शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

लघु कथा - कर्जा माफ़


धरमपाल के लड़के ने इस साल इंजीनियरिंग कालेज मे दाखिला ले लिया था, फीस की एक किश्त तो कैसे भी भर दी लेकिन आगे का जुगाड़ करना कठिन था।
नया कालेज गाँव के पास ही बने फोरलेन हाइवे पर खुला था, सो लड़का घर मे ही रहकर पढ़ाई करने वाला था।  लेकिन पढाई की जरूरतों ने घर का बजट बिगाड़ रखा था।  एक पेट्रोल पम्प पर चपरासी का काम करते करते तो पच्चीस साल हो गये थे लेकिन इतना पैसा जुड़ा नही था की ये सब खर्चा एकदम से उठा ले। 
सोच रहा था कि पिछले साल से सरकारी दफ्तरों की तरह जो पी.एफ. जमा होना शुरू हुआ है , वो कुछ साल पहले शुरू हुआ होता तो आज उससे ही सारी जुगाड़ हो जाती।   
बैंक से कर्ज लेने के लिए लड़का बार बार कह रहा था । लेकिन कर्ज का ब्याज बहुत ज़्यादा होता है. चुकाना दुष्कर होगा और लड़के पर जीवन शुरू होने से पहले कर्ज लाद देने को उसका मन गवाही नहीं देता था। गुस्सा तो उसके मन में इस बात का भी था कि उसके मित्र नब्बू का बेटा भी उसी कालेज में जा रहा था और उसकी कोई फीस नहीं लगती थी, गरीब तो वो भी था ।
लेकिन जो है सो है , जुगाड़ तो करना ही है , आखिर लड़के का भविष्य भी तो बनाना है। 
तभी एक गाड़ी प्रचार करते हुए निकली - हमारी सरकार आएगी तो सबका कर्जा माफ़ किया जाएगा। कृषकों का कर्जा माफ़ किया जाएगा , हमे जिताइये, कृषकों की सरकार बनाइए।
फिर एक नेता जैसा टोपी कुर्ते वाला आदमी उसके सामने रुका, झुक कर प्रणाम किया और बोला -
"चाचा हमको वोट जरूर देना, इस बार अपनी सरकार बनेगी जो आपकी जरूरतों को पूरा करेगी।  "
"बेटा हो कौन तुम ? "
"मैं पूर्व विधायक लखन सिंह का बेटा रतन सिंह, इस बार आपके क्षेत्र से विधायक के चुनाव मे खड़ा हुआ हूँ। पिताजी को तो आप जाते ही हैं, वो सांसद का चुनाव लडे थे इस बार।  "
"अच्छा तो क्या ये कर्जा माफ़ करने वाली बात सच है ?"
"सौ प्रतिशत सच है काका, हमारी सरकार बनी तो सबका कर्जा माफ़. "
अब धरमपाल के दिमाग़ मे कुछ कुटिल विचार आया, बोला -"और जिसने न ले रखा हो कर्जा  उसका क्या?"
"जिसने न लिया हो तो ले ले, हम तो सबका माफ़ करवाएँगे, रतन सिंग ने कहा"
धरमपाल के कहा - "फिर तो तुम्हे कोई न हरा सकेगा बेटा हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है"
और रतन सिंह राम राम कर के आगे निकल गया। 
उसे जाते देखकर धरमपाल के मन मे विचार आया -देखो तो कितना बड़ा और समझदार हो गया, थोड़ा मुटा गया है पहचान में भी नहीं आता , कल की ही बात लगती है जब लड़कियों के दुपट्टे खींचते हुए पकड़ा गया था , और जनता ने खूब धुनाई की थी। उसपर विधायक जी ने चार पुलिस वालों का तबादला भी करवा दिया था । वो तो दो बार से विधायक जी हार रहे हैं , नहीं तो नाम बजता था इनका।  खैर वो पुरानी बात हैं, उम्र के साथ समझदारी आ ही जाती है। 

धरमपाल की आँखों मे एक नई चमक थी, सरकारी दस्तावेज़ों मे वह भी एक पंजीकृत किसान था। उसकी माँ के नाम पर थोड़ी बहुत  जमीन थी, जिसपर किसी किसी साल कोई भाई खेती करता, कभी आजू बाजू वाले किसानो को निश्चित आनाज के बदले खेती करने दे दिया जाता। 
किसानों का बैंक से कर्ज लेना उतनी ही आम बात है जितना शहरों के लोगों के पास क्रेडिट कार्ड होना, पिछली सरकार जब बनी थी तो कृषि पर कर्ज का ब्याज बहुत कम कर दिया था, और कर्ज लेने की प्रक्रिया को भी बहुत आसान कर दिया था। 
धरमपाल के दिमाग़ मे एक खुराफाती विचार आया, उसने सोचा क्यों न अपनी जमीन पर कृषि के लिए बैंक से कर्ज लेकर, अभी अपनी सब जरूरतें पूरी कर ली जाएँ। 
जब सरकार सब कर्ज माफ कर ही रही है तो ये भी हो ही जाएगा जरूरत भी तो केवल एक लाख की ही है। दो लाख ले लिया जाए और उसने ऋण के लिए आवेदन डाल दिया हफ्ते भर मे पैसा उसके खाते मे था उसकी तत्कालीन आवश्यकताएँ तो पूरी हो ही गयीं।
लड़के को कम्प्यूटर भी दिला दिया गया।  अब वो आते जाते उस पार्टी का प्रचार कर ही देता जिसने कर्ज माफ करने का वादा किया था।  अब तक गाँव मे जो किसान अपना कर्ज वापस कर रहे थे उन्होने बैंक खाते खाली कर लिए और कर्ज का पैसा वापस करना छोड़ दिया। वे कहते नजर आते पाँच चाह महीने की बात है उसके बाद सबका कर्जा माफ होना ही है तो फिर काहे को पैसे दें ?
सबको एक उम्मीद थी कि सबके बुरे दिन अब लद गये हैं , आखिर वो सरकार उनकी बन ही गयी जिसकी प्रतीक्षा धरमपाल को थी।  दो दिन बाद टीवी पर देखा - किसानो का कर्जा माफ कर दिया था सरकार ने, लेकिन पिछले साल तक का । इस साल जिसने कर्ज लिया उसको कोई लाभ नही मिलेगा और न जाने क्या क्या शर्तें थी। 
धरमपाल सर पकड़ कर बैठा गया, जैसे जुए मे बड़ी रकम हार गया हो। फिर खेत की ओर चल दिया यह अनुमान लगाने की इस बार कितनी फसल की उम्मीद है।
मन में एक ही बात चल रही थी - बुरे फंस गए मुफ्त के चक्कर में 

शनिवार, 17 नवंबर 2018

बुद्धिजीवियों का आतंक


बुद्धिजीवियों का आतंक बहुत है । ये अखबारों में छपते हैं ,किताबों में बिकते हैं, मंचों पर दिखते हैं ,अनर्गल बकते हैं और लोगों के सर में फोड़े जैसे दुखते हैं । उन्होंने स्वयं को दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ तक फैला दिया है। 
हर बुद्धिजीवी को लगता है वह आसमान में उड़ता हुआ गिद्ध है,और उसे ऊपर से सबकुछ दिख रहा है। लेकिन हैं तो गिद्ध ही, फिर वह अपना स्वभाव कैसे त्याग सकता है, अतः बुद्धिजीवी अवसर देखकर टूट पड़ने को सदैव आतुर रहते है। 

बुद्धिजीवी हैं तो सोचना और विचार करना इनकी आत्मा में समाया हुआ है , और इसी सोचने और विचार करने में विचारधाराओं से जुड़ जाना स्वाभाविक है। और इसी के चलते बुद्धिजीवी मूलतः दाएं और बाएं वाले हो गए हैं । 

जो दाएं वाले हैं बड़ी दुविधा में पड़े रहते हैं उनकी समस्या उनके ही नेताओं की हरकते हैं, जिनका समर्थन ये करते हैं । जितना आदर्शवादी दायीं तरफ के नेताओं को होना चाहिए उतने रह नहीं गए हैं। दरसल यह नागपुर के संतरों के बीच मौसमी, नीम्बू और खटुआ जैसों का संतरा बनकर बैठ जाने का नतीजा है। अंततः होता यह है कि दाएं वाले बुद्धिजीवी कलम के सिपाही बनकर जो विचार व्यक्त करते हैं उसे कमल का सिपाही समझ लिया जाता है। बड़ी महीन झिल्ली है कलम का सिपाही और कमल के सिपाही हो जाने में, लेकिन दाएं वाले अपनी विचारधारा के समर्थन में अगर कुछ भी कहते सुनते हैं तो वह भक्ति गीत ही कहलाता है , ऐसा बाएं वाले बुद्धिजीवियों का मत हैं।  

उनका मत तो यह भी है कि जो कुछ सत्ता के विरोध में कहा जायेगा केवल वही व्यंग्य कहलाने का अधिकार रखता है अन्यथा नहीं । तो जो वामपंथ वाले कहते और करते हैं वह क्रन्तिकारी विचार माना जाना चाहिए और जो दायीं तरफ वाले कहते और करते हैं उसे आप चरणवंदना या भक्ति गान या दलगत आस्था की श्रेणी में रख सकते हैं।  

