 

गुरुवार, 30 मई 2019

कैसी छवि

कैसी छवि घनश्याम तुम्हारी,
कारे में उजरी, के उजरे में कारी?

आधे हो तुम, और आधे नहीं हो,
मगर देखता हूँ, ये पूरे तुमही हो। 

सब देखते हैं, दो नैना तुम्हारे,
कौन क्या मन में सोचे विचारे।

जगत को नचाती तुम्हारी मुरलिया,
दिखती है, न ही सुनाई दे छलिया।

कौन सी लीला, रचोगे मुरारी,
कोई न जाने थाह तुम्हारी।
                              

शनिवार, 18 मई 2019

का हुईए अब राम - चुनाव प्रचार के बाद

चुनाव प्रचार निपट चुका है। कई महीनों का शोर, टीवी पर आने वाले चाय, न्याय, आय और हाय हाय के नारे बंद हो गए। अब अगले तीन-चार दिन एग्जिट पोल के आंकड़े आतंक मचाएंगे। पूर्ण बहुमत, बहुमत, अल्पमत जैसे शब्द कानों में चुभने तक टीवी पर गूँजेंगे । अखबार आंकड़ों से पटे होंगे और नेता लोग अपनी थकान मिटाने के अनेक उपाय कर रहे होंगे। कुछ मंदिरों में माथा रगड़ेंगे और कुछ इफ्तारी में लग जायेंगे। इसमें भी दो राय नहीं कि चुनाव में दुश्मन जैसे लड़ने वाले बहुत से नेता एक ही मंच पर या फिर कहीं डिनर या लंच पर मुँह से मुँह लगाकर चुहलबाजी करते दिख जाएँ । कुछ गठबंधन की तैयारियों में होंगे कुछ अभिनंदन की । 
मोटा भाई कर्नाटक और मध्यप्रदेश की संभावनाएं छांटेंगे और कुछ बहन-भाई किसी डेस्टिनेशन पर १८ की रात को ही निकल जाएंगे । कुछ तो प्रचार समाप्त होने से पहले ही निकल गए। उनके निजी समर्थकों में घोर निराशा व्याप्त है। दो चार दिन बाद चले जाते तो क्या बिगड़ जाता। लेकिन काम समाप्त हो गया, इतने लम्बे चुनाव के पश्चात अवकाश तो बनता ही है। ईवीएम पर दोषारोपण की भूमिका तैयार की जा रही है, चुनाव आयोग को भी इस बार लपेटे में आने का भय है। डर और अविश्वास के दावों का दौर चालू हो गया है।
टिकट के लिए दावा ठोकने से शुरू हुआ क्रम जीत का दावा ठोके जाने के दौर तक पहुँच चुका है । अभी दावे करने के लिए दो-तीन दिन हैं जिसमे सभी लोग सभी प्रकार के दावे कर सकते हैं। सभी दल बहुमत का दावा कर सकते हैं। यहाँ तक कि चुनाव न लड़ने वाले दल भी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा कर सकते हैं । बुराई क्या है। राज्यसभा का स्वप्न भंग होने से कुपित कवि-सखा-गुरु अपनी चाणक्य-छोटी वाला दावा पहले ही कर चुके हैं और इस नाटक में धनानंद की भूमिका निभाने वाले अपनी हार का कारण अपने प्रतिद्वंदी को बता रहे हैं। प्रतिद्वंदी इन्हे जिताने के लिए लड़ते तो ये जीत भी सकते थे।  
कोई अपने दम पर तीन सौ पार करने का दावा कर रहा है और कोई स्वयं के वोट काटने में सफल होने से उत्साहित है। उधर पंचवटी के निकट हिरन बनकर उछलने वाले सत्ता में भागीदार होने का स्वप्न देख रहे हैं, जबकि उन्हें तो युद्ध से पहले ही बलि का पशु बनाकर समाप्त कर दिया गया है। किन्तु जय पराजय मन से होती है।  वे न लड़कर भी विजयी होने का दावा कर सकते हैं।  प्रचार की धूम और टी.आर.पी की दौड़ में हाँफते हुए सभी न्यूज़ चैनल अपने अपने कवरेज को सबसे तेज, निष्पक्ष या सटीक होने का दावा कर सकते हैं। 
चुनाव में सबसे अच्छा साक्षात्कार लेने का दावा रवीश कुमार जी कर सकते हैं और मोदीजी का सबसे अच्छा साक्षात्कार लेने का दावा चौरसिया जी कर सकते हैं। सबसे मनोरंजक प्रचार का दावा करने की आवश्यकता कांग्रेस अध्यक्ष को नहीं है। यह दावा उनकी तरफ से कोई भी कर सकता है।
शांत एवं बोरियत की ओर बढ़ते हुए चुनाव के क्लाइमेक्स में एक्शन सीक्वेंस डालने का दावा पश्चिम बंगाल की सरकार कर सकती है । 

