रविवार, 15 अप्रैल 2018

होइहि वही जो पृच्छ रूचि राखा


जिन प्राणियों की पूँछ होती है वे स्वयं को ईशतुल्य समझते और उनकी पूँछ स्वामी के शक्ति और प्रभाव के अनुसार स्वयं को उकृष्ट | ईश्वर ने तरह तरह के प्राणी बनाये और फिर बनाई उनकी पूँछ । कुछ के दिमाग में पुंछ होती है कुछ की पूँछ में दिमाग । कुछ तो वास्तव में सिर्फ पूँछ होते है लेकिन खुद को स्वामी मानते हैं ।

पूँछ कई प्रकार की देखी गई है, छोटी पूँछ, लंबी पूँछ, बाल वाली पूँछ ,बिना बाल वाली पूँछ । अधिकतर पूँछ स्थाई होती है, कुछ विशेष परिस्थितियों में अस्थाई पूँछ भी देखी गयी है । पूँछ सिर्फ होने के लिए नहीं होती बल्कि इसके कुछ विशेष कर्तव्यों को अलग अलग शास्त्रों में वर्णित किया गया है |

ट्वीट शास्त्र में पूँछ को सांसे कुटिल और जटिल पूँछ कहा गया है | इसमें कौन किसकी पूँछ है यह कह पाना अत्यंत कठिन है | हर जीव एक पूँछ है और हर पूँछ एक जीव | एक पूँछ अगर शेर से जुडी है तो बकरी से भी | ये पूँछ एकदम मुखविहीन है |  अगर ये मक्खियां भगाती हैं तो चाबुक बनकर दनादन किसी पर भी बरस भी पड़ती हैं | एक प्रकार की पूँछ का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए | ट्वीट शास्त्र में लम्बी पूँछ को ही उत्तम माना गया है | छोटी पूँछ को मद्धम माना गया है और पृच्छ न होना एक प्रकार से बोट होने का प्रमाण कहा गया है |
अतः  अगर आप बोट रूप न समझा जाना चाहते हों तो पूँछ रखना आपकी बाध्यता है |

राजनीति के शास्त्रों में पूँछ के कुछ विशेष कर्तव्य कहे गए हैं |  पृच्छ-स्वामी के पृच्छ भाग को ढांकना | पृच्छ-स्वामी पृष्ठ भाग से कोई भी क्रिया करे पूँछ का कर्तव्य है कि वह पीछे बनी रहे |  स्वामी जब बैठने को हो तो बैठने के स्थान को साफ़ करना पूँछ का परम कर्तव्य है |  पृच्छ-स्वामी की प्रसन्नता और सफलता में स्वयं को प्रसन्न जानकार स्वामी के साथ नृत्य करना और स्वामी की असफलता और कष्ट के समय स्वयं भी झुका हुआ रहना उत्तम पूंछ के लक्षण कहे गये हैं |

एक बार एक पूँछ को अभिमान हो गया कि उसका स्वामी उससे इतना अधिक प्रेम करता है कि वह उसके इशारों पर ही अपने सभी काम करता है | स्वामी भी यदा कदा पूँछ को चाट चूम कर सहला कर प्रेम जाता देता |  पूँछ को कुछ अभिमान हो आया और स्वामी की इच्छा के बिना इधर उधर खुद को पटकने लगी | स्वामी भी कभी कभी परेशान हो उठता कि ये पूँछ ऐसा कर क्यों रही है | फिर एक दिन उसने पूँछ को रोग ग्रस्त जानकार अपने हाल पर छोड़ दिया |

अधिकतर इस शास्त्र के अनुसार पूँछ के स्वामी से अपेक्षा नहीं की सकती कि वह अपनी पूँछ को पहचाने भी | अतः एक दो बार पृच्छ स्वामी अपनी ही पूँछ को काटने दौड़ते देखा गया है |

अगर स्वामी क्यूट हो तो उसकी पूँछ भी क्यूट होती है । मसलन खरगोशों की पूँछ , लेकिन ऐसे प्राणी अपनी पूँछ सहित किसी का भोजन बन जाने से अक्सर बच नहीं पाते । ये अपने भोलेपन में प्राण गंवाते हैं |

पृच्छ-स्वामी जितना छोटा होता है, पूँछ उसके लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है । जैसे जैसे स्वामी बड़ा होता है, उसकी पूँछ का महत्त्व कम होता जाता है ।

जब स्वामी बहुत बड़ा हो जाता है तब उसकी पूँछ का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता खिलवाड़ के अलावा । पूँछ उसके लिए केवल हिलाने के लिए होती है । भले ही पूँछ ये सोचे कि "होइहि वही जो पृच्छ रूचि राखा" लेकिन होता नहीं है ।

जब स्वामी हाथी हो जाये तो न तो अपनी पूँछ दिखती है और न ही उसपर पूँछ के वार का असर होता है | उसे अपनी आँखों के सामने लगी सूंड अधिक प्रिय लगती है । आखिर नाक का सवाल आ जाता है और पूँछ की पूँछ नहीं रहती ।

