मंगलवार, 30 जुलाई 2024

जननायक की चप्पल लीला

विपक्ष से ९९ के जननायक सड़क पर निकले। वे सड़क पर अक्सर निकलते हैं। एक जगह उन्हें एक मोची मिला। मोची चप्पल सिल रहा था। जननायक का मन भी चप्पल सिलने का हुआ। जननायक ने चप्पल सिली। मोची अगर भजिए बना रहा होता तो जननायक का मन भजिए बनाने का हो जाता। जननायक का मन ही ऐसा है।

सब कहने लगे कि अब जननायक ने मोची पर कृपा कर दी है, मोची के दिन फिर गए। मोची पर कोई असर नहीं हुआ था, वह अब भी चप्पल ही सिल रहा था।
एक दिन एक जननायक की पार्टी का एक नेता उसके पास आया और बोला उसे वो चप्पल देखनी है जो जननायक ने सिली थीं।
मोची ने कहा –पता नहीं कहां हैं। तब उस नेता ने उन चप्पलों को देखने के लिए बहुत पैसा देने की बात की। मोची ने सोचा सिर्फ चप्पल देखने के पैसे?
नेता ने और उत्सुकता दिखाई, और कहा चप्पल छूने दोगे तो दुगने पैसे दूंगा।
पहले तो मोची ने सोचा पागल है। फिर मान गया। अब उसने वो चप्पल ढूंढनी शुरू की। लेकिन एक जैसी चप्पलों में कौन सी थी जिसपर जननायक ने हाथ आजमाए थे, पहचानना मुश्किल था।
उसे जैसा याद आया वैसी एक जोड़ी चप्पल लाकर उस नेता के सामने रख दीं। नेता की आंखों से आंसू बह निकले। उसने पहले तो हाथ जोड़े। फिर दंडवत लेट गया। फिर भी मन न भरा तो उन चप्पलों को उठाकर चूमने लगा, छाती से लगाकर रोने लगा। मोची यह सब देख रहा था।
अब वह नेता बोला ये चप्पल मुझे दे दीजिए। मोची पहले तो सोच रहा था कि दे दे, फिर बोला नहीं दे सकता, आप तो जानते हैं ये कितनी अनमोल हैं। मेरे पूर्वज भी चप्पल सिलते थे। मैं इन्हे पीडीयों की विरासत बनाऊंगा। मैं इनको संभाला कर रखूंगा। नेता करोड़ों रुपए की बोली लगाने लगा। मोची न माना।
वह बोला आप कहें तो ऐसी ही दूसरी चप्पल ले जाइए, एक लाख रुपए में ऐसी ही दे देंगे, कहिए तो जननायक का चेहरा भी चप्पल पर बना देंगें। ये वाली तो मेरे लिए अनमोल हैं। नेता मन मार कर दूसरी चप्पल लेने तैयार हो गया, बोला - "ये राज किसी को मत बताना कि तुमने मुझे असली वाली नहीं दी।"
नेता उन चप्पलों को एंटीक बताकर विदेश में बेचना चाहता था।
अगले दिन मोची ने एक मखमल का कपड़ा खरीदा। एक चौकी पर बिछा कर वो चप्पल रखीं। फूल बिछाए। दीप और धूप लगा दिया। जो आता उसे सुनाता कि ये वही वाली चप्पल हैं। सभी दंडवत करते। कुछ चढ़ावा चढ़ाते।
कुछ खरीदने के लिए बोली लगाते। जो ज्यादा जिद करता उसे मोची वैसी ही चप्पल बनाकर देने की बात करता। वे लेकर जाते।
कुछ ही दिनों में पार्टी कार्यकर्ताओं को कतारें लगने लगीं। केरल से भी कार्यकर्ता दर्शन को आए, साथ कम्युनिस्टों को लाए। कम्युनिस्ट सदा से माओ या मार्क्स की चप्पल पूजना चाहते थे। लेकिन मार्क्स के अवतार ने जिन चप्पलों में टांके लगाए वे भी दर्शनीय और प्रेरणादायक थीं। दो चप्पलों की अवधारणा को घोर रूढ़िवादी और अमानवीय मानते हुए वामपंथी विचारकों का मत है कि हर व्यक्ति के पास कम से कम तीन चप्पल होनी चाहिए। जहां अतिरिक्त चप्पल मोचियों के लिए अधिक रोजगार का सृजन करती, वहीं तीसरी चप्पल से किसी को भी चप्पल टूटने पर परेशान नहीं होना पड़ता। चार चप्पल होना पूंजीवादियों को फायदा पहुंचाती है और समाज में असमानता का भाव उत्पन्न कर सकती है। अतः अमीर गरीब सभी को तीन चप्पल लेकर रखना चाहिए। अमीरों के पास बहुत अधिक न हो और गरीबों के पास थोड़ा सा अतिरिक्त हो।