जो बाएं वाले  है, इनका वर्चस्व ऐसा फैला हुआ है कि कोई इनकी बात को काट दे तो अपराध गंभीर ही माना जाता है, अपितु इनके छू करने मात्र से ट्विटर के मठाधीश किसी का भी खाता बंद कर सकते हैं । 

तथाकथित बाएं वाले बुद्धिजीवी वामपंथ पर चलते हुए बहुत आगे निकल गए और उन्होंने अपने आप को भी बाएँ से दाएँ तक फैला दिया। इनका वर्चस्व ऐसा फैला कि पत्रकार, चित्रकार, कलाकार बनकर व्यभिचार भी करते तो समाचार न बनता । 
न्यायाधीश, सत्ताधीश, मठाधीश बनकर अनाचार भी करते तो भी इनके विरोध का कोई आधार न बनता । यही नेता अभिनेता छात्र बनकर लोगों को मूर्ख बनाते घूमते और लोग आखों पर पट्टी बाँधे हुए हाय हुक्कु हाय हुक्कु करते हुए इनके पीछे चल पड़ते।  

राजशाहों के राज में पहले बुद्धिजीवी सत्ता का अंग बने, फिर सत्ता का रंग बने और तीसरी पीढ़ी तक सत्ता का ढंग बन गए । एक प्रकार से स्वयं ही सत्ता, स्वयं ही सत्ताधारी हो गए । इनका अपना गुट बना और केवल अपने गुट द्वारा , गुट के स्वार्थ के लिए शासन ही इनका उद्देश्य रह गया । 

एक समय अखबारों पर कब्ज़ा जमा चुके बुद्धिजीवी कॉफी हाउस से पब और कब पब से बार में पहुंच कर गंभीर चर्चा से दारु का खर्चा पर बहस करते और हिन्दू हिंदी हिन्दुस्तान को गाली देते हुए बेशर्मी के ठहाके लगाते । 
दरसल एक भारत की परिकल्पना से कांप उठने वाले ब्रेनवाश्ड बुद्धिजीवी, उसी परम्परा से उपजे हैं जिस परंपरा ने संयुक्त हिन्दू परिवारों में 'छोटा परिवार सुखी परिवार' के नारे का नींबू मिर्च डालते हुए पहले घर में ज्यादा बच्चों को समस्या बताया और फिर पश्चिम की हवा ने माता पिता को ही बोझ बना दिया और अंततः परिवार छोटा करने के नाम पर माता पिता को ही परिवार से अलग कर दिया। 

कुल मिला कर एक रहना इनके स्वाभाव मे ही नही है, असली ब्रेनवाश्ड बुद्धिजीवी वह है जो गर्व से सर उठा के कह सके कि जो कुछ माता पिता ने हमारे लिए किया है वा उनका कर्तव्य था, अपने कर्तव्यपालन के अलावा उन्होने हमारे लिए किया क्या हैं और यह कहते हुए अपने माता पिता को दुत्कार दे। 

इसी प्रकार के बुद्धिजीवी मातृभूमि को भूमि मात्र समझकर टुकड़े टुकड़े का राग अलापते हैं। 

जो बाएं वाले लिबरल बुद्धिजीवी हैं, वे कब वामपंथ पर चलते चलते कामपन्थ पर निकल जाते हैं उन्हें खुद आभास नहीं होता। चाहे तो दिल्ली का हस्ताक्षर देख लीजिये । जो वामपंथ के लिबरल बुद्धिजीवी सारे देश में करना चाहते हैं उसका नमूना दिल्ली की शान बताये गए सिग्नेचर ब्रिज पर देखने को मिला है।   

ऐसा नहीं है कि बुद्धिजीवी केवल दाएं और बाएं वाले है, एक बुद्धिजीवियों का एक नियो वर्ग भी देखा गया है, जिसे देश से तो प्रेम है लेकिन किसी और के विचारों की अभिव्यक्ति इनको पसंद नही आती। 
ये वैसे तो कतई नही है जैसे की पुराने वाले बुद्धिजीवी है लेकिन इनका मामला अलग ही तर्क पर चल रहा है। ये लेफ्ट वाली हवा खाते हुए राइट वालों पर फूंकते हैं । ये कुछ अत्यधिक पढ़े लिखे बुद्धिजीवी हैं, और तर्क के अर्क के अलावा कुछ और नहीं पीते । 

लेकिन राईट लेफ्ट करते हुए अपने को निष्पक्ष कहते हैं और सामने वाले आदमी को कोसने का अधिकार समझते हैं ।  इनकी अपनी हाहाकार सेना है । जो किसी भी बात पर कभी भी कैसे भी किसी के खिलाफ भी हाहाकार मचा सकती है ।

हाहाकार सेना को त्यौहार में भी राजनीति दिखती है और राजनीति में भी त्यौहार । इनके हिसाब से अगर कोई उसका समर्थक है जिसके वो विरोधी हैं तो वह घोर चाटुकार है और अगर कोई उसका विरोधी है जिसके वो समर्थक हैं तो वह घोर पक्षपाती है।  

दरअसल हाहाकार सेना को आशा के सन्देश का इंतज़ार है जो उन्हें मिल नहीं रहा ,और फिर खुद की निराशा को दूसरों पर लच्छेदार बातों में लपेटकर दूसरों पर थोपना इनको अच्छी तरह से आता है ।
हाहाकार सेना के सेनापति के अनुसार छाछ न दही जो वो कहें बात बस वही सही । इसलिए जो सही है वो छी छी है, और जो सही नही है वो तो सही हो ही कैसे सकता है । 
हाहाकार सेना का आधार ही विरोध पर टिका है और ये किसी भी बात का कभी भी कैसे भी विरोध कर सकते हैं ,क्योंकि विरोध करना ही है। हाहाकार सेना के हिसाब से आदमी को हर बात पर हाहाकार करना ही चाहिए क्योंकि सकारात्मक तो कुछ हो ही नहीं सकता, इन्हे नकारात्मकता हर जगह, हर आदमी में दिख सकती है।  
इनकी अपेक्षा सौ प्रतिशत है , जो बच्चा सौ प्रतिशत नहीं ला सकता है वह जीकर क्या करेगा । हालाँकि बहुत तगडी प्रतियोगिता का दौर है सो गलत तो नहीं है।

आमतौर पर हर बुद्धिजीवी के रंग ढंग निराले हैं। बुद्धिजीवी पहले आवाज़ और शब्दों में चाशनी घोलते हुए ऐसे बातें करते हैं जैसे इनसे बड़ा ज्ञानी और मृदुभाषी कोई है ही नहीं । सामने वाले को अपनी भाषा में उलझाते हुए ये श्रेष्ठ होने का प्रमाण देते हैं । 
कोई भाषा में न फंसे तब मुल्ला नसरुद्दीन वाले तर्क और मुल्ला अजहरुद्दीन वाले आंकडों से सामने वाले को चुप कराते हैं और अगर फिर भी बात न बने तो पहले तो अपनी तारीफ में बाईस सौ किस्से सुनाते हुए सामने वाले को नीचा दिखाते हैं, और फिर भी बात न बने तो रिश्तेदारी निकालने लगते हैं ।
जब रिश्तेदारी करीबी हो जाती है और अहसास होता है कि अब मामला बिगड़ गया है तो चुपचाप निकल लेते हैं।

तर्क कम पड़ने या ग़लत साबित होने पर भाषा की मर्यादा का नाप लेते हैं , फिर उसी नाप के अनुसार मर्यादा के ऊपर से, उससे बड़ी वाली छलाँग लगाते हैं।  
भाषा की मर्यादा की दुहाई देकर किसी के तर्क को नकार देना इनका गुप्त हथियार ही है।  
जब ये किसी को कमलगट्टा, भक्त , चाटुकार, चड्डी छाप, हिंदी मीडियम आदि कहते हुए उपहास करते हैं तो इसे भाषा की शालीनता मान लेने मे ही भलाई है है।  ये उनके हिसाब से शालीन भाषा में दिया गया आशीर्वाद ही है। 
प्रत्युत्तर में किसी को अपिया, पिद्दी आदि कह देना घोर अपराध माना जाता है। बुद्धिजीवी को उत्तर देने वाला जाहिल गँवार,असभ्य और अमर्यादित कहा जा सकता है।   

बुद्धिजीवियों की कमी नहीं थी, लेकिन कुछ लोगों ने बुद्धिजीवी बन जाना इसलिए स्वीकार किया कि फोन में ट्विटर था और दिन का एक जीबी था।  इन्हे एक जीबी वाला बुद्धिजीवी कहा जा सकता हैं। ये एक जीबी वाले ही हैं जिन्होंने भाषा का आतंक मचाया हुआ है। अगर दाएं और बाएं वाले आपस में (क्षद्म) सभ्यता से बात कर भी रहे हों तो ये अपनी १०२४ गज लम्बी उँगलियों से (दिमाग और जबान से तो ऐसे शब्द कहे भी नहीं जा सकते ) ऐसा कुछ लिख देते हैं कि मामला कहीं से कहीं पहुँच जाता हैं।

जब से सोशल मीडिया आया है, उसने बुद्धिजीवियों की कलई खोलकर रख दी है।  धीरे धीरे लोगों को यह समझ आने लगा कि ये जो बुद्धिजीवी हैं वही देश को असली चूना लगाने वाले पुतइये हैं। जो अपने मालिकों के काले कारनामो को तरह तरह के चूने से पोत कर सफ़ेद करते रहे हैं।  
जब तक बुद्धिजीवियों की बुद्धि मे यह बात आती तब तक उनके अख़बार समोसे रखने के और टीवी बिग बॉस आदि की भेंट चढ़ चुका था। 
टीवी पर खुद को सेलिब्रिटी या फिर यूँ कहिये "कभी कभी अपुन को लगता है अपुन ही देश की सरकार  है" समझने वाले न्यूज़ का जूस निकालते फिर रहे हैं।  
हालाँकि उन्होंने हमेशा से न्यूज़ का जूस ही निकाला है और अपने मालिकों के लिए प्रयोग किया है, जनता को हमेशा से न्यूज़ का छिलका देखने ही मिला है , न्यूज़ का गूदा तो कभी दिखाया ही नहीं गया ।
इसीलिए तो कभी अखबारों में चाव से पढ़े जाने वाले बड़े बड़े नाम तारों पर झूलते हुए पांच रुपया -सात रुपया मांगते फिर रहे हैं।

लेकिन अब जब जागे तो बुद्धिजीवियों ने सोशल मीडीया पर भी कब्जा जमाना शुरू कर दिया, ऐसा नहीं कि ये यहाँ ज्यादा प्रभावी हो गए हों, लेकिन अपने प्रभाव और अलग अलग जगह बैठाये हुए प्यादों के दम पर एक क्षद्म दमनकारी युद्ध छेड़ कर दूसरे विचारों का दमन करना प्रारम्भ कर दिया गया  है । 

अब सोशल मीडिया भी उन्हीं बुद्धिजीवियों के पाचनतंत्र का अंतिम छोर बनकर रह गया है और बुद्धिजीवियों की नयी प्रयोगशाला के रूप में स्थापित होने लगा है।  


रविवार, 7 अक्टूबर 2018

ठेके पर सरकार


नहीं सरकार उस ठेके पर नहीं है जिसकी कल्पना आपके मन में हिलोर लेकर बैठ गई है ।

लोकतंत्र एक विचित्र स्थिति में पहुंच चुका है वर्षों से सरकार बनती कम गिरती ज्यादा है , सरकार कब बनती है कब गिरती है पता ही नहीं चलता । सरकार कभी भी किसी भी कारण से गिर सकती है ।
कभी प्याज - कभी पेट्रोल , कभी इसबगोल  किसी भी वस्तु की कीमत घटने बढ़ने पर सरकार गिर जाती है, एक बार तो सरकार इसलिए गिर गई कि बहुत दिन से चल रही थी।  चल तो ठीक रही थी लेकिन लोगों को लगा बहुत दिन हुए चल रही है चलो गिरा दें। 
इस तरह गिरती पड़ती सरकारों से लोग परेशान हो गए क्योंकि गिरती हुई सरकारों मे जो भी सत्ता मे आता कोई न कोई गिरा हुआ काम करके ही जाता।

ऐसे में देश के युवा नेता छगनलाल जी के मन मे एक विचित्र भाव उत्पन्न हुआ वे  क्रोधित भी थे और अवसाद ग्रस्त भी। वे सदैव से नोटा सरकार चाहते थे, लेकिन उनके व्यापक प्रचार के बाद भी कभी नोटा की सरकार नही बन पाई, हालाँकि चुनावों मे विचित्र परिणाम आते रहे।

एक बार चुनाव का समय था, उनके एक अनुयायी ने प्रश्न किया -

हे परम पूज्य छगनलाल जी , मैं अब किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ, हम नोटा का बटन दबाते ही क्यों हैं, जब नोटा से राष्ट्र की राजनीति मे अस्थिरता आती है?
क्यों न किसी अन्य का पक्ष लेकर कम से कम अपने मत की वैद्यता तो बना कर रखें।
परिणाम एक ओर झुके हुए तो दिखेंगे, और जिसे मत दिया है उसे जिम्मेदार मानते हुए उसे धिक्कार कर अन्य को चुने जाने का अवसर तो देंगे। अगर कोई विकल्प नही ठीक लगता तो स्वयं ही विकल्प बन कर उपस्थित क्यों नही हो जाते ?

तब शांत भाव से महापुरुष ने कहा -

मैं तुम्हें एक जंतर देता हूँ । जब भी तुम्हें संदेह हो या कोई नेता सत्ता पर कायम दिखने होने लगे और तुम्हारी शर्तों पर काम न करे, तो यह कसौटी आजमाओ :
जो सबसे  घाघ नेता तुमने  प्रत्याशियों की सूची मे देखा हो, उसकी शकल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो सरकार बनाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस नेता के लिए कितना उपयोगी होगा । क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? 
क्या उससे वह अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा और लालच पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्या उससे उन सत्ता के भूखों को राज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ?
तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त हो रहा है । और तुम फिर नोटा ही दबाओगे।  

किंतु इसमे उस नेता के प्रति तो कोई विचार है ही नही जो शायद बहुत नही तो कुछ काम तो कर सकने की क्षमता रखता हो? अनुयायी ने प्रश्न किया।

मेरे जंतर पर भी प्रश्न उठाते हो, तुम अवश्य ही उस नेता के ही चमचे , गट्टे और अंध-भक्त हो।  अगर वह सौ प्रतिशत तुम्हारी शर्तों को न माने तब वह चुने जाने लायक नही है।
नेता को दुग्धस्नान कर युधिष्ठिर की तरह सत्यवादी और धर्म पर चलने वाला होना चाहिए, उसने अगर कुछ करने को कहा है तो तत्क्षण करना चाहिए, उसके वचन पूर्ण होने में विलम्ब होना भी तुम्हारे साथ अन्याय है मूर्ख।
अतः एक ही विकल्प नोटा के सिद्धांत पर कार्य करो।  स्वयं मठाधीश न बनो।

अनुयायी ने कहा -किंतु इससे क्या लाभ होगा? केवल चुनाव के परिणाम गणना होने तक रहस्यमय बने रहेंगे।  उसके पश्चात किसी एक अनिश्चित , किंचित अयोग्य  प्रत्याशी को विजय तो मिलनी तय ही है।

छगनलाल उवाच - वही तो हम चाहते हैं, किसी को अंत तक पता न रहे कि कौन विजयी होगा, अतः जो निश्चित विजय देखते हैं उनके मन में संदेह बना रहे।  भ्रान्तिः परमो धर्मः के सिद्धांत पर चलो और भ्रान्ति का प्रचार करो।

कई वर्षों के पश्चात गिरती पड़ती सरकारों के बीच राष्ट्र का विभाजन हुआ और जिसको जो हिस्सा मिला या समझ मे आया उसने अपने आपको वहाँ का मालिक, सम्राट और नवाब घोषित कर दिया।  केवल याचक जी की याचिका अभी तक लंबित है, जिसके अनुसार उन्होने अपना अलग याचिकापुर माँगा है।

जब सब अपना अपना हिस्सा जाति, धर्म, भाषा, भूसा, चारा आदि किसी भी हिसाब से बाँट रहे थे तब छगनलाल जी ने अथक प्रयासों से इस राष्ट्र का निर्माण करवाया नोटा के महान सिद्धांत पर और वे उसके राष्ट्रपिता कहलाए।
उत्तर मे मुफ़्तिस्तान, पूर्व मे यादविस्तान, दक्षिण मे मूलीस्तान, और पश्चिम मे जीजापुर नामक राज्यों के बीच मे बसा हुआ यह नोटालैंड है ।

फिलहाल अभी वर्ष २०५९ चल रहा है । लोकतंत्र तंत्रलोक गया है । इस देश के सभी निवासी केवल नोटा पर वोट देते हैं। कोई नेता इन्हें कभी भरोसे लायक लगा ही नहीं , सो हर बार ये केवल मिल जुलकर नोटा दबा देते।  इसीके चलते इनके देश में सरकार लोकतंत्र से नहीं नोटतंत्र से चलती है । यहाँ सरकार चुनी नहीं जाती ठेका दिया जाता है।
यहाँ के निवासी चुनाव नहीं करवाते बल्कि विज्ञापन के जरिये एक निश्चित प्रारूप में निविदाएं आमंत्रित करते हैं । प्रारूप अमूमन एक सा ही होता है, और जो उस प्रारूप में ठीक बैठता है और नियमों के अनुसार सरकार चला सकता है उसे निश्चित अवधि के लिए ठेका दे दिया जाता है ।
चाहे वह सनीचर हो या निशाचर ठेका कोई भी ले सकता है । इस बार उत्सुक लाल निविदा के नियम तय कर रहे थे ।

सोच रहे थे कि क्या लिखें जिससे कोई सरकार चलाने वाला भी मिल जाए और उनकी जेब भी बनी रहे । पड़ोस के देश मुफ्तिस्तान में लोग सब कुछ मुफ़्त होने का लुत्फ़ उठा रहे थे , वहाँ के मालिक ने सबको सबकुछ मुफ़्त देते थे । हालाँकि मुफ्तिस्तान में कोई भी अपना नागरिक नहीं था , केवल इधर उधर के मुफ़्त के चक्कर में पड़े रहते थे ।

