शनिवार, 4 नवंबर 2023

सत्तर घंटे काम

एक बुजुर्ग सीईओ साहब सपने में घुस आए। कहने लगे - "यार हमको लग रहा है कि अब सबको हफ्ते में सत्तर घंटे काम करना चाहिए। मेहनत करेंगे तभी तो आगे बढ़ेंगे।"

हमने कहा "बिलकुल करना चाहिए। सत्तर क्या आप कहिए एक सौ सत्तर घंटे हम दफ्तर में बैठे रहें।"

"अब तुम फिर हमारी बात की गंभीरता नहीं समझ रहे हो।"

"तो आप समझाइए मालिक!"

"देखो क्या है, जवान खून होता है गरम, उत्साही, जोशीला। इसलिए जवान लोग जितना मेहनत करेंगे उतना ही आगे बढ़ेंगे। उनके साथ कंपनी आगे बढ़ेगी, कंपनी के साथ देश आगे बढ़ेगा। हमको युवा शक्ति का सही इस्तेमाल करना ही पड़ेगा। वर्ना तो आज के युवा की शक्ति नालियों में बह रही है। आज के युवा न प्रोडक्टिव रह गए हैं, न रिप्रोडक्टिव।"

"वो तो आप सही कह रहे हैं। युवाओं को मेहनत तो करनी ही चाहिए। लेकिन बस यह समझ नहीं आता कि आई. टी. वाले ज्यादा काम करेंगे तो क्या? काम तो हर एक के पास उतना ही रहेगा जितना आज है। जो बीस घंटे में निपटा लेता है वो बीस में ही निपटाएगा और जो आज भी साठ घंटे लेता है वो कल सत्तर और अस्सी भी लेगा।"

"हम ऐसे लोगों को निकाल देंगे जो अपना काम बीस घंटे में निपटा देते हैं। हमको सत्तर घंटे वाले लोग ही चाहिए।"

"फिर भी अगर समय ज्यादा हुआ तो लोग खलिहर बैठेंगे!"

"तो क्या हुआ हम उनमें से भी आधे लोग निकाल देंगे। फिर तो लोग और काम बराबर हो जाएगा।"

"निकालने की बात तो आप करो ही मत। चाह महीने पहले निकाला था आपने एक को, उसके बदले दो को नौकरी पर रखना पड़ा है। और उन दोनों  को भी पता नहीं है कि उनको क्या करना है और उनके साथ वाले क्या करते हैं। न आज तक हमको समझ आ पाया है कि इन दोनों आतापी–वातापी को रखा क्यों गया है? किसी दिन ये कंपनी का पेट फाड़ कर निकल जायेंगे।"

"इधर उधर की बात मत करो ये बताओ सत्तर घंटे काम करने को तैयार हो या नहीं?"

"हम तो पहले से सत्तर घंटे काम करते हैं मालिक। रोज़ नौ घंटे दफ्तर में और पांच घंटे दफ्तर के सफ़र में।"

"सफ़र में करते क्या हो?"

"सोचते हैं कि दफ्तर में काम कैसे करेंगे।" 

"इससे मदद मिलती है?"

"नहीं सोचते-सोचते थक जाते हैं, फिर काम नहीं कर पाते!"

"फिर काम कब करते हो?"

"शनिवार-इतवार को, जब दफ्तर नहीं जाते उन दो दिनों में काम करते हैं। बाकी दिन सफ़र करते हैं।"

"फिर तो सफ़र करना बेकार है तुम्हारा, उसे सत्तर घंटे में नहीं गिन सकते। सफ़र में और क्या करते हो?"

"वही जो सब करते हैं। सफ़र। मेट्रो में लोगों के कलेश देखते हैं। फिर गाना सुनते हैं। हालत ऐसी हो गई है कि घर पर भी कहीं जब गाना सुनाई देता है तो हमको लगने लगता है कि हम मेट्रो में हैं। गानों के बीच में अगर मेट्रो की घोषणाएं न सुनाई दें तो गाना अटपटा लगने लगता है। दिमाग में गाने फिट बैठ गए हैं। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी - अगला स्टेशन पटेल चौक है - हे नाथ नारायण - दरवाजे बाईं तरफ खुलेंगे - वासुदेव। 

सुंदरकांड दिमाग में भर गया है। शेड्यूल इतना टाइट है कि किस चौपाई पर  कौन सा स्टेशन आता है वह याद हो गया है। जैसे - प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा। सुनते ही सीट से खड़ा हो जाता हूं। कश्मीरी गेट पर प्रवेश करने का यही समय होता है। 

एम्स पहुंचते पहुंचते विभीषण रावण को छोड़कर जाने लगता है और गायक कहता है – अस कहि चला विभीषनु जबहि, आयुहीन भए सब तब ही।"

"तुमको सुंदर काण्ड सुनने के लिए दफ्तर बुलाते हैं क्या?"

"तो मालिक मेट्रो में चल रहे किसी और काण्ड पर ध्यान देने से अच्छा तो सुंदरकाण्ड पर ध्यान देना बेहतर है।"

"बोर नहीं हो जाते रोज?"

"होता हूँ, फिर बालकाण्ड सुनने लगता हूँ। धनुष टूटते–टूटते दफ्तर पहुँच जाता हूँ।"

"बड़े फालतू काम हैं तुम्हारे।"

"हमारे छोड़ो ये बताओ, ये HR वालों को सत्तर घंटे रोककर क्या करवाओगे? चालीस घंटे में ही रंगोली, अंताक्षरी करवा लेते हैं। सत्तर घंटे तक ये लोग करेंगे क्या?"

"तुम अपने काम की बात करो, सत्तर घंटे करोगे या नहीं?"

"करवाओगे तो कर लेंगे मालिक। विकल्प ही क्या है?"

"विकल्प तो कुछ नहीं। तुम तो जानते हो आईटी के दिन ठीक नहीं चल रहे। रिसेशन सर पर खड़ा है। आय उतनी है नहीं। शेयरों के भाव भी टूटे हुए हैं। समझ नहीं आता क्या करें। फिर विकल्प तो खोजने ही पड़ते हैं।"

"विकल्प मतलब क्या? क्या सच में लोगों को निकालने की योजना बना रहे हैं?"

"नहीं नहीं, जितने लोग हों उतना अच्छा।"

"फिर आय कैसे बढ़ाएंगे?"

"आज तुमको राज़ की बात बताते हैं। ये आईटी बिजनेस तो सब साइड बिजनेस है। हमने जब आईटी में नौकरी शुरू की तो दूसरे ही साल  समझ आ गया असली काम तो कैंटीन का है और हमने कैंटीन खोल ली। लेकिन कैंटीन में तब लोग नहीं आते थे, इसलिए हमने साइड में एक आईटी कंपनी भी खोल ली। 

आज भी हमारा असली काम तो कैंटीन और हॉस्टल का है। आईटी डूब जाएगी लेकिन कैंटीन का धंधा अजर अमर है।  

लोग जब दफ्तर में चौदह घंटे रुकेंगे तो उनको कैंटीन में खाना ही पड़ेगा। कुंवारों से तो भरपूर कमाई है। शादीशुदा लोग थोड़ा नुकसान करते थे, घर से खाना ले आते थे। चौदह घंटे रुकेंगे तो कम से कम दो बार की चाय और एक बार का खाना तो खाना ही पड़ेगा। कुछ लोग तो घर ही नहीं जायेंगे और तीनों समय का खाना हमारी कैंटीन में ही खायेंगे।"

"तो आपकी असली कमाई Vertica नहीं भजिया है? शेयरपोइंट नहीं डोसा प्वाइंट है? सर्विस-नाउ नहीं वड़ा पाव है?Tally नहीं थाली है?"

"हाँ दोस्त,  python में दिमाग खपाने वाले खाते तो आखिर उतप्पम ही हैं। कैंटीन का धंधा न हो तो हमारा EBIDTA आधा रह जाए।"

"लेकिन आपके दोस्त तो कह रहे हैं, कि चालीस घंटे कंपनी के लिए और तीस अपने लिए लगाने चाहिए। हमको तो वो बात ही ठीक लग रही है।"

"हाँ तो तीस घंटे हमारी कैंटीन में ही बैठो। अपने लिए खाओ पियो। दोस्तों के साथ गप्पबाजी करो। गप्पबाज़ी के बीच बीच में जूस, पकौड़े, पॉपकॉर्न आदि लेते रहो।"

"मालिक सत्तर घंटे कैंटीन में खाने पीने के बाद बीमार न पड़ जायेंगे।"

"उसके लिए ही तो हमने अस्पताल का धंधा भी खोल रखा है। पूरी सुविधा है।"

"माफ करो मालिक। समझ गया और कोई विकल्प नहीं। घर परिवार का क्या है, चल ही जाएगा।"

"देखो तुम अपना सब कुछ कंपनी को देदो, लेकिन टर्म इंश्योरेंस जरूर ले लेना।"

"साइड में वो धंधा भी खोला है क्या? वैसे इतना समय दफ्तर में लगाने के बाद इंसान जीकर करेगा भी क्या। टर्म इंश्योरेन्स ही सही है।"

वे दांत दिखाते हुए बोले "मैने भी अपने दिनों में ऐसे ही सत्तर अस्सी घंटे काम किया है। मुझसे प्रेरणा लो और लग जाओ।"

"वो आपकी खुद की कंपनी है मालिक। खुद की दुकान में आदमी चौबीस घंटे काम भी करे तो कम है।"

"तो तुम अपनी दुकान खोल लो।"

"इतनी औकात होती तो इस नौकरी को कब का छोड़ दिया होता। नहीं है इसलिए जैसा कहोगे वैसा ही करेंगे। 'जहाँ ले चलोगे वहीं मैं चलूँगा, जहाँ नाथ रख लोगे वहीं मैं रहूँगा।"

वे कहने लगे - "तो उठो इस भजन के शुरू होने तक तुम्हें रिक्शे में होना था। आज देर हो गई।"

हम हड़बड़ाते हुए उठकर गुसलखाने में घुस गए। नहा धो कर पूजा पाठ करके तैयार हो गए। देखा तो पत्नी अभी भी सो रही थीं। हमने उन्हें उठाया – चाय ही बना दो।

उन्होंने एक आँख खोलकर घड़ी देखी। फिर दोनों आखों को बंद करके घूरते हुए बोली सो जाओ अभी रात के ढाई बजे हैं और आज शनिवार की छुट्टी है।

रविवार, 10 सितंबर 2023

कांग्रेस राज में G20

कुंठित पत्रकारों की सभा हो रही थी। सभी आदि इत्यादि पत्रकार रोनी सूरत बनाकर बैठे हुए थे। बैठे बैठे सामूहिक सपना देखने लगे। कांग्रेस की सरकार आ गई है और राह–उल–गान्ही प्रधानमंत्री बन गए हैं। जी–२० का आयोजन हो रहा है। 

तैयारियों के नाम पर एक लाख करोड़ रुपए आवंटित हुए थे जिसे मंत्री खा गए हैं। सबको हिस्सा मिला है। गान्ही बाबा ने कहा है कुछ तैयारी की जरूरत नहीं है। जो जैसा है वैसा ही दिखाएंगे।  अपनों से क्या छिपाना।  

एक पत्रकार ने सपने में देखा राष्ट्राध्यक्ष भारत आ रहे हैं। उन्हें लेने कोई नहीं गया। सब रिक्शा कर के जनवासे में जा रहे हैं। सबको एक स्कूल में ठहराया गया है। स्कूल के कमरे अलग अलग देशों को दे दिए गए हैं। सारी डेस्क उठाकर एक कोने में एक के ऊपर एक चढ़ा कर रख दी गई हैं। कमरों में दरी बिछी है। दरी पर सफेद चादर में लिपटे गद्दे हैं। साथ में काले कंबल भी रखे हैं। सफेद कवर डले हुए तकिए भी हैं। ब्लैक बोर्ड पर रंगीन चॉक से  वेलकम लिखा है। क्लासरूम के बाहर दो के बीच में एक मटका रखा है, जिसपर एक प्लास्टिक का डंका है। साथ ही डिस्पोजल ग्लास लटक रहे हैं। ग्लास फेकने के लिए एक बाल्टी रखी है। 