चमत्कारी चप्पलों ने मोची की किस्मत खोल दी थी। जननायक ने चप्पल नही सिली थीं, मोची की किस्मत सिल दी थी। मोची की दुकान के आसपास चाट पकौड़ी के ठेले लगने लगे। मोहब्बत की दुकानों में मोहब्बत का शरबत मिलने लगा। सोनू सूद ने जूठे खाने की सच्ची दुकान लगाने के लिए कड़ाही और करछुल भेजे। कुछ लोग जूता खाने आते, कुछ जूठा खाने आते।
भीड़ सभालने के लिए चार हवलदार तैनात करने पड़े। मोची की दुकान बड़ी हो गई, शोरूम जैसी। जिसमें सबसे ऊपरी तल पर पूजनीय चप्पल दर्शनार्थ रखी गई थीं। दूसरे तल पर जननायक मर्चेंडाइज मिलता था। जिसमें जननायक की फोटो वाली चप्पल, जूते आदि मिलते थे। सबसे नीचे वाले तल पर दफ्तर और बिलिंग काउंटर था। साथ ही चप्पलाकार की–रिंग, इयर रिंग, रिस्टबैंड, लॉलीपॉप आदि मिलते थे। शोरूम के बाहर छोटे छोटे बच्चे उन चप्पलों की फोटू बेचते थे। वास्तुशास्त्री उन चप्पलों को घर के ड्राइंग रूम में रखने से वस्तु दोष दूर होने के टोटके बताते थे। कुछ बाबा की रेड बुक के जानकार बताते थे कि रेडबुक टोटका नम्बर ९९ के अनुसार अगर एक बार वो चप्पल किसी के सर पर पड़ जाए तो गंजे सर पर भी बाल उग सकते हैं। प्रसिद्ध सेलिब्रिटी चावला जी ने नुस्खे की पुष्टि की। उन्होंने कहा - पहले मैं गंजा था। मैं परेशान रहता था। लोग मुझे गंजा कहते थे। मेरे सरपर बाल नहीं थे। मैं हार मान चुका था और निराश हो चुका था। फिर किसी ने मुझे इन चप्पलों के बारे में बताया। बस एक बार इस नुस्खे को आजमाया उसके बाद मेरे सर पर घने मुलायम सफ़ेद बाल उग आए।
चप्पलों की कसम खाई जाने लगी। सौगंध मुझे है चप्पल की पूंजीवाद बढ़ने दूंगा।