उत्सुक लाल के विचार में ठेका इस बार कुछ कुछ मुफ्तिस्तान जैसे मालिक को ही मिलना चाहिए । फादर ऑफ नोटालैंड छगनलाल जी के दिखाए गये रास्ते और तय किए गये मानदंडों के अनुसार शर्तें तो लिखनी ही थी औ लिखनी शुरू की -

नोटालैंड के निवासी अगले एक साल के लिए सरकार चलाने हेतु निश्चित प्रारूप में इस विज्ञापन के प्रकाशित होने के सात दिन के अंदर आवेदन आमंत्रित करते हैं । इच्छुक व्यक्ति या पार्टियाँ या कम्पनियाँ दिए गए प्रारूप में आवेदन करें । सभी शर्तों का मानना आवश्यक है ।
सरकार आप अपनी मर्जी से कैसे भी चला सकते हैं इसमें नोटालैंड के वासियों को कोई आपत्ति नहीं है । केवल निम्नलिखित शर्तों का पालन आवश्यक है -

पेट्रोल शासन अवधि में किसी भी कीमत पर बीस रूपये से अधिक महंगा नहीं बेचा जा सकेगा । रुपया की कीमत 50डॉलर पर स्थिर रखनी होगी । इससे अधिक कीमत बढ़ाने पर अमेरिका को भारी नुकसान हो सकता है। 
प्याज  और आनाज़ की कीमत किसान को 15रुपये प्रति किलो दी जायेगी और जनता को वही 12 रूपये के भाव से सरकार बेचेगी ।
सरकार को यह बताना होगा कि अगले दो वर्षों में वह किन किन परियोजनाओं पर कार्य करेगी और कितना पूरा कर सकेगी । पूरा न कर सकने की स्थिति में , कितना जुर्माना सरकार पर लगाया जाएगा ।
देश में किसी पर किसी प्रकार का कर नहीं लगाया जाएगा । कर लगाना दंडनीय अपराध होगा।  उल्टा सरकार को नागरिक की कमाई पर बीस प्रतिशत बोनस भुगतान नागरिकों को देना होगा ताकि नागरिकों का जीवन सुखमय हो सके। आखिर दाल रोटी ही जीवन में सब कुछ नहीं है।  
वैसे तो सरकार सभी उद्योगपतियों को जेल में ठूंस लेगी।  लेकिन अगर कोई बच गया तो उद्योगपतियों को लाभ कमाने का अवसर नहीं दिया जाएगा ।  उद्योगपति जेब से पैसा लगा सकते हैं किन्तु लाभ की इच्छा न करें । 
सरकार को पहले से बताना होगा देश मे कितनी बाढ़, सूखा या बरसात आएगी. और उसका खर्चा अपनी जेब से देना होगा।  इन सभी शर्तों को मान सकने वाला जो भी पक्ष इच्छुक हो वह आवेदन करे। 

इन शर्तो को लिखने ने पश्चात उत्सुक लाल ने मन ही मन छगनलाल जी को प्रणाम किया और विज्ञापन छपने के लिए अखबार में भेज दिया और इस प्रकार नोटालैंड मे सरकार चलाने का  ठेका देने के लिए प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। 

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

एक सरोवर की कथा - टर्र

एक विशाल सरोवर के निर्मल जल में नाना प्रकार के जलचर विहार करते थे । सरोवर सदैव जल से युक्त रहता जिसमे प्रचुर मात्रा में वनस्पति सभी प्राणियों का भरण पोषण करती थी । कहीं से कोई भी प्राणी सरोवर में आकर रहने लगता और सरोवर में इतनी सम्पन्नता थी कि किसी प्राणी को किसी  जाने से कोई आपत्ति नहीं होती । हम रहते हैं तो तुम भी रहो हम खाते हैं तो तुम भी खाओ । इस प्रकार सरोवर में सभी प्राणियों में घनिष्टता रहती थी ।


एक समय भयानक अकाल पड़ा सरोवर सूखना आरम्भ हो गया । जल एवं वनस्पति की कमी से सभी प्रजातियों के प्राणियों पर भीषण कष्ट आया। 

वीभत्स परिस्थितियों में प्राणी हाहाकार कर रहे थे, जल सूखता और मलिन पंक विस्तार पाता हुआ प्राणियों का भक्षण करता ।

एक दिन अचानक श्रावण मास में घनघोर घटा छाई और उस मृतप्रायः से सरोवर के जीव वृष्टि की आशा से आनंद विभोर हो क्रीड़ा करने लगे ।

प्राणियों में मण्डूक और पंडूक नाम के दो मेंढक थे, जो घनिष्ट मित्र थे ।

मण्डूक ने पंडूक से कहा - टर्र ! अकाल ख़त्म हुआ तो सरोवर में जल आएगा और हम आम जलचर रह जायेंगे । कुछ करो कि हम दोनों का राज इस स्थान पर बना रहे ।

इधर से पण्डूक ने भी सोचा मण्डूक एक भाग ले भी जाए तो बाकी सरोवर की सत्ता हमारी, इसलिए उसने भी हाँ में हाँ मिलाई । और बोला हाँ हाँ , बंटवारा जरूरी है ताकि हम दोनों को राज करने का बराबर मौका मिल सके । फिर मण्डूक और पण्डूक ने आपस में फैसला कर के सरोवर का बंटवारा कर दिया । अब बारी थी बाकी प्राणियों को खबर देने और अपनी अपनी तरफ लाने की ।

मण्डूक बड़ा ही हरा मेंढक था, वह जलचरों को भड़काने लगा यही मौका है हमें सरोवर में अपना अधिकार मांग लेना चाहिए । ये जलचर वाणी विहीन हैं, किन्तु हम तो टर्राना जानते हैं । हम सरोवर का एक भाग मांगते हैं, वहाँ केवल हम ही रहेंगे और उस भाग का नाम मण्डूकिस्तान  होगा । सभी जीवों ने समझाया कि नहीं भाई सब मिल जुल कर सरोवर में रहते हैं यह व्यर्थ बंटवारा क्यों चाहते हो?

लेकिन मण्डूक न माना और आखिरकार सरोवर के मध्य में एक रेखा खीच दी गयी । जलचर इधर से उधर हो गए । जितने मेंढक थे कूद कर मण्डूकिस्तान में चले गए । सरोवर के दोनों और लोकतंत्र कायम हुआ ।



सभी मण्डूकिस्तानियों को शिक्षा के नाम पर पढ़ाया गया कि दुनिया में केवल मेंढक रहते है और यह कीचड ही सारी दुनिया है । कुछ पीढ़ियां बीतने के बाद अधिक समय नहीं लगा सभी मण्डूकों को कूपमण्डूक बनने में । अब उनके लिए उस कीचड से बाहर कुछ भी सोच पाना संभव न था । वे वही सोचते और वही फैलाते ।



जब बहुत समय व्यतीत हो गया तब मण्डूकिस्तान से अन्य सभी जीव समाप्त कर दिए गए । जो अन्य जीव बचे भी थे उन्हें मेंढक की तरह रहना सिखा दिया गया । जो जितना ज्यादा टर्र करता था वह उतना बड़ा मेंढक कहलाता और जी मेंढक टर्र नहीं करता था उसके पास दो ही विकल्प थे , या तो वो टर्र बोले या टें । ज्यादातर तो टें बोल गए बाकियों ने गूंगा मेंढक होने का फैसला कर लिया । वे रहते तो मेंढक की तरह लेकिन टर्र नहीं बोलते ।



मेंढक कभी जमीन पर कूदते कभी पानी में इस कूदा-फांदी में पानी बहार निकलता और मिटटी अंदर आती इससे कुछ ही वर्षों में कीचड बन गया । मेंढकों को तो कीचड भी अत्यंत प्रिय था सो वे और अधिक आनंद में रहते ।



मण्डूकिस्तान के मेंढकों की एक बुरी आदत यह थी कि वहां के कीचड में सने कुछ मेंढक अक्सर सरोवर के इस ओर कूद आते और यहाँ के पानी में कीचड घोलने लगते । फिर इस तरफ के प्राणी उन्हें मार पीट के भगा देते । इसलिए दोनों और तनाव बना रहता। 



मण्डूकिस्तान में लोकतंत्र चरम पर रहता और सभी मेंढकों से वोट डलवाये जाते । प्रधानमण्डूक चुना जाता । फिर मौका मिलने पर उसे जेल में डाल दिया जाता । इस प्रक्रिया को जनरल इलेक्शन कहा जाता था । मण्डूकिस्तान में अक्सर जनरल इलेक्शन होते रहते ।



इस बार भी जनरल हुए इलेक्शन हुए और जनरल साहब ने एक लंबा चौड़ा अधेड़ उम्र का नौजवान मेंढक अपना प्रधानमण्डूक चुन लिया ।

मेंढक ने प्रधानमंत्री बनते ही कहा टर्र।  बाकी मेंढक टर्र टर्र कर उसका स्वागत करने लगे।

उधर नौजवान मेंढक के प्रधानमण्डूक बनते ही कुछ कूपमण्डूक उछल पड़े। उछले तो कुछ शेरी से शेरू बने मण्डूक भी थे और टर्रा टर्रा के कीचड़ में ही कूद गए ।



कुछ मेंढकियों की मेहर भी नए प्रधानमण्डूक पर हुई और वे बोलीं टर्र ! हाय कितने हैंडसम हैं हमारे मेंढक-ए-आजम ! जिनकी टर्र टर्र में टर्रूर टर्रूर होता था वे प्रधानमण्डूक पर सदके जा रही थीं।



एक बार की बात है नए नए प्रधानमंत्री बने हुए मेंढक हज़रत अपनी विदेशी मेंढकी के साथ मक्खियों के शिकार में मशगूल थे कि एक दरबारी मेंढक ने आकर कहा टर्र ! जनरल बजवा आये हैं ।

प्रधान मेंढक ने कहा टर्र ! कौन सी नई बात है जब भी सरोवर की तरफ जाते हैं बैंड बजवा कर ही आते हैं ।

दरबारी ने कहा नहीं उनका नाम ही कुछ ऐसा है। इसने में जनरल अंदर आ गए और बोले, क्या इसी रोज-ए-कयादत के लिए तुम्हें चुना था ? कुछ करो ऐसे ही मक्खियाँ न मारो । उस तरफ वालों ने सत्तर साल पहले बाँध बना लिए थे और तुम अभी तक चंदा ही माँग रहे हो ?