सामने टेंट लगा है जिसपर पोहे जलेबी और चाय के स्टाल लगे हैं। प्रधानमंत्री गान्ही स्वयं व्यवस्था संभाल रहे हैं। रोंदू पत्रकार डिस्पोजल प्लेट में पोहे सजा रहे हैं। दूसरे उसपर जलेबी रख रहे हैं। तीसरा पत्रकार बिस्कुट के पैकेट खोल खोल कर दो दो बिस्कुट गिन कर हर प्लेट में रख रहे हैं। 

कोई परेशान सा एक्टिविस्ट ने नमकीन संभाल रखा है। गठबंधन के नेता लोग ट्रे में चाय लेकर सब मेहमानों के कमरों में देने जा रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति अपना तकिया बदलवाने के लिए लड़ रहे हैं, कह रहे हैं तकिए पर दाल लगी है। बिस्तर तो साफ देते कम से कम। 

इटली के मेहमानों को ऊपर वाला कमरा दिया गया है। जिसमें कूलर लगा है। गान्ही जी की माताजी स्वयं वहीं कुर्सी डाल के व्यवस्था देख रही हैं। भानेजन जो आई है। चिदंबरम, अय्यर दोनों दोपहर के खाने की व्यवस्था देख रहे हैं। चिदंबरम अपने गमलों से ताज़ी गोभी तोड़कर लाए हैं। आलू गोभी मेनू में तय है। अय्यर कुर्सी पर बैठकर आलू सलाद काटने वालों को निर्देश दे रहे हैं। 

कांग्रेस अध्यक्ष सफेद कलफ वाली धोती कुर्ता पहन के द्वार पर बैठे हैं। उनके पुत्र पानी की व्यवस्था देख रहे हैं। टैंकर वाला देर कर रहा है तो उसे हड़का रहें हैं। कह रहे हैं वहीं आके मारूंगा अगर दस मिनट में टैंकर नहीं आया तो।

केजरीवाल और संजय सिंह बीच में कुर्सी डाल के बैठे हैं। पोहा जलेबी खा चुके हैं। हर मेहमान को पकड़ कर बता रहे हैं, बढ़िया शीशमहल बनाया है। चलो दिखाते हैं। लाल किले के बाद दिल्ली में कुछ बना है तो बस यही। कनाडा के प्रधानमंत्री तो उनका घर देखने को तैयार भी हो गए। बोले चलो दिखाओ वहीं फ्रेश भी हो लेंगे।  वे दूर के रिश्ते में साढ़ू लगते हैं।  उनको लेकर जब घर पहुंचे तो भाभी जी चिढ़कर कहने लगीं आज पानी नहीं आ रहा। स्कूल में व्यवस्था है भाई साहब वहीं जाइए। अपने पति को कोने में ले जाकर बोलीं चार लाख का लगवाया है खराब कर देंगे ये लोग। भतेरे लोग आए हैं। किस किस को बुलाइएगा? स्कूल में रहने दीजिए सबको।

इधर  गान्ही बाबा अब सब्जी की कड़ाही पर कर्छुल चला रहे हैं। अनुभवी लालू जी भी पहुंच गए हैं और मसाले बता रहे हैं कितना डालो। "ए प्याज भुनने दीजिए जी फिर टमाटर डालिए। अभिये डाल देंगे तो ऊ स्वाद नहीं न आएगा।"

सब्जी की खुशबू लेते हुए पुष्पेश जी भी पहुंच गए हैं। कह रहे हैं मुगलों के बाद कहीं सब्जी की ऐसी खुशबू आई है तो यहीं आई है। 

पडाइन बार बार आने जाने वालों पूछ रही हैं, ऊ बिडेनवा आवा कि नहीं?

सब बार बार मना कर देते। मंडल जी ज्ञानी बने बैठे हैं, सबके बीच में संसार भर की चर्चा कर रहे हैं। कह रहे हैं, वो देखो फलां  का लड़का मजिस्ट्रेट हो गया। उसकी शादी में बढ़िया भोज हुआ। भेज भी नॉन भेज भी। सब भेज जी बनाईएगा तो कैसे चलेगा। कुछ हम लोगों की जुगाड़ पानी है कि नाही? एक कांग्रेसी कह रहा है बिरयानी बन रही है। ओवैसी साहब पीछे बकरा ही काट रहे हैं। लेकिन शाम तक बनेगी।

इधर ब्रिटेन के प्रधान मंत्री पहुंच गए हैं। सिद्धारमैया खुद उनकी अटैची लेकर चल रहे हैं। आगे आगे डीके चल रहे हैं, और उनके सामने आने वालों को हटा रहे हैं। उनको देखते ही पडाइन, कविता, वृंदा करात मंगल गान गाने लगी हैं।

 ... लालाजू पधारे, 

धन भाग हमारे

आरती लियाओ रे 

मंगल गाओ री

आए हैं पई पावने, 

बता दियो सब गांव में।

महिला पत्रकार छुप छुप कर देख रही हैं। एक ने छेड़ भी दिया जीजा जी लगता है दीदी खाने नहीं देती दुबरा गए हो।  इतने में दो कुत्ते लड़ पड़े। किसी ने पोहे की प्लेट छोड़ दी थी जिसपर दो कुत्तों में काटा–भौकी हो गई। पेंचकस बाबू लट्ठ लेकर दौड़े। 

पत्रकारों को भरपूर रसद मिल गई है। सब अफर कर बैठे हैं। अब एक पत्रकार पंडाल के पीछे झाँकने जाता है कि दोपहर के खाने की क्या व्यवस्था है।   लालूजी कह रहे हैं कि अब हल्दी डाल दो मसाला होने वाला है। हल्दी का पैकेट नही मिल रहा था। एक पत्रकार हल्दी लेने दुकान की तरफ दौड़ा। दूसरे ने स्कूटी की चाबी उसे फेंक कर दी और कहा स्कूटी से चला जा जल्दी आ जाएगा और चाबी छिटक के नाली में गिर गई। उधर ये चल रहा था, इधर एक परेशान सा दौड़ा जा रहा था। 

पड़ाईन ने फिर टोका, का हो बाइडेनवा आ गइल का?

वो बोला उसी का तो लफड़ा हो गया। उनको ऊपर वाला कमरा दे दिया। अब कह रहे हैं दादा से सीढ़ी चढ़ते न बनेगी। नीचे फ्रांस वाले चाचा को ढूंढने जा रहे हैं, बे मान जाएं तो उनसे कमरा बदलवा दे।

टेंट में अब सफाई हो रही है। खाना लगने वाला है। सलाद कर गया है। दाल भात तैयार है। पूडियां निकलने लगी हैं। बाइडेन दादा कह रहे भूख लगी है। नाश्ता लाओ। इधर खड़गे जी उनको समझा रहे बड़े भाई पंद्रह मिनट रुक जाओ खाना तैयार हो रहा है। खाना खा लो सीधा। बाइडेन कह रहे हैं, हमे तो प्लेट लगवा के यहीं दे जाओ।

खाने पर फूंक मारने सारुक और आमिर आए हैं। दोपहर के खाने में आमिर फूंकेंगे और रात की बिरयानी में शारूक।

गैलरी में दरी बिछ गई है। जादूगर नेता ने सब मेहबानों को जेवने का न्यौता दे दिया है। सब आकार बैठने लगे हैं। दो तीन नीचे बैठने से आनाकानी कर रहे हैं। कह रहे हैं घुटने पिराउत हैं। उनके लिए टेबल की व्यवस्था की जा रही है। बाकी मेहमान पंगत में बैठ गए हैं। सबके सामने पहले पत्तल डाली गई। पत्तल पर पानी छिड़का गया। दो दो दोने रखे गए। यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष आदि फुर्ती से परस करवा रहे हैं। एक ने नमक उठा लिया। एक ने सलाद। एक ने सब्जी और एक ने पूड़ी। एक दोने में दाल भरी गई। दूसरे में रायता। किसी किसी ने रायता सीधा ग्लास में ही भरवा लिया। साउदी वाले दाऊ का दोना लीक  कर गया। उनका झबला पीला पड़ गया। 

बाइचारों के लिए दूसरी मंजिल पर पंगत बैठाई गई। महिला कार्यकर्ताओं ने परस की जिम्मेदारी उठाई।

जिनपिंग जो अभी भी बाइडेन के पास बैठे थे, उन्होंने एक लड़के को बुलाया। बोला वो दो कुत्ते जो लड़ रहे थे कहां गए? 

लड़का बोला वे तो भाग गए। 

जिनपिंग कहने लगे ढूंढ लाओ यार। ऐसे ही मजबूत चार कुत्ते। अगले महीने हमारे यहां दावत है। काम आ जाएंगे।  उनके लिए कुत्ते ढूंढे जाने लगे। कुत्तों को भी शाम के भोज में आमंत्रित किया गया। चार कुत्ते ऑनसाइट जाने वाले थे। कुत्ता समाज में खुशी की लहर दौड़ गई।

इधर खाना हो रहा था, उधर पंडाल के बाहर कुछ लोग बर्तन लेकर खाना मांगने आ गए थे। उनको कुछ देर बैठने को कहा गया। 

पंगत समाप्त हुई सब तृप्त होकर उठे। कुछ नहीं भी उठ पाए। ज्यादा खाने की वजह से वहीं पसर गए। नीतीश जी खाना खाकर भूल गए कि उन्होंने खाना खा लिया है। वे दोबारा खाना मांगने लगे। उन्हें समझाने के लिए तीन सचिव लगाए गए। 

 वहीं गैलरी में ही दरी बिछाकर गप्पों का दौर चल गया। चार पांच उत्साही प्रधानमंत्री लोग ताश लेकर बैठ गए। दहला पकड़ का दौर चल निकला जो चाय के समय तक चला। तब एक कार्यकर्ता आया और कहने लगा चलो सब जने बैठक का समय हो गया। तैयार हो लो जब तक चाय आ रही। 


गान्ही बाबा कहने लगे चलो सबको देश दिखाएं। 

वो जो खाना मांगने आए थे उनको दिखाकर कहने लगे देखो ये हमारा देश है। भूखा। गरीब। नंगा। काला। धूल में लिथरा। असहाय। 

सारे राष्ट्राध्यक्ष दया से भर गए। सबने सहायता का वादा किया। 

फिर गान्ही बाबा सबको नाली के पास ले गए , जहां अभी भी वो लोग चाबी निकालने का प्रयास कर रहे थे। बाबा कहने लगे ये देखो हमारा देश। गंदा। नाली। ये देखो हमारे देश का लोग, नाली में लोरता है।

उसके बाद गान्ही उनको वहां ले गए जहां कुत्ते और ढोर मिलकर पत्तल चाट रहे थे। बाबा बोले ये देखो हमारे देश का असलियत। ये हमारे आवारा कुत्ते और ढोर । जिनपिंग बोले कुत्तों की जिम्मेदारी हमारी। हम उनको खिलाएंगे पिलाएंगे। पालेंगे। जी२० की सभा में तालियां। जिनपिंग जिंदाबाद के नारे।

गान्ही बाबा जिन्नाबाद के नारे। गान्ही जी एक बड़ी समस्या सुलझा दिए थे।

ओवैसी तब तक बिरयानी चढ़ा चुके थे। गान्ही बाबा ने मिलवाया ये हमारे यहां को माइनोरिटी। देखिए हमारे राज में कितनी खुश है। बिरयानी खाती है। शेरवानी पहनती है। 

वहीं पास में मांस के टुकड़े, कचरे का ढेर पड़ा है, गान्ही बाबा गर्व से दिखाते हैं ये देखिए हमारे इहां का कचरा, गंदगी। मेहमान खुश होते हैं। वाह वाह करते हैं। गान्ही की कहते हैं ये तो कुछ नहीं सुबह हम तुमको रेल की पटरी दिखाएंगे। कृष्णन, तीस्ता, स्वरा, राणा आदि सब प्रसन्न होती हैं। 

