देखने में बिल्कुल सफ़ेद , गोल भरा हुआ सा मुंह । लंबे लंबे दो हाथ एक पैर या शायद दो पैर एक हाथ, बनाने वाले ने इसे ऐसा ही बनाया था ।
जब बंद होता तो ताकता रहता ऊपर से । न जाने उसने इस घर में क्या क्या होते देखा है । जब चलता ताकता तो तब भी लेकिन नज़रें ज़रा तरेर लेता ।
पंचशील के ज़माने का लगा हुआ पंखा देश की उसी समय की विकास की रफ़्तार से घूमता । ऊपर से तो हवा आती लेकिन हम तक केवल पंद्रह प्रतिशत ही पहुँचती ।
गर्मी देश के माहौल जैसी हो रही थी । कभी भड़क जाती कभी एकाध हवा के झोंके से राहत मिल जाती ।
बिजली अटल जी के भाषण की तरह थी, जब होती तो इतनी जबरदस्त कि आसपास मौजूद हर चीज़ की धज्जियां उडवा देती ।
लेकिन जब विराम लेती, तो हम मुंह खोल के इंतज़ार करते कि कब आएगी । और फिर अचानक आती और पंखा अपनी औकात से ज्यादा तेज़ चलने लगता और फिर एक विराम ।
पिछले साल सुधरवाया गया था लेकिन, इस साल फिर उसका कोई पुर्जा, किसी पार्टी से रूठे हुए सांसद की तरह स्तीफा दे गया । इस पंखे की बिजली की खपत उतनी रही होगी जितनी किसी सरकारी परियोजना में पैसे की खपत ।
कभी भन्न करके ऐसे रुक जाता जैसे कोई नेता चार घंटे की भूख हड़ताल पर बैठ जाता और भनभनाता रहता । थोड़ी देर में खुद ही चल पड़ता जैसे स्टील के ग्लास में ग्लूकोस मिल गया हो । बस ये होने के लिए था और घर में अपने होने का पूरा अहसास कराता था ।
कभी कभी जब इसे हमसे बतियाने या मन की बात कहने का मन होता तो आधी रात को ख़ट ख़ट खटर खटर की आवाज़ करता और उठा देता सबको और सब ताकते रहते मुँह बाए ।
तेल का नशा सा था उसे,जब उसे चार बूँद तेल पिलाते तो आराम से मान जाता । खटर खटर बंद करके आराम से हवा झलता,और सुलाता था बड़े प्यार से सबको ।
उतार कर ले जाया गया है उसे और उसकी जगह मेड इन इंडिया, एनर्जी एफिसेंट एक नौजवान सा पंखा आया है।रिमोट से चलता है । सुना है सिर्फ अट्ठाइस वाट खाता है और हवा, हाँ भाई पूरी देता है , अभी हवा खाते में जमा नहीं होती |
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