उत्तरपूर्व में नाचते गाते हुए प्रचार लिए हेमंत विश्व शर्मा बधाई के पात्र है, और 'द डांसिंग पॉलिटिशियन' की उपाधि प्राप्त करने के दावेदार हैं। अगर सभी चुनाव प्रचार वैसे होते जैसे हेमंत जी ने किये हैं तो चुनाव वास्तव में राष्ट्रीय उत्सव बन जाता।  हवाबाज राजनेता का दावा वे स्वयं कर सकते हैं जिन्होंने चुनाव लड़ने की हवा तो बनाई किन्तु लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई। नाक की लड़ाई बिना प्रतियोगिता के नाक कटा कर समाप्त हुई। बुआ-भतीजे, बेटे से दुखी पापा, जेल गए पति के वियोग में दुखियारी पत्नी, भाई से दुत्कार खाये हुए भाई का दुःख जैसे फैमिली ड्रामा का भी खूब बोल बाला रहा। 

चुनाव लड़ने, लड़ाने और प्रचार करने वालों के आलावा चुनाव कराने वालों की उबाऊ तस्वीरों के बीच ग्लैमर का तड़का लगाने का दावा वो दो नीले-पीले वस्त्रों वाली सुंदरियाँ कर सकती हैं। 

लुटियन सुंदरियों एवं 'इलीट खान मार्किट दल' के सदस्यों के ह्रदय में पीड़ा व्याप्त है, चुनाव के परिणाम का विचार मन में आते ही उदर से रक्त मुख की ओर प्रवाहित होने लगता है। वे अपने मन को बहलाने हेतु अब प्रेम एवं दर्शन में डूबकर आनंदित होने का दावा कर रही हैं। सत्यवादी पत्नी होने का दावा सिद्धू जी ठोक चुके हैं। पति के 'सत्य'वादी होने का दावा आशुतोष जी की पत्नी कर सकती हैं। 
एक दावा हमारा भी है कि सच यह है कि गला सबका सूखा है। पता किसी को कुछ नहीं है कि क्या होने वाला है। मतगणना में कुछ और भी झमेले खड़े करने की कुछ लोगों की तैयारी अवश्य होगी। मतगणना इस बार आसान नहीं होने वाली। चुनाव को ही अलोकतांत्रिक घोषित करने में भी लोग चूकेंगे नहीं। राजनैतिक दलों का स्वयं का आंकलन क्या है यह हलवाइयों की आर्डर-बुक  देखने से पता चल सकता है। सत्ता-सुंदरी ने ये सात फेरे किसके साथ लिए हैं। यह बाकी सबके लिए कौतुहल का विषय है। कल के अंतिम चरण के मतदान के बाद चार दिन आनंद लीजिये दावेदारों के दावों का।

