शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

चच्चा गुलाबीलाल

ये देश इसलिए है क्योंकि चच्चा गुलाबीलाल अलहाबादी  थे , गुलाबीलाल न होते तो भारत नहीं होता | दरअसल भारत की खोज तो चच्चा गुलाबीलाल ने ही की थी | उससे पहले तो भारत में केवल सांप और सपेरे ही रहते थे |  पर भारत खुजा हुआ नहीं था  |
गुलाबीलाल को सेवक बनने का बड़ा शौक था, इसीलिए उन्होंने अपना नाम गुलाबदास रखवा लिया था | गुलाबी तबीयत के मालिक गुलाबदास की आँखें भी गुलाबी थी  | जिनसे प्रभावित होकर एक शायर ने "गुलाबी आखें जो तेरी देखीं" नामक गीत लिखा |
चच्चा दरअसल बड़े सेवक थे ऐसा उनके एक वंशज पत्रकार जातपूछे ने बताया | पत्रकार जातपूछे वास्तव में प्रवक्ता थे, प्रवक्ता से कभी कभी पत्रकार का भेष धर लेते थे | भाषा की लच्छेदारी में जातपूछे का कोई जवाब नहीं था | कभी माइक लेकर सड़क पर निकल पड़ते ,कभी सड़क इनपर निकल पड़ती |
नयी सड़क पर लफत्तू के किस्से गढ़ते गढ़ते ये लोगों से आसानी से जुड़ जाते |  जब ये प्रवक्ता के रूप में होते तो अपनी पार्टी के गीत गाते | ये देश उन्हें चच्चा गुलाबदास की विरासत लगता|किसी ने अगर कुछ कह दिया तो इनको चच्चा खुद रात को सपने में आके बताते की फलां आदमी ने जो ये कहा है न कि "रात काली है " ये तो हम उन्नीस सौ बाइस  में कह दिए थे | देश की रातो पर कालिख हम ही तो पोत के गए हैं | नहीं तो पहले कहाँ रातें इतनी काली होती थीं | 
ये तो चच्चा गुलाबदास की  विरासत थी की आजतक गाँव गाँव में बिजली गुल रही | 
फिर प्रवक्ता से पत्रकार बनकर अपने सपने को सुनाते हुए जातपूछे सबको बताते, ये तो तुम्हारे पप्पा को भी नहीं पता था , हमें तो खुद चच्चा कान में बता कर गए हैं की ये उन्होंने कहा था | अब लोग चुरा रहे हैं | 

पत्रकार जातपूछे, के कुछ विशेष नियम थे जिसके अंतर्गत वे उसी अवसर पर आते थे जब वाम का दम फ़ूलने लगता था | वामा-गौरी से लेकर वामप्रस्थ के  टुकड़े टुकड़े समूह तक के लिए इनके प्राण हथेली पर होते थे | इनको विशेष सिद्धि प्राप्त थी ये हर चीज़ के विशेषज्ञ थे |

उनका मानना था कि गुलाबजल से लेकर गुलकंद तक की खोज चच्चा गुलाबदास ने की थी|यहाँ तक कि गुलगुले में जो गुल खिलता है वो भी चच्चा का खिलाया हुआ होता है|  
एक बार चच्चा ने जातपूछे को बताया कि, प्राचीनकाल में जब वेद पुराण लिखे जा रहे थे तो  वो लिखवाने वाले चच्चा खुद थे |
सामवेद का सा चच्चा का चा था जो अपभृंश होकर सा बन गया | रामायण में भी चच्चा ने बाल्मीकि का रोल निभाया था |  और महाभारत में अर्जुन के धनुष के रोल में चच्चा खुद थे |
महाराज विक्रमादित्य के पीछे लटकने वाले बेताल का रोल चच्चा निभाकर अमर हो गए |

चच्चा ने इस देश पर दो उपकार और किये एक तो स्वयं हो भारत रत्न देकर भारतं रत्न की वैल्यू बढ़ा दी और दूसरी अपनी विरासत छोड़ गए | वरना तो इस देश के पास था ही क्या ?

मुंशीजी बहुत कर लिए

गंज में वैद्य जी एकमात्र थे जिनपर गंज के बीमार निर्भर थे | गंज में बीमार तो तरह तरह के थे लेकिन इलाज हमेशा वैद्य जी की पुड़िया ही थी  | वैद्य जी एक झोला रखते थे अपने पास, उनका झोला भानुमति का पिटारा था | 
हाथ डालते और बीमार की देने-लेने की क्षमता के हिसाब से पुड़िया निकाल देते | वैद्य जी नब्ज देखकर ही जेब में पड़ी चिल्लर तक गिन लेते थे । चेहरा देखकर अगले क्षण आने वाले उधार को पहचान लेते थे । पेट के दांत वैद्य जी से छुपते न थे । 

इसी झोले को उठा के चल देने की धमकी देते और गंज के गंजहे "न जाओ सैयां छुड़ा के बइयाँ" का राग अलाप देते|गंजहों की छाती पे सांप लोट जाते और वैद्य जी मुस्कुरा के अपनी जगह बैठ जाते,फिर किसी को पुड़िया देने लगते |वैद्य जी अपनी  विद्या के धुरंधर थे ये तो उनके शत्रु भी जानते थे | 


गंज के बीमारों की भी तो मजबूरी थी , वैद्य जी की टक्कर का दूसरा दूर दूर तक कोई नहीं था |  ले देके दो चार लोग थे, जो लोगों का इलाज करने का दम भरते थे ,लेकिन सब भभूति बाज थे । एक ओझा था जो वैद्य जी का किरायेदार,झाड़ फूंक करता था | लेकिन झाड़ू से झाड़ने से कौन रोग दूर हुआ है | ऊपर से खुद टीवी का मरीज तो लोग उसे वैसे ही दूर रहते थे |  

एक पहलवान था जो मालिश करके रोग दूर करने का दवा करता था , लेकिन हड्डियां मरोड़ने से कितने लूले लंगड़े हो गए उसके हिसाब के लिए सरकार को अलग विभाग बनाना पड़े | अब उनके लड़के ने अखाडा संभाल लिया , लेकिन पंचर सायकल लेके पंचरवालों के चक्कर काटता फिरता है | 

एक बूढ़ी फूफी है जिसने हाथी पाल रखा है, कहती है हाथी की पूँछ से झड़वा लो रोग झड़ जायेंगे धूल की तरह | जो जाता उससे हाथी के लिए एक वक्त का खाना मांगती । गंज के गरीब कहाँ हाथी को खिलाने लायक कमाते थे ? 

एक बंगाली तांत्रिक है जिससे सारा गंज डरता था | उसके बगल से निकल जाओ तो रोंगनाथ, रोंगनाथ करके सबको डरा देती । 
एक वेदों के लूज ट्रांसलेशन सीख के पंडित बना जनेऊधारी , मंगल शनि राहु की दशा, बृहस्पति कि गति,  बताता रहता, और हाथ फैला के दक्षिणा मांगता था | लोग इसकी ख़राब दिशाओं और दशाओं और पूर्वजों के नाम पे दक्षिणा मांगने से ही परेशान थे | असली सनीचर के बाद एक सनीचर गंज पे ये भी था | 

कुल मिला कर बीमारी का इलाज करने के लिए एक ही विकल्प थे वैद्य जी | जाएं तो कहां जाएं उम्मीद केवल वैद्य जी से और वैद्य जी अगर रास्ता भटक गए तो समझ लो पूरा गंज का बंटाधार निश्चित है | 

एक बार गंजहों ने कहा वैद्य जी ज़रा बीमारी नंबर ३७० का इलाज तो बताइये | वैद्य जी चल दिए कश्मीर अपना झोला उठा के | घर से निकले तो थे कि नुस्खे लाएंगे, और पक्का इलाज करेंगे ।  लेकिन रस्ते में मिल गयी महबूबा, वैद्यजी फंस गए मुफत में । महबूबा ने वैद्यजी को ऐसा घुमाया कि वैद्यजी पुड़िया नुस्खा सब भूल गए । ऊपर से महबूबा ने पकड़ा दी कश्मीरी बाम ।  अब वैद्यजी को  दर्द  होता है बाम लगा लेते हैं । नुस्खा याद आता ही नहीं ,कह रहे थे जड़ी बुटिये नहीं न होगी तो काहे का नुस्खा बनाएंगे । लेकिन गंवई लोग का क्या होय, उनके गांव में तो वैद्य ठहरे एकहि ।
वो तो अपनी बाम लगा के आराम पा जाते, लेकिन गंजहे कहते, नुस्खा नहीं दिये तो नोटा लगा देंगे । 