रात के भोज में मेहमान, पत्रकार, कुत्ते और ढोर एक साथ भोजन करते हैं। पत्रकार बिरयानी पर टूट पड़े हैं। भीड़ में कुछ बाहरी लोग भी घुस आए हैं। बिरयानी खतम हो गई है। एक मेहमान को खाना नहीं मिल पाया है। वे रूठ कर बैठ गए हैं। उन्हें दो लड़के बाइक में बीच में फंसा कर ढाबे पर खाना खिलाने ले जा रहे हैं। कुछ रसिक मेहमानों के लिए आर्केस्ट्रा हो रहा है। जादौ जी एक लड़का भी लाए हैं जो लाल टोपी लगा के बाइडेन के कमरे में नाच रहा है। साथ में जादौ जी आनंद ले रहे हैं। 

सरकार और पत्रकारों ने विदेशों से आर्थिक पैकेज की मांग की। व्यवहार लिखने के लिए स्वयं राजदीप टेबल पर मौजूद। सौंफ और मिश्री का डब्बे से सौंफ उठा कर मुंह में डालते मेहमान अपना अपना व्यवहार लिखवा रहे हैं।  

बाकी मेहमान अपने-अपने कमरों में सो जाते हैं। कुछ आधी रात से ही निकलना शुरू हो जाते हैं। बहुत अच्छा लगा आके। बहुत दिन में सबसे मिले नहीं तो कहां निकलना हो पाता है।

सुबह पत्रकारों का हिसाब किताब किया जाता है। सबको पर्याप्त मेहनताना मिलता है। पैकिट मिले हैं। बोतल मिली हैं। लेख लिखे जाते हैं G 20 सफल। गान्ही बाबा ने सबको वो इंडिया दिखाया जो दुनिया देखनी चाहती है। 

लेख में आगे लिखा है - भारत ने अपना लोहा मनवाया। G-२० में अफ्रीका यूनियन। प्रधानमंत्री ने सब मेहमानों को नालंदा के विषय में बताया। भोज में कटहल और बाकरखानी। भारत सही मायनों में विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर।  

पत्रकार चौंके। विश्वगुरु? ऐसे कैसे? ये हमारा कीवर्ड नहीं हैं। उनकी नींद टूटी। सामुहिक सपना टूटा। उफ्फ ! दुःख, तकलीफ, पीड़ा। अब भी सरकार नहीं बदली। पत्रकारों ने विदेशों से मांग की - सरकार बदलवा दो तो हमारे दिन फिरें।  


गुरुवार, 7 सितंबर 2023

कन्हैया ही झूले, कन्हैया झुलावे

हम चौरासी खंबा मंदिर के द्वार पर थे, मंदिरों और घाटों से घूमते हुए गोकुल पहुंचे थे। अंदर जाते हुए वहीं से फूल माला ले ली।

यह नंदबाबा का पहला घर था जहां उन्हें टोकरी में रखकर यमुना पार से वसुदेव मथुरा से लाए और योगमाया को यहां से ले गए। मंदिर के प्रांगण में हमे एक पंडानुमा एजेंट ने रोक लिया और बैठा दिया। कुछ ज्ञान दिया कि एक-एक कर के लोग जाते हैं वगैरह वगैरह। कुछ ज्ञान देने के बाद पंडितों ने कुछ शब्द दोहराने के लिए कहा, कुछ लोग दोहराते चले गए, यह जाने बिना कि उनसे दान के संकल्प करवाए जा रहे हैं। वे तोते की तरह बोले जा रहे थे। हमारी दृष्टि केवल और केवल कान्हा, उनके पालने, चेन और पीछे बने बाद विग्रह की ओर जमी हुई थी, हम ॐ नमो भगवते वासुदेवाय के बाद भूल गए पंडित क्या बोल रहे हैं।

साथ वाले परिवार के अपनी इच्छानुसार देने की बात करने पर उनका अपमान करना पंडो ने शुरू कर दिया था, यह भी कुछ दान है? जैसा दोगे वैसे भोगोगे, पुण्य–पाप, एक ग्रास भी नहीं खिला सकते क्या, तुम देने वाले ये लेने वाले तुमने संकल्प लिया है वगैरह वगैरह। मोलभाव शुरू हो गया था।
मामला वहां ११ हजार से शुरू होता है, पुण्य का अंतिम मोल ढाई हजार का है। इतना तो हमारी न जेब में था न पूरी यात्रा का बजट था। इससे पहले पंडित की दृष्टि हम पर पड़ती हमारी दृष्टि पालने में बैठे पालनहारे से मिल गई, हाथ में फूल माला थी, वही अर्पण की और उठ गए।

उठने लगे तो पंडित ने रोका - "झूला नहीं झुलाओगे?" (झुलाने की कीमत लगती है)

हमारे मुंह से निकला –

माया इन्हीं की, जगत का ये झूला,
कन्हैया ही झूले, कन्हैया झुलावे।
बैठकर पालने में जगत पालता है,
किसमें है क्षमता जो इनको झुला ले।

पंडित कहने लगा - "क्या है तुम्हारी क्षमता, उसका अर्थ था कितना दे सकते हो?"

हमारे मुंह से निकला – "जो क्षमता है, शक्ति है इनकी ही है, हमारी क्या है? यही देने वाले हैं यही लेने वाले हैं। इनका मन होगा तो दे देंगे इनका जब जैसा मन होगा तो ले लेंगे। अभी हमें फूल लाने की प्रेरणा दी थी सो फूल लाए हैं, इन्हें जो लेना होगा वैसी प्रेरणा दे देंगे।"

और हम प्रणाम कर के उठ गए। दोनों पंडे देखते रह गए फिर पहले वाले परिवार से उलझते रहे। हम जाकर दूर पीछे की तरफ खड़े हो गए। उसके बाद दो क्षण के लिए जब नेत्र बंद किए तो मन में प्रश्न आया कुछ गलत तो नहीं किया भगवान के सामने से ऐसे उठकर?

फिर तो जैसे भगवान से ही हमारी सीधी बात हो रही थी –

"जो ये पंडे तुम्हारे नाम पर धन मांगते हैं, वे क्या सही कर रहे हैं?"

"वे अपना कर्म कर रहे हैं। मेरी ही प्रेरणा से वे इस प्रकार की बातें करते हैं।"

"और देने वाले का सामर्थ्य न हो तो?"

"सामर्थ्य न होता तो यहां तक पहुंचते ही कैसे?"

"तो क्या जो ये मांगते हैं दे देना चाहिए?"

"वह तो तुम्हारी इच्छा है।"

"इसमें मेरी इच्छा क्या है, जब सब तुम ही करते और करवाते हो?"

"फिर यह प्रश्न ही क्यों है? मेरी ही प्रेरणा से लोग यहां आते हैं, मेरी ही प्रेरणा से दान भी करते हैं। मेरी ही प्रेरणा से इस संसार में मांगने, देने और छीनने वाले प्राणी हैं। सब अपने कर्म कर रहे हैं या अपने कर्मों को भोग रहे हैं। किसी एक के देने न देने से इनका पालन रुक नहीं जाएगा, न ही कोई एक इन सबका पालन कर सकेगा। मैं ही अलग अलग लोगों से उनकी देने की क्षमता के अनुसार लेता हूं और देते समय उतना ही देता हूं जितना उसके भाग्य में है और जितना वह भोग सकता है। चाहे वह कष्ट हो, धन हो या कोई अन्य सुख हो। तुम बैठे रहते तो मेरी इच्छा होती, मेरे सामने से उठने का साहस कर पाए ये भी मेरी इच्छा थी।"

"फिर भी इन पंडों को ऐसे किसी को अपमानित तो नहीं करना चाहिए। यह दान लेने के लिए किया गया मोलभाव उचित नहीं लगता।"

"हो सकता है ये भी किसी कर्म का फल ही हो जो इन पंडों से उलझना पड़ता है।"

"फिर तुम इन पंडों को ऐसी प्रेरणा क्यों नहीं देते कि ये दाता से उतना ही मांगें जितना देने में किसी के हाथ न कांपे, न दे पाने की ग्लानि न रहे।"

"हाथ कांप गया तो दान ही कैसा? फिर ग्लानि किस बात की? जो दे सके उसमें देने वाले का क्या है और जो न दे सके उसमें न देने वाले का क्या है? कोई न कोई ऋण है जो लोग चुका जाते हैं। उनका ऋण मुक्त होना भी मेरी कृपा है।"

"फिर मुझपर कृपा करना कि अगर कोई अपराध हुए हों तो क्षमा करना।"

वे मुस्कुराते हुए बोले "ये को खंबे देख रहे हो, लोग हर खंबे को अलग अलग नाम से जानते हैं। तुम इस जिन चार खंबो के बीच खड़े हो इनमें लोग चार युग, चार वेद, चार धाम सब देख लेते हैं। तुमने क्या देखा?"

"मैंने तो बस खंबे देखे, अलग अलग तरह के खंबे।"

"बस यही मर्म है, जो मैं दिखाना चाहता हूं, तुम वही देखते हो। तुम्हारे सामने होते हुए भी वह नहीं जान पाओगे जो मैं नहीं चाहता।"

उनका झूला हिल रहा था। पंडित किसी अन्य परिवार से उलझे हुए थे। मैंने बस श्रद्धा से हाथ जोड़े मंदिर की परिक्रमा की और आनंद से सराबोर होकर निकल गया। यहां मैने ये लिखा –

कन्हैया मुझे अपनी शरण में बुला ले।
हृदय से नहीं तो चरण से लगा ले।

जो कुछ मिला है, तुम्हारी दया है,
जो भी दिया है, तुम्हीं ने दिया है।
आगे तुम्हारे करूं क्या मैं अर्पण?
तुम्हीं देने वाले, तुम्हीं लेने वाले।

जीवन में मुझसे जो कुछ हुआ है,
उसमें तुम्हारी ही प्रेरणा है।
तुम्हें है समर्पित सभी कर्म मेरे,
पुण्य पाप सारे, तुम्हारे हवाले।

माया तुम्हारी, जगत का ये झूला,
कन्हैया ही झूले, कन्हैया झुलावे।
बैठकर पालने में जगत पालते हो,
किसमें है क्षमता जो तुम को झुला ले।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

Corporate Chakravyuh

One fine morning Arjuna was chewing datun, thinking that if he had slightly adjusted the angle of the last arrow he shot yesterday, it would have hit Duryodhana's nose, and he would've been pranked. A smile appeared on his face as he pondered. Just as he was savouring the taste of the neem datun, a sudden message popped up on WhatsApp: "A Chakravyuh has been formed today. Stand-up meeting in fifteen minutes. Join online."

Arjuna exclaimed, "Oh, come on, not now." He tossed the datun aside; there was no time to clean his teeth. He hurriedly got online; the meeting was already in progress.

The manager said, "Chakravyuh is not a big deal. We've seen many of those. Arjuna, give us an overview of Chakravyuh in fifteen minutes. I want everyone to participate and show some teamwork."

Arjuna replied, "I know how to break a Chakravyuh, let me handle it."

The manager retorted, "You are too eager to get promotion and lead. Have patience, I'm talking to upper management, and I'll let you know what happens."

Arjuna retorted, "I'm not asking for a position. I'm saying let me do the work that I'm good at."

The manager scolded, "That's why you haven't become a leader yet. A leader is someone who grooms his juniors. If you know something, let others learn it. Be a mentor."

"But this isn't training time, it's an incident time."

"Do one thing, follow Susharma from Gurugram and report back to me. I'll handle the Chakravyuh. I know how to do it too."

"But..."

"Just do as I say."

"I'm thinking of taking sick leave instead."

"I'm giving you a chance to do something big. You're stuck on the Chakravyuh! Cowards take sick leave at such crucial moments. Susharma is leading Trigart operations. Go after him!"

"Listen, at least..."

"First, tell me, how did you come to the meeting in a vest and shorts? And you even left your video on."

Apologizing, Arjuna quietly left.

The manager called Guru Dronacharya, "Gurujee, what Ghitorni have you created today? What kind of chaos is this?"

"It's not chaos, it's a Chakravyuh. Understand, there's a problem in the program life cycle. Send your best resource! This is a very difficult task."

"You could have at least given me an idea, so I could prepare for it! Is this in our Scope of War?"

"Where was your attention when the SOW was being signed? Now send your best resource, otherwise accept defeat!"

The manager called another meeting, "Look, Arjuna has gone to Arjangarh to collaborate with a crucial customer. Who will go into the Chakravyuh?"

Nakul said, "You just said you will do it!"