डांट पड़ी तो प्रधानमण्डूक को पिछले वाले मण्डूकशरीफ की याद आई । जनरल की मेहरबानी से आजकल मण्डूकशरीफ की तशरीफ़ जेल में रखी हुई थी ।



अब प्रधानमण्डूक को काम करना था सो सबसे पहले उन्होंने इकनॉमी पर ध्यान दिया । एक प्रैस कॉन्फ्रेंस बुलाई और बोले - टर्र । हम भैसों की नीलामी करके अपनी इकनॉमी मजबूत करेंगे।

एक पत्रकार मेंढक ने पूछा लेकिन फिर जिस काम के लिए भैंसे पाली गई थीं वह काम कौन करेगा ?

प्रधानमण्डूक बोले शौक तो बकरियों से भी पूरे हो सकते हैं । हम बकरियां पालेंगे क्योंकि - ईमानदार सरकार , टर्र ।

 

इकनॉमी सुधारने के लिए और भी कदम उठाये गए , मेंढकों की टीम को क्रिकेट खेलने भेजा गया । लेकिन वहाँ जाकर भी सारे कूपमण्डूक बोले - टर्र और हार कर वापस आ गए । इकनॉमी मजबूत करने का यह दांव भी खाली गया । एक मैच जीत जाते तो साल भर की इकनॉमी चलती रहती।



उन्होंने सोचा चलो सरोवर वालों से ही बात की जाए और फिर सरोवर की सरकार को फ़ोन लगा कर बोले -टर्र । बात करोगे?



इधर से जवाब मिला जब तक कीचड उधर से इधर आता रहेगा कोई बातचीत नहीं । टर्राते रहो टर्ररिस्टो । पहले उधर से इधर कूदना बंद करो फिर तुमसे बात करेंगे ।



प्रधानमण्डूक का दिमाग हो गया खराब फिर ट्विटर्र पर बोले - टर्र  । हमारा दोस्ती का हाथ ठुकरा किया । छोटे लोग बड़े पद। टर्र ।

सरोवर में रह रहे कुछ मेंढक और झींगुरों ने भी उनके स्वर में स्वर मिलाया ।

 

सरोवर से आवाज़ आई अरे ओ मण्डूक-ए-आजम -



 जब तक बरसात है टर्रा लो ।

 जब तक हम शांत है गर्रा लो ।

 अगर बात करने की औकात रखनी है ,

 तो इस कीचड बाजी से अलग तुर्रा लो।



उधर से एक ही आवाज़ आई - टर्र ।



मण्डूकिस्तान के कुछ जलचरों को याद आया कि सरोवर में उनके मण्डूक-ए-आजम के मित्र पण्डूक का राज था , उनके वंशज और समर्थक तो अब भी सरोवर में हैं और उनके टर्रक् भी समझते हैं ।  तब सरोवर से पण्डूक वंशियों से संपर्क साधा गया । पण्डूक वंशियो के हालाँकि दिन ठीक नहीं थे उनका राजपाट जाता रहा था , समर्थन जहाँ से मिले उनके लिए अच्छा ही था, भले ही मण्डूकिस्तान का हो । उन्हें वापस सत्ता पाने की आशा जागी। 

मण्डूकिस्तान के मंत्री मण्डूक बोले टर्र और इधर से पण्डूक वंशी बोले टर्र । इस तरह दोनों ने टर्र में टर्र मिलाई । इस टर्र टर्र में सम्पूर्ण सरोवर में दिव्य स्पंदन हुआ और सब सरोवर में कीचड घोलने के लिए पुनः एक हो गए ।



शनिवार, 14 जुलाई 2018

मंत्रालयों की दरकार

#मंत्रालयों_की_दरकार 

हमारे देश में नेता होना आम बात है, अगर हम आसपास देखें तो हर चौथा आदमी नेता होता है । सड़क पर निकलते ही हम पाते हैं कि हमारे आगे चल रही लूना से लेकर सफारी तक में फलां पार्टी का सचिव, अधिकारी या किसी न किसी प्रकार का अध्यक्ष सफ़र कर रहा होता है । इसलिए नेता हो जाना आम बात है। लेकिन ख़ास बात है मंत्री हो जाना । 
मंत्री बनने पर नेता को वही सुख प्राप्त होता है जो "राजा मंत्री चोर सिपाही" खेलते समय मंत्री की पर्ची मिलने पर होता था। मतलब अलग ही तरह का चेहरे के भाव पढ़ने का खेल हुआ करता था वो भी । आम लोग उसको तुक्का मार खेल समझते थे लेकिन वास्तव में खिलाडी वही होता था जो सामने वाले के आव भाव समझ कर पहचान ले कौन चोर है।

ऐसे ही नेता लोग का है लोगों के चेहरे के भाव पढते हैं । जो डरा सहमा सा दिखा बस उसी को पहचानना और उसी पर रौब दिखाना है । 

जिसके हाथ में राजा की पर्ची लग गयी उसका तो अलग है, वो ऊपर से बस कहता है मंत्रीजी क्या चल रहा है बताओ ?

 और इधर से मंत्री जी खेलने में लग जाते । सबसे संतुष्ट लोगों को ढूंढ निकालते और राजा के सामने खड़ा कर देते देखो जी सब मजे में । 

लेकिन जो नेता बनता है वह मंत्री तो बनना चाहता ही है । वैसे तो चोर और सिपाही भी मंत्री ही बनना चाहते हैं । लेकिन हमारे यहाँ मंत्रालयों की बड़ी कमी है ।

इस कमी को और बढ़ा देते हैं पीयूष गोयल जैसे लोग बताइये रेल, कोयला और वित्त जैसे बड़े बड़े मंत्रालय लेकर अकेले बैठे हैं ।
इन मंत्रालयों ने ही पिछली कई सरकारों में बड़े बड़े झंडे गाड़ दिए हैं । कुल मिलाकर पीयूष जी ने कई नेताओं की मंत्री बनने की संभावनाओं को दबा रखा है । कई नेताओं की भावनाये भड़की हुई है । 
इन्ही मंत्रालयों ने पिछली कई सरकारों के समीकरण बिगाडे भी हैं बनाये भी हैं । कई बार तो एक मंत्रालय देकर पूरी पार्टी का समर्थन भी लिया दिया गया है ।

लोगों का मानना है कि हर मंत्रालय में कम से कम दो मंत्री तो होने ही चाहिए ऐसे में नेताओ को मनवांछित सम्मान भी मिल सकता है और मंत्रालयों को अलग अलग मंत्री भी । और ऐसे में शायद कुछ झंडे गाड़ने का मौका भी मिल जाए ।

कुछ मंत्री फीते काटने में व्यस्त हैं । लोगों को आश्चर्य है की किया तो इन्होंने कुछ है नहीं लेकिन ये फीते काट किसके रहे हैं । पता चलता है की कुछ निजी कालेजों  और होटलों  के फीतों के अलावा गृह प्रवेश और सामुदायिक शौचालयों तक का उद्घाटन फीते काट कर कर रहे हैं । 

पिछले दिनों तो एक सड़क के बीचों बीच पंद्रह सालों से खुले हुए गटर पर ढक्कन क्या लगवा दिया एक पार्षद जी ने सभा ही बुला ली ।उद्घाटन भाषण सब कर दिया गया । 

बोले ये ढक्कन नहीं है ये हमारी ईमानदारी और आपके प्रति समर्पण है ।

वैसे कुछ विशेष लोग हैं जो खाली बैठे हुए हैं और उन्हें कुछ काम जरूर दिया जाना चाहिए ।
मेरे विचार में एक उद्घाटन मंत्रालय होना चाहिए । जिसमे दस पंद्रह वरिष्ठ नेताओं को रख देना चाहिए । जब बाकी मंत्रालयों के मंत्री काम कर रहे हों, अगर वे करते हों तो , तब ये उद्घाटन मंत्रालय के मंत्री जाकर जगह जगह  उद्घाटन करते रहें । इससे कुछ नेताओ को मनवांछित सम्मान भी मिल सकेगा और मंत्रालय भी और सरकार से असंतुष्ट नेताओं की संख्या में कमी भी आएगी । इस मंत्रालय के लोग देश में सभी प्रकार के उद्घाटनों के लिए जिम्मेदार होंगे । वे सड़क से लेकर नहर तक, शौचालय से लेकर गटर तक, कालोनी से लेकर शहर तक का उद्घाटन कर सकेंगे । 
इसमें उन सभी फीता काटू लोगो को डाल देन चाहिए जो काम नहीं उद्घाटन करने लिए मंत्री बने हैं ।