वैद्य जी को तो लोग फिर भी इज्जत देते थे ,लेकिन वैद्य जी ने पाल लिए थे एक मुंशी | मुंशी जटिल प्रसाद , बड़े ही चारपाई किसम के व्यक्ति थे | इनका काम था गाँव वालों के पैसे का हिसाब किताब | 

पहले तो जब मुंशी जी पंचायत के चुनाव में खड़े हुए तो वैद्य जी के घोड़े-गदहे सब जीत गए , लेकिन मुंशीजी हार गए | हार के बाद भी , वैद्य जी ने इनको पिछले दरवाजे से पंचायत की तिजोरी पकड़ा दी | और मुंशीजी ने यहाँ से पंचायत में अपनी हार का बदला निकालना शुरू कर दिया |हिसाब किताब तो बढ़िया करते थे , वैद्यजी के कई जटिल काम भी निकलवा दिए थे मुंशीजी ने, लेकिन हिसाब किताब रखते रखते, धीरे से दारोगा की वर्दी भी पहिन ली ।गंजहों के दिल में जगह नहीं बना पाए । 

अव्वल तो लोगों को रायजादा के तबेले से बड़ी चिढ थी,क्योंकि एक तो रायजादा कुढैल आदमी था, दूध के नाम पे नाले का पानी मिला के बेचता था | 
दूसरा इसकी पाली हुई भैंसो के आतंक मचा रखा था | हर आने जाने वाले पे गोबर उछालती रहती | लेकिन मुंशीजी को गोबर से जाने क्या लगाव था कि मौका मिलते ही तबेले पे जाके पसर जाते | लोग कुढ़ के रह जाते कि वैद्य जी के मुंशी, तबेले पे गोबर में खुद ही लोट रहे हैं |  मुंशीजी ये सब करने के बाद नहा धो के वैद्य जी के बगल में बैठ जाते | 
उनको एक और बुरी आदत थी , खाली बैठने की । वैद्यजी के बगल में जाकर खाली बैठ जाते थे, जैसे भांग घोट आये हों । 
वैद्यजी उनको खाली देखकर कहते, कुछ कर लो ।और मुंशी जी नया फरमान निकाल देते नया "कर" लेने का ।

गंजहे परेशान होते रहते कितना "कर" लेंगे ? और ये इतना "कर" लेंगे, तो वैद्य जी अकेले क्या कर लेंगे? 
गंजहे देख रहे थे, वैद्य जी काम कर कर के हार रहे थे और मुंशी जी कर लगा लगा कर मार रहे थे । 

भीमखेड़ा वाले लोग वैद्यजी को देने के लिये थाली भर के परसाद लाते और मुंशी जी उसमे से झपट्टा मार के मुट्ठी भर ले जाते । 
मंदिरो के बाहर परसाद की थैली छीनने वाले बंदरों जैसी टुकड़ी बना ली थी । जिनको देखते ही लोग कहते छुपाओ नहीं तो छीनेगा । अगर बन्दर छीने न, और शांति से बैठ जाएँ, तो लोग खुद ही बजरंग बली समझ कर खिलाते रहें । लेकिन छीना झपटी में बहुत छीछालेदार हो गयी थी , मुंशी जी की तो ठीक है वैद्य जी की भद्द ज्यादा पिट रही थी ।

गंजहे सब तो सहते आये, लेकिन जब भांग घोंटने पे कर लगा दिया , तो पानी नाक तक आ गया ।ऊपर से कहते हैं, दादा परदादा के जमाने से जितनी भांग जिसने घोंटी है, वो कर देगा और जिसने मुफ़्त की भांग पी है वो भी कर देगा । ये नहीं समझते कि गंजहे कर तो देंगे , लेकिन उनकी धोतियां कौन धोएगा?