प्रेमी प्रेमिका कहते - जैसे एक चप्पल के बिना दूसरी किसी काम की नहीं वैसे हम दोनों भी एक दूसरे के बिना किसी काम के नहीं रहेंगे। हमारा तुम्हारा साथ इन्ही चप्पलों की जोड़ी जैसा है। बस कोई जननायक टाँके लगा दे तो हम सदा के लिए एक दूसरे के हो जाएं। कुछ कार्यकर्ता तो चप्पलों को साक्षी मानकर शादी करने लगे। पादरी नरूला ने चप्पलों को ही होली ग्रेल बता दिया। कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोगों ने चप्पलों को ही नया भगवान बता दिया। चप्पल निर्माण दिवस मनाया जाने लगा। चप्पल चालीसा और भजन के वीडियो यूट्यूबर्स ने बना कर यूट्यूब भर दिया।
चप्पल अब राष्ट्रीय विमर्श का विषय थी। टीवी पर पार्टी प्रवक्ता जननायक और उनकी चप्पल लीला का महिमा मंडन करते और सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं के पास हमेशा की तरह इसका कोई उत्तर नहीं होता। वे केवल सर पकड़े बैठे रहते। लेकिन सत्ता पक्ष के शीर्ष नेताओं की सोच कुछ और थी, सुनने में आया कि लोगों की आस्था को देखते हुए चप्पल पर्यटन पर जोर देने की बात चल रही है। चप्पल दिवस की चर्चा मीडिया में चल निकली। चप्पल सेस लगाने का प्रस्ताव वित्त सचिव ने रख दिया। चप्पल को भी कैपिटल घोषित करने की योजना बनाई जाने लगी। पाकिस्तान से भी चप्पल कॉरिडोर बनाने की मांग उठी।
जननायक की पार्टी के समर्थक विरोधी पार्टी के समर्थकों को चिढ़ाते कि भक्तों देखो हमारे जननायक की चप्पल लीला। तुम अंधभक्त लोग कभी जननायक का न्याय और क्रांति नहीं समझ सकते। दूसरी तरफ के समर्थक खीझ उठते।

कुछ ही महीनों में मोची अमीर हो चुका था, चार शोरूम खुल चुके थे।

हर शोरूम में वैसा ही चप्पलों का मंदिर उसने बनवाया था। उसके हर शोरूम के मैनेजर दावा करते कि असली चप्पल यहीं रखी हुई हैं। पित्रोदा से लेकर जुबैदा बॉस, बंटी से लेकर बंटाधार और हाफिज सईद तक के साथ उसकी तस्वीरें उसके शोरूम की दीवारों पर लगाई गई थीं। वह पार्टी की सभाओं में जाता, मंच पर चप्पल वाले के रूप में उसका सम्मान किया जाता।
यह सब देखकर वह पहला नेता जो चप्पल ले गया था एक दिन हाईकमान से मिलने गया और कहने लगा असली चप्पल तो उसके ही पास हैं, मोची धोखा करता है। हाईकमान चप्पल की महिमा जानता था। हाईकमान ने एक बिस्कुट उसकी तरफ फेकते हुए कहा - "पहले क्यों नहीं बताया?"