"Yes, but I want to give you all a chance to prove yourselves. Leaders are made in such situations. Tell me, who will go?"

Sahdev said, "I can do it, but I don't know what to do. If I don't know what to do, what will I do when I get there?"

"Everyone has so much experience, everyone is an expert. Go prove yourself. I am here to support you. Let me know what you need."

Intern Abhimanyu enters the scene. "What's the discussion about?"

"Nothing, we need to break a Chakravyuh! We're thinking of sending someone. It's a once-in-a-lifetime opportunity."

"I learned this in boot camp training. Should I go?"

"You're a fresher, but if you want, you can go. Capitalize on the opportunity. We like people who come forward in tough situations."

"What is required?"

"That you have to find out."

"Who can help?"

"We don't know at the moment."

"What do we know?"

"We know only what you know."

"Do you know what I know?"

"We know exactly the same thing that you know."

"I know that you don't know what I know."

"Don't make jalebis, just tell us if you'll go or not?"

"I'll go, but I don't know how to get out once I'm in."

"Entering is important, Abhimanyu. Getting out is easy, just return the way you get in!"

"Can I escalate if needed?"

"The rest of the seniors will be on call. Our calendars are booked for the entire day; otherwise, we could have handled."

In this way, the intern Abhimanyu was sent alone into the client's Chakravyuh. The outcome was the same as expected. After a fierce escalation, Abhimanyu was terminated. All the senior resources were busy in a meeting with Jayadratha. The next day, when the situation worsened, Arjuna said, "I will resolve it by the end of the day, otherwise I'll resign." Then Arjuna engaged in intense troubleshooting.

The root cause of the issue turned out to be Jayadratha, who had been hiding. In the end, just as Arjuna was about to send a resignation email, he identified the root cause and fixed the issue.

The moral of the story is, there is Arjun who knows; there are Nakuls and Sahdevs, nobody knows what they know and what they do, but they are there as important pillars. Then there are interns with confidence surplus and knowledge deficit. Ready to jump in everything. Finally, there is a boss, and you know what he does.

Corporate - चक्रव्यूह

अर्जुन दातून चबाते हुए सोच रहे थे कि कल जो अंतिम तीर उन्होंने चलाया था अगर दो डिग्री साइड से निकाल देते तो दुर्योधन की नाक में लगता और वो नकटा हो जाता। सोचते ही चेहरे पर हंसी आ गई। वे दातून का स्वाद ले ही रहे थे कि अचानक Whatsapp पर मैसेज आया – "आज चक्रव्यूह रचा गया है। पंद्रह मिनट में  Standup Meeting है। ऑनलाइन आओ।"

अर्जुन के मुंह से निकला "अरे दद्दा रे।" 

दातून वहीं फेक दी, कुल्ला करने का भी समय नहीं था। आनन फानन में ऑनलाइन हो गए। मीटिंग चालू हो चुकी थी।

मेनेजर कह रहे थे – "चक्रव्यूह कोई बड़ी बात नहीं है। हमने ऐसे बहुत से चक्रव्यूह देखे हैं। अर्जुन इन सबको पंद्रह मिनट में चक्रव्यूह का ओवरव्यू दे दो। मैं चाहता हूं सब लोग Participate करें, Team work दिखना चाहिए।"

अर्जुन ने कहा – "चक्रव्यूह भेदना मैं जनता हूं,  मैं लीड करता हूँ।"

मैनेजर ने कहा – "तुमको लीड करने की बहुत जल्दी रहती है। मैं अपर मैनेजमेंट से बात कर रहा हूं, और जैसा होगा बता दूंगा।"

अर्जुन बोले – "अरे पोजिशन नहीं मांग रहा हूं। ये कह रहा हूं ये काम मेरे को आता है मुझे कर लेने दो।"

मैनेजर ने लगभग डांटते हुए कहा –"इसीलिए तो तुम लीडर नहीं बन पाए अब तक। लीडर वो होता है जो अपने नीचे काम करने वालों को ग्रूम करे। जो तुम्हें आता ही है तो वो दूसरों को सीखने दो। मेंटर बनो।"

"अरे लेकिन ये ट्रेनिंग का टाइम नहीं इंसीडेंट का टाइम है।"

"तुम एक काम करो उधर ये गुरुग्राम वाले सुशर्मा को फॉलो करो और मुझे रिपोर्ट करो। चक्रव्यूह मैं देख लूंगा। मेरे को भी आता है।"

"अरे लेकिन..."

"जो कहा वो करो।"

"सोच रहा हूं सिक लीव ही ले लूं फिर।"

"मैं तुम्हें कुछ बड़ा करने के मौका दे रहा हूं। तुम चक्रव्यूह पे अटके हो! ऐसे बड़े मौके पर सिक लीव कायर लेते हैं। सुशर्मा पूरे त्रिगर्त का मामला है। उसके पीछे जाओ!"

" सुन तो लीजिए..."

"पहले ये बताओ ये बनियान पहन में मीटिंग में कैसे आए? आए तो आए वीडियो भी ऑन कर रखा है।"

"सॉरी" कहते हुए अर्जुन चुपचाप निकल गए।

मैनेजर ने गुरु द्रोणाचार्य को फोन लगाया। "गुरुजी ये क्या घिटोरनी फैला दी आज? ये क्या चक्कर चलाया है?"

"चक्कर नहीं है चक्रव्यूह है। समझ लो प्रोग्राम लाइफ साइकिल में दिक्कत आ रही है। अपने सबसे बढ़िया रिसोर्स को भेजो! ये बहुत कठिन काम है।"

"पर थोड़ा आइडिया तो दे देते तो तैयारी करके आते! वैसे स्कोप ऑफ वार में आता है ये?"

"जब SOW sign हो रहा था तब ध्यान कहां था? अब तो आपने बेस्ट रिसोर्स को भेजो वरना हार मान लो!"

 मैनेजर ने दूसरी मीटिंग बुलाई। "देखो अर्जुन आज अर्जनगढ़ गया है। चक्रव्यूह में कौन जाएगा?"

नकुल ने कहा - "आप करने वाले थे?"

"हां लेकिन मैं तुम लोगों को खुद को Prove करने के मौका देना चाहता हूं। ऐसे ही समय में लीडर्स बनते हैं। बताओ कौन जाएगा?"

सहदेव ने दाढ़ी सहलाते हुए कहा - "कर तो हम लेंगे लेकिन हमको पता नहीं है कि करना क्या है। कुछ पता ही नहीं कि क्या करना है तो जाकर क्या करेंगे?"

"अरे इतना एक्सपीरियंस है सबको, सब महारथी हो। जाओ!"

इतने में अभिमन्यु का प्रवेश होता है। 

"क्या चर्चा हो रही है?"

"कुछ नहीं एक चक्रव्यूह भेदना है! सोच रहे हैं कौन जाएगा।"

"मैने बूटकैंप में सीखा था। कहो तो चला जाऊं?"

"तुम तो फ्रेशर हो लेकिन जा सकते हो।  हमको ऐसे लोगों की जरूरत है जो मुसीबत के समय आगे आते हैं।"

"करना क्या है?"

"अभी पता नहीं।"

"कुछ पता है?"

"जितना तुमको पता है उतना ही हमको पता है।"

"आपको क्या पता है?"

"वही पता है जो तुमको पता है।"

"आपको क्या पता है कि मुझको क्या पता है?"

"हमको पता है कि तुम नए हो तुमको तो पता होना ही चाहिए।"

"हमको पता है कि आपको नहीं पता है कि हमको क्या पता है।"

"जलेबी मत बनाओ, ये बताओ जाओगे या नहीं?"

"घुस तो जाऊंगा लेकिन निकलना नहीं आता।"

"घुसना इंपोरेंट हैं अभिमन्यु। निकलने का क्या ही जिस रास्ते जाओ उसी से वापस आ जाना!"

"कोई एस्केलेशन हुआ तो?"

"बाकी महारथी ऑनकॉल रहेंगे। सब का कैलेंडर बुक है नहीं तो तुमको नहीं जाना पड़ता।"

इस तरह फ्रेशर अभिमन्यु को क्लाइंट के चक्रव्यूह में अकेले भेज दिया गया। परिणाम वही हुआ हो ऐसी परिस्थिति में होता है।  सारे सीनियर रिसोर्स जयद्रथ के साथ मीटिंग में बिज़ी हो गए। भीषण escalation के बाद अभिमन्यु को टर्मिनेशन लेटर पकड़ा दिया गया।  

अगले दिन जब मामला बिगड़ा तो अर्जुन ने ही कहा, मैं End of day तक Resolve कर दूंगा नहीं तो रिजाइन कर दूंगा। फिर अर्जुन ने भयंकर troubleshooting की, अर्जुन को root cause नहीं मिला।   

अंत में थक हार कर जब अर्जुन रेजिग्नेशन मेल डालने ही वाला था कि उसे root cause दिख गया और उसने Issue fix कर दिया।  इश्यू का root cause जयद्रथ ही था जो छुपा बैठा रहा।

मैनेजर ने सुसम्पादित मेल लिखा और बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया।  

इसका लब्बोलुआब यह है कि एक होता है अर्जुन, जिसे पता है कि क्या करना है, उसे हर समय किसी उटपटांग काम में व्यस्त रखा जाता है। 

फिर होते हैं नकुल और सहदेव, जो बस होते हैं। वे क्या करते हैं और क्या जानते हैं यह और कोई नहीं जानता।  उसके बाद आते हैं इंटर्न, जो आत्मविश्वास में सरप्लस और ज्ञान में डेफिसिट होते हुए भी हर काम में कूद जाना चाहते हैं। 

भयंकर escalation में काम अर्जुन ही आता है लेकिन तब तक दो चार अपनी नौकरी गँवा चुके होते हैं। अंत में वेरिएबल अर्जुन का भी कटता है क्योंकि टीम  Zero escalation वाला goal achieve नहीं कर पाती।  

इन सबके ऊपर होता है मैनेजर, जिसका तो आप सबको पता ही है क्या करता है।  

रविवार, 2 जुलाई 2023

राधे-राधे

हम वृंदावन से लौट रहे थे। गाड़ी में अचानक बेटा कहने लगा इस बार एक बात तो समझ में आ गई,वृंदावन है कृष्ण का लेकिन चलती वहां राधाजी की है। सारी दुनिया में कृष्ण सबसे शक्तिशाली हैं लेकिन राधाजी तो उनसे भी शक्तिशाली हैं। सब भगवान की सेवा करते हैं भगवान तो उनकी ही सेवा करते रहते होंगे। हमने पूछा ऐसा क्यों लगा? 

तो कहने लगा वृंदावन कृष्ण का, मथुरा कृष्ण का, गोकुल कृष्ण का, नंदगांव कृष्ण का लेकिन कहते हैं सब राधे-राधे। मतलब ज्यादा शक्तिशाली तो राधा ही हुईं। कृष्ण को खुश करना है तो राधे- राधे, राधेकृष्ण बोलो। अभिवादन करना हो तो राधे राधे। भीड़ में किसी को सामने से हटने को कहना हो तो एक अलग स्वर में कह देते हैं – राधे-राधे। टीका लगाने वालों को मना करना हो अलग स्वर में कहते हैं राधे-राधे। टीका लगवाना हो तो मुस्कुराकर कह देते हैं राधे-राधे। किसी को कुछ भी माना करना हो तो न नहीं कहते, कहते हैं राधे-राधे। किसी को आगे बढ़ना हो तो इशारा करके कहते हैं राधे-राधे। 

लोग तो होटल में वेटर को बुलाने, कुछ मांगने के लिए राधे-राधे बोलते हैं सामने वाला समझ जाता है। गार्ड मंदिर में लोगों को फोटो खींचने से मना करने के लिए जोर से राधे-राधे बोलते हैं, लोगों के कैमरे बंद हो जाते हैं। यहां की भाषा में जैसे दो ही शब्द हैं राधे-राधे, उच्चारण का स्वर (टोन) और इशारे, बाकी शब्द जरूरी ही नहीं।

बच्चे आसपास की बातों पर कितना ध्यान देते हैं, यह बात हमें समझ आई। यह सब हमने नहीं बताया उसने खुद ही देख समझ लिया। फिर कहने लगा कि लेकिन ऐसा है क्यों? राधा कृष्ण को क्यों कंट्रोल करती हैं?