मुंशीजी समझ चुके थे,कि पंचायत चुनाव में जब वैद्यजी खड़े होंगे,गंजहे बहुमत तो देंगे लेकिन GST काट के । GST के रूप में उनका ही पत्ता कटेगा। मुंशीजी की होशियारी है,जो पहले ही अपनी कुर्सी पिछले दरवाजे पे सेट कर ली है। 

मुंशी जी का उठना बैठना तो हवेली में भी है, अंग्रेजी बोलते हैं, सो वैद्यजी रहें न रहें मुंशी जी के हाथ में तिजोरी बनी रहेगी । लेकिन  वैद्यजी भी चाहें तो अगली बार जब वे मुंशी जी से कहे  की कुछ कर लो, तो देख लें की वे क्या कर रहे हैं । और मुंशीजी अगर वैद्यजी की सत्ता को बढ़ते देखना चाहते हों, तो अब और कुछ न करें । बहुत "कर" लिया अब वैद्यजी को देखने दें ।

#राग_दरबारी
#मुंशीजी_बहुत_कर_लिए

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

धींगा वंश का राजकुमार और शून्यभट्ट का षड्यंत्र

वि.सं. 2068 के लगभग एक विशाल राज्य में एक धींगा वंश का शासन था ।धींगा वंश लगभग सौ वर्षों से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से राज्य संभाले था । तत्कालीन महारानी की नीति अप्रत्यक्ष रूप से शासन करने की थी । 
महारानी ने सिंहासन पर मूकेश्वर नामक दिव्य दृष्टा को बैठा रखा था । वह देखता तो सब कुछ था करता कुछ नहीं था । सभी निर्णय महारानी ही लिया करती थी । राज्य विशाल था, उत्तर से दक्षिण तक फैला हुआ और सभी जगह एक ही राज चलता था धींगा वंश का राज ।

एक समय की बात है राज्य के युवराज ने एक महायज्ञ करने का प्रस्ताव रखा, जिसे अश्वमेध यज्ञ कहते हैं । इस यज्ञ में एक घोडा छोड़ दिया जाता है और जहाँ जहाँ घोडा जाता है उसके पीछे एक सेना जाती है ।जिस राज्य में घोडा 
पहुँचता है, वहां का राजा या तो घोड़े को नमन करके यज्ञ करने वाले का आधिपत्य स्वीकार लेता है या युद्ध कर के परास्त करने पर स्वयं अधिपति बन जाता । 

महामंत्री शून्यभट्ट ने कहा युवराज हमारा आधिपत्य तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पहले से समस्त क्षेत्रों और दिशाओं में है यह यज्ञ करना ही क्यों है?
इससे तो हमे शून्य ही प्राप्त होगा |

 अपने शून्य जैसे मुख पर शून्य जैसी भाव भंगिमा बनाकर शून्य मे डूब जाने वाले शून्यभट्ट ने एक बार शून्य की खोज की थी | तब से उनका नाम शून्यभट्ट पड़ा था | चाँदनी चौक के तले हुए पराठे और जमा मस्ज़िद की गली के कबाब खाकर एक बड़े से शून्य के आकार की देह बड़ी जटिलता से प्राप्त की थी | अत्यंत न्याय प्रिय थे शून्यभट्ट | ये न्यायालयों को रात्रि के किसी भी प्रहर मे खुलवाने की विद्या जानते थे | यहाँ तक कि बड़े बड़े न्यायाधीशों को केवल अपनी विचार शक्ति (टेलीपैथी)के द्वारा संदेश भिजवा कर भी न्याय प्राप्त कर लेते थे | किसी भी प्रकार का दुराचारी , देशद्रोही, दुष्ट ,दुरात्मा हो ये उसको न्याय दिलाए बिना नही रहते | न जाने कितनो को इन्होने दुर्दिन से बचाया | 
शून्यभट्ट ने एक बार षड्यंत्र रचा, न्याय के तराजू मे वंशरक्षा के प्रण की चुंबक एक पलड़े मे चिपका कर न्याय को पाना चाहते थे | किंतु वही चुंबक उनके मुँह पर दे मारा गया और उन्हे पुनः शून्य मिला था | उनके बड़े दुर्दिन चल रहे थे |