 एक मंत्रालय गाली मंत्रालय होना चाहिए , जो लोगों से मिलने वाली गालियों का हिसाब रख सके । इसका इंचार्ज उन लोगों को बनाया जा सकता है जो सत्ता में रहने पर बहरे हो जाते हैं ।

एक मंत्रालय रूठो-मनाओ मंत्रालय होना चाहिए , इसका इंचार्ज किसी चाशनी की जुबान वाले शायर को बनाया जाना चाहिए । जो रूठों को मना सके । 
इससे बात बात पर रूठ जाने वाले सांसदों के साथ विभिन्न संगठनों को मना सके । हालांकि आजकल कवि स्वयं रूठ रूठ कर पार्टियों से किनारा कर रहे हैं । उन्हें अगर कोई मंत्रालय दे दिया जाता तो आज भी वे रूठों को मनाने का काम कर रहे होते ।

साथ ही एक मंत्रालय धरना आंदोलन मंत्रालय बनना चाहिए जो आंदोलन करवाने और उसका संचालन करने की जिम्मेदारी ले । मसलन अन्ना जी के आंदोलनों का वर्ष में कम से कम दो बार रथयात्रा की तरह रामलीला मैदान में आयोजन करवा सके । 
अगर कोई मंत्री या मुख्यमंत्री धरने पर बैठना चाहे तो उसकी व्यवस्था संभाल सके ।

वैसे एक मांडवली मंत्रालय भी होना ही चाहिए, देखिये न ज़ी और जिंदल को मांडवली करने में कितना समय लग गया । मंत्रालय होता तो दोनों व्यापारियों में पहले ही समझौता करवा देता । लेकिन अब दोनों व्यापारी इसे सत्य की जीत बता कर एक दूसरे पर लगे संगीन आरोप वापस ले रहे हैं।  धन्य हो ! आपकी राजनैतिक बुद्धि की। 

फिर बनाने को तो कौन सा मंत्रालय और किसको मंत्री नहीं बनाया जा सकता , बस नीयत होनी चाहिए और इस सरकार में मंत्रालय बांटने की नीयत नज़र नहीं आती । हाँ आएगी कोई सरकार जिसमे हर नेता एक मंत्री होगा और हर मंत्री होगा लाला ।

शुक्रवार, 22 जून 2018

रीजक का धरना


हसीनापुर के मालिक रीजक जब से दक्षिण के मिलन समारोह से लौटे थे तब से बड़े परेशान थे । उन्होंने जितना सोचा था उसका एक प्रतिशत भी भाव उस सभा में उन्हें नहीं मिला था जिसकी उन्होंने कल्पना की थी । गए तो थे एक राज्य के मालिक की तरह किंतु वहां एक दर्शक बने एक कोने में बैठे रहे । ऊपर से चींवि ने उन्हें लताड़ सा दिया था और सूरमाओं तो की फोटो में उनके न सींग ही आये न पूँछ ।रीजक का मन पीड़ित हो रहा था, इतने बड़े बड़े उत्पात करने पर भी दो कौड़ी का भाव। ऊपर से हसीनापुर के लोगों ने मालिक से प्रश्न करना प्रारम्भ कर दिया था ।

मालिक स्वच्छ जल?
मालिक बिजली?
मालिक - बरसात के पहले की तैयारियाँ , सफाई?

ऊपर से लपिक ने रीजक का जीवन नर्क कर रखा था। रीजक रायता फैलाते और लपिक वही गोबर से लीप देते । दोनों का वाक् युद्ध रोचक होता जा रहा था । लपिक ने उनके हर भेद को खोल कर रख दिया । रीजक कहते हम सच्चे और लपिक कहते तुम लुच्चे । रीजक कहते भोले और लपिक उनके भालू रूप की तस्वीर दिखा देते । विवाद बढ़ता जाता ।

रीजक को उपाय सूझा । वही किया जाए जिसको करने में उन्हें महारथ प्राप्त है , उन्होंने अपने विश्वस्त सनीम को लपागो और रदनतिस को साथ लपेटने को कहा ।

सनीम यथा नाम नीम की चाशनी डूबा हुआ रसगुल्ला थे । उतने ही कर्तव्यपरायण जितने उनके सर पर बाल । चाहते थे सिंहासन लेकिन रीजक भी कम चीकट क थे, जिस कारण उनकी इच्छाएं अधूरी रह गयी थी ।
वे रीजक के बायें हाथ थे, और उनका कार्य वस्तुतः वही माना जाता था जो बाएं हाथ का होता है ।
सनीम के लपागो से चिढ़ने की वजह अलग ही थी । उन्हें लगता था जितने बाल उनके सर पर नहीं जितने लपागो अपने मुँह पर लगाये घुमते हैं  ।रीजक की वैसे तो अनेक राजनैतिक पत्नियां थीं, उनमे से एक वामा थे रदनतिस । रीजक को अपनी समस्त राजनैतिक पत्नियों में रदनतिस ही अत्यंत प्रिय थे ।

कलियुग में विशेषकर वामपंथ के लोग उदारवाद (लिबरल) में अत्यधिक उदार हो गए थे । पत्नी और पत्ना का भेद नहीं मानते थे । पुरुष पत्नी के साथ भी रहते और पत्ना के साथ भी, विवाह बंधन नहीं ।
रीजक के श्वेत-श्याम धन के समस्त रहस्य जानने वाले रदनतिस उन्हें अत्यंत प्रिय थे, यहाँ तक की गबन के अनेक आरोपों से घिरे रहने पर भी सच्चे जीवनसाथी की तरह रीजक ने रदनतिस का साथ नहीं छोड़ा था ।
शायद कोई और भेद खुलने का भय रहा हो ।
किन्तु अभी स्थिति यही थी कि चारों ने अपनी चौकड़ी बना ली थी और मंत्रणा कर रहे थे ।