हमने उसे समझाने का प्रयास किया - राधा और कृष्ण एक ही हैं, जहां राधा की पूजा होती है वहां कृष्ण भी प्रसन्न होते हैं। इसको ऐसे समझो कि कन्या का सम्मान करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। यहां बात कंट्रोल की नहीं एक दूसरे में अपना सम्मान देखने की है। कृष्ण राधा के सम्मान में अपना सम्मान समझते हैं और राधा के लिए तो कृष्ण ही सबकुछ हैं।

बेटी इतने में उसे चिढ़ाने लगी – वैसे तो सारी लड़कियां ही लड़कों को कंट्रोल करती हैं। तेरी शादी होगी तो तुझे भी करेगी। तुझे भी सेवा करनी पड़ेगी।

तब बेटी से हमारी पत्नी ने कहा - इसका एक और अर्थ है, अगर कन्या का चुनाव सही पुरुष है तो वह सम्मान पाती है, पूजनीय हो जाती है। गलत चुनाव हो तो उसका जीवन अर्थहीन हो जाता है। राधा और कृष्ण की लीला में तो चुनने, न चुनने का प्रश्न नहीं था वो ईश्वर थे और सब उनकी इच्छा थी। लेकिन आज के समय में सही चुनाव, सही समय पर जरूरी है। कहते हैं राधा और कृष्ण पहली बार बहुत कम आयु में मिले थे, तब कृष्ण ने राधाजी को सही आयु और समय की प्रतीक्षा करने के लिए कहा था। फिर सही समय आने पर ही उनकी प्रेमलीला आरम्भ हुई थी।

इससे यह भी समझना चाहिए कि बच्चों को जल्दी बड़े होने का प्रयास नहीं करना चाहिए सब कुछ सही समय के अनुसार होना चाहिए। राधे–राधे से धैर्य भी सीखना चाहिए।

इतना ज्ञान सुनकर थोड़ी देर बच्चे शांत रहे, फिर पत्नी ने बेटे से कहा तो जब तुम्हारी शादी हो जाए तो तुम अपनी पत्नी की सेवा कर लेना जैसे कृष्ण राधा जी की सेवा करते हैं। इसपर हमारे ड्राइवर साहब भी मुस्कुरा दिए।

शनिवार, 17 जून 2023

सब राम जी की इच्छा है

ईश्वर स्वामी, सखा, परिजन, आराध्य, प्रेमी, बालक कुछ भी हो सकते है। जो जिस रूप में देखना चाहे ईश्वर उसके लिए वैसा ही बनकर सामने आ जाते है। जिसने स्वामी के रूप में चाहा तो वे स्वामी बन गए जिसने शत्रु के रूप में चाहा तो वे शत्रु बन गए।

ईश्वर ने कभी यह नहीं कहा कि मेरी पूजा नहीं की तो नर्क भोगोगे, या मेरे आलावा किसी और की पूजा की तो मार दिए जाओगे। हमारे ईश्वर ने हमें चुनने के लिए स्वतंत्र छोड़ा है। जब जिसके भाग्य उदय होते हैं, उसकी मति उससे ऐसे कर्म करवा देती है कि वह स्वयं ईश्वर में लीन हो जाता है।  

कितने ही नास्तिक आस्तिक हो जाते हैं। उन्हें कोई धमकाता नहीं है, न ही किसी लोभ के चलते वे इस करते हैं। न ही कोई जबरदस्ती ईश्वर की आराधना करने को कहता है। नास्तिक होना भी अपने आप में सनातन का एक पथ है जिसपर जो चाहे चल सकता है।  

ईश्वर से हमारा सम्बन्ध परिजन सा ही है, गाँवों में आज भी ग्राम देवता को बाबा या दादा कहते हैं। कुलदेवी मैया ही हैं। कृष्ण  को ठाकुर जी कहकर उन्हें कोई स्वामी कहता है कोई बालगोपाल स्वरुप में ह्रदय से लगाए घूमता है। परन्तु अपने आराध्य की मर्यादा कोई नहीं लांघता। अनजाने में की गई भूल ईश्वर भी क्षमा कर देते हैं।

हमारा ईश्वर बात बात पर दंड देने वाला दंडाधिकारी नहीं है, जो धमकाकर अपनी पूजा करवाता हो।

लोक परम्पराओं में ईश्वर का जिस भी रूप में वर्णन किया गया सब स्वीकार्य रहा। हास्य प्रधान लोकगीत भी प्रचलित रहे और नाट्य भी। हमारे आराध्य केवल कल्पना मात्र नहीं रहे वे हमारा इतिहास हैं।

लोग कथाओं को कई तरह से सुनते सुनाते आए हैं, लोकगीतों में लोककथाओं में नए आयाम देकर कथा को बढ़ाते आए हैं, लेकिन महिमा  और महत्त्व को बनाए रखा है। बहुत लोगों ने ऐसी कल्पनाएं की हैं कि किसी विशेष परिस्थित में अगर वे रहे होंगे तो क्या हुआ होगा। उनके किसी चरित्र की विशेषता को उस परिस्थिति ने कैसे उजागर किया होगा। 

उदाहरण के लिए एक लोकगीत है जिसमें राम जी हनुमान जी से विवाह कर लेने के लिए कहते हैं। यह किसी किताब में नहीं होगा। लेकिन फिर भी इसमें ईश्वर की महिमा को कम करने का प्रयास नहीं किया है। 

https://youtu.be/aRBycpvjrLM

जब कृष्ण भक्त गाते हैं राधिका गोरी से बिरज की छोरी से मैया करा दे मेरो ब्याह। और उत्तर मिलता है नजर तेरी खोटी है , उमर तेरी छोटी है कैसे करा दूं तेरा ब्याह। यह किस पुस्तक, किस ग्रंथ में मिलेगा?

लेकिन सुनकर ही माता–पुत्र का जो संवाद उभरता है, वह अपने साथ बहा ले जाता है। भक्ति केवल भक्ति नहीं है, वात्सल्य है, प्रेम है, समर्पण है, भय और हास्य विनोद भी है।

पिछली बार मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में एक दंपति सर पर भेंट लिए मंदिर में अंदर आए और ऐसे प्रसन्न हुए जैसे अपने पुत्र से मिलने आए हों। पति ने भीड़ देखकर अपनी पत्नी से कहा देखो वो हैं, भीड़ में हम उनको दिखेंगे नहीं इसीलिए हाथ दिखाओ उनको। और दोनों हाथ ऊपर करके ऐसे प्रभु ध्यान का ध्यान "इधर! इधर !यहां" चिल्लाकर अपनी ओर खींचने का प्रयास करने लगे जैसे आप किसी भीड़ के बीच में किसी अपने का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर सकते हैं। वह भाव तो तभी जागृत हो सकता है जब भक्ति और श्रद्धा अपार हो। कृष्ण जब केवल मंदिर में बैठे आराध्य नहीं बल्कि अपना ही कोई परिजन लगने लगे तब किसी का इस प्रकार का व्यवहार अचंभित नहीं करता। 

नवरात्र में बुंदेलखंड में कौन सा मंदिर होगा जहां – झूम छननन बाजे माई पांव पैंजनिया न बजता हो। हमारी देवी त्यौहार में आती हैं तो उनकी कल्पना भी प्रसन्नता के साथ नाचते झूमते हुए आने की कल्पना की जाती है। 

"माई हंसा चाल मृग नैन, दुलारी तोरे भुवन कहां" आज भी जो सुनता है उसके मन में श्रद्धा भर जाती है।

किसी ग्रंथ में ऐसा लिखा तो नहीं होगा, किसी न किसी की कल्पना ही होगी।

मूल बात है कि रचने वाले में श्रद्धा कितनी है और नीयत कैसी है। ईश्वर की इच्छा के बिना ग्रंथ तो क्या एक शब्द लिखने का सामर्थ्य किसी में नहीं है, फिर भी अगर किसी पर कृपा हो ही गई है तो भाषा की मर्यादा रखना उसके अपने हाथ में हैं। भाषा बिगाड़ने से ईश्वर का कुछ नहीं बिगड़ता, लिखने वाले का चरित्र पता चलता है।

आज बहती धारा में सब कुछ न कुछ लिख रहे हैं, कुछ अच्छा भी लिख रहे हैं और कुछ कथाओं का आधुनिकीकरण भी कर रहे हैं। 

 लोग केवल व्यवसाय की दृष्टि से कथा कहने सुनने लगेंगे तो कथाएं अपना मूल खो देंगी। 

कुछ लोग आलोचनात्मक दृष्टि से भी परिभाषित कर सकते हैं और कुछ अपनी विकृत सोच में कथाओं को ढाल सकते हैं। 

कथा को संभवतः समय के साथ पुनर्परिभाषित करना चलता रहेगा और चलता रहना चाहिए। समय के साथ कई चीजों को देखने का दृष्टिकोण बदलता रहता है। कल जो चमत्कार था आज नहीं है, आज जो चमत्कार हैं वो शायद कल चमत्कार न रहे। ऐसे में उन लोगों का लिखना आवश्यक है जो श्रद्धा रखते हैं, अन्यथा अगर श्रद्धा न रखने वाले व्यवसायी लिखेंगे तो वे उसे केवल वायरल होने की कसौटी पर रखकर लिखेंगे।

फिर रामकथा जैसी कथावस्तु, जो अपने मूल रूप में ही पूर्ण है उसे फिर से कहने के लिए ईश्वर की अपार कृपा चाहिए। कसौटी यह है कि अगर कोई राम कथा कह रहा है और हर घटना पर भावनाओं का ज्वार न उठे तो वह कहने में असफल है। अगर धनुष भंग के प्रसंग से उमंग न जागे तो वह दृश्य असफल है, अगर स्वयंवर में वरमाला के दृश्य के समय किसी भी पुत्री के पिता की आंखें न भर आएं तो वह दृश्य असफल है, अगर राम के वनवास के समय गले न रूंध जाएं, भरत मिलाप के समय भाई की याद न आ जाए तो कथा कहने वाला असफल है, सीता हरण के समय स्वयं जटायु हो जाने का मन न करने लगे तो कथा कहने वाले में कमी रह गई है। लंका दहन में हनुमान जी के प्रति श्रद्धा से हाथ न जुड़ें तो कथा क्या ही कही गई है, और रावण के वध के बाद भी कथा सुनते रहने की इच्छा न बची रह जाए तो कथा कहने वाला असफल है।

अतः जो कथा जन जन के मन में बसी है, फिर भी उसी को सुनने देखने के लिए लोग हर वर्ष रामलीला में पहुंच जाते हैं उस कथा को कहने के लिए बहुत मेहनत और श्रद्धा की आवश्यकता है। वह कथा कहने के पहले और बाद में लेश मात्र भी अहम उत्पन्न हो गया तो सब पानी में गया समझिए। घटनाओं की गलतियां लोग नजरंदाज कर देते हैं लेकिन जब संवाद ईश्वर के हों तो आशा होती है कि हर संवाद से प्रेरणा और शक्ति ही प्राप्त होगी। उसी के लिए लोग रामकथा सुनते हैं। फिर मौका मिलने पर भी कोई ठीक से न सुना पाए तो समझिए राम जी की इच्छा है।

गुरुवार, 8 जून 2023

टिपिकल मसाला

वैसे तो इस लेख में तर्क वगैरह को स्वाहा ही समझिये। फिर भी अगर बिना किसी तर्क के ही पढ़ सकें तो पढ़ें। एक नई फिल्म के टीज़र देखने के बाद, हमनें सोचा अगर पुराने जमाने के टिपिकल मसाला फिल्मों वाले इस फिल्म के डायलॉग लिखते तो कैसे लिखते। डायलॉग और सीन कैसे होते?

कहीं दूर किसी टापू पर, किसी किले के सामने  –

"रावण अली! चुपचाप अपने दोनों हाथ ऊपर कर के बाहर आ जाओ। वानरों ने तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया है।"

"तुमने अभी रावण का कहर देखा नहीं है सूर्यवंशी। रावण के खौफ से देवता भी थर थर कांपते हैं।"

पृष्ठभूमि में संगीत ~ लंक..लंक..ल..ल ...लंकेश ..लंकेश।

"रावण जब स्वर्ग की तरफ देख भी लेता है तो देवता कहते हैं अप्सराओं छुप जाओ नहीं तो रावण आ जाएगा।"

"ये गीदड़ भभकी किसी और को देना रावण। माँ का दूध पिया है तो बाहर निकल। क्या कायरों की तरह छुप कर बैठा है।"

"लौट जाओ सूर्यवंशी, वरना.."