युवराज ने कहा राज्य और दृढ करना है और जो बीच बीच में दो चार क्षेत्र हैं लगे हाथ उनपर भी अधिकार जमाना है ।

व्यर्थमंत्री मरबदांची ने कहा कीजिये अवश्य कीजिये अभी तो खजाने की कमी नहीं है, कोषागार से पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा ।

युवराज चींवि एक अत्यंत रहस्यपूर्ण व्यक्ति था । कोई इस व्यक्ति को अभी तक समझ नहीं सका था। युवराज कभी कभी इस प्रकार की बात करता कि वह सबके हास्य का पात्र बनता । उससे उत्तर की बात करो तो पश्चिम कहता , नीति की बात करो तो सीटी की बात करता । शिक्षा की बात करो तो रिक्शा की बात करता था ।

उसके प्रशंसकों को लगता कि वह छायावादी विनोद कर रहा है और वे उसमे भी कोई गूढ़ अर्थ ढूंढ कर उसकी वाह वाही कर उठते । उसके कुछ विशेष चाटुकार थे । 
महिषी वील्लप तो चींवि के छींक ध्वनि से अपान वायु प्रावह कृत नाद तक को क्यूट की संज्ञा देती थी । महिषी का चींवि के प्रति विशेष प्रेम था ।

चींवि को समझना बहुत ही जटिल कार्य था, वह स्वयं भी कहता फिरता कि वह अज्ञानी है । कुछ लोग यह समझते कि वह नम्रतावश यह कहता है और उसकी वाहवाही करते । किन्तु अधिकतर लोग समझते वह सत्य बोल रहा है ।
लोग उसके नाम से बहुत विनोद करते । विनोद से उपहास बनने में समय नहीं लगता ।  

सदा राजमहल में रहा, राजमहल में बढ़ा और आधी सदी तक राजमहल मे ही पड़ा रहा । जब धरती पर रहने वाले लोग , जीवित ही धरती मे धंसते जाते तब उसका जन्मोत्सव आकाश में मनाया जाता । उसने किसी विद्या को प्राप्त किया या कोई विद्या उसको प्राप्त करके धन्य हो गयी यह तय कर पाना कठिन है । पांच वर्ष के होने पर उसकी मित्रता ज्ञान और विवेक से हुई । ज्ञान और विवेक उसके होने भर से इतने प्रभावित थे कि वे स्तब्ध रह गए । चींवि पांच से पचास वर्ष का हो गया, किन्तु उसके मित्र ज्ञान और विवेक अब तक भूतकाल में अटके रहे । वे कभी पांच वर्ष से आगे बढ़ ही नहीं पाये ।
 
चींवि ने दरिद्र और दारिद्र्य को किसी संग्रहालय की वस्तु की तरह ही देखा जितना कि उसे दिखाया गया । वह समझता रहा कि उसके राज्य के सभी लोग दरिद्र हैं और दरिद्रता एक रोग । इस रोग का निदान एक बार उसकी दादी महारानी ने "दारिद्र्य नाशं भवतु" के महामंत्र से करने का प्रयत्न किया । परंतु यह रोग फैलता चला गया ।
 उन्होंने मन्त्र तो सीखा पर मन्त्र को सिद्ध नहीं किया । जाप तो किया परंतु मन्त्र के सफल होने के लिए आवश्यक क्रिया नहीं की । उन्होंने दरिद्रता का 
नाश करते करते दरिद्र के नाश के पथ को चुन लिया । इसी के चलते चींवि दरिद्रता की छाया से दूर रहा । 

धींगा वंश को लगता था की दरिद्रता ही इस राज्य की पहचान हैं । इनके एक पूर्वज तो अन्य राज्यों के राजपुरुषों के मध्य सर्पविदों को दिखा कर कहते ये देखो, ये मेरा राज्य है | अन्य राज्यों में यह बात फ़ैल गयी कि वास्तव में यह भूमि सर्पो और सर्पविदों की ही भूमि है ।  वर्षों तक राज्य का नाम सुनते ही लोग समझते ये सर्पविद पूर्णतया जंगली लोग हैं | विश्व मे इस छवि से निकलने मे अगणित वर्ष लग गये | 