वह नेता बोला -" छह महीने से प्रयास कर रहा था। यही बताने के लिए लेकिन आप मिलते ही न थे।"
हाईकमान ने मोची को बुलाया और कहा -" क्यों बे ये बता कि ये महाशय तुझसे चप्पल ले गए थे?"
"हाँ ले गए थे।"
"तो फिर तेरे पास नकली चप्पल हैं?
"मेरे पास तो असली हैं। मैं तो उनकी रोज पूजा करता हूँ। कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को चरणामृत भी देता हूँ।"
"लेकिन ये महाशय तो कहते हैं असली इनके पास हैं?"
"नहीं हैं, ये झूठ बोलते हैं। मैंने तो नक़ल बना कर दी थीं। ऐसी नक़ल तो रोज दो-चार दर्जन बेचता हूँ। "
"लेकिन ऐसे तो विवाद बढ़ जाएगा। ये चप्पल अब पार्टी की संपत्ति हैं। तुम दोनों के पास जो चप्पलें हैं उन्हें पार्टी कार्यालय में जमा करवा दो। हम देखेंगे क्या कर सकते हैं।"
नेता तो मान गया, मोची न माना। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। छुट्टियों में भी आधी रात को सात जजों की बेंच बैठी। मु.न्या. ने अध्यक्षता की। पार्टी की तरफ से सिफ़र साहब और मोची की तरफ से चैंबर बाबू ने मोर्चा संभाला। मामला वर्चस्व का था।
केस पर लगातार सात दिन और सात रात सुनवाई हुई। फैसला पार्टी के पक्ष में आया। चप्पल पार्टी को और मुआवजा मोची को देने की बात हुई।
उस दिन मोची के शोरूम पर भारी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता जमा हुए, उतना ही पुलिस बल जमा हुआ। चप्पलों को बड़े से ट्रक में शान से के मोची की दूकान से पार्टी कार्यालय लाया गया। जुलूस सारे शहर में निकला। पटाखे चले, मिठाई बंटी। झबरे और तगड़े सभी कार्यकर्ताओं ने नागिन डांस किया।
मौसमी और मिश्रा ने कूद कूद कर बताया कि वो कितनी उतावली थीं - वो देखो चप्पल, वो देखो चप्पल, कहते हुए माइक लेकर छत से कूद पड़ीं।
एक पार्टी प्रवक्ता ने बताया कि - यह हमारे पार्टी में ही संभव है जहाँ आलाकमान चाहे तो किसी भी पद पर किसी को भी बिठा सकती है। अब देखिये वो चप्पल आज कार्यालय में स्थापित होकर हमारे हर कार्यकर्ता को प्रेरणा देगी। हमारे नेतृत्त्व की बात कोई नहीं टालता और पार्टी अनुशासन में रहती है।
गठबंधन के नेताओं ने इसे क्रांतिकारी कदम बताया और भरोसा जताया कि इस कदम से सबको बराबरी का अधिकार मिलेगा। हर क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी। फिलिस्तीन आज़ाद हो जाएगा और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। चीन से सम्बन्ध सुधर जायेंगे। लखनऊ की सड़कों से सांड कम हो जाएंगे। दिल्ली को नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा।
रविश ने पूरा एक घंटे का शो बनाया - ये देखिये लोकतंत्र का उत्सव है। आज वे चप्पल जो समाज के सबसे निचले तबके से उठकर आज हमारी पार्टी कार्यालय में स्थापित की जा रही हैं। यही समाजवाद है जिसकी कल्पना हम करते रहे हैं। ये चप्पल याद दिलाती रहेंगी कि एक जननायक कैसे सबकी जिंदगी में टाँके लगाने के लिए गली गली घूमा।
जर्मन ने बताया - दोस्तों क्या आप जानते हैं, अब पार्टी इन चप्पलों को हमेशा के लिए अध्यक्ष बनाकर एक बहस को समाप्त कर सकती है। ९९% देशों में चप्पल किसी पार्टी न चुनाव चिन्ह ही नहीं बन सकी हैं और आज अध्यक्ष भी बन सकती हैं। दोस्तों ... दोस्तों ... दोस्तों। चप्पल चप्पल चप्पल।
वरुण ग्रोवर अभी तक इस बात पर हंस रहे थे कि वो लोग अयोध्या हार गए। उन्हें अभी तक चप्पलों पर हंसने की फुर्सत नहीं मिल रही थी।
अजीत भारती वीडियो नहीं बना पाए क्योंकि उनके घर पर हॉन्डुरास की पुलिस नोटिस देने आई थी।
https://x.com/bstvlive/status/1818249028704088371

सोमवार, 22 जुलाई 2024

मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है

बस में चार पहिए, दो दरवाजे, बाकी का खांचा तो बाहर से दिख गया था। बस के अंदर ड्राइवर की सीट, सीट पर लटका मटमैला तौलिया, एक घिसा हुआ स्टीयरिंग, सही सलामत गियर, ड्राइवर के पीछे गद्दी वाली एक बेंच, बहुत सारी मैली सीटें, जिनपर पीला पेंट लगा था या किसी प्रकार की सब्जी कहना मुश्किल है, कुछ पर ग्रीस के दाग जरूर थे। कुछ सीटों की गद्दी उखड़कर बगल वाली विंडो सीट पर बैठने को उछल रही थीं। अनगिनत खिड़कियां जिनका कांच बंद करने और खोलने के लिए किसी न किसी सवारी के बीच लड़ाई होने की प्रबल संभावना थी। ड्राइवर की सीट के बिलकुल पीछे एक पैनल खुला था या टूटा कह नहीं सकते क्योंकि बेतरतीब नट बोल्ट से सेट या अपसेट किया गया था, जिसमें से नीचे देखने पर सड़क देखी जा सकती थी।