रीजक ने कहा - हमारा तो कोई मान ही नहीं रह गया है । उधर मिलन समारोह में हमें बड़ा बदनाम किया गया । इधर हसीनापुर के लोग और लपिक प्रश्न करते है ।
कभी कोई पानी मांगता है कभी बिजली ।कहाँ तक उत्तर दें। अभी अभी छुट्टियां बिता कर आये हैं , तो दोबारा जा भी नहीं सकते ।
इसलिए सबका ध्यान भटकाने और अपने आप को पुनः स्थापित करने हेतु हम वही करेंगे, जिसमे हम सिद्ध हस्त हैं।हम धरना देंगे ।
स्वभाव से कोमल रदनतिस ने कहा-बाहर गर्मी है ,कहाँ धरेंगे और क्या धरेंगे?
हम तो सूख जायेंगे । ऊपर से हमारे व्यक्तिगत कोष की स्थिति ठीक नहीं है कि बाहर मजमा लगा सकें । फिर आपने ही तो हमारे भीड़ जुटाने वाले कविराज रमाकु को बहार फिकवा दिया ।
आप जानते हैं हमारे पक्ष में जितनी भीड़ जुड़ती थी उसमे आधे से ज्यादा तो कवि को सुनने के लिए आते थे,आपका ड्रामा उसके बाद आता था।अब वो आपको और आपकी नीतियों को खुलकर लताड़ रहे हैं।अबके अगर किसी मैदान में भीड़ का आह्वान किया तो निश्चित है खर्च होगा बहुत लेकिन भीड़ नहीं जुटेगी।
माने न माने कविराज इस वामाओं के दल में एक मात्र राष्ट्रवादी थे । और हम सब के बीच से राष्ट्रवाद की कवितायेँ सुनकर बहुतो को हमसे जोड़ देते थे । लपागो ने कहा इसीलिए तो निकाला । हम वामियों के बीच कैसा राष्ट्रप्रेम और कैसा राष्ट्रप्रेमी? या तो हमसे प्रेम कर ले या राष्ट्र से ।
जहाँ वाम है वहां कोहराम रह सकता है राम नहीं । और वह तो खुद को राम का वंशज कहता था ।
रदनतिस ने कहा अब जो है सो है लेकिन हमसे गर्मी और धूप में न होगा । फिर हम धरना करेंगे किस बात पर ? राज तो हमारा ही है ।रीजक ने कहा -आज तक किस बात पर दिया है? तो फिर हम लालजी के घर में धरना देंगे, वातानुकूलित वातावरण में आराम से बैठेंगे । धरने का धरना आराम का आराम । न कोई कुछ पूछेगा न हम कुछ बताएँगे । हम लालजी के घर में बैठकर लालजी को हटाने और हसीनापुर को आज़ादी दिलवाने की मांग करेंगे ।
बाकी लोगों का ध्यान बंट जायेगा ।
सनीम ने कहा कब तक धरना है लालजी के घर पर?कम से कम ईद को तो बहार आना ही पड़ेगा ।वरना हमारे वोटर बिदक जायेंगे।वे नाराज़ बहुत जल्दी होते हैं । रीजक ने कहा देखते हैं और सभी ने हामी भरी और लालजी के घर पर जाकर चारों ने एक एक आसन पकड़ा और पसर गए ।
लालजी भी सोच कर बैठ गए बैठने दो , मिलना ही नहीं है । जब पसरे पसरे चार दिन हो गए और लालजी ने भाव नहीं दिया तो मन में उकताहट होने लगी ।
चारों ने शोर मचाया हम अनशन पर हैं। भूख से मर रहे हैं । चिकित्सकों का दल बुलवाया गया ।
जहाँ चार दिन के अनशन से जहां किसी का बुरा हाल हो जाना था, वहीं रदनतिस का वजन सवा किलो बढ़ गया था । लोग सोच रहे थे , कि भूखे रह कर भी आखिर ऐसी कौन सी हवा है जो वजन बढ़ा गयी ।
अंदर बैठे बैठे चारों बाहर निकलने के लिए तड़प रहे थे और लालजी ने इनको बिठा कर इनको लाल करने की ठान ली थी ।
रीजक ने आखिर जम्बूद्वीप के सम्राट के अन्य विरोधी क्षत्रपों को बुलावा भेजा और चार क्षत्रप अपना विरोध धर्म निभाने हसीनापुर की ओर कूच कर गए । हसीनापुर के लोगों के लिए भरपूर मनोरंजन अभी पंक्तिबद्ध था ।
क्षत्रप हसीनापुर पहुँच  गए किन्तु रीजक से मिल नही पाए। लालजी के सिपाहियों ने उन्हे बाहर ही रोक दिया, रीजक और क्षत्रप मन-मसोस कर रह गये। किन्तु रीजक को आत्मसंतुष्टि हो  गयी। सम्राट को अपशब्द कहते कहते रीजक की जिह्वा न थकती थी न रुकती थी। इधर रीजक से कुपित हो लपिक ने उनके ही दरबार मे डेरा डाल दिया और धरने पर बैठ गये। धरने के विरोध मे कोई धरने पर बैठा हो और हर नागरिक खुद  मालिक को धरने के लिए लालायित हो ऐसा गज़ब संयोग हुआ।  हसीनापुर जैसे धरनास्थल हो और धरना ही यहाँ के शासकों की धारणा। 
जब अपनी तशरीफ़ धरे धरे कोमलांगी रतिंदस थक गये और उनसे सहन न हुआ तो पहले वे ही निकले, पीछे से सनीम और अंत मे रीजक की नवरात्रि समाप्त हुई और मेघनाद के पुतले की तरह रीजक दशहरे के दिन बाहर निकल आए। रीजक को किसी ने भी भाव न दिया था, किंतु फिर से वे ऐसे ढोल बजाते हुए बाहर आए जैसे बस अभी अभी युद्ध मे से प्राण बचाकर आए हों। मिला उन्हे कुछ न था, लेकिन थकान बहुत हो गयी थी।  इसलिए सब अपनी अपनी औकात अनुसार अलग  अलग स्थानों पर अवकाश पर चले गये।  और हसीनापुर वासी, बस इसी धरना और अवकाश के बीच मे अपने आप को चटनी में पिसती धनिया समझते रह गये।  