"वरना क्या रावण अली.."

"अंजाम बहुत बुरा होगा!"

पृष्ठभूमि में संगीत ~ लंक..लंक..ल..ल ...लंकेश ..लंकेश।

"अंजाम की धमकी किसी और को देना। मैं अपने सर पर कफ़न बांध के आया हूं और आज मामला रफा दफा कर के ही जाऊंगा। "

"सूर्यवंशी भूलो मत तुम असुर बस्ती में खड़े हो, ये हमारा इलाका है।  हमारे इलाके में घुसकर हमें भड़काओ मत।"

"इलाके कुत्तों के होते हैं, शेर जंगल का राजा होता है और तुम्हारे सामने शेरों की सेना खड़ी है। "

सीन का फोकस अचानक अदालत में - 

"ऑब्जेक्शन मीलॉर्ड ! मीलॉर्ड, मेरे काबिल दोस्त फेक न्यूज़ फैला रहे हैं। साफ़ साफ़ दिख रहा है सामने वानरों की सेना है।"

"ओवर रूल, आप ऐसे वनरों को शेर बता कर फैक्ट के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते।"

"लेकिन मीलॉर्ड .. "

हथौड़े की आवाज़ ठक्क !

सीन का फोकस वापस किले पर  - 

 उधर से मेघनाद – "भूलो मत हमारे कब्जे में कौन है। चुपचाप हथियार डाल दो। वरना हमारे हथियार उठे तो बहुत खून बहेगा। क्यों खुद अपनी तबाही को बुला रहे हो।"

"मेघनाद, क्लाइमैक्स में फैमिली का अपहरण आउटडेटेड हो गया है। हमने तुम्हारे हथियारों का फ्यूज कंडक्टर हमने पहले ही निकाल लिया था। हार मान लो और दशहरे पर जलने के लिए तैयार हो जाओ।"

संगीत - ढेंटें  sss ढेंटें ....

भारी आवाज में डायलॉग ... मुद्दई लाख बुरा चाहे तो .....वगैरह वगैरह।

ढेंटेँ sss ढेंटें .... टन टन्न टन टन्न

"अरे वानर तुम तो द्रविड़नाडू वाले हो, साउथ इंडियन हो। तुम क्यों इन नॉर्थ के लोगों का साथ दे रहे हो। ये यूपी वाले भैया लोग बड़े लड़ाकू होते हैं।"

"जबान को लगाम दे मेघनाद!नॉर्थ से साउथ और ईस्ट से वेस्ट इंडिया एक है।हम सब इंडियन हैं।लंका का मलिंगा हमको सिखाएगा?

तुम्हारा लंका कढ़ी में पकौड़े की तरह पड़ा हुआ द्वीप है।जितने तुम्हारे यहां की जनसंख्या है उतने तो हमारे यहां NRI विदेशों में स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी में लगे हैं।

जितने सोने के तुम्हारे देश में सोने के महल हैं उतना सोना तो हमारे केरल वाले सऊदी से अपने *** में भरकर ले आते हैं। जितनी तुम्हारी जीडीपी है उतना तो हमारे देश को बर्बाद करने के लिए सोरोस इन्वेस्ट कर देता है।

जितने साल लंका को बने हुए नहीं हुए उससे ज्यादा तो अकेले नीतीश कुमार  बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। हमारा देश एक भारत और श्रेष्ठ भारत है। और इसीलिए चुपचाप हथियार डाल दो।"

"तुम क्या हथियार डलवाओगे, हमारी तो एक नजर  ही काफी है कहर बरपाने के लिए। याद है तो १७०० करोड़ का पुल। उसे हमारी ही नजर लगी थी। इसीलिए बनने से पहले ढह गया।"

"पुल तो हम और बना लेंगे। देख लो तुम्हारे ही सामने समुद्र पर पुल बनाकर हम नदी के इस पार इतनी बड़ी सेना लेकर आ गए।"

सीन कट कर अचानक अदालत में-

"ऑब्जेक्शन मीलोर्ड।नदी नहीं समुद्र।मेरे काबिल दोस्त भूल गए कि पुल समुद्र पर बना है।"

"सस्टेन्ड!" जोर से हथौड़े की आवाज़।

सीन वापस युद्ध भूमि में।

"तुम्हारे जैसे राक्षसों की बुरी नजर हमारे राष्ट्र का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अरे, हमारे तो ट्रकों के पीछे भी लिखा होता है – बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला।"

"संघी, भक्त। राष्ट्रवाद फैलाता है। तुम लंका जलाने के अलावा कर क्या सकते हो। अरे सूपर्णखा तो पंचवटी में मोहब्बत की दुकान खोलने आई थी, तुम सेवक संघ वालों ने उसकी नाक काट दी और नाकपुर शहर बसा दिया। और अब उसी नाकपूर से सारी दुनिया चलाना चाहते हो। यही है तुम्हारी इंसानियत?"

"अरे मोहब्बत की दुकान वालो, दुकान खोलकर एक तरफ बैठो, घर घर जाकर क्यों जबरदस्ती बेचते हो। अपनी मोहब्बत अपने पास रखो और सरेंडर कर दो। अब भी मौका है, तुम्हे सरकारी गवाह बना देंगे और कम से कम सजा होगी!"

विभीषण हाथ ऊपर कर के बाहर निकलता है। "मैं सरेंडर करने के लिए तैयार हूं। सरकारी गवाह बनने के लिए भी।"

"देश द्रोही। कुल द्रोही। मैं तुझे नहीं छोडूंगा।"

"भैया, आप भी सरेंडर कर दो। हम अपनी सजा काटने के बाद इज्जत की जिंदगी जिएंगे। आप बाहुबली हो चुनाव लड़कर विधायक या सांसद भी बन सकते हो। और इन लोगों ने चाहा तो आपको राज्यसभा का टिकट भी दे सकते हैं।"

"अरे देश द्रोही, लंकेश हैं हम। लंका में राजसभा होती है राज्यसभा नहीं। रुक अभी तेरा टिकट कटवा कर तुझे रफा दफा करता हूं।"

पृष्ठभूमि में संगीत ~ लंक..लंक..ल..ल ...लंकेश ..लंकेश।

" इससे पहले कि मेरे वानर लंका में घुसकर तुम्हारी लंका लगा दें, बाहर आ जाओ। आखिरी मौका है।"

रावण का फोन बजता है। 

"हैलो!"

"हैल्लो सर, गुड मोर्निंग। मैं बजाज फाइनेंस से बोल रहा हूँ। "

"सर सुना था कोई लंका जला गया था, रिकंस्ट्रक्शन वगैरह के लिए हमारी कंपनी आपको प्री-एप्रूव्ड होम लोन दे रही है।"

"नहीं चाहिए।"

"कोई और लोन की जरूरत हो तो बताइये सर।"

"नहीं चाहिए।" 

"पुष्पक विमान का इंस्युरेन्स करवा लीजिये सर। "

"नहीं करवाना।"

"आप युद्ध में जा रहे हैं सर अपना बीमा करवा लीजिये। हेल्थ कवर और बीमा के बढ़िया प्लान हैं सर।"

"नहीं चाहिए। अबकी बार फोन किया तो ब्लॉक कर देंगे।"

"याद रखना एक बार अगर हमको ब्लॉक किया तो फिर हमसे लोन लेना तो भूल ही जाओ।"

"अहंकारी हम हैं, कि तुम हो? लोन दे रहे हो या अहसान कर रहे हो? दोबारा फोन मत करना नहीं तो तुम्हारा बीमा करवा देंगे।"

और फिर सन्नाटा... युद्ध की घोषणा करते हुए आसमान में विमान।

संगीत ... नगाड़ों वाला।

लंका में - "आई लव यू ब्रो! उठ जाओ लड़ने जाना है।"

"आई लव यू टू ब्रो लेकिन लड़ने जाना ही क्यों है। प्रवक्ता और आईटी सेल वाले छुट्टी पर हैं क्या? इतना तो वो ही लड़ लेंगे।"

"लड़ तो लेंगे ब्रो लेकिन ये जंग जुबानी नहीं है।"

"लेकिन तुम्हारे लिए मैं क्यों लड़ूँ?"

"क्योंकि उनकी सेना में कोई आई लव यू नहीं बोलता ब्रो। हमारी लंका में सब एक दूसरे को आई लव यू बोलते हैं इसलिए जाओ लड़ो ब्रो। "

अब यहां के सीन किसी वेबसीरीज वाले ने लिखे हैं –

सीन कटकर बीबीसी पर – संयुक्त राष्ट्र ने लंका में बढ़ते तनाव को देखते हुए दोनों पक्षों से शांति की अपील की है। अमेरीका ने लंका को हथियार देने की पेशकश की। अमेरिका और चीन हथियार देने के लिए आपस में भिड़े।

सीन वापस लंका में – लंका से निकलता हुआ भीमकाय कुंभकर्ण।

सीन टीवी पर – आपके लिए एक्सक्लूसिव तस्वीरें। लंका की तरफ से लड़ने के लिए कुंभकर्ण निकल रहा है। भीषण लड़ाई की संभावना। केवल हमारे नंबर वन चैनल पर एक्सक्लूसिव तस्वीरें।

बीच में विज्ञापन, विज्ञापन में मेघनाद – इस युद्ध में आपने ड्रीम ११ पर सेना बनाई? सेना नहीं बनाओगे तो जीतोगे कैसे?

सीन वापस लंका में– कुंभकर्ण गिर रहा है, वानर उसकी देह के नीचे दब रहे हैं। युद्धभूमि से पुलिस और एम्बुलेंस के सायरन की आवाज।

मीडिया से युद्ध भूमि पटी हुई।मीडिया लाशों के मुंह में भी माइक ठूंस कर बाइट लेने की कोशिश करती हुई।

एक राक्षस- जब मुझसे लड़ना ही नहीं था तो बुलाया क्यों था?

मीडिया - सर आप स्वयं सक्षम है भिड़ जाइए किसी से भी।

इसी बीच लंका पक्ष की आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस – युद्ध में आज कुंभकर्ण शहीद हो गए हैं। कुछ लोग उनकी चपेट में आकर घायल हुए हैं। हम हालात पर नजर बनाए हुए हैं। घायलों को मोहल्ला क्लिनिक में भर्ती करवाया जा रहा है।

बंगला सरकार ने घायलों को दो दो लाख रुपए दो हजार की गड्डियों में बांध कर भेजे हैं।

वानर पक्ष का आधिकारिक बयान – आज अपराह्न २ बजे, एक एनकाउंटर में रावण के भाई की मृत्यु हो गई है। एनकाउंटर ऑपरेशन अभी चल रहा है जिसकी जानकारी सही समय पर उपलब्ध करवा दी जाएगी।

जेएनयू में नारेबाजी – कुंभकर्ण हम शर्मिंदा हैं।

दिल्ली में एक सभा में वक्ता की आंख में आंसू  – आज उनकी बड़ी हैंडसम याद आ रही है।

*हैंडसम आदमी की याद भी हैंडसम होती है।

जंतर मंतर पर कैंडल मार्च। जस्टिस फॉर कुंभकर्ण।

ग्रेटा का आधिकारिक ट्वीट – दिस इस क्लाइमेट इमरजेंसी।

Kumkan was an environment activist. **please use the toolkit for tweet storm at noon today.

पर्यावरण मंत्री – इस साल फिर कुंभकर्ण मर गया, बाकी भी मरते ही होंगे। इस साल भी दिवाली पर प्रतिबंध है। पटाखे बैन करो।

उधर युद्धभूमि में मुझे मजबूरन तुम्हारे अहंकार की छाती में यह ब्रह्मास्त्र गाड़ना पड़ रहा है। और फिर   ..... !!

"ये सब जान गए हैं शिवा! तुम ही ब्रह्मास्त्र हो शिवा। अहंकार की छाती में से निकल आओ शिवा। शिवा! शिवाSSS"

ट्विटर पर ट्रॉलिंग – इस देश में जब तक सनीमा है ....!

