रविवार, 22 अप्रैल 2018

वमन विचार

रक्तवर्ण पृच्छ वाली ब्राह्मणिका जिसे ब्राहमनी या बामनि भी कहते हैं | यह लोभवश ओले निगल लेती हैं, जो उसके लिए आत्मघाती सिद्ध होते हैं | ऐसी ही काई ब्राह्मणिकाये आजकल उठते तूफान के समय निकल कर आ जाती हैं और सोचे समझे बिना ओले निगलने मे लग जाती हैं |

किसी रक्तवर्ण पृच्छ वाली ब्राह्मणिका ने मनुष्यों पर वमन की इच्छा प्रकट की है | उनकी पृच्छ के रक्तवर्ण होने का कारण वामपंथ का प्रभाव है या वामपंथ के प्रभाव से उनकी पृच्छ रक्तवर्ण हुई है यह तो उन ही को पता होगा | परंतु उनकी इस प्रकार की इच्छा को समझना अत्यंत आवश्यक है | 

वमन ग्रंथ के कुछ अंशों का अध्यन बताता है कि, वामपंथ का वमनग्रंथ से गहरा नाता है | 

जब वामपंथ आपके रक्त में प्रवाहित होने लगे । जब आपके जीवन में कटुता पद-नख से मुख तक मुखर हो । अम्ल पाचन तंत्र से उल्टा प्रवाहित हो कटु वचन स्वरूप जिह्वा तक पहुंचने लगे । तब वमन होता ही है । वमन की इच्छा कई कारणों से हो सकती है । परंतु किसी मनुष्य पर वमन की इच्छा रक्त में प्रवाहित एवं मन में समाहित विष से ही हो सकती है । 
कदाचित किसी व्यक्ति की उपलब्धियाँ आपके हृदय में रक्त के स्थान पर अग्नि का प्रवाह करती हों । आपके उदर से खट्टी डकारें आती हों और आपकी ग्रीवा ज्वलनशील प्रतीत होती हो । 
किसी अन्य की उपलब्धि को पचा पाना इतना सहज नहीं होता और अपच की इसी स्थिति को अम्लिकोद्गार कहते हैं ।
 इस स्थिति में वमन की इच्छा जागना सामान्य है । 
इसका इलाज केवल अपने मन की कुंठाओं और अन्य व्यक्तियों की सफलताओं को स्वीकार करना हो सकता है, किंतु जो वामी हो जाए उसे कोई सुखी दिख जाए तो कष्ट हो जाता है। 
वामी का सुख उसके सामने होने वाले संघर्षों में निहित है । ये वही लोग होते हैं जो चलते फिरते पार्किंग में खडे पड़ोसी के नए वाहन को केवल इसलिए खरोंचते जाते हैं कि इससे पड़ोसी को कुछ कष्ट पहुंचे ।


सुरा को असुर की भाँती पी जाने पर भी लोग वमन करते देखे गए हैं । ऐसे लोग एक एक करके इतनी सुरा पी लेके हैं कि इनका उदर इधर-उधर हो किधर से भी खाली होने के लिए बाध्य हो जाता है । अंदर ही अंदर ऊर्जा और मूर्छा का ऐसा समावेश होता है कि सुरा पान करने वाला स्थान देखता है न मान, न बिस्तर देखता है न चद्दर । न शयनकक्ष देखता है न स्नान कक्ष ।

ऐसी वमन जनक स्थिति में कौन कहाँ कैसे किसपर वमन करता है नहीं रोका जा सकता । किंतु जो साथ में बैठ कर सुरपान कर रहे हों उन्हें भी कहाँ इतनी सुध रहती है कि घृणा कर सकें । रात्रि के सुरापान समारोह के पश्चात स्नानागार के वाश बेसिन में भरी ,चादर में लिपटी उल्टी से उत्पन्न होने वाली वमनजनक स्थिति सुबह सुध आने पर ही पता चलती है ।

कभी कभी देखा गया है कि बसों और यहाँ तक की कारों में बैठते ही और कुछ लोगों को सफ़र के नाम से ही वमन की इच्छा होने लगती हैं । इस स्थिति को अंग्रेजी में मोशन सिकनेस की संज्ञा दी गयी है ।
 ये गति से संबधित रोग है । कदाचित आपका मन राष्ट्र की विकास की गति से सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा है । क्योंकि वाम का अस्तित्व तब तक है जब तक पिछड़ापन और समाज में असंतुलन है । राष्ट्र अगर संतुलित हो गया तो वामी करेंगे क्या? इसी के चलते असंतुलन ही वामपंथ की संजीवनी है ।
 अगर राष्ट्र संतुलन की ओर एक कदम भी बढ़ाये तो वामपंथी को वमन की इच्छा होती है । यह सामान्य है । थोडा शांत बैठे कदाचित आपको महसूस हो कि सबके साथ आप भी बढ़ रहे हैं और आपको कुछ बेहतर लगे ।


रामायण में एक प्रसंग आया है, हालाँकि वाम से राम की बात करना एक संग्राम है किन्तु उल्लेख किया जाना आवश्यक है ।


जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा ।

मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥

मुठिका एक महा कपि हनी ।  
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥


इसमें लंकिनी ने हनुमान को कहा कि - 
हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना जहाँ तक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। 

महाकपि हनुमान्‌जी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर ल़ुढक पड़ी॥

कहीं न कहीं राम/राष्ट्र/सत्य के सेवकों को लिब्रलत्व/असत्य/राष्ट्रद्रोह की लंकिनी इसी प्रकार ललकारती हुई अपना आहार समझती है और काटने को दौड़ती है । उसे जब तथ्य और सत्य का घूसा पड़ता तब वह रुधिर वमन करते हुए लुढक पड़ती हैं ।
 अतः वमन की इच्छा सत्य के सामने आने पर भी हो सकती है ।


वमन की इच्छा का एक अन्य कारण मातृत्त्व हो सकता है । किन्तु वाम की समस्त गतिविधियाँ जीवन लेने में विश्वास करती हुई प्रतीत होती हैं या किसी के जीवन जाने पर उसका येन केन प्रकारेण किसी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करने या लाभ उठाने में । अभी तक किसी वामपंथी द्वारा किसी को जीवन देने की बात सामने आई नहीं है । और अगर जीवन का महत्त्व समझ आ ही जाए तो किसी पर वमन करने की इच्छा ही क्यों जागृत हो । अतः यह आशा  करना उचित नहीं हैं कि नव जीवन की उत्पत्ति ही वमन का कारण है ।


आपको अगर किसी मनुष्य पर वमन करने की इच्छा जागृत हो तो अपना इलाज शीघ्र कराएं । वात-पित्त के साथ कटुता में कमी लाएं । वाम के साथ जाम लाभप्रद तो कतई नहीं हैं ।

सुरा में बसकर किसी का कल्याण नहीं हुआ ।

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