शनिवार, 11 मई 2019

हुआ तो हुआ


एक बार जंगल में पंचायत लगी. सियारों पर आरोप था कि उन्होंने जंगल का कानून तोडा है. सरपंच बैठे थे, वानर मीडिया सियारों और पंचों के मुंह में माइक ठूंस देने के लिए उछल कूद मचाये हुए था. पशु पक्षी कार्यवाही देख रहे थे.पंचायत की कार्यवाही शुरू की गई और एक पंच ने बोलना शुरू किया-वन में यह अनोखा मामला है जिसमे पशुओं के साथ उनके पूर्वजों पर भी आरोप लग रहे हैं. अपराध होते रहे और वनवासी चुपचाप देखते रहे, लेकिन अब जब मामले सामने आ रहे हैं तो कई पीढ़ियों के अपराधों के उत्तर इस पीढ़ी को देंगे होंगे.
पंच ने सवाल पूछा - क्या आपसे जंगल के संसाधनों का दुरूपयोग हुआ?
सियार- हुआ.  
पंच- क्या वही अपराध आपके पूर्वजों से भी हुआ था?
सियार- हुआ.
पंच- आपने दूसरे जंगल के अपने रिश्तेदार जानवरों को हमारे जंगल में बुला कर यहाँ शिकार किया. क्या यह सच में हुआ?
सियार- हुआ.
पंच- कानून को मजाक समझना, बाकी जानवरों को मूर्ख बनाना, दूसरों का शिकार छीनना, दूसरे जंगल के जानवरों से खाना छीनना, क्या यह अपराध आपसे हुआ?
सियार- हुआ.
पंच- आपको पता है इससे जंगल के पशु पक्षियों को बहुत कष्ट हुआ है?
सियार -हुआ.
पंच- आपको देखकर लगता तो नहीं है कि आपको अपने किये पर पछतावा है. आप हुआ हुआ कर रहे हैं. आप जानते हैं आपने अपराध किया है फिर भी दांत दिखा रहे हैं. आपके अपराध देखिये और शर्म कीजिये, क्षमा मांगिए .
सियार (दांत दिखाते हुए) - जो हुआ सो हुआ, हुआ तो हुआ.
पंच ने अपना सर पीट लिया, फिर कहा- ऐसा लगता है आपने जानबूझकर ही अपराध किए अनजाने में नहीं और अब आप स्वीकार भी कर रहे हैं. अब पंचायत फैसला करेगी.
बैठे हुए एक पंच ने कहा अभी चुनाव चल रहे हैं, चुनाव होने तक मामले पर सुनवाई टाल दीजिये. इससे चुनाव पर प्रभाव पड़ सकता है।पंच कुछ सोचकर बोले - स्वीकारोक्ति तो हो गई अब क्या बाकी रहा?
एक पक्षधर ने गुर्राते हुए कहा अगर कोई फैसला सुनाया तो हम केंचुआ से शिकायत कर देंगे और यह सुनते ही पंचायत की सभा विसर्जित हो गई. केंचुआ से पंच भी डरते हैं.
सियारों ने एक बार फिर से हुआ हुआ, हुआ तो हुआ की जोरदार ध्वनि की.


#केंचुआ ~ केंद्रीय चुनाव आयोग,केंचुआ जिसका भी सृजन है उसको धन्यवाद.

