लेकिन छुट्टन ने उत्पात बहुत मचा रखा है। छुट्टन लोकपाल लोकपाल करते करते पहले बैल बने, और फिर धीरे धीरे छुट्टे सांड कब हो गए पता ही न चला ।पहले जो छुट्टन अपने सामने रखी दूब से भी पराया कहकर किनारा कर जाते थे आजकल खुद दूसरों के खेतों में घुस कर चरने में लगे हैं।
छुट्टन पहले जहाँ तहाँ सींग मारते और दौड़ लगा देते । और जब कोई लठ लेके पछियाता तो अम्मा-अम्मा रम्भाने लगते । लोग सोचते बड़ा अत्याचार हो रहा है निरीह पर । छुट्टन समझ गए सहानुभूति बड़ी चीज़ है । फिर तो छुट्टन क्या गुड़ क्या गोबर हर जगह सींग मारते और दौड़ लगा देते ।
छुट्टन ने कहा हम नंदी है, मंदिर में बैठेंगे । लोगों ने सोने का आसान लगा के बैठा दिया । ये सोचके के नंदी के कान में कुछ कह दो तो मन्नत पूरी हो जाती है । लेकिन मंदिर में बैठे तो छुट्टन खुद को मंदिर का मालिक समझ बैठे और जब कोई उनके कान में कुछ कहने को उनके कान की तरफ बढाता, उसको ही सींग मार देते । फिर तो जिसने सुबह शाम भजन न गाया उसके लिये मंदिर के पट बंद हो गए । किसी को पृष्ठ भाग पर दुलत्ती मार के भगाया, और किसी को सींग । भले ही वो छुट्टन का कितना भी बड़ा विश्वास पात्र क्यों न हो ।
अब छुट्टन बन बैठे हैं देवता, और उनका भजन करने में लगी है उनकी मण्डली , जो समझती है समस्त तैंतीस कोटि देवता का वास छुट्टन में ही है ।
लेकिन जिस जिस को सींग मारा है सब बदला तो लेंगे ही सो सबने छुट्टन के लिए नकेल बनाना शुरू कर दिया ।
लेकिन जिस जिस को सींग मारा है सब बदला तो लेंगे ही सो सबने छुट्टन के लिए नकेल बनाना शुरू कर दिया ।
नकेल देखते ही छुट्टन के नथुने सूख जाते हैं । सो जब जब किसी के हाथ में नकेल देखते हैं, छुट्टन चुपचाप क्षमा मांग लेते हैं । एक बार खुद की पूँछ शीशे में देखकर उसे नकेल की रस्सी समझ बैठे खुद से ही क्षमा मांग बैठे । आजकल क्षमा चालीसा पढ़ रहे हैं ।
सुना है छुट्टन देवता एक नया ग्रन्थ भी रच रहे हैं आजकल जिसका नाम है - "छुट्टन के माफीनामे" !
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