शनिवार, 26 मई 2018

संभावनाएं बहुत हैं



चार वर्ष पूर्व, भारतीय राजनीति में एक ऐसा ज्वार उठा था जिसमे बहुत से लोग बह गए थे और बहुत से ऐसे लोग पार लग गए थे जिनको कोई जानता भी नहीं था। यकीन मानिए इन चार वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। राजनीति के ध्रुव बदल गए हैं, नए समीकरण बन गए हैं। जो शत्रु थे वो मित्र बन गए हैं और जो मित्र थे वो शत्रु बन गए हैं। चार वर्ष पहले लोगों में बहुत उत्साह था और बहुत सी उम्मीदें थीं, और यकीन मानिए जितनी उम्मीदें लोगों ने इस सरकार से पाली थीं , सरकार उन उम्मीदों से दवाब महसूस करती रही है। आज सफलताओं और असफलताओं की बातें बहुत से लोग करेंगे। आलोचनाएं होना स्वाभाविक है। लोग आंकड़ों के माध्यम से तुलनात्मक अध्ययन करेंगे और चुनाव के समय किये गए वादों को कितना गया इसपर भी करेंगे।
लेकिन सरकार के कामकाज के मूल्यांकन के नियम क्या होने चाहिए ? मात्र आँकड़े किसी भी सरकार का मूल्यांकन नही कर सकते, क्योंकि आंकड़े बनाये और बिगाड़े जा सकते हैं और आंकड़ों की परिभाषाऐं भी गढ़ी जा सकती हैं किसी सरकार की नीतियों से सामान्य आदमी का जीवन कितना आसान हुआ है इसपर भी विचार होना चाहिए। हालाँकि लोग अभी केवल आँकड़ों की बात करते हैं जिसमे भी यह सरकार बहुत बेहतर दिखती है।
लेकिन कुछ लोग निराश हैं, विशेष रूप से हिंदू और मध्यम वर्ग जिसने प्रधानमत्री से चमत्कारिक शासन की उम्मीद की थी वह निराश दिखता है। मध्यम वर्ग की शिकायत है कि कम से कम दस लाख तक की आय को कर मुक्त कर देना चाहिए , या कर पूर्ण रूप से समाप्त कर देना चाहिए।  थोड़ा शांत चित्त होकर सोचिए, क्या एक विकासशील देश मे यह उम्मीद करना ठीक है ? हम अभी विकसित राष्ट्र नही हैं, हमारे देश की आवश्यकताएँ बहुत हैं, हमारे पास इनफ्रास्ट्रक्चर नही है। ऐसे मे जब निर्माण कार्य और कई सरकारी योजनाएँ तेज़ी से प्रगती कर रही हों तब बिना किसी अन्य आय के साधानो के सरकार आय के पारंपरिक साधन बंद कैसे कर सकती है? शायद जब हम विकसित राष्ट्र हो जाएँ तब यह संभावना बन सकती है। वैसे भी निम्न मध्यम वर्ग से लिया जाने वाला प्रत्यक्ष आयकर काफ़ी कम है। चुनाव प्रचार मे कुछ लोगों ने अतिशयोक्ति की थी, जिसके कारण लोगों के मन मे यह बात बैठ गयी कि अब आयकर नही लगेगा, बस वही अब सरकार के गले की हड्डी बन गयी है।  लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी के अलावा किसी और राजनैतिक व्यक्ति के मुख से आयकर समाप्त करने की बात किसी से नही सुनी। इसमे एक बात अवश्य है कि सरकार अगर अव्यवस्थाओं को कुछ और नियंत्रित करे तो सरकारी खर्चे कम हो सकते हैं।  थोडा सोचिए क्या कॉंग्रेस की सरकार से यह उम्मीद कभी लगाई गई कि वे आय को कर मुक्त कर देंगे? इस सरकार से उम्मीद है, लेकिन जब तक सरकार को आय के वैकल्पिक साधन नही मिलते तब तक इंतज़ार करना होगा।
हाल ही में पेट्रोल की कीमतों के उतार चढ़ाव से बहुत हाहाकार मचा हुआ है क्या पिछली सरकार और इस सरकार मे पेट्रोल की कीमत को लेकर तुलना की जाएगी ? तब भी यह सरकार कीमतों को नियंत्रण मे रखने मे सफल हुई है।  क्या लोग वह समय भूल गए, जब पेट्रोल की कीमत दो रुपये बढ़ती थी और इधर दूध की कीमत एक रुपया बढ़ा दी जाती थी , ऐसा लगता था दोनो मे कोई प्रतियोगिता चल रही है? चार साल मे ऐसा हुआ है क्या? फिर ज़रूरत की दूसरी चीज़ों जैसे सब्जियाँ, डालें इनपर भी बात होनी चाहिए, प्याज़ जिसने सरकारें गिरा दीं थी, आपको नही लगता काफ़ी नियंत्रण मे है? पेट्रोल की कीमत पक्ष लेने का मंतव्य नही है, अगर इसे जीएसटी मे लाया जा सकता है तो लाया जाना चाहिए।  किसी वस्तु की कीमत काम करने की मांग करना जनता का संवैधानिक अधिकार है।
दूसरी शिकायत हिंदू वर्ग करता है। हिंदू वर्ग जो तुष्टिकरण का विरोध करता है, जिसके लिए राम मंदिर प्रमुख मुद्दा है और हिंदुत्व का संरक्षण ही वर्तमान सरकार को समर्थन की प्रथम शर्त।
तुष्टिकरण के मामले मे सरकार का मन्त्र शुरू से ही सबका साथ सबका विकास रहा है, और यह सरकार किसी भी प्रकार से कट्टर हिंदुओं की सरकार नही कही जा सकती है। इस सरकार के एजेंडे मे हिंदुत्त्व था रहेगा। यह बात समझनी होगी, अगर हिंदुत्त्व का राजनीति मे स्थान होगा तो केवल शांत हिंदुत्त्व का होगा। आज देश की परिस्थिति ऐसी है कि कितने धर्म कितनी जातियाँ कितनी मान्यताएँ प्रचलित हैं जिनकी गणना यह तो क्या कोई सरकार नही कर सकती।  हिंदुओं को समझना
होगा कि आज की परिस्थिति मे डंडा उठाकर काम नही हो सकता। ही डंडे के बल पर बांग्लादेशियों को भगाया जा सकता है, ही रोहिंग्याओं को। सरकार कोई कदम भी उठाती है तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं ही विपक्ष बन कर खड़ा हो जाता है। 
विदेशी एन.जी. पर लगाए गए प्रतिबंधों से मिशनरियों और उनके संरक्षकों में भारी आक्रोश है। एक यह कारण भी है कि हिंदुओं को भड़काया और बांटा जा  रहा है।   नरेन्द्र मोदी पर एक आरोप लग चुका है, और वे ऐसा कोई निर्णय नही लेंगे जिस से देश मे अशांति का माहौल बने। अगर बांग्लादेशी या रोहिंग्याओं के मसले हैं तो वे शांति से ही सुलझाए जा सकेंगे, हम इस स्थिति मे हैं कि बल पूर्वक किसी को निकाल पाना संभव नही है। ये लोग बहुत बड़ी संख्या मे हैं और कुछ राज्य सरकारों और नेताओं के संरक्षण मे हैं। 
जब सबका साथ सबका विकास की बात आएगी तो सबके हिस्से मे कुछ कुछ जाएगा, इसलिए यह शिकायत भी ठीक नही है कि किसी को कुछ दिया तो क्यों दिया?
राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट ने लटका रखा है, ये न्यायालयों की भीरूता और असक्षम होने का प्रमाण है कि एक निर्णय वर्षों से नही कर पा रहे हैं। दूसरा न्यायाधीशों पर विपक्ष ने बहुत दवाब बना कर रखा है, न्यायालय वर्षों से कांग्रेस के इशारों पर चलते आए हैं और कांग्रेस के प्रभाव से निकल नही पाए हैं। यह प्रधानमंत्री  के हाथ मे नही है कि वे इस व्यवस्था को बदल पाएँ, ऐसा नही है कि प्रयत्न नही किया। किया था लेकिन न्यायालय विपक्ष की भूमिका मे दिखते हैं।  मोदी शायद किसी को गिरफ्तार इसीलिए नही कर पाए क्योंकि अभी भी कॉंग्रेस सत्ता से बाहर होने पर भी, सिस्टम के अंदर है।  चाहे वो न्यायालय हों या हर महत्वपूर्ण संस्थान मे बैठे हुए उनके लोग। किसी के अपराधों पर गिरफ्तार करके क्या फायदा होगा जबकि न्यायालय उनको फिर छोड़ देगा? पहले उनका ईकोसिस्टम ख़त्म करना होगा, अन्यथा जेल से पहले बेल पाकर ये लोग और स्वतंत्र हो जाएँगे। लालू यादव को जेल भेजने से कौन सा फ़ायदा हुआ है, मन मर्ज़ी  से बाहर रहे है।
ऐसा नही है कि सरकार कुछ कर नही सकती थी, जॉन दयाल जैसे धर्म परिवर्तन करने वालों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सकता था, मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त किया जा सकता था। गौवध पर प्रतिबंध है, लेकिन सरकार रोकने मे असमर्थ दिखती है। शराब पर देशभर मे प्रतिबंध लगाया जा सकता था लेकिन उससे होने वाली आय बहुत अधिक है। सरकार शिक्षा के क्षेत्र मे बेहतर काम कर सकती थी, लेकिन प्रकाश जावड़ेकर जैसे निष्क्रिय व्यक्ति को शिक्षा विभाग देकर स्मृति ईरानी के कार्यकाल मे किए गये कार्यों को प्रभावहीन कर दिया। अगर इस सरकार मे कोई सबसे असफल मंत्री हैं तो वे प्रकाश जावड़ेकर हैं। उसके बाद सबसे बड़ी असफलता क़ानून मंत्रालय और अटॉर्नी जनरल की है, जो सरकार के पक्ष मे एक भी महत्वपूर्ण निर्णय नही करवा पाए। 
असफलताओं की सूची मे गंगा सफाई अभियान मे लगी हुई उमा भारती का नंबर भी है, उनसे गंगा की सफाई को लेकर बहुत उम्मीदें थीं, एक नदी को साफ़ होने के लिए अगर मिशन बना कर काम किया जाता तो चार साल बहुत होते हैं।  एक रविशंकर प्रसाद का नाम कमजोर मंत्रियों मे लिया जाएगा, उन्होने कोई खराब काम किया ऐसा नही है लेकिन जब लोग डेटा सेक्यूरिटी पर प्रश्न उठाते हैं, आधार पर प्रश्न उठाते हैं तब वे देश को साइबर सुरक्षा पर भरोसा नही दिला पाए।  
कुछ तो विपक्ष के खोजे और बनाए हुए मुद्दे हैं, जब झूठे समाचारों और मोदी के अंध विरोधियों के समूह द्वारा निर्मित समस्याओं को देखते हैं, तब यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि 2019 उनके अस्तित्व का चुनाव है। अगर 2019 विपक्ष की पार्टियाँ हारती हैं तो उनकी राजनीति समाप्ति की ओर बढ़ जाएगी। शायद बसपा , सपा जैसी पार्टियाँ बिखर जाएँ, कॉंग्रेस अपने अंत की ओर या विभाजन की ओर बढ़ जाए।  वामपंथ का देश मे अस्तित्व ख़तरे मे जाएगा और फिर इनके संरक्षण
मे जी रहा इनका ईकोसिस्टम भी ध्वस्त हो जाएगा।  इसलिए विपक्ष और मुखर होगा , आरोप और प्रखर होंगे, और असली नकली सब मुद्दे उछाले जायेंगे।  विभाजन उनकी प्राथमिकता होगी। 
कुछ मंत्रियों के असफल होने पर, लोगों को क्या उस सरकार को समर्थन देना बंद कर देना चाहिए जो वास्तव मे अच्छा काम कर रही है? अगर आप इस सरकार का मूल्यांकन करें तो अपने आसपास होते बदलाव को अवश्य देखें।   नरेन्द्र मोदी केवल देश का आर्थिक विकास नही कर रहे हैं , बल्कि लोगों की सोच मे भी परिवर्तन ला रहे हैं. लोगों को जागरूक कर रहे हैं। जब भी उनकी बातें सुनें तो ये देखें कि वे हमेशा "क्या किया जा सकता है" इस पर बल देते हैं।  वे हर क्षेत्र मे संभावनाएँ ढूँढते दिखते हैं। मोदी जी सकारात्मक बदलाव का नेतृत्व कर रहे हैं। .लोगों को अपनी दृष्टि बदलनी होगी, केवल आँकड़ों पर जाकर सरकार का काम मत आंकिए। भविष्य की संभावनाएँ भी देखिए।  बाकी निर्णय आपका ही है कि आपको किसको चुनना है।  या घर बैठकर विपक्ष की मदद करनी है।  एक वर्ष और है अभी इस सरकार का और आशा यह है कि जो काम रह गये हैं उनको जल्दी से जल्दी शुरू करे, ख़ासकर गंगा की सफाई, शिक्षा के प्रति गंभीरता, रोज़गार की कमी के आरोपों को रोज़गार देकर ही ख़त्म किया जा सकता है और इसमे सुधार की गुंजाइश है। 
सरकार को समझना होगा हिंदुओं के मन मे भय है, विश्व भर मे इस्लामिक कट्टरता और क्रिस्चियन मिशनरीयों ने भय का वातावरण निर्मित किया है और अब समय है कि हिंदुओं को भी भरोसा दिलाया जाए कि उनके साथ भी कोई सरकार मजबूती से खड़ी रह सकती है।  बात वोट बैंक की नही है , सबका साथ सबका विकास मे हिंदुओं की उपेक्षा की कोई गुंजाइश नही है। भय जितना बढ़ेगा समाज मे दूरियाँ उतनी अधिक बढ़ेंगी दूसरे धर्मों के साथ पूरा विपक्ष खड़ा दिखता है लेकिन हिंदुओं की आशाएँ केवल एक पार्टी से हैं और सत्ता मे रहते हुए ये उनकी ज़िम्मेदारी बनती है समन्वय बिठाते हुए सभी वर्गों को सुरक्षा की भावना महसूस कराएँ। 
लोग भी अब एक नई मनोस्थिति में गए हैं, लोग प्रश्न पूछने लगे हैं पहले केवल कुछ कथित बुद्धिजीवी और पत्रकार ही अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे नेताओं से प्रश्न पूछने का, लेकिन सोशल मीडिया के समय में जब नेता और जनता एक दूसरे के संपर्क में गए तो पत्रकारों की भूमिका सिमट गयी है। कुछ में तो हीन भावना जागृत हो गयी है।  लोग अब नेताओं से सीधा प्रश्न पूछते हैं और सुखद बात ये है कि उन्हें उत्तर भी मिलता है। 

एक साल बाकी है अभी और आशा है कि यह सरकार उन क्षेत्रों मे भी बेहतर काम करेगी जहाँ कुछ कमी रह गयी है। बाकी यह मानने मे मुझे परहेज़ नही कि काम वास्तव मे अच्छा हुआ है और बदलाव दिखता है।