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

अब राष्ट्र नहीं रुकेगा


भारत एक बड़ा राष्ट्र है और यहाँ प्रत्येक क्षण किसी किसी स्थान पर कुछ विशेष घट रहा होता है. यह राष्ट्र जितना विशाल है उतना ही क्रियाशील भी है. रुकना भारत ने कभी नहीं सीखा, सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मृत्यु, शांति-युद्ध, बाढ़-सूखा सभी कुछ यह दिव्य राष्ट्र समभाव से देखता हुआ आगे बढ़ता जाता है और यहाँ तो इतना कुछ एक साथ होता रहता है कि किसी भी घटनाक्रम को राष्ट्र घटित होते हुए देख ही रहा होता है और दूसरा घटनाक्रम शुरू हो जाता है.
किन्तु कुछ विशेष वर्ग हैं जो राष्ट्र को रोकने की भरपूर चेष्टा करते हैं. कोई कोई बहाना चाहिए कि गति पर विराम लगाया जा सके. बंद बुलाने वाले, रेल रोकने वाले, संसद में काम रोकने वाले, आवश्यक निर्णय टालने वाले या अन्य प्रकार के अनावश्यक विवाद खड़ा करने वाले सभी इसके दोषी हैं.
विशेषकर जब भी चुनाव आते हैं तब सरकार के हर कदम को केवल और केवल चुनाव से जोड़कर देखा जाने लगता है और चुनाव कहीं कहीं होते ही रहते हैं और आम चुनाव कोई एक दो दिन में तो होते नहीं, इस बार लगभग ढाई माह चुनाव में लगने वाले हैं. तो क्या ढाई महीने सारा राष्ट्र निष्क्रिय हो जाए? चुनाव के समय सरकार से अपेक्षा की जाती है कि सरकार कुछ करे. सरकार का हर निर्णय संदेह की दृष्टि से देखा जाता है.
सरकार तो एक तरफ राष्ट्र में होने वाली किसी भी सामान्य घटना को भी शंका की दृष्टि से देखा जाता है. यह सब इसलिए क्योंकि नेहरू के समय से ऐसा होता रहा है. अगर कोई आर्थिक गतिविधि होती है तो विपक्ष कहता है चुनाव के कारण हुई है, अगर कोई सुरक्षा से सम्बन्धित गतिविधि सामने आती है तो भी उसपर प्रश्न किया जाने लगता है.
पुलवामा की घटना होती है, तो सरकार की विफलता बताते हुए विपक्ष मुखर हो उठता है और जब सरकार उत्तर देती है तो इसे चुनाव से जोड़कर प्रश्न करने लगते हैं. अगर देश में चुनाव हैं उस समय कोई आकर हमपर आक्रमण कर दे और हम उत्तर भी दें, क्योंकि चुनाव है? राष्ट्र की सुरक्षा को चुनाव से अलग कर देना आज के समय की मांग है. सुरक्षा स्वाभाविक है और किसी दल का नहीं सरकार का विषय है.
उसी प्रकार अंदर के शत्रुओं पर जब कोई सुरक्षा एजेंसी कार्यवाही करती है तब भी प्रश्न क्यों उठाए जाते हैं, यह समझ से परे है. अगर चुनाव चल रहे हैं तो क्या किसी अपराधी को खुला छोड़ दिया जाना चाहिए? आयकर विभाग की रेड हो या किसी भी अन्य विभाग का सामान्य कामकाज, चुनाव से जोड़ कर देखना कितना उचित है? इसका एक कारण हमेशा से इन विभागों का होता रहा राजनैतिक दुरुपयोग है.
आज जो कांग्रेस कर्णाटक में आयकर विभाग के सामने बैठी है कल तक उसने राजनैतिक लाभ के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी. एक दशक पूर्व ही आयकर विभाग के छापे समर्थन लेने देने के लिए प्रयोग होते थे. वो तो भला हो जनता का जिसे समझ गया कि सत्ता की चाबी अगर एक को नहीं दी तो सारे मिलकर नोच लेंगे देश को और अधिकतर सरकारें पूर्ण बहुमत के साथ आईं.
इसके परे एक मत यह है कि अगर ये विभाग स्वतंत्र हों तो चुनाव हों या हों अपना काम करती रहें. जो अपराधी है सो है , चुनाव की आड़ में किसी को बचने देना अपने आप में एक अपराध है.
इसका एक सीधा उपाय यह है कि विभाग अपना काम करते रहें , विपक्ष आरोप  लगाए और सरकार उसका श्रेय ले. जो विभाग कर रहे हैं वह उनका कर्त्तव्य है, उसपर प्रश्न उठा कर विपक्ष स्वयं सरकार को उसका श्रेय लेने का अवसर  देता है.
ऐसा ही कुछ देखने को तब मिला जब प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के एक अंतरिक्ष महाशक्ति बन जाने की घोषणा की. यह किसी दल की घोषणा नहीं थी, सरकार की घोषणा थी.प्रधानमंत्री ने भी अपनी बात रखते हुए विशेष ध्यान रखा कि सन्देश प्रधानमंत्री से जनता को जाए, उसमें दल बीच में आए. प्रधानमंत्री ने श्रेय वैज्ञानिकों को दिया, कि खुद लिया. लेकिन बात स्वयं कही, क्योंकि उसके बाद उत्तर उन्हें विश्व को देना है.
अगर अन्य देशों से कुछ प्रतिक्रियाएं आती हैं तो उनको भी प्रधानमंत्री को ही झेलना है. विपक्ष इसे राष्ट्र की बड़ी उपलब्धि बता कर वैज्ञानिकों को बधाई दे सकता था, किन्तु विपक्ष को एक मौका मिला उपहास करने का , और बीच में नेहरू को ले आएवे शायद इस उपलब्धि तो काम आंक रहे हों या समझ ही पा रहे हों लेकिन उनका इसे चुनाव से जोड़ देना अपने आप में आश्चर्य का विषय है. वैज्ञानिकों ने यह एक दिन में नहीं किया होगा इसमें वर्षों तक परिश्रम किया होगा और जब यह  उपलब्धि प्राप्त हुई तो प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को तुरंत सूचित किया. इसमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण है पूरे मिशन को इतना गुप्त रखा गया कि किसी ने कल्पना भी नहीं की. उसके बाद विपक्ष के आरोप कि चुनाव के समय यह नाटक किया, तो प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता को प्रणाम है.
जिन्होंने इस पन्द्रह मिनट के भाषण के लिए वर्षों पहले ही वैज्ञानिकों को काम पर लगा दिया, फिर कुछ माह पहले लक्ष्य करने के लिए एक (या एक से अधिक भी) सैटलाइट अंतरिक्ष में पहुंचा दिए और चुनाव के समय उन्हें भेद कर श्रेय ले लिया. सोचिये उन्होंने और कितने दूर की बात सोच रखी होंगी. कांग्रेस इसमें स्वयं उपहास का पात्र बनी और नेहरुजी को भी उपहास का पात्र बना दिया. बात को राष्ट्र के गौरव से जोड़कर समाप्त किया जा सकता था.
ऐसी ही जाने कितनी घटनाएं होती हैं और हमारे यहाँ एक प्रचलन बन चुका है कि चुनाव है तो अभी यह नहीं करेंगे, वह नहीं होगा. राजनीति को एक तरफ रख कर सोचना आज के समय की मांग है और इस दिशा में वर्तमान सरकार ने उम्दा कार्य किया है. राष्ट्र निरंतर चलता है और व्यवस्था भी निरंतर ही चलनी चाहिए , पदों पर बैठे हुए नेता बदलते रहें, सत्ता में बैठी हुई पार्टियां बदलती रहें, किन्तु राष्ट्र नहीं रुकना चाहिए.

