धरमपाल
के लड़के ने इस साल इंजीनियरिंग कालेज मे दाखिला ले लिया था, फीस की एक किश्त तो कैसे
भी भर दी लेकिन आगे का जुगाड़ करना कठिन था।
नया
कालेज गाँव के पास ही बने फोरलेन हाइवे पर खुला था, सो लड़का घर मे ही रहकर पढ़ाई करने
वाला था। लेकिन पढाई की जरूरतों ने घर का बजट
बिगाड़ रखा था। एक पेट्रोल पम्प पर चपरासी का
काम करते करते तो पच्चीस साल हो गये थे लेकिन इतना पैसा जुड़ा नही था की ये सब खर्चा
एकदम से उठा ले।
सोच
रहा था कि पिछले साल से सरकारी दफ्तरों की तरह जो पी.एफ. जमा होना शुरू हुआ है , वो
कुछ साल पहले शुरू हुआ होता तो आज उससे ही सारी जुगाड़ हो जाती।
बैंक
से कर्ज लेने के लिए लड़का बार बार कह रहा था । लेकिन कर्ज का ब्याज बहुत ज़्यादा होता
है. चुकाना दुष्कर होगा और लड़के पर जीवन शुरू होने से पहले कर्ज लाद देने को उसका मन
गवाही नहीं देता था। गुस्सा तो उसके मन में इस बात का भी था कि उसके मित्र नब्बू का
बेटा भी उसी कालेज में जा रहा था और उसकी कोई फीस नहीं लगती थी, गरीब तो वो भी था ।
लेकिन
जो है सो है , जुगाड़ तो करना ही है , आखिर लड़के का भविष्य भी तो बनाना है।
तभी
एक गाड़ी प्रचार करते हुए निकली - हमारी सरकार आएगी तो सबका कर्जा माफ़ किया जाएगा।
कृषकों का कर्जा माफ़ किया जाएगा , हमे जिताइये, कृषकों की सरकार बनाइए।
फिर
एक नेता जैसा टोपी कुर्ते वाला आदमी उसके सामने रुका, झुक कर प्रणाम किया और बोला
-
"चाचा
हमको वोट जरूर देना, इस बार अपनी सरकार बनेगी जो आपकी जरूरतों को पूरा करेगी। "
"बेटा
हो कौन तुम ? "
"मैं
पूर्व विधायक लखन सिंह का बेटा रतन सिंह, इस बार आपके क्षेत्र से विधायक के चुनाव मे
खड़ा हुआ हूँ। पिताजी को तो आप जाते ही हैं, वो सांसद का चुनाव लडे थे इस बार। "
"अच्छा
तो क्या ये कर्जा माफ़ करने वाली बात सच है ?"
"सौ
प्रतिशत सच है काका, हमारी सरकार बनी तो सबका कर्जा माफ़. "
अब
धरमपाल के दिमाग़ मे कुछ कुटिल विचार आया, बोला -"और जिसने न ले रखा हो कर्जा उसका क्या?"
"जिसने
न लिया हो तो ले ले, हम तो सबका माफ़ करवाएँगे, रतन सिंग ने कहा"
धरमपाल
के कहा - "फिर तो तुम्हे कोई न हरा सकेगा बेटा हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है"
और
रतन सिंह राम राम कर के आगे निकल गया।
उसे
जाते देखकर धरमपाल के मन मे विचार आया -देखो तो कितना बड़ा और समझदार हो गया, थोड़ा
मुटा गया है पहचान में भी नहीं आता , कल की ही बात लगती है जब लड़कियों के दुपट्टे
खींचते हुए पकड़ा गया था , और जनता ने खूब धुनाई की थी। उसपर विधायक जी ने चार पुलिस
वालों का तबादला भी करवा दिया था । वो तो दो बार से विधायक जी हार रहे हैं , नहीं तो
नाम बजता था इनका। खैर वो पुरानी बात हैं,
उम्र के साथ समझदारी आ ही जाती है।
धरमपाल
की आँखों मे एक नई चमक थी, सरकारी दस्तावेज़ों मे वह भी एक पंजीकृत किसान था। उसकी
माँ के नाम पर थोड़ी बहुत जमीन थी, जिसपर किसी
किसी साल कोई भाई खेती करता, कभी आजू बाजू वाले किसानो को निश्चित आनाज के बदले खेती
करने दे दिया जाता।
किसानों
का बैंक से कर्ज लेना उतनी ही आम बात है जितना शहरों के लोगों के पास क्रेडिट कार्ड
होना, पिछली सरकार जब बनी थी तो कृषि पर कर्ज का ब्याज बहुत कम कर दिया था, और कर्ज
लेने की प्रक्रिया को भी बहुत आसान कर दिया था।
धरमपाल
के दिमाग़ मे एक खुराफाती विचार आया, उसने सोचा क्यों न अपनी जमीन पर कृषि के लिए बैंक
से कर्ज लेकर, अभी अपनी सब जरूरतें पूरी कर ली जाएँ।
जब
सरकार सब कर्ज माफ कर ही रही है तो ये भी हो ही जाएगा जरूरत भी तो केवल एक लाख की ही
है। दो लाख ले लिया जाए और उसने ऋण के लिए आवेदन डाल दिया हफ्ते भर मे पैसा उसके खाते
मे था उसकी तत्कालीन आवश्यकताएँ तो पूरी हो ही गयीं।
लड़के
को कम्प्यूटर भी दिला दिया गया। अब वो आते
जाते उस पार्टी का प्रचार कर ही देता जिसने कर्ज माफ करने का वादा किया था। अब तक गाँव मे जो किसान अपना कर्ज वापस कर रहे थे
उन्होने बैंक खाते खाली कर लिए और कर्ज का पैसा वापस करना छोड़ दिया। वे कहते नजर आते
पाँच चाह महीने की बात है उसके बाद सबका कर्जा माफ होना ही है तो फिर काहे को पैसे
दें ?
सबको
एक उम्मीद थी कि सबके बुरे दिन अब लद गये हैं , आखिर वो सरकार उनकी बन ही गयी जिसकी
प्रतीक्षा धरमपाल को थी। दो दिन बाद टीवी पर
देखा - किसानो का कर्जा माफ कर दिया था सरकार ने, लेकिन पिछले साल तक का । इस साल जिसने
कर्ज लिया उसको कोई लाभ नही मिलेगा और न जाने क्या क्या शर्तें थी।
धरमपाल
सर पकड़ कर बैठा गया, जैसे जुए मे बड़ी रकम हार गया हो। फिर खेत की ओर चल दिया यह अनुमान
लगाने की इस बार कितनी फसल की उम्मीद है।
मन
में एक ही बात चल रही थी - बुरे फंस गए मुफ्त के चक्कर में ।