सड़क तो सामने से भी देखी जा सकती थी, लेकिन नीचे वाला दृश्य सड़क को अधिक निकट से दिखाता। भोपाल और सागर के बीच रोज सुबह चलने वाली इस बस में न जाने और कौन-कौन सी जुगाड़ करके चलने पर मजबूर किया गया होगा यह तो ड्राइवर ही जानता होगा या उसका सहायक। फिलहाल बस में एक ड्राइवर और तीन सहायक थे। बस चालू करने के लिए कोई स्विच या चाबी नहीं थी। हॉफ पेंट और जंग के रंग वाली टी शर्ट पहने ड्राइवर ने न जाने कौन सा मंत्र फूंक कर एक तार का गुच्छा खींचा और बस चालू हो गई।
सवारियां अपने स्थान पर बैठ गई, जिनमे एक दुल्हन, उसकी मां, बहने और परिवार के अन्य लोगों के साथ एक सहेली और दो चार पड़ोसी थे।

साथ में थे एकमेव जीजाजी। जीजाजी कहां बैठेंगे इस बात में संशय नहीं था, क्योंकि मेहमान जी थे उन्हें तो खुद चुनी हुई जगह मिलनी ही थी। उन्होंने चुनी ड्राइवर के पास सबसे आगे वाली सीट। क्योंकि यही वो सीट थी
जहां चकल्लस सबसे कम होने की संभावना थी। जय बजरंगबली के उद्घोष के साथ बस चली और साथ ही चल पड़ी चकल्लस।

देखो सब जने आ गए?
कोनऊ छूट तो नई गओ?
पानी की टंकी रख ली थी?
डिस्पोजल काय में रखे?
नारियल को बोरा आंगें ले आओ। नदी–नरवा पे चढ़ाने पड़ें।
तुमने चाबी काय में रखें।
अरे यार हमाई लिपस्टिक छूट गई।
काय अपनो लाल सूटकेस डिग्गी में रखवा दओ?

चकल्लस सुनकर ड्राइवर और उसके तीनों सहायक भी मूड में आ गए और अपनी चकल्लस करने लगे। अधिक तो समझ नहीं आया लेकिन ड्राइवर तीन में से दो को आगे उतरने को कह रहा था और तीनों उतरने के लिए तैयार नहीं थे। ड्राइवर का कहना था कि जिसके पास राजश्री हो वह बैठा रहे बाकी दो उतर जाएं और अगली गाड़ी से आएं। और तीनों सहायक बारात के साथ ही जाना चाहते थे। ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोकी और तीनों को नीचे उतर कर आपस में फैसला करने को कहा। तीनों उतरे और न जाने कैसे दो मिनट में फैसला कर लिया। एक चढ़ा और बस चल पड़ी।

तब तब सवारियां भी स्थिर हो गई थीं और ड्राइवर से गाना लगाने की मांग कर रही थीं। ड्राइवर ने सूचना दी कि बस में म्यूजिक सिस्टम नहीं है। मनोरंजन के लिए खिड़कियां खड़कती हैं, वही संगीत है।
बस के ड्राइवर का नाम था बाबू। जो भी हो बताया तो उसने यही था। बस ने जैसे ही रफ्तार पकड़ी उसकी राजश्री की तलब ने भी जोर पकड़ा।
इतने में बारात में सबसे सियाने यानी दुल्हन के भाईसाहब आगे आकर बैठ गए। ड्राइवर को कुछ नदी के पास धीमा चलने या रोकने की हिदायत देने ताकि नारियल फोड़ा या फेका जा सके।
ड्राइवर से भाईसाहब ने नाम, पता आदि पूछा। ड्राइवर ने बताया उसके पांच बच्चे हैं। और वह फलां गांव का है। ड्राइवर को कहीं बीच में नाश्ते के लिए रोकने को कहा गया।
ड्राइवर ने भाईसाहब से पूछा - "आपका ब्याह हो गया?"
भाईसाहब ने बताया - "अभी नहीं।"
ड्राइवर अगले ही क्षण कहने लगा - "आप हमको अपनई समझो, हम तो केवल आपई के हैं। आपके अलावा और कोई नहीं है हमारा।"
भाईसाहब घबराए, वैसे ही कुंवारे हैं और अब ये पांच बच्चों का बाप उनके गले पड़ रहा है। बोले - "उन पांच बच्चों का क्या होगा?"
ड्राइवर बोला –"वे भी आपई के सहारे हैं।"
भाईसाहब और घबराए, बोले -" क्या चाहिए ये बताओ।"
"बोला बीस रुपए दे दो राजश्री के लिए।"
एकमेव जीजाजी ने भाईसाहब को व्यंग्य से देखा और बोले - "दे दो, इसके मुंह में गुटका रहेगा तो चुप रहेगा, नहीं तो आज हमको सरहज मिली समझो।"