बुधवार, 27 मार्च 2019

आसमानी घोषणापत्र

नब्बे के दशक में छात्र बड़ी दुविधा में रहते थे। शिक्षक पढ़ाते थे प्रधानमन्त्री अमुक महानुभाव हैं, लेकिन परीक्षा के समय बदल जाते थे। कभी कभी तो परीक्षा और परिणाम के बीच में बदल जाते थे। छात्र बेचारे दुविधा में रहते थे कि जो पढ़ा था वो सही है, या जो लिख दिया था वो सही है या जो लिखने के बाद हो गया है वो सही है। वैसा ही कुछ शायद शिक्षकों के मन में रहा करता हो।

पारले जी के पैकेट पर छपे बालक के बाद आजीवन बालक रहने का वरदान केवल एक ही बालक को मिला वो हैं राहुल जी। राहुल जी में जो ये जी है वही उनके जीवन का ग्लूकोस है, और वही कांग्रेस का ग्लू कोष है जिससे कांग्रेस बंधी हुई है।

 राहुल जी जब चुनाव की तैयारी में उतरे तो जी जान लगा दिया जी तैयारी तो उन्होंने यू.पी.एस.सी लेवल की की थी।
सिलेब्स में सब याद कर लिया नीरव मोदी, माल्या, मेहुल चौकसी आदि महापुरुषों का जीवन परिचय तो जुबानी याद था, इतना कि सोते जागते कुछ भी पूछें तो भी सुना देते थे। लेकिन इनके पूर्वजों पर लगे अभिशाप और देश पर परमेश्वर की असीम कृपा से इन महानुभावों को मुँह छुपा कर जीवन यापन करने की नौबत आ गई और एक एक कर धरे जाने लगे।
राहुल जी ने जो कुछ याद किया था उस पर पलीता लग गया। मूल समाप्त हो गया तब परीक्षा में भी इनका औचित्य समाप्त हो गया। बड़ी कठिनाई से तो यह याद किया था,
सिलेबस बदलने से दिल डूबा जा रहा था।
अब कुछ नया चाहिए था। अब परीक्षा सामने थी सिलेबस खुल गया था। यह पता नहीं था कि क्या पढ़ें क्या लिखें।

तब इन्हें बहत्तर का आंकड़ा याद आया। बहत्तर छेद वाली छलनी में से पहले लोग छाने जाएँगे जो बहत्तर  साल से इनकी बातों में बहते रहे हैं। बहत्तर हूरों के लिए मर मिटने वालों को जीते जी मुफ़्त बहत्तर हज़ार मिल जाएँ और क्या चाहिए। यूँ समझिये जीते जी एक हज़ार ही एक हूर है।