एक बार चींवि राज्य में भ्रमण के लिए निकला । एक स्थान पर उसका वाहन रुका तो उसने एक समाचार पत्र लेने का प्रयास किया, कीमत तो कभी पता थी नहीं, तो पांच सौ मुद्राएं दे दीं । उसके प्रशंसकों को लगा कि कुमार अत्यंत दयालु हैं ।
चींवि आधुनिक युग का कर्ण बन गया | जैसे उसने अपने कवच और कुंडल ही उस बालक हो दे दिए हों | पारिवारिक इतिहास थोपने वाले थोपर जैसे इतिहासकार और महिषियों ने चींवि को राष्ट्रीय दानवीर बना देने मे कोई कसर नही छोड़ी |

चींवि को अंतर्ध्यान होने की विशेष सिद्धि प्राप्त थी । वह जब चाहे जहाँ चाहे अंतर्ध्यान हो जाता और कहाँ पहुँचता यह सदा ही रहस्य बना रहता । एक दो बार राज्य से अंतर्ध्यान हो ननिहाल पहुँच जाता है ऐसी खबर उसने स्वयं ही फैलाई । शिक्षा दीक्षा और संस्कार ननिहाल से प्राप्त होने के कारण अपनी नानी से विशेष प्रेम करता था ।
 
जीवन के अर्धशतक को पार करने के पश्चात भी विवाह न करने का रहस्य राज्य में कोई नहीं जानता था । ब्रह्मचारी वह था नहीं । एक धींगा वंश के जानकार का मानना था की वह वंशवाद से परेशान था और स्वयं अपने वंश का अंत चाहता था । 

किन्तु एक अन्य अफवाह राज्य में थी, कि वह राजा बनना नहीं चाहता । वह किसी अन्य राज्य की एक कन्या से प्रेम करता था और उस कन्या को एक साधारण जीवन देने का वचन दे चुका था । किन्तु उसके आसपास के लोग उसे राजा बनाने के लिए बाध्य कर रहे थे ।
वह भी राजकाज से दूर रहना चाहता था , अतः कोई रास्ता न देख उसने स्वयं ही अपने वंश के शासन काल का अंत करने का प्रण कर लिया था ।
 
परंतु यह अश्वमेघ यज्ञ ? यह एक रहस्य था कि आखिर जो राज्य न संभालना चाहता था वह राज्य विस्तार क्यों करना चाहता था? यज्ञ की तैयारियां की गयी । राज्य की महिषियों ने मंगल गान किया , चींवि की जय जयकार से राज्य गूँज उठा ।

शुभ मुहूर्त में यज्ञ प्रारम्भ हुआ , राजकुमार यजमान बने । यज्ञ पशु को छोड़ दिया गया । पीछे पीछे राजकुमार सेना समेत यान पर निकल पड़े ।
यज्ञ पशु पहले हसीनापुर पहुँचा, जहाँ मार्जनीदण्ड वंश के शासक रीजक ने मार्जनीदण्ड से ही  यज्ञ पशु को पीट पीटकर भगा दिया और चींवि का यान ध्वस्त कर दिया । हसीनापुर के राज्य को हारा हुआ मानकर चींवि ने पुनः यज्ञ पशु को छोड़ दिया । यज्ञ पशु जहाँ जाता राजकुमार को हार का सामना करना पड़ता । धीरे धीरे धींगा साम्राज्य सिमटता गया ।

राजकुमार को लगा कि शायद हार के लिए उन्हें लोग दोषी समझते हैं । वह ये तो नहीं चाहता था । वह चुपचाप सब समाप्त कर निकल जाना चाहता था । किंतु उसका रहस्य अब खुलने लगा था ।
 

