रविवार, 8 अप्रैल 2018

हसीनापुर का मालिक

एक शहर था हसीनापुर । हसीनापुर पर तात्कालीन मार्जनीदण्ड नामक वंश का शासन था ।  महाराज रीजक स्वयं को हसीनापुर का मालिक मानते थे और हसीनापुर उनके वंश की संपत्ति ।

विरोध इनका जीवन था , अवरोध बनना इनका उद्देश्य | आत्म प्रशंसा इनका ध्येय था | प्रतिवाद इनका कर्म था और विवाद इनका धर्म |  इस वंश के उत्थान की कथा भी रोचक है ।
एक बार एक ऋषि तापस्या कर रहे थे, तब रीजक जाकर चुपचाप वहां बैठ गया । जब भगवन प्रकट हुए तो ऋषि से बोला आप भोले हैं मुझे मांगने दीजिये सबका कल्याण मांगूंगा और इस प्रकार ऋषी को मूर्ख बनाकर हसीनापुर का राज्य मांग लिया ।

ऋषि पंचवटी को लौट गए और इधर प्रारम्भ हुआ रीजक का शासन काल । रीजक शासन कम और प्रतिवाद अधिक करता था । आये दिन एक नया स्वांग करता । राज्य की व्यवस्था ठप हो चुकी थी । कभी लोकपालों पर खीझता, कभी पडोसी राज्य को दोष देता । कभी जम्बूद्वीप सम्राट के प्रति कटु वचन कहता ।

रीजक के मन में इतनी कटुता थी की करेला और नीम को मिष्ठान्न घोषित कर देना चाहिये । रीजक का मन कटु और जीव्हा विषयुक्त हो गयी थी ।

विचारों लोभ और दम्भ भर चुका था । एक बार तो स्वयं का नाश करने के लिये तपस्या पर बैठ गया ।
सोचा जब ऋषि को ईश्वर ने दर्शन दिए तो मुझे भी देंगे और तब मैं हसीनापुर के साथ जम्बूद्वीप का शासन मांगूगा  । चार दिन की क्षुधा ने उसके मन से जम्बूद्वीप निकाल दिया और वह जम्बूफल मुंह में रखकर तप त्यागते हुए बोला मैं सिर्फ हसीनापुर की सेवा करूँगा ।


रीजक का मानसिक संतुलन फिर भी ठीक नहीं हुआ । और यदा कदा कुछ न कुछ ऐसा करता कि लोग स्तब्ध रह जाते की उनका राजा इतना बड़ा मूर्ख भी हो सकता है ?

रीजक की सभा में एक लपिक नामक ब्राह्मण था । एक बार लपिक ने रीजक को शास्त्र की शिक्षा देनी चाही । इसपर रीजक ने लपिक को अपने दरबार से निष्काषित कर दिया । ब्राह्मण ने रीजक के नाश की शपथ ले ली ।
 ऐसे ही जो रीजक के विरुद्ध मुंह खोलता रीजक उसे राज्य से निकलवा देता । कई लोग त्राहि त्राहि करते उसके राज्य से बहार निकल गए ।

लपिक रोज दरबार में पहुँचता और रीजक से प्रश्न पूछता और रीजक के विश्वस्त लपिक को गद्दा समझकर धुनते और यह सिलसिला निरंतर चलता था ।

रीजक का एक विश्वास पात्र था हसींयजसं । वह एक सवा दो कुंटल का भारी भरकम नरपशु था । विषाक्त मन, विषाक्त वाणी, विषाक्त जिह्वा और विषाक्त दृष्टि उसकी पहचान थी ।
वह इतना वामी था कि उसके शरीर का केवल बायां भाग काम करता । रीजक को रोज विषपान कराता और सभा में द्वेष भरता जाता । हंसीय एक कुटिल कुत्सित मानसिकता वाला व्यक्ति था । वह कहता कि उसकी पूँजी शून्य है परंतु वह व्यय इतना करता कि राजकोष हिल जाता |

हसींय ने ही सभा से दाढ़ीधर वदया समेत हर उस व्यक्ति को राज्य से निष्कासित करवा दिया था जो उसके और रीजक के बीच मे आने का प्रयत्न करता | हंसीय को धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्तिओं और धर्म से विशेष घृणा थी | जो भी उसे धर्म पर चलता दिखता उसका उपहास करता |


पड़ोस के राज्य उत्तमदेश में एक महंत का राजतिलक हुआ तब हसींय के हृदय पर उसका ही मित्र शतोशुआ लोट गया |  शतोशुआ एक अत्यंत कुटिल विषधर था | मन, क्रम, वचन और वाणी से कलुषित | पहले टीवी पर विषवमन करता था किंतु बाद मे महाराज रीजक का दास बन गया |