अब अपना सिलेबस खुद ही लिख लिया गया है। अब कुछ भी पूछा जायेगा उत्तर बहत्तर ही आएगा। बहत्तर कहेंगे, बहत्तर लिखेंगे। भारत के बहत्तर टुकडे करने का स्वप्न पालने वाले प्रसन्न हैं और विकास की आस लगाने वाले सन्न हैं।

यहाँ छप्पन भोग की थाली परोसने में लगे मोदी के पकवान का स्वाद लोग ले ही रहे थे और उधर बहत्तर टन की बिरयानी परोसने के लिए प्लेटें लगा दी गईं। बिरयानी के लिए चावल कहाँ से आएगा यह पता नहीं, गोश्त किसका नोचा जाना है यह तय है।

कितनी सड़क, कितनी रेल, कितने रोजगार, सुरक्षा, सुविधा यह सब पीछे छूट जाएगा। परीक्षा में अब यह कोई नहीं पूछेगा कि बहत्तर के अलावा और क्या लिखा है उस आसमानी घोषणापत्र में?

मंगलवार, 19 मार्च 2019

जंगल का राजा


एक लोमड़ी सियारों के झुण्ड की तरफ बदहवास सी दौड़ी चली रही थी. सियार एक मरे हुए पशु का मांस नोचते हुए लड़ रहे थे.  कुछ कुत्ते भी वहीं बैठे हुए सूखी हडियों को चूसते हुए गुर्रा रहे थे. दो चार गिद्ध और कौए भी अपना हिस्सा ले कर भागने का मौका ढूंढ रहे थे.
लोमड़ी हाँफते हुए आई, पहले तो सियारों ने  गुर्रा कर नए आगंतुक को भगा देना चाहा. जब दुष्टजन सभा कर रहे हों वहां प्राणों का भय रहता ही है. लोमड़ी ने फिर भी एक सांस में कहा –“मैं तो खबर देने आई हूँ. खबर तो सुन लो.“
एक सियार सामने आया और बोला –“जल्दी कहो, लेकिन एक बोटी की भी अपेक्षा मत करना. अभी हम अपना खाना बांटने की परिस्थिति में नहीं हैं.”
लोमड़ी ने कहा -पहले खुशखबरी तो सुन लो शेर एक बीमारी के बाद चल बसा है. जंगल में शोक की लहर दौड़ गई है. शेर के डर से ही सभी जंगल का कानून मानते थे, उसके साथी और मित्र बहुत दुखी हैं. मुझे लगता है तुम सबको भी वहां चलना चाहिए.”
सियार ने लार टपकाते हुए कहा- “ओह शेर चल बसा. ये तो अच्छा ही हुआ अब हमारी बारी है जंगल पर दावेदारी ठोक देने की. अब हम जंगल पर राज करेंगे. चलो बता देते हैं ये सबको कि हम सियार ही अब सबसे शक्तिशाली है.”
लोमड़ी ने कुटिलता से मुस्कुराते होते हुए कहा- “लेकिन ऐसे समय में ये बात कहना ठीक रहेगा, एक दिन तो रुक जाते, उन्हें शोक तो मना लेने देते. “
“शोक! कैसा शोक? ये जो गिद्द की चोंच देख रही हो उस शेर के शव को फाड़ कर खा जाने के लिए अभी से फड़फड़ाने लगी है. हम सब सियार उसके मांस को नोच कर खा जाने को कब से दांत पैने कर तैयार बैठे हैं.”  सियार ने दांत भींचते हुए कहा.
गिद्दों ने कहा –“अच्छा हुआ मर गया, बहुत दिनों से शेर का मांस नही खाया और वे सब उस तरफ उड़ गए. “
लोमड़ी ने समझाने के बहाने उकसाने का  प्रयास किया – “थोडा तो सोचो, जंगल के बाकी पशु क्या कहेंगे? तुम्हें कैसे अपना राजा मान लेंगे? ये तो घोर असंवेदनशील बात कह रहे हो तुम.”
“यह जंगल है, सियार बोला, और यहाँ शक्ति ही सबकुछ है. आज शेरों का झुण्ड कमजोर है और हम ज्यादा है, आज निर्णय  कर के ही रहेंगे. जाओ सबको सूचना देदो हम पूरे झुण्ड के साथ शेर की गुफा पर कब्जा करने आ रहे हैं, जो भाग सकता है वो भाग जाए.”
लोमड़ी ने कहा – “लेकिन जंगल का कानून यह नहीं कहता, नया राजा चुना जायेगा कोई ऐसे ही कब्जा कर के राजा नहीं बन सकता.”
सियार ने अपने राजनैतिक ज्ञान का परिचय देते हुए कहा – “तो क्या और पशु जंगल पर राज करने के लिए नहीं सोच रहे होंगे. जिसमें थोड़ी सी भी शक्ति होगी वह जंगल का राजा बनने का सपना  जरूर देख रहा होगा.”
लोमड़ी ने कहा – “होगा लेकिन कोई ऐसी बातें खुले आम नही कह रहा होगा. थोड़ा धैर्य से काम लो. तुम वैसे तो शेर की एक दहाड़ से डर जाते थे, अब जब वह मृत पड़ा है तो उसका स्थान लेने के लिए लार टपका रहे हो. चाहो तो मैं तुम्हारे पक्ष ने माहौल बना सकती हूँ, ताकि तुम्हे पशु स्वीकार करें ,अन्यथा विरोध बना रहेगा.”