शनिवार, 27 मई 2023

संस्कृति का प्रतीक सेंगोल

 अधिकतर लोग सोचते हैं कि इस मृत्युलोक में दो प्रकार के प्राणी हैं। एक वे जिनको लगता है कि मोदीजी ने किया है तो सही किया होगा। दूसरे वो जिनको लगता है कि मोदी ने किया है तो गलत ही होगा। दोनों धुर विरोधियों के बीच में तीसरा सत्य है जो दोनों परिस्थियों के बीच में कहीं है। किसी की उपलब्धियों को दिखा कर उसकी कमियां नहीं छुपाई जा सकतीं और किसी की कमियां दिखा कर उसकी उपलब्धियों से मुंह नहीं फेरा जा सकता। अधिकतर सोशल मीडिया में इसी बात का युद्ध चलता रहता है।एक वर्ग को कुछ सकारात्मक नहीं दिखता दूसरे को नकारात्मक।एक वर्ग व्यक्ति पूजा से बस एक कदम दूर है।

और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो विरोध में पागल हो चुके हैं। इन्हें अंध विरोधी कहें, विपक्षी कहें या बौखलाया हुआ कहें समझ नही आता। कुछ का विरोध एक पार्टी से है, कुछ का सरकार से, कुछ का एक व्यक्ति से, कुछ का उस व्यक्ति के समर्थकों से। कुछ विरोध में इतने पागल हैं कि समझ नहीं पाते कि वे विरोध कर किसका कर रहे हैं। व्यक्ति का विरोध करते करते कब पूरे समाज और फिर देश का विरोध करने लगते हैं इनको पता नहीं चलता। देश विरोधी बातें करने पर इन्हें एंटी नेशनल कहा जाता है तो पिनक जाते हैं।

जैसे विरोध प्रदर्शन करते करते आजादी मांगने लगते हैं। भाई साहब किससे आजादी चाहिए? किसने गुलाम बना रखा है?

कहने लगते हैं मनुवाद से आजादी, मनु को गए सैकड़ों साल हो गए प्रभु। न मनु हैं न मनुस्मृति से कोई सरकार चल रही है। जो है ही नहीं उससे आजादी कैसे दिलवा दें?

फिर न जाने किस किस से आजादी मांगते हुए नारे लगाते हैं। पर यह समझते नहीं कि ये गुलाम तो किसी और के हैं। और जिसके ये गुलाम हैं, उसने इनको सड़क पर बैठा रखा है। भाई साहब प्रधानमंत्री की कबर खोद कर अपनी मांगे मनवाने की कोशिश कर रहे हो, प्रशासन तो कहेगा ही भाड़ में जाओ। तथाकथित किसानों का आंदोलन हो या यह पहलवानों का पेशेवर आंदोलनकर्ताओं ने ही किए। सुनियोजित।

इनको प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का धैर्य देखना चाहिए कि इतनी उद्दंडता के बाद भी संयम बरते हुए हैं। किसी के धरने पर बैठने से लोग जेल जाने लगते तो न जाने कितने लोग सड़क पर बैठ गए होते। भीड़ जमा करके न्याय नहीं मांग रहे हो ब्लैकमेल कर रहे हो। ऊपर से धमकी दी जा रही है। राज्य में तुम्हारा कुत्ता भी नही घुसने देंगे। न घुसने दो। फिर किसके कुत्तों को घुसने दोगे और किसकी सरकार बनवाओगे?

कुल मिलाकर मामला राजनैतिक है। और राजनैतिक होकर बात यहां पहुंची है कि जिस दिन संसद भवन का उद्घाटन होना है उस दिन उत्पात मचाने की पूरी तैयारी कर ली गई है।

किसानों के नाम पर 26 जनवरी का खालिस्तानी उत्पात देश भूला नहीं है। लाल किला फतह करने निकल पड़े थे, क्या भरोसा कल को संसद भवन पर आक्रमण कर दो। यह राष्ट्रद्रोह नहीं होगा क्या? वैसे तो तुम लोग चाहते ही हो कि जब भी देश में कुछ शुभ हो,उत्सव हो तो ऐसी परिस्थितियां उत्पन हों कि हिंसा हो।

तुम्हारा उद्देश्य ही शुभ काम में बाधा डालना है, वैसे ही जैसे ताड़का के पुत्र ऋषियों के यज्ञ में बाधा डालने आ जाते थे वैसे ही राक्षसों ने देश के हर उत्सव में बाधा डालने का प्रण ले रखा है। विरोध करने के सौ दिन हैं, लेकिन जिस दिन सारे संसार की दृष्टि देश पर हो उसी दिन कुछ उत्पात? ट्रंप के भारत आने के समय दिल्ली में दंगे हों, या 26 जनवरी की परेड के बाद लाल किले पर आक्रमण। कौन प्रायोजित कर रहा है? किसका विरोध कर रहे हो मोदी का? सरकार का? या देश का?

संसद भवन का उद्घाटन देश का उत्सव है मोदी का निजी उत्सव नहीं। मोदी सत्ता में है, सत्ता मोदी नहीं है। संसद भवन भारत की संपत्ति है, मोदी की नहीं। लेकिन तुमको प्रस्तुत करना है एक चित्र, कि एक तरफ मोदी संसद का उद्घाटन कर रहा है और दूसरी तरफ लोग विरोध में सड़कों पर हैं, विपक्षी पार्टियां समारोह में नहीं आ रही हैं।

फिर कहते हैं कि विपक्ष को पूछा नहीं। अब या तो बहिष्कार कर लो या भागीदार हो जाओ। सांसद विपक्ष के भी हैं, संसद भवन विपक्ष का भी है।लेकिन निर्माण से लेकर उद्घाटन तक विपक्ष ने रोड़े ही अटकाए हैं। कुछ नही मिला तो भाई उद्घाटन में राष्ट्रपति क्यों नहीं?

कांग्रेस सरकार होती तो उद्घाटन कौन करता? निश्चित रूप से कोई गांधी। फिर न राष्ट्रपति बड़ा होता न प्रधानमंत्री। तब गांधी परिवार से कोई प्रश्न पूछता? कुछ विपक्षी कह रहे हैं कि सत्ता बदलने पर दोबारा उद्घाटन करवाएंगे। यही आशा है आपसे, जब तक देश की हर सड़क, मोहल्ला, हर इमारत गांधी या नेहरू के नाम से न हो उसे enemy property act के तहत जब्त कर लें। फिर समस्या आई सेंगोल। ये नया डंडा मोदी कहां से ले आया। नेहरू जी की सुनहरी छड़ी थी सुनहरी छड़ी रहने देते, जबरदस्ती सत्ता के हस्तांतरण से जोड़ रहे हैं। किसी को दकियानूसी, ब्राह्मण वाद और न जाने क्या क्या दिख रहा है सेंगोल में।

इससे एक बात प्रमाणित अवश्य होती है कि नेहरू को भारतीय परंपराओं और आस्था की लेशमात्र भी चिंता नहीं थी। न ही समझ। उन्हें सत्ता के प्रतीक के रूप में धर्मदंड सौंप कर ईश्वर का प्रतिनिधि बनाया गया था, और उन्होंने उसे एक छड़ी कहकर संग्रहालय में रखवा दिया। अब धर्म और आस्था के उस प्रतीक का उपहास कर के विपक्षी पुनः प्रमाणित कर रहे हैं कि उन्हें भारतीय संस्कृति से कितना मोह है। संभव है उन्हें किसी बर्बर घुसबैठिये की तलवार सत्ता का प्रतीक अधिक लगती हो क्योंकि उनकी आस्था उस तरफ झुकी हुई है। धर्म संस्कृति एक तरफ रख भी दें तो विचार करें कि चोल साम्राज्य की संस्कृति का प्रतीक संसद में लाया जा रहा है वह ऐसे समय में कितना महत्त्वपूर्ण हैं जब विपक्ष ने देश को क्षेत्र, भाषा, धर्म, जाति, यहां तक कि दूध पर भी बांटने के सभी प्रयास कर लिए हैं। यहां तमिल संस्कृति को भारत का अभिन्न हिस्सा दर्शाने का प्रतीक है सेंगोल।

दक्षिण में द्रविड़ संस्कृति के नाम पर द्रविडनाडु की मांग पर सीधा विराम लगाने वाला कदम है। सेंगोल या धर्मदंड  तमिल संस्कृति नहीं उत्तर से दक्षिण तक एक भारत, एक संस्कृति का प्रतीक है। भाषा भले अलग है लेकिन हम एक हैं। कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस से अमूल बनाम नंदिनी का विवाद छेड़कर

लोगों को भड़काने की जो कोशिश की वह अब स्टालिन तमिलनाडु में लाने का प्रयास कर रहे हैं। कहां ग्लोबल ब्रांड बनाने की बात हो रही है और कहां कांग्रेस और स्टालिन जैसे लोग कर्नाटक बनाम गुजरात का विवाद खड़ा कर रहे हैं।क्यों यह स्थापित करने कर लगे हैं कि राज्य भारत का हिस्सा नहीं हैं। दक्षिण में हिंदी को लेकर लोगों को भड़काया जाता है, बंगाल में उत्तर प्रदेश के लोगों को बोहिर्गतो कहकर भड़काया जाता है, पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद को बढ़ावा दिया जाता है, हरियाणा में खिलाड़ियों के चेहरे के पीछे से राजनैतिक दांव पेंच चले जाते हैं। रोहिंग्याओ और बांग्लादेशियों के प्रति इतनी सद्भावना और हिंदुओं के प्रति इतनी नफरत क्यों भरी है इन विपक्षी पार्टियों में? क्यों हिंदू हिंदू न होकर ओबीसी,दलित,यादव,कुर्मी, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ बनाया जाता है। बांटना जरूरी है क्या? कर्नाटक मंत्रिमंडल की सूची आई है देखने लायक है।

केवल और केवल फूट डालो और राज करो की नीति पर चलते हुए विपक्ष भारत में फूट डालने का भरपूर प्रयास कर रहा है। कर्नाटक में जाकर उत्तर भारतीयों  को बाहर का बताते हैं। पंजाब में जाकर बिहारियों  को भैये बोलकर अपमान करते हैं। कश्मीर में आजादी के सपने दिखा कर पीढ़ियां खराब कर दी हैं। गुजरात को तो जैसे ये देश का हिस्सा मानते ही नहीं। मोदी गुजराती है तो मोदी के विरोध में सारे गुजरात के प्रति द्वेष है। गुजरात के उद्योगपतियों के प्रति द्वेष है। पालते रहें।  देश में जो बोलते हैं सो बोलते हैं देश के बाहर जाकर जब कहते हैं आप हमारी राजनीति में हस्तक्षेप कीजिए। तब लगता है नहीं साहब आप एंटी नेशनल ही हैं। और आपका विरोध मोदी से नहीं इस देश से है। इस देश की एकता से है। आप इस देश को तोड़ने का भरकस प्रयास कर रहे हैं।  ऐसे में सेंगोल जैसे प्रतीक आपके सभी प्रयासों पर पानी फेरने के लिए काफी हैं।

गुरुवार, 26 जनवरी 2023

गणतंत्र दिवस की झाँकियाँ

सबसे आगे पश्चिम बंगाल की झांकी - महिला सशक्तिकरण का प्रतिनिधित्त्व करती हुई, झांकी में सबसे आगे एक महिला सफ़ेद साडी पहले हुए माइक पर चीख रही है खा खा खी खी, का का छी छी।

साथ ही हाथ में हथियार लिए हुए भीड़। बदलते हुए समाज का परिचय देते हुए।

उसके पीछे चेक वाली लुंगी पहने हुए लोग तोड़ फोड़ करते हुए। आग लगाते हुए। पटरियां उखाड़ते हुए। साथ में जलता हुआ एक स्टेशन, और जलती हुई रेल।

मेहनतकश लोग, जी तोड़ मेहनत करते हुए। जी के साथ सब कुछ तोड़ते हुए। अद्भुत सौंदर्य।

बंधे हुए लोहे के तार, उसके ऊपर से कूदते और भीड़ का हिस्सा बनते हुए 1:4:16 के अनुपात वाले सुखी परिवार।अतिथि देवो भवः की भावना से ओत प्रोत दृश्य।

सेक्युलर बांगला पॉपुलर बांगला की अद्भुत भावना का परिचय उजड़े हुए पंडाल,जिसमें कोई मूर्ती इसलिए नहीं रखी गई कि किसी की भावनाएँ आहत न हो।

साथ ही बंगाल में गृह उद्योग के रूप में बनते हुए कट्टे और बम का दृश्य। राज्य ने मालदा में डालडा के उत्पादन में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। यह दृश्य राज्य के धमाकेदार भविष्य को दर्शाते हुए। 

पीछे से फिर से खा खा खी खी चीखते हुए लोग। और साथ ही पेड़ों से लटके हुए धड़ ।

झांकी राजपथ पर आगे बढ़ती हुई। दर्शक गण जय श्री राम का उदघोष करते हुए।

अगली झांकी महाराष्ट्र की। झांकी में माइक पर खड़ा हुआ एक शायर। शायर के पीछे दो टायर। टायर के ऊपर कुर्सी और कुर्सी पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ मुख्यमंत्री तो केवल शिवसेना का होगा।

उसके पीछे एक बड़ी सी कड़ाही, कड़ाही में सरकार, और करछुल हिलाते हुए तीन पार्टियाँ। म्यूजिकल चेयर खेलते हुए MLA.