एक प्रकार के पृच्छ-स्वामी होते हैं जो उपयोगी होते हैं , और इनकी पूँछ होती है लंबी और गुच्छे दार । ये पूँछ मख्खी भगाने के काम आती है । कुछ हद्द तक ऐसी पूँछ की इज्जत भी होती है । इनकी इज्जत उतनी ही होती है जितनी किसी पूँछ की होनी चाहिए । ये सबसे इज्जतदार पूँछ है । कुछ पूँछ होती है बालों वाली । जिसमे लंबे लंबे बाल होते है । ऐसी पूँछ उठाने के काम तो आती है इससे इज्जत ढंकी रहती है |

कुछ पूँछ होती है टेढ़ी कुत्ते जैसी । ऐसी पूँछ का प्रयोग किसी ग्रन्थ में वर्णित नहीं है । अक्सर जीभ के साथ सीधे जुडी रहती है, एक तरफ कुत्ते की जीभ चलती है दूसरी तरफ पूँछ हिलती रहती है ।
आजादी के बाद न तो कोई कुत्तों को सीधा कर सका है न उनकी पूँछ को । कुत्ते पहले सूंघते हैं, फिर गुर्राते हैं , फिर या तो चाटते हैं या काटते हैं । यही उनकी पूँछ की हालात है । सीधी नही रह सकती ।

कुत्ते की पूँछ का कुत्ते के जीवन में कोई विशेष योगदान नहीं है, सिवा इसके की जब कुत्ते अति उत्साहित होते हैं तो पूँछ विजय पताका की तरह लहरा उठती है और जब कुत्ता संकट में होता है तब पूँछ स्वयं छिपने का स्थान ढूंढती है । कोई वैज्ञानिक कारण तो उपलब्ध नहीं है किन्तु मान्यताएं अवश्य हैं । एक दो बार यह देखा गया है कि विशेष परिस्थितियों में अगर किसी कुत्ते की पूँछ न हो तो वह अधिक भयानक हो जाता है । अतः याद कदा पूँछ नियंत्रक का कार्य भी करती है और कुत्ते को नियंत्रण में भी रखती है ।

कुछ प्राणियों में पूँछ इतनी प्रबल हो जाती है कि वह पृच्छ-स्वामी को ही तुच्छ समझती है । वह पृच्छ-स्वामी की साथियों पर गुर्राती है, गरियाती है और बस चले तो पृच्छ-स्वामी को काटने ही दौड़ पड़ती है । ऐसी पूँछ समझती है की वह है इसीलिए स्वामी है, अन्यथा स्वामी ही न रहे । ऐसा स्वामी अभी तक देखा नहीं गया है जो अपनी ही पूँछ से भय खाता रहे । अगर भय खा गया तो स्वामी पूँछ और पूँछ स्वामी हो जाये ।


एक प्रकार की पूँछ होती है लंबी और बहुपयोगी । ये होती है वानर की पूँछ, यह लटकने से लेकर मटकने तक के काम आती है । ये वो पूँछ है जिसपर वानर इतरा सकता है ।


एक होती है विषधर पूँछ जो प्रायः बरैया और बिच्छू जैसे प्राणियों में पायी जाती है । इसे डंक पूँछ कह सकते हैं । जितने छुटभैये खतरनाक ये प्राणी होते हैं उतनी ही घातक उनकी पूँछ होती है । स्वामी को भय लगा नहीं की पूँछ हरकत में आ जाती है । ऐसी पूँछ विकट अपराधिक श्रेणी में आती है ।


स्वामी की मानसिकता पर पूंछ की मानसिकता देखी गयी है | अगर स्वामी का दिमाग़ मे गोबर ओ तो उसकी पूंछ भी गोबर कीचर उछालते देखी गयी है |

एक प्रकार के पृच्छ-स्वामी है छिपकली टाइप के । जो जहाँ मख्खी देखी वहीं पहुँच जाते हैं । इनको कहाँ किस दीवार पर चिपकना है वह मौसम और मक्खियों की उप्लब्धता पर निर्भर है । और इसी प्रकार इनकी पूँछ भी डिटेचेबल होती है । सुविधा के अनुसार ये अपनी पूँछ बदलते रहते हैं । जब मोह भंग हुआ तो पूँछ छोड़ दी, जहाँ भय हुआ तो जीवन से पहले पूँछ को त्याग देते हैं । बेचारी पूँछ अपनी कीमत तलाशती रहती हैं ।


आज का हर कोई  किसी न किसी की पूँछ बन चुका है और पूँछ को समझना होगा वह केवल पूँछ है, उसकी कीमत प्राणी के पीछे रहने में है ।

अगली बार जब आप किसी की पूँछ बने तो स्वामी सोच समझ कर चुनें । ऐसा न हो कि आप गलत स्वामी की पूँछ बन जाएँ और उसके पृच्छ भाग को ढकते ढकते अपना अस्तित्व मिटा बैठें ।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें