उम्मीद अभी भी
तो इस कहानी का किरदार एक बेरोज़गार इंजिनियर है ! वैसे तो ये कहानी भी सच्ची है पर इसे भी काल्पनिक कह देने मे ही भलाई है !
तो हुआ यूँ की जितेंद्र ने अपनी इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली थी, अब तलाश थी उसे नौकरी की ! नौकरी मतलब रोटी, नौकरी मतलब कपड़ा, नौकरी मतलब मकान...नही नही भाई...एक इंजिनियर के लिए नौकरी का दूसरा ही मतलब होता है..."इज़्ज़त", पढ़ाई पूरी करने के बाद भी अगर इंजिनियर को नौकरी ना मिले तो कोई और समझे या ना समझे अगर वो ग़ैरतमंद इंजिनियर है तो खुद तो धोबी के कुत्ते की तरह समझने लगता है ! बाकी लोग उसे निकम्मा और बेकार इंजिनियर ही कहते हैं बस !
वैसे बी.ई के मायने ही आजकल बेरोज़गार इंजिनियर हैं ! तो जितेंद्र हमारा एक ग़ैरतमंद, ज़िम्मेदार और होनहार मगर बेरोज़गार इंजिनियर है ! वैसे उसे अपनी पढ़ाई पूरी किए हुए एक वर्ष हो गया था तब से वो जूते ही चटका रहा है ! वो ये भली भाँति जानता है की उसके पिता ने अपना खून पसीना एक कर के उसे पढ़ाया है, पिता ने कहीं से उधर लिया ...कहीं से जुगाड़ किया कुछ भी किया पर अपनी तरफ से पूरी कोशिश की , कि उनके बच्चों को कोई कमी न हो और उनकी पढ़ाई मे व्यवधान न पड़े ! हालाँकि पिता से हर समय कुछ न कुछ माँगते ही रहते थे पर बच्चे जानते थे की उनके पिता की हैसियत क्या है ! पर अब जितेन्द्र को पिता के सामने हाथ फैलाते हुए संकोच होने लगा था ...क्या फायदा उसकी पढ़ाई का ..उसे आज भी अपने पिता के सामने हाथ फैलाना पड़ता है ! यह संकोच आत्मा को धीरे धीरे काटता रहता है !
फिलहाल ये कहानी जितेंद्र नमक इंजिनियर की है तो उसके आर्थिक हालात की व्याख्या यहाँ शोभा नही देती ! भाई एक इंजिनियर की भी कुछ इज़्ज़त होती है...
एक इंजिनियर पैदल चलना श्रेयस्कर समझता है पुरानी स्कूटर पर चलने से , एक इंजिनियर जूतों के बिना बहार निकलता है तो ख़ुद अपने पैर नही सर चप्पलों में छुपा लेना ही बेहतर समझता है॥ एक इंजिनियर बिना जूतों के ...छी छी...इंजिनियर एक ऐसी जात है जिसके अपने नियम होते हैं। इंजिनियर की कुछ बुनियादी अवश्यक्ताये होती है...जिनमे उसका एक इंजिनियर की तरह दिखने और कपड़े पहनना शामिल होता है. इंजिनियर को साफ़ सुथरा जेंटलमेंन बन कर रहना ही उचित होता है ! ये स्वाभाविक गुण इंजिनियर में न हो तो उसकी जगहंसाई ही होती है!
तो जीतेन्द्र हालाँकि एक इंजिनियर कॉलेज की डिग्री से तो बन गया था पर अभी वास्तविक इंजिनियर बनना बाकी है ! उसे नौकरी की जरूरत थी और जिस भी नौकरी को प्राप्त करने का प्रयत्न वो करता उस नौकरी को अनुभव की ! अब नौकरी नही मिलेगी तो अनुभव कहाँ से लेकर आयें? और बिना अनुभव के नौकरी कहाँ से लायें समस्या गंभीर है ! और ऊपर से दबाव यह की अगर २-३ वर्ष बिना नौकरी के निकल गए तो डिग्री भी बेकार ही समझिये !
