एक बार की बात है, दो मित्र एक एसयूवी में बैठकर यात्रा पर जा रहे थे। उनमें से एक ने कहा "मित्र हम दिल्ली के पास हैं, मेरी मानो तो कोई बायपास लेकर बाहर से ही इस नगर को पार कर लो। इस नगर से हमें दूर ही रहना चाहिए। अंदर जाना खतरनाक है।"
दूसरे ने आश्चर्य पूछा – "क्यों मित्र?"
"यह बड़ा विचित्र नगर है। इस नगर में सबके बाप की पहचान है। यहाँ घुसने से पूर्व जानना होता है कि किसका बाप कौन है। यहाँ सबकुछ मुफ्त है। कमाई गुप्त है। शासन सुप्त है। इस नगर में अव्यवस्थाएं चरम पर हैं। कानून व्यवस्था भ्रम पर हैं। न्याय है विचित्र और हर चीज केवल दो कौड़ी की है मित्र।"
"यह तो बड़ा रोचक जान पड़ता है। एक बार तो देखना ही चाहिए कि यहाँ मुफ्त में क्या क्या मिलता है। कुछ नहीं तो दो-दो कौड़ी में मिलने वाली कुछ वस्तुएं ही खरीद लेते हैं।"
"मित्र रहने दो, यहाँ मनुष्य के प्राण भी दो कौड़ी के ही हैं।"
"प्राण तो हर जगह सस्ते हैं। मैं तो सस्ता खाना, मुफ्त पानी, सस्ता कपड़ा और यहाँ का खेल तमाशा देखना चाहता हूँ।"
"दूर से तो अच्छा लगता है, इस सब में फंस गए तो ये नगर जकड़ लेता है। बड़े बड़े लोग कौन जाए दिल्ली की गलियां छोड़कर कहते हुए यहीं फंसे रह गए। असली नकली का भेद मुश्किल है यहाँ। सब एक जैसा लगता है। सड़कें एक सी, चौराहे एक से। नदी और नाले एक से हैं। नदी में झाग बहता है, नालियों में लाशें। सरकार और अपराधी एक से हैं। चोर और राजा दोनों के पास महल हैं लेकिन दोनों जेल में रहते हैं। आधी जनता सड़क पर और आधी रेल में रहती है। मेला और धरना सदाबहार की तरह चलते ही रहते हैं।"
"यह शहर तो मुझे अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है। एक बार तो देखना ही है। चलते हैं कुछ खा-पी कर ही आ जाएंगे।"
"यहाँ का भोजन पचता नहीं है। चलो बाहर से ही निकल चलते हैं, किसी और राज्य की शुद्ध हवा में भोजन पानी करेंगे।"
"नहीं मैं तो जाऊंगा!"
"तो अकेले जाओ।" ऐसा कहकर पहला मित्र गाड़ी से उतर गया।
दूसरा मित्र दिल्ली की गलियों में घूमने लगा। अपनी गाड़ी लेकर गलियों को देखता और आनंदित होता। पहली बार उसने देखा एक ही जगह उसे सौ शहरों का प्रसिद्ध खाना मिल रहा था। हर ठेला और हर दुकान मशहूर और सौ-दो-सौ साल पुरानी ही थी। हट्टियाँ थीं, भट्टियाँ थीं, लस्सियाँ थीं। खाना मुफ्त था, पानी मुफ्त था, कीमत केवल उसकी वसूली जाती थी जो गले के नीचे उतरता था। वह खाता गया। गुण गाता गया।
फिर अचानक उसे कोतवाल ने पकड़ लिया।
खबर थी कि एक दुर्घटना हो गई थी। एक इमारत के तलघर में पानी भरने से कुछ बच्चों की जान चली गई थी। कोतवाल अपराधी को ढूंढ रहा था। उसे यह आदमी एसयूवी चलाते मिल गया तो धर लिया। ऐसा नहीं कि जांच नहीं हुई। पूरी जांच हुई और सरकार नीति के अनुसार हुई। वर्तमान सरकार की नीति थी कुछ भी हो प्रेस-वार्ता होनी चाहिए। अगर कुछ अच्छा हो तो उसका श्रेय तुरंत ले लेना चाहिए और कुछ गलत हो तो दोष किसी पर भी मढ़कर पल्ला झाड़ लेना चाहिए।
पहले दोष बिजली वालों पर लगा, जिन्होंने बारिश के समय बिजली नहीं काटी। उन्होंने बोला हमारा दोष नहीं, हम तो बिजली सरकारी योजना में मुफ्त बांट रहे थे, दुर्घटना तो पानी भरने के कारण हुई है। नाली टूटी, पानी भरा नगर निगम की गलती है।
आरोप मेयर पर लगा, जिसने नालियों की मरम्मत नहीं करवाई थी। मेयर ने कहा दोष हमारा नहीं, हमने तो साफ करने का आदेश दे दिया था। गलती अधिकारियों की है उन्होंने काम नहीं किया।
अधिकारियों पर दोष लगा तो अधिकारी बोले, हमारा क्या है, नेताओं से पूछिए। एक तो हमें वेतन भी नहीं देते ऊपर से ठीक से आदेश भी नहीं देते। इतने नेता हैं किसकी बात माने हमें तो यही पता नहीं।
नेताओं तक बात पहुँची, तो नेता बोले गलती नाली की ही है। बिना अनुमति के भर कैसे गई? और हमारे कार्यकाल में तो बनी ही नहीं। पिछली सरकार वालों ने नाली मजबूत नहीं बनाई थी। दोषी वो हैं।
पिछली सरकार पर बात पहुँची तो वे बोले, नाली तो हमारे कार्यकाल में बनी थी। लेकिन जाम इनके कार्यकाल में क्यों थी? दोष तो नगर निगम का ही है।
नगर निगम ने कहा, नाली तो अपनी जगह ठीक थी लेकिन इमारत में तलघर कैसे बना? दोष इमारत के मालिक का है। उसने बिना नक्शा पास करवाए तलघर बनाया। इमारत के मालिक ने कहा, इमारत ठीक, इमारत का तलघर ठीक, तुम ये बताओ नाली कैसे टूटी?
इसी सब आरोप प्रत्यारोप के बीच में किसी ने कहा जब बारिश हो रही थी तो ये आदमी अपनी गाड़ी लेकर इस इमारत के पास से गुजरा था। सारा दोष इसी का है। फिर तो आगे देखा न पीछे कोतवाल टूट पड़ा और उसे पकड़ लिया।
अब उसे समझ आया कि उसका मित्र इस नगर में आने से क्यों मना कर रहा था। लेकिन देर हो चुकी थी, अब वह मुख्यमंत्री का पड़ोसी था। उसी जेल में जहाँ सवा सौ एचआईवी पॉजिटिव कैदियों की संख्या गिनी गई थी और दोषी अभी तक मिला नहीं था। उसे डर यह था कि उन सवा सौ अपराधों को भी उसके सर पर न मढ दिया जाए।
उसका मित्र जानता था कि ऐसा ही कुछ होगा। उसने सोचा इन लोगों के विचित्र तर्क देकर ही जीता जा सकता है। उसने मीडिया में खबर चलवाई दोष गाडी चलाने वाले का नहीं था, दोष तो गाडी का था जो भरे पानी में भी चल रही है। आम गाड़ियां पानी भरते ही बंद हो जाती हैं। वह चल रही थी। दोष गाडी का है, जिसने नियम तोडा और पानी में बंद नहीं हुई। गाड़ियों को सड़क पर चलने की इजाज़त है पानी में नहीं। अगर उसे पानी में चलना था तो उसे अपना रजिस्ट्रेशन नाव की तरह करवाना था।
मीडिया ने खबर चलाई। कोतवाल ने गाडी को दोषी माना लेकिन गाडी को सजा कैसे दें, तो किसी ने कहा गाडी बनाने वाली कम्पनी को पकड़ा जाए। ऐसी गाड़ी बनाई कैसे। गाडी बनाने वाली कम्पनी के मालिक को समन भेजा गया। मालिक ने कहा हमको पता होता तो कि यह पानी में बंद नहीं होती तो कीमत दो लाख ज्यादा रखते। दोष हमारे इंजीनियरों का है, हमसे पूछे बिना बना दी। उनको पकड़िए।
इंजीनियर बोले गाड़ी तो थोड़ी देर में बंद हो ही जाती लेकिन पहले यह पता लगवाइए कि तलघर में बच्चे कर क्या रहे थे?
जॉंच में पता चला कोचिंग पढ़ रहे थे। कोतवाल पढ़ाने वाले को ढूंढने लगा। पढ़ाने वाला बोला, मैं तो बस पढ़ा रहा था कोचिंग के मालिक से पूछिए, तलघर में पढ़ाने क्यों बोला। कोतवाल कोचिंग के मालिक के पास पहुँचा।
मालिक बोला अकेला मैं कैसे दोषी हो सकता हूँ, सब कोचिंग वाले तलघर में कोचिंग चलाते हैं। ऊपर से मैं तो मंत्रियों को चंदा भी देता हूँ।
कोतवाल मंत्रियों के पास पहुँचा, सभा बैठी। सभा में चर्चा हुई, कोचिंग का मालिक निर्दोष पाया गया। मेयर और मंत्री निर्दोष पाए गए।अधिकारी और कर्मचारी निर्दोष पाए गए। बिजली वाले निर्दोष मिले। गाड़ी चलाने वाला भी निर्दोष सा ही लगा। अब दोषी बचे इमारत, नाली और गाडी। गाड़ी पहले ही जब्त हो गई थी, नाली टूट कर मर चुकी थी। लेकिन न्याय में अभी कुछ कमी सी लग रही थी किसी को तो फांसी होनी चाहिए। आखिर जान गई है और जान के बदले जान जानी ही चाहिए।
इमारत को सजा देने के लिए उसपर बुलडोजर चलाने का आदेश हुआ। इमारत का मालिक दौड़ा दौड़ा आया बोला, दोष इमारत का नहीं है। अगर इतने ज्यादा बच्चे न हों तो तलघर में पढ़ाना ही क्यों पड़े? दोष बच्चों का है। सबको कोचिंग पढ़नी ही क्यों है? अब इस मामले की जाँच मीडिया करे। कोतवाल छुट्टी पर जाएं।
मीडिया ने बच्चों के माँ-बाप को दोषी बताया, बोले इतनी दूर भेजते ही क्यों हैं, बच्चे बुरी हालत में रहते हैं। मीडिया बच्चों के पास गया, बच्चे बोले हमारे माँ-बाप भेजते हैं, लेकिन उनको दोष मत देना। प्रतियोगिता कठिन है, परीक्षा कराने वाले कठिन प्रश्न पूछते हैं हमें पढ़ना पड़ता है।
मीडिया ने शिक्षा व्यवस्था और बढ़ती प्रतियोगिता को दोषी बताया और दोष को केंद्र सरकार की शिक्षा नीति पर मढ़ दिया। केंद्र सरकार के पास इस सब का कोई उत्तर न कभी था, न है। जैसे दुर्घटनाओं का दोषी न कोई होता है, न इस बार है।
हाँ, हर अच्छे शासक के पास एक लिखी लिखाई बात होती है, जिसे सुनकर मीडिया और जनता शांत हो जाती है। हर मामला ठंडा हो जाता है। सरकार ने भी वही बात दोहराई - "दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा, कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाएगी।"
यह सब कह सुन-कर दिल्ली की सरकार वापस अपने नियमित प्रेसवार्ता वाले कार्यक्रम में व्यस्त हो गई।
कोचिंग ज्यों की त्यों चलने लगी। जनता अपने में व्यस्त हो गई और नाली अगली बारिश में उफनने की प्रतीक्षा करने लगी, क्योंकि नालियों को अपनी भड़ास निकालने के लिए बरसात का ही तो मौसम मिलता है। फिर अगली बारिश में, कहीं और से उफन पड़ेगी। किसी और इमारत में घुस जाएगी।