एक अन्य राज्य के शासक ने अपनी सभा मे एक साधु को स्थान दे दिया इससे हसींयजसं इतना चिढ़ा कि समस्त साधुवर्ग के साथ उस शासक भी खूब उपहास किया |

मार्जनीदण्ड वंश और हसीनापुर के प्रति हंसीय का योगदान केवन विष वमन करना था | जिसको रीजक और उसके चाटुकार पीकर बेसुध रहते |


रीज़क को चाटुकरिता अत्यंत प्रिय थी, अपनी प्रसंशा सुनकर रीजक अत्यंत प्रसन्न होता | उसने अपने आसपास चाटुकारों की ऐसी मंडली बना ली थी जो रीजक को कुछ देखने ही नही देते
और रीजक भी कुछ और देखने मे कोई रूचि नही दिखाता |


जब राज्य के किसी कार्य की बात आती तो रीजक किसी न किसी पर दोष मढ़ देता | जब कोई जल माँगता तो कहता की पड़ोस के राज्य ने नही दिया , कब कोई बिजली माँगता तो कहता पूंजीपति नही देते |
हालाँकि सत्तारूढ़ होते समय रीजक ने जल और बिजली जनसुविधा कम कीमत पर देने की घोषणा की थी | पर अब रीजक मुकर जाता है | लपिक भी इसकी पुष्टि करता |

जब कोई अधिक गंभीरता से पूछता तो कहता कि उसे लालजी नामका व्यक्ति कुछ करने नही देता | लालजी क्योंकि जम्बूदीप के सम्राट का प्रतिनिधि था, तो दोष जम्बूदीप पर मढ़ने से रीजक स्वयं को दोषरहित घोषित कर देता |

रीजक की सभा चल रही थी | एक विषदंत ने प्रस्ताव रखा रामनवमी को बंद किया जाए क्योंकि इससे ख़तरा है | लोग राम का नाम लेकर सनातन को बढ़ावा देना चाहते हैं | इससे पहले यह विष सभा से निकल कर जनमानस तक पहुँचता लपिक ने लपक कर प्रस्ताव छिन्नभिन्न कर दिया | पर इसपर लपिक पुनः गद्दा बना दिया गया |

ऐसी कितनी ही घटनाएँ होती और हर विरोधी को पीटपाटकर रीजक कहता लोकतंत्र ख़तरे मे हैं |

पिछली बार जब अपने प्रतिनिधि जम्बूदीप मे भेजना था तब रीजक ने हंसीय और गुप्त रूप से एक अजगरधारी को वरिष्ठों की सभा मे भेज दिया और इसी के साथ विष वहाँ भी पहुँच गया जहाँ शांति से सोचने का काम होना चाहिए | वरिष्ठ सभा तब से ही चल नही पाई |
इसी घटना से कुपित हो रीजक के भक्ति गीत गाने वाले कवि ने सभा का त्याग कर दिया | कवि रीजक का आवरण था, जो अपनी वाणी से रीजक की कुटिलता को भी ओजपूर्ण भक्तिभाव मे परिवर्तित कर देता |
कवि के जाने से रीजक आवरण हीन हो गया | अब कवि रीजक को आत्ममुग्ध और लोलुप कहते हुए मद्धम विरोध मे कविताएँ पढ़ते दिख जाता | जो उसके आवरण को प्याज की तरह परत-परत छीलता जाता |

रीजक के राज्य मे अराजकता बढ़ती जा रही थी और लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे | लोगों को आशा थी की रीजक को सद्बुद्धि आए और हमारी कोई बात सुने | और इतने मे रीजक की ओर से घोषणा आई - ग्रीष्म ऋतु है |
महाराज को शीतलता की आवश्यकता है. अतः शायद किसी दक्षिण के पंचतारा रिज़ॉर्ट मे छुट्टियाँ बिताने जा रहे हैं और रीजक एक पखवाड़े के लिए राज्य से अंतर्ध्यान हो गये |

हसीनापुर के लोगों के मुख से हँसी लुप्त है और अपने राजा के कारण वे सब हँसी का पात्र बने हुए हैं | लोगों सोच रहे हैं यह शासन ख़त्म कब होगा और जम्बूदीप का शासन सोच रहा था चलो अच्छा है ये सब जम्बूदीप मे ही सीमित हैं | मुक्त होते तो तांडव करते फिरते |

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