एकमेव जीजाजी का यह पहला अवसर था जब मौका मिला था मेहमान बनकर किसी विवाह में जाने का।
वैसे तो जीजाजी की इज्जत उस तरफ से उतनी ही है जितनी अपने घर में दाल बघारते हुए होती है। लेकिन फिर भी इस बार हिदायत दी गई कि थोड़ा मेहमान की तरह पेश आना, कुर्सियां उठाने मत लग जाना। अपना सूटकेस भी मत उठाना। थोड़ी अकड़ भी दिखा लोगे तो चल जाएगा क्योंकि आप उधर मेहमानजी हैं। सेवा साले करेंगे। जीजाजी के मन में भी लड्डू फूटा अगर कहो तो बैठने के लिए चक्का वाली कुर्सी ही मंगा ली जाए। न मिलने पर थोड़ा मुंह फुला लेंगे। ये तो जीजाजी को दी गई हिदायतें थीं, दूसरी तरफ भी माहौल बनाया गया कि ये थोड़े अकडू हैं, बात कम करते हैं, काम इनसे एक नहीं होता, वजन उठता नहीं और गुस्सा बहुत करते हैं। दोनों तरफ मामला ऐसा हो गया कि जैसे दोनों तरफ से सावधान रहना है।

थोड़ी देर में सब को न जाने कैसे भूख लगने लगी, नाश्ता नाश्ता की करुण पुकार और हाहाकार सुनाई देने लगा। बाबू से कोई ठीक ठाक स्थान पर रोकने की मिन्नतें की जानें लगीं। बाबू भी थोड़ा आगे, थोड़ा आगे करता हुआ पीछे तीन चार कस्बे छोड़ चुका था। अगर एकाध घंटे बस न रुकती तो शायद कोई न कोई सीट नोचकर खाने लगता। वही सीट जो उखड़कर खुद विंडो सीट पर बैठने के लिए अपनी जगह से उछल रही थी और जिसपर चटनी या ग्रीस या पेंट पहले से लगा हुआ था। राहतगढ़ से बेगमगंज के बीच की सड़क आज भी वैसी थी जैसी पंद्रह साल पहले थी। विकास के प्रकोप से बनती होगी लेकिन पहली बरसात में धुल भी गई लगती थी। या ये वाली सड़क शायद कांग्रेस का कार्यकाल याद दिलाने के लिए ऐसी छोड़ी गई थी। सड़क की खड़र बरड़ ने भूखे पेटों ने अंगों को उलटना पलटना शुरू कर दिया। गाड़ी जाकर रुकी गैरतगंज में, पहले पेट के अंग अपनी जगह पर लाने के लिए लोगों ने हाथ पैर खींचे फिर नाश्ता किया।

अबकी बार जब गाड़ी चली तो सहायक ने भाईसाहब से पूछा, शादी है किसकी? बताया गया दुल्हन उधर बैठी है।