इंजिनियर बनने के बाद से नौकरी मिलने तक की जो महादशा होती है वो शनि राहू केतु की सम्मिलित महादशा के प्रभाव से भी अधिक होती है , एक इंजिनियर और उसके परिवार का भरपूर शोषण कर लेती है ! परिवार अपनी आर्थिक क्षमता तो कमजोर हो ही जाता है वरन पड़ोसी दृष्टा एवं विद्वानों की तुलनात्मक गिद्ध दृष्टि इंजिनियर के मानसिक एवं शारीरिक स्वस्थ्य को गिरा देता है ! माता पिता को सुना सुना कर कहा जाता है की फलाने के पुत्र ने भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी वो आज यहाँ नौकरी कर रहा है ...वो बड़ा सुपूत निकला ! और फ़िर उनकी विशेष टीप होती है जिससे माता पिता को अपने ही पुत्र पर संदेह होने लगता है की हमारे पुत्र ने ही ग़लत गोली खा ली है !
तो आप समझ गए होंगे की जितेन्द्र एक होनहार मगर बेरोजगार इंजिनियर है जिससे वो ख़ुद को तिरस्कृत अनुभव करता है और यूँ कहिये नौकरी के लिए परेशां है और अपनी जवानी को साक्षात्कार और प्रतियोगी परीक्षाओं में ही खर्च कर रहा है !
नौकरी के लिए पैदल चलते चलते उसके जूते भी रहम की भीख मांगने लगे हैं.. हाँ कंपनियों के दरबान पहचानने लगे हैं …अब तो बेचारे ख़ुद ही शर्मा जाते हैं “लो फ़िर आ गया साक्षात्कार देने” !
कंपनियो के दरवाज़े बजाते हुए उसकी उँगलियों में सूजन आने लगी है ! भाई उंगलिया हैं भी तो उन हाथों की जिन्होंने कभी कलम घसीटने और कंप्यूटर के कीबोर्ड के बटन दबाने से सिवा कुछ नही किया था ! किसी मजदूर के हाथ हो तो दरवाज़ा तोड़ भी सकते हैं..पर ये इंजिनियर के हाथ हैं और ये मजदूरों से बड़े अलग होते है !जैसे की पहले ही कहा जा चुका है की इंजिनियर जात के भी कुछ नियम होते हैं...तो एक इंजिनियर पेट भरने के लिए मजदूरी नही कर सकता ....हालाँकि परिस्थितिया उसे सब करने पर मजबूर कर देती हैं...
फिलहाल गौर इस बात पर करना चाहिए की जितेन्द्र इंजिनियर से इंजिनियर बाबू बनने के लिए मशक्कत कर रहा है...उसी सिलसिले में आज एक सरकारी कंपनी में साक्षात्कार देने जा रहा है !
तो जितेन्द्र ने तैयारी पूरी कर ली थी, सारा कोर्स पुनरावलोकन करने के बाद अतरिक्त पुस्तकें भी पलट कर देख ली थी रात भर जाग कर पढ़ाई की थी और उसे उम्मीद थी की वो उससे पूछे गए सारे सवालों के उत्तर दे देगा ! उससे पहली बार सब कुछ याद था ! उसने इश्वर का ध्यान किया, माता पिता से आशीष लेकर चल पड़ा ! आत्मविश्वास से उसका रोम रोम पुलकित हो रहा था !