सियार ने कहा –“तुम्हे ऐसे ही बुद्दिमान नहीं कहते हैं, सोचो हमें जंगल का राज मिलते ही तुम्हे भी खाने के लिए तरसना नहीं पड़ेगा. तुम्हे मुलायम खरगोश पसंद हैं, हम तुम्हारे लिए खरगोशों की कतार लगा देंगे. लेकिन इससे पहले जंगल के पशु किसी को चुन ले जाओ तुम हमारे नाम की घोषणा  कर दो. हम पीछे पीछे आते हैं. “
लोमड़ी को सफ़ेद मुलायम खरगोशों के मांस की गंध आने लगी थी. वह जाकर अपने काम पर लग गई.

शोकमग्न शेर के शावकों को भयभीत करने हेतु कहने लगीअब तो तुम्हारे पिता नहीं रहे यह स्थान छोड़कर चले जाने में भलाई है. जाने कौन तुम्हारे प्राणो का शत्रु हो. “
उधर शेर के मित्रों से कहने लगीअब शेर तो रहा नहीं अब तुम मेरी बात मानो जिसे मैं कहूं उसे समर्थन देकर राजा बनाओ तुम्हे कोई कमी रहेगी.”
लोमड़ी अपने प्रयास में लगी थी, उसे जब विश्वास हो गया था कि सियारों की सत्ता आई ही समझ लो. उसने ये खबर सियारों को देने के लिए दौड़ लगा दी.  
इतने में ही शेर के मित्रों ने कहा - ये सियार हमें शोक करने का समय भी देंगे. अगर हम शोक में डूब गए तो अवश्य ही ये कोई षड्यंत्र कर जंगल का राजपाट हथिया कर सभी पशुओं का जीना मुश्किल कर देंगे . उसपर जो समर्थक शेर के नाम से ही उसके साथ सत्ता से जुड़े थे वे भय या लालच वश कहीं षड्यंत्र का शिकार हो जाएँ, जितना विलंब होगा सत्ता के उतने दावेदार उठ खड़े होंगे, अतः विलम्ब करना उचित नहीं है.
एक विद्वान ने कहा - एक दिन का शोक तो कर लेते आज ही सब करना आवश्यक है क्या?वो तो सियार हैं शव खाते हैं, लेकिन हम सत्ता के लिए अपने संबंधी का शोक भी करें? यह उचित नहीं.
तब एक मंत्री ने उत्तर दिया - हम शोक में पड गए तो सियार धमकेंगे और फिर कोई पशु सुखी रह सकेगा. यह समय कर्म करने का है.
इस प्रकार की मंत्रणा कर शेर के एक कुटुम्बी और दो समर्थकों को संयुक्त रूप से राजा घोषित कर दिया गया.
उधर जब सियारों को यह पता चला कि सत्ता उनके हाथ नही आई वे सब लोमड़ी पर ही टूट पड़े और उसे मार कर खा गए.