वह कहने लगा – "आजकल उल्टो होन लगो है। पहले बरात आउत हती अब जाउत है। मानो एक बात है जो बैनर आगे लगो है ओ में तो काऊ और है।"
"नहीं इन्ही का बैनर है। यही हैं।"
"नहीं हैं भैया, कोई और हैं। इनकी तो शकल नहीं लग रही वैसी।"
"अरे जेई हैं।" दो चार लोग एक साथ बोले।
"हम नहीं मानत।"
"तुमाए माने से का!"
"रामधई कहो तो बैनर से मिलवा दएं! अलग है।"
"अरे जेई हैं!"
"हम नहीं मानत।" यह कहते हुए सहायक ने बस रुकवा दी। ड्राइवर ने मुंह में गुटका था। उम्म हम्म करते हुए रोक दी। सहायक उतरा और बस के बाहर से बैनर उतार लाया।
बस चल पड़ी। सहायक बैनर खोलकर दुल्हन और बैनर की शकल मिलाने लगा। कहता है जे बिन्ना नैय्ये।
"जेई आएं।" सब चिल्लाए।
तब ड्राइवर ने मामला संभालते हुए कहा – "काअ पीछे पाओ अय, फोटू में फिएक्टर लग जात आजकल।"
जैसे तैसे बारात भोपाल पहुंची। लड़के वालों ने ढोल, फूल और पोहे से बारात का स्वागत किया। समय तो पूड़ी का था लेकिन पोहे भी अपना काम कर गए।

कार्यक्रम की लंबी सूची थी। दुल्हन को पार्लर जाना पड़ा। तीन घंटे के मेकअप के बाद खबर मिली कि दुल्हन रो रही है। उसका मेकअप खराब कर दिया गया था। इधर दुल्हन की मां भी रोने लगी। इस विलापमयी माहौल को संभालते हुए येन केन प्रकारेण दुल्हन दूसरे पार्लर ले जाई गई। वहां दो घंटे की मशक्कत के बाद भी कोई असर न हुआ। दुल्हन अब भी दुखी थी। फिर वह तीसरे पार्लर में ले जाई गई। जहां तसल्लीबख्श तरीके से मेकअप की मरम्मत हुई और विवाह कार्यक्रम आगे बढ़ने के संकेत मिले। लगता तो यही था कि विवाह का मुहूर्त मेकअप में निकल जाएगा। जीजाजी की एक संभावित सरहज ने कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।

लेकिन पार्लर वालों की असीम कृपा से जो कार्यक्रम सात बजे होना था, ग्यारह बजे होने के आसार दिखने लगे।
इसी बीच खाने का कार्यक्रम शुरू हुआ। जीजाजी के सालों, और सालों के दोस्तों ने पैर छूने के बहाने बार बार जीजाजी के पैजामे से हाथ पोंछे। थोड़ी ही देर पहले सब उनके कमरे में तैयार होने घुसे थे और जीजाजी को आतंकित कर के निकले थे। एक तो होटलों के बाथरूम में लगे हुए तरह तरह के नल और सिस्टम आसानी से समझ नहीं आते, जब तक समझ आते हैं कमरा छोड़ने का समय आ जाता है। । दो कहकर घुसे थे बारह धड़धड़ाते आ चुके थे।
साले बाथरूम में घुसते, फिर अंदर से आवाज लगाते पानी नहीं आ रहा, दो तीन बार तो जीजाजी ने नल से पानी निकालने के इंस्ट्रक्शन ब्रॉडकास्ट किए, चौथी बार थक गए। फिर एक साले को नियुक्त किया। लेकिन अब सालों को आनंद आने लगा था। हर कोई कहता जीजाजी आप ही सिस्टम बताओ इनका बताया समझ नही आया। जीजाजी को लगा वो सुलभ शौचालय के बाहर ड्यूटी पर बैठ गए हैं। खीझकर चिल्लाने वाले थे कि उनकी शक्ल देखकर संभावित विस्फोट उन सालों की बहन को समझ आ गया। लक्षण जीजी के चेहरे पर दिखने लगे और तब जाकर सालों ने कमरा छोड़ा। इस समय अपने ये साले जीजाजी को महादेव की बारात के बाराती लग रहे थे।

फिलहाल बारात नाचते गाते पहुंच चुकी थी। बारात का जोरदार स्वागत चल ही रहा था।
नारियल, माला, लिफाफे बांटे जा रहे थे। गले मिलने वाली औपचारिकताएं चल रही थीं। डीजे की ढिंचक-ढिंचक धड़क-धम के बीच में मंगल गान चल रहा था। कि अचानक डीजे का ट्रक खुद नाचने लगा और ढलान से लुढ़ककर एक घर में घुस गया।