वह जब साक्षात्कार वाले घटना स्थल पर पंहुचा तो वहां की परिस्थितियों ने उसके आत्मविश्वास की आत्मा निकल दी. पहले तो भीड़ कुछ ज्यादा ही थी...लगा की कुम्भ का मेला इस बार जल्दी लग गया है.. दहकती गर्मी में भी सारे लोग टाई पहन कर अपने इंजिनियर होने का प्रमाण दे रहे है भाई साक्षात्कार में इंजिनियर टाई नही पहनेगा तो साक्षात् पशु पृच्छ विहीना लगेगा ! तो गर्मी से दो-चार कोमलांगी इंजिनियर बालाएँ तो यूँ ही बेसुध हो गई और लौट गई ...किंचित उन्होंने रसोई में रोटी बेलना इस प्रतीक्षा पंक्ति में खड़े रहने से बेहतर समझा हो ! खैर...कुछ लोगों को तसल्ली हुई की चलो कुछ प्रतियोगी तो कम हुए ! ये करकट प्रवृत्ति इंजिनियर में जन्मजात नही होती पर कठिन प्रतियोगिता बना देती है ! तो १०००-१५०० इंजिनियर की लम्बी कतार, भीषण गर्मी सबका खून सोखने में मगन और अपनी बारी आने की उम्मीद किसी को नही ! फ़िर भी सभी संभावनाओं के विरुद्ध संभावित परिणाम की अपेक्षा कर रहे थे ! एक एक कर के सब की बारी आने लगी !
वैसे तो जितेन्द्र सब रता रटाया भूल चुका था फ़िर भी जाने क्यों...चेहरे पर आत्मविश्वास को घसीट कर ले आया..और घुस गया बजरंग बली का नाम लेकर साक्षात्कार वाले कमरे में ! सभी प्रश्नकर्ताओं को विद्वान-गुरु और श्रेष्ट समझ कर दंडवत प्रणाम किया और फ़िर बैठ गया सामने पड़ी कुर्सी पर एक निर्बल अबला की तरह ... उसने विद्वानों ने आँखें चार की और प्रश्न का इंतज़ार किया ....थोडी देर तक दोनों तरफ़ से कोई संवाद नही हुआ तो जितेन्द्र ने सोचा की ये उसके प्रस्तुतीकरण के गुणों की परीक्षा है !
उसने सोचा उसे ही अपना परिचय देना चाहिए...उसने अपना नाम बताया और अपने बारे में जानकारी दी फ़िर चुप हो गया ! उसने सोचा अब तो कोई प्रश्न करेगा ... फ़िर कोई संवाद नही हुआ तो वो सोचने लगा की उसने अपना परिचय बेकार ही दे दिया ...पर यूँ हुआ की अचानक देव वाणी में एक विद्वान ने प्रश्न किया " ५ लाख दे सकते हो?" जितेन्द्र को हलाकि अपने पैरों के नीचे से जमीन खिसकती हुई लगी पर उसने बड़े ही आत्मविश्वास से इस प्रश्न का उत्तर भी दिया "नही" प्रश्नकर्ता ने कहा की आप जा सकते हैं !
जितेन्द्र की समझ में सब कुछ आ गया और वह धन्य वाद देकर वहां से निकल गया ! घर पंहुचा तो माँ ने पूछ लिया "कैसा हुआ साक्षात्कार, सब सवालों के उत्तर तो दिए न तूने " जितेन्द्र ने मुस्कुराते हुए कहा "हाँ बहुत अच्छा हुआ ...आज तो जो प्रश्न मुझसे पूछे उनका जवाब भी मुझे मालूम था, आज सब सही जवाब देकर आया हूँ" माँ ने उसे ढेरों आशीर्वाद दिए और खाना लगा दिया. फ़िर माँ ने पुछा की बेटा "साक्षात्कार कितनी देर चला? कितने प्रश्न पूछे तुमसे?"
जितेन्द्र ने कहा "एक ही तो प्रश्न किया था"
"बस एक ?"
"हाँ माँ इसी प्रश्न से उन्होंने मेरी योग्यताएं जाच ली"
"ऐसा कौन सा प्रश्न था"
"बस था माँ, इंजीनियरिंग की पढ़ाई से भी बड़ा व्यावहारिक प्रश्न था, संक्षिप्त प्रश्न था, उत्तर भी संक्षिप्त था, तू चिंता मत कर, जा सो जा ...कल फ़िर एक जगह साक्षात्कार देने जाना है" !
उम्मीद अभी भी है उसे !