वह हारना भी चाहता था और दोष भी लेना नहीं चाहता था । वैसे भी अभी तक की किसी हार पर उसको किसी ने दोष नहीं दिया था । कभी यज्ञपशु को दोष दिया जाता । कभी राजकुमार के यान को । कभी दोष लेने राज्य की महिषियाँ प्राण न्योछावर करने आ जाती कभी श्रेष्ठि स्वयं राजकुमार के चरणों में बिछ जाते । चींवि के सैनिक कुर्बानी दे देते ।मंत्री आत्मघात कर लेते पर राजवंश पर दोष नहीं आने देते । कभी पराजय को नैतिक विजय घोषित कर उत्सव मनाते । इतनी पराजयों के पश्चात भी चींवि उनकी  दृष्टि में महानायक था , अविजित था । चींवि अजेय बनकर कही भी जाते और अपनी विजय गाथा सुनाते । कभी कहते किसी नगर को स्वर्ग बना देंगे , कभी कहते स्वर्ग कैसे बनेगा ये उनसे न पूछा जाये । क्या सोचकर नगर को स्वर्ग बनाने की बात करते यह तो उनका भाषण लिखने वाला ही जानता ।

यहाँ अश्वमेघ यज्ञ चल ही रहा था कि जम्बूदीप के केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया और ढींगा वंश विपक्ष में जा बैठा । अब चींवि छद्म सम्राट से विपक्ष की ओर से सिंहासन के दावेदार बन गए |

धींगा वंश के विश्वासपात्रों में नैराश्य था, वे सभी अपना साम्राज्य नष्ट होते देख दुखी होते । अब इनके हाथों में कुछ प्रांत ही बचे थे ।पर पराजय ने तो जैसे चींवि से गंधर्व विवाह ही कर लिया था | जहाँ जाता पराजय उसके साथ चलती | कुल बीस प्रांत हार चुकने के बाद जब धींगा वंश का शासन लगभग समाप्त हो गया, समय आ गया था कि असफलताओं का एक आंकलन किया जाए | तब चींवि ने कबरी-अनल्या नामक छद्म भेष संस्था से पूछा कि उसका अश्वमेघ उल्टा क्यों हो गया वह दिग्विजय चाहता था परंतु उसका साम्राज्य सिमट क्यों गया | संस्था ने जो बताया वह चौंकाने वाला था | 

मंत्री शून्यभट्ट ने यज्ञ से पूर्व एक विचार प्रस्तुत किया था - कुछ सप्ताह पूर्व एक प्रांत में एक अश्व की मृत्यु से राज्य में संकटजनक स्थिति आ गयी थी । अतः अश्व का प्रयोग न किया जाए । सड़को पर अश्व का निकलना सुरक्षित भी नहीं है, कोई अन्य उपाय निकाला जाये । शून्यभट्ट ने कहा कि जब शासन करने के लिए छद्म शासक का प्रयोग किया जा सकता है तब अश्वमेघ के लिए छद्मअश्व का प्रयोग नहीं हो सकता?

तब राजकुमार की अश्वशाला संभालने वाले विश्वासपात्र नजुरकाल्लिमन् ने कहा हम एक रासभ को अश्व की भाँति श्रृंगार कर तैयार करते हैं और वही हमारे यज्ञ का पशु होगा । कही सड़कों पर विचरण करेगा और राजकुमार स्वयं उसके साथ दिग्विजय को निकलें |

इस प्रकार शून्यभट्ट और नजुरकाल्लिमन् ने मिलकर एक षड्यंत्र रचकर एक रासभ का शृंगार कर चींवि को "यह अश्व है" कहकर दे दिया | और रासभ भूरिकर्ण यज्ञपशु बन कर चुका था | और जब एक बार राजकुमार ने कहा की यह अश्व है तब कोई और कैसे मान सकता था कि वा अश्व नही है | भूरिकर्ण दिग्विजय के लिए छोड़ दिया गया । पीछे पीछे राजकुमार सेना समेत खरयान पर ही निकल पड़े । 

कबरी-अनल्या नामक छद्म भेष संस्था ने समझाया - अश्वमेघ में अश्व ही छोड़ना चाहिए । रासभ का श्रृंगार करके छद्म अश्व बना तो सकते हैं, किन्तु उससे दिग्विजय प्राप्त नहीं की सकती । 

भूरिकर्ण दंडकारण्य के दक्षिण की ओर बढ़ा । यह धींगा साम्राज्य का प्रत्यक्ष आधिपत्य वाला अंतिम छोर था । यह प्रांत हाथ से जाने से धींगा वंश को बड़ा आघात लग सकता था । शून्यभट्ट ने चींवि को फिर एक उपाय बताया था - बेन