अब दो समारोह साथ में चल रहे थे। एक तरफ बारात का स्वागत और दूसरी तरफ डीजे ट्रक ने जो बाउंड्री तोड़ी थी उसका निरीक्षण। कौतूहल का विषय दूल्हा नहीं डीजे का ट्रक अधिक था।
फिर भी भाईसाहब और उनके मित्र दूल्हे को गोद में उठाकर मंच पर ले ही आए। ताकि दूल्हा जाकर डीजे ट्रक को न देखने लगे। जीजाजी दर्शक बने थे। उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया कि उनके विवाह में महादेव की इस सेना से उनका पाला नहीं पड़ा। अन्यथा इन शिवगणों ने दो चार बार तो उठाकर पटक ही दिया होता।

बाद में पता चला कि डीजे कांड बाबू का किया धरा था। डीजे ट्रकवाले ने टायर के नीचे एक टेक लगाने को कहा था। कोई न मिला तो बाबू से कह दिया। बाबू को कुछ न मिला तो छोटी सी ईंट लाकर ट्रक के नीचे फंसा दी। डीजे वाला आश्वस्त हो गया, और बिना गियर डाले, न्यूट्रल में छोड़कर ट्रक से उतर गया। किसी गाने की ढिंचक ढिंचक में ईंट का चूरा हो गया और ट्रक चल पड़ा।

जीजाजी की संभावित सरहज ने फिर कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।
खैर ट्रक का कार्यक्रम उधर चल रहा था, इधर वरमाला का समय (भारतीय रेल के समय अनुसार) चार घंटे देर से सही, हो गया था। दुल्हन को स्टेज पर लाने की तैयारी की जा रही थी। दुल्हन बाहर खड़ी थी, दूल्हा मंच पर विराजमान था। दुल्हन चाहती थी कि उसके भाई एक चुन्नी उसके सर के ऊपर पकड़ कर चलें, लेकिन चुन्नी नहीं मिल रही थी। समय निकल रहा था। जीजाजी की संभावित सरहज ने अपनी एक सहेली की चुन्नी मांगी और उपयोग करने के लिए दे दी यह कहते हुए कि मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।

दुल्हन अपनी टीम के साथ अपने मिशन पर निकली। फिर भी कुछ कमी थी। किसी को कमी समझ नहीं आ रही थी। मिशन चल रहा था। दुल्हन स्टेज पर पहुंच चुकी थी। दूल्हा दुल्हन आमने सामने खड़े थे। तभी किसी को समझ आया कमी कहां थीं। इस अवसर का मुख्य आकर्षण,वरमाला गायब थी। वरमाला मंचन होना था और दुल्हन हाथ में बिना वरमाला लिए स्टेज पर खड़ी थी। रात के ग्यारह बज रहे थे।इस समय फूल वाला मिलना मुश्किल था। जीजाजी सजावट के फूलों से माला बनवाने की योजना बनाने लगे थे। अचानक माला मिल गई। आम शादियों में दुल्हन से ज्यादा सजी धजी सुंदर लड़कियां, थाल में वरमाला लेकर आती हैं। यहां केशविहीन अधेड़ गुड्डू भैया हाथ में अखबार में लिपटी हुई वरमाला लेकर पहुंचे।

संभावित सरहज ने फिर कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है। मंडप में यह वाक्य कहने के अनेक अवसर उन्हें मिले। उन्होंने मौका न छोड़ते हुए हर बार कहा।
पंडित जी ने दूल्हा दुल्हन को वचन दिलाए, जीजाजी ने अपने साले और संभावित सरहज से भी वचन सुन लेने का इशारा किया। कहने लगे अभी मौका है इसी मंडप में निपट लो, वरना भाईसाहब पर आजकल पांच बच्चों के बाप बाबू डोरे डाल रहे हैं। दोनों ने इग्नोराय नमः कहते हुए बगलें झांकी।

पंडित जी ने भी वर वधु को आशीर्वाद दिलवाते हुए अपना भाषण समाप्त किया सब ने महावीर भगवान का जयकारा करते हुए विवाह संपन्न होने की घोषणा की।