भरने के लिए सूखा तालाब ढूंढता हुआ एक नेता।

पीछे सर पकड़ कर बैठी हुई जनता। झांकी राजपथ से आगे बढ़ती हुई।

दर्शक दीर्घा में बैठे हुए फडणवीस और अमितशाह सब रिकॉर्ड करते हुए।

अगली झांकी राजधानी दिल्ली की। स्कूल, स्कूल से लगे ठेके, ठेके पर कतार। सड़क, सड़क पर जाम। पंडाल, पंडाल में बुजुर्ग महिलाएं। धरना, धरने में लंगर, लंगर में पिज़्ज़ा। धरना पर्यटन की खूबसूरत तस्वीर। लालकिले पर चढ़ाई करते लोग। जेल, जेल में मसाज कराते मंत्री। सेवा सर्वोपरी का सन्देश।

सबसे आगे दिल्ली के मालिक।मालिक सत्ता की गर्मी में,कुकर से चार सीटी लगने के बाद निकले आलू जैसा गर्म। मालिक के पास आसुरी अट्टहास करती नेत्री।एक दूसरे को पीटते पार्षद।यह नई दिल्ली की उभरती हुई सांस्कृतिक विरासत है।जानता है मैं कौन हूँ से मैं दिल्ली के मालिक का गुर्गा हूँ, तक का सफर।

लाचार दिखती पुलिस। सुहाना दृश्य। सशक्त लोकतंत्र की सशक्त होती जनता का प्रतीक। सबसे पीछे सीबीआई, सीबीआई के हाथ में झुनझुना। झुनझुने की झंकार पर नाचते स्मार्टमैन और साथी।   विपक्ष झांकी से भी नदारद।

अगली झांकी बिहार से।एक कुर्सी, कुर्सी के आस पास दौड़ते लोग। लोग बदल रहे हैं।कभी भगवा कभी नीले। लेकिन कुर्सी पर बैठा व्यक्ति स्थिर, हरा।हरियाली और बाढ़ का अद्भुत संगम। गाना बजता हुआ आइये न हमरे बिहार में, ठोक देंगे कट्टा कपार में। तीर,तीर पर लटकी लालटेन।

तीर और लालटेन के बीच में घुसने की कोशिश करता हाथ, जो कभी लालटेन की लौ से जलता कभी तीर की नोक से घायल होता।  लोग दिल्ली की झांकी में धक्कामुक्की करते हुए कूद कूदकर घुसते हुए। बनाया क्या है, कुछ समझ नहीं आ रहा। कुछ है, लेकिन हमको पता नहीं है क्या है। जो भी है सो है, बिहार का सत्य।

इस बार की झांकियों में एक नई झांकी। ऐतिहासिक लोकतंत्र की झांकी। संसद भवन, संसद भवन में घुसा हुआ मीडिया का माइक, जो संसद से ऊपर निकल गया है। जो पत्रकारों की पहुँच और "सूत्रों" का प्रतिनिधित्व करता है। उसके ऊपर मीलार्ड के बाल। जो न्यायालय की सर्वोच्च सत्ता और सम्मान का प्रतीक है।


सबसे नीचे इन सबके बोझ से दबी हुई जनता। मिडिल क्लास जनता झुकी कमर से दर्शकदीर्घा में मिडल क्लास वित्तमंत्री के आगे से हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए। वित्तमंत्री वहीं से बोझ उठाने वाले करदाताओं का धन्यवाद करती हुईं।  

झांकी अपनी ठसक दिखाते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर।

रविवार, 22 जनवरी 2023

जब मैंने ये नहीं सोचा कि तीर मारने के बाद मुझे क्या मिलेगा तो मैं ये क्यों सोचता कि तीर मारना कहाँ है।

युवराज ने धनुष उठाया, और तेल की कड़ाही के पास जाकर खड़ा हो गया। उसने कड़ाही हो देखा, कड़ाही में भरे तेल को देखा, सभा में भरे लोगों को देखा, दो तीन को तो मन ही मन गले भी लगाया। ऊपर लटकती मछली को देखा और उसे अपना चुनाव चिन्ह दिखाते हुए कहा डरो मत। 

उसनें धनुष के ऊपर तीर को चढ़ाया, और निशाना लगाया। 

उसने नहीं सोचा कि उसे तीर मारने के बाद क्या मिलेगा, उसने तेल में देखा, उसे छत दिखी, छत पर लगा झूमर दिखा, छत पर बनी कलाकृति दिखी, छत पर लटकती मछली और अपनी ही परछाई दिखाई दी, फिर उसने तीर तेल में दिख रही अपनी ही आंख पर चला दिया। 

फिर सभा में खड़ा होकर कहने लगा – "मार दिया मैंने उसको, गया वो। अब तो वो है ही नहीं। जो आपको दिख रहा है वो युवराज है ही नहीं। समझो आप।"

एक राजा बोला – "तीर तो मछली की आंख पर मारना था?"

"जब मैंने ये नहीं सोचा कि तीर मारने के बाद मुझे क्या मिलेगा तो मैं ये क्यों सोचता कि तीर मारना कहां है। मुझे लगा मुझे मारना चाहिए तो मैने मार दिया।"

"लेकिन इधर उधर क्यों चलाया? लक्ष्य मछली की आंख थी, कड़ाही में देखकर ऊपर निशाना लगाना था। ऐसे थोड़ी कहीं भी निशाना लगा दो?"

"देखो सबसे पहले खुद को उधर मछली की जगह रखकर देखो। वहाँ से जो दिखता है वो अलग दिखता है। वहाँ से आपका दृष्टिकोण बदल जाता है। कड़ाही अलग दिखती है। लोग अलग दिखते हैं। धनुष-बाण अलग दिखता है।"

"लेकिन मछली को तीर थोड़ी चलाना था, आपको चलाना था।"

"आप जब धनुष उठाते हैं तो ऐसा नहीं लगना चाहिए कि तीर आपको चला रहा है, ऐसा लगना चाहिए आप तीर को चला रहे हैं। आप कड़ाही में देखते हैं तो आपको उतना ही दिखता है, जितना कड़ाही में होता है, लेकिन जो कड़ाही में है उतना ही तो नहीं होता, उससे ज्यादा भी तो बहुत कुछ होता है। उसके बाहर देखने के लिए आपको कड़ाही से बाहर सोचना पड़ता है। फिर आप धनुष पर रखकर तीर छोड़ते हैं तो तीर उड़ता है। उस उड़ते तीर को ग्रहण करने के लिए आपको तीर के आगे उड़ना पड़ता है। आप अपने आपको तीर से आगे रखकर सोचिए। तब समझ आएगा।"

सभा के सब लोग सन्न थे, बस कुछ पत्रकार धन्य धन्य कर रहे थे।

फिर भी एक राजा ने कह दिया– "कहना क्या चाहते हो?"

"समझ नहीं आया न? जब शिव को पढ़ोगे तो समझ आएगा।"

"कौन शिव?"

"शिव खेड़ा, यू कैन विन।"

"उन्होंने ये सब लिखा है?"

"नहीं,उन्होंने लिखा है कि फालतू बातों में समय खराब मत करो।"

"मुझे शंका हो रही है।  तुम हो कौन?"

"यह तपस्वियों का देश है और मैं तपस्वी हूँ।"

"तो तपस्वी महाराज, इस स्वयंवर में क्यों आए हैं?"

"देखिए यहाँ सभी धर्मों के लोग आए हैं। मैं इन सबको जोड़ने आया हूँ और मैं इन सब को जोड़ के रहूँगा।"

"यह तो बड़ी जोड़दाड़ बात कही आपने।" मगधराज ने कहा।  

"क्या जोड़दाड़ है इसमें?" एक पत्रकार बोला। 

"हमको पता नहीं है।"  मगधराज ने कहा।

"कुछ पता है भी? उधर आपके राज्य में जनता कितनी परेशान है?"

"हमको अभी पता नहीं है। हम पूछते हैं।"  

"जंगल राज आया हुआ है पूरे मगध में और आप यहाँ मछली की आँख मारने चले आए हैं ?"

"जंगलराज का हमको अभी पता नहीं है। हमारे राज्य में शिक्षा व्यवस्था बड़ी ख़राब हो रही है।"  

एक पत्रकार बोला - "इनको कुच्छौ पता नहीं है। बड़े राजा बनते हैं।"

दूसरा बोला - "शिक्षकों को फ़िनलैंड भेजकर ही देख लो, क्या पता पूरे मगध की शिक्षा व्यवस्था सुधर जाए। आपके यहाँ तो कोई फाइल अटकाने वाला भी नहीं है।"

पहले ने कहा - "लगता है आप सब जानते हैं। आप कुछ पढ़े लिखे लग रहे हैं।  लगाइए महाराज आप ही निशाना लगा दीजिये, तेल में देखकर मछली की आँख पर।"

दूसरा बोला - "धनुष हमारा, बाण हमारा, आंख मछली की, मछली हमारी, बीच में ये कड़ाही कहां से आ गई? हम किसी कड़ाही को नहीं जानते। कौन कड़ाही और कौन सा तेल। हमारे हाथ में धनुष होगा तो तीर हम मारेंगे, कैसे मारना है और कहां मारना है ये हम डिसाइड करेंगे कि कड़ाही?"

उधर से कोई स्त्री बड़े म्यूजिकल रीदम में कुकु-कू-कू-कू-कू की आवाज़ निकाल कर कहती है - स्वयंवर पर कंसन्ट्रेट कीजिये। 

सभा में से आवाज आई - "तो तपस्वी महाराज! सब जोड़ लिया? अब क्या करेंगे?"

"आज तो इस नफरत की सभा में मोहब्बत की दुकान खोलने वाला हूँ। कल का पता नहीं।"

सभा के आयोजक ने कहा - "अरे यार दुकानदारी बाद में करना कोई ढंग का निशाने बाज हो तो बताओ। आप सबको समझ भी आया है कि यह सभा किस कारण से आयोजित की गई है? " 

उधर से युवराज के सहबाला ने कहा - "भारत जोड़ो यात्रा के कारण।" 

सभा में सभी ने एक स्वर में कहा - साधो! साधो! 

अचानक सारे पत्रकार बाहर की तरफ भागे। किसी का ध्यान सभा पर नहीं था। सब धक्का मुक्की करने लगे।  एक दूसरे के स्तर को नीच महानीच, गिरा हुआ, पड़ा हुआ, सड़ा हुआ बताने लगे। 

सभा में सब बस यही सोच रहे थे कि ये हो क्या रहा है। सबका ध्यान भागेश्वर से बागेश्वर पर कैसे चला गया।  

एक शरीफ आदमी कोने में बैठा हुआ था, दबी सी आवाज़ में बोला  - "सभा में जो करना है कर लो, लेकिन महाराज! सभा के बाद ये तेल , कड़ाही और मछली हमको दे देना। खाने पीने की बड़ी किल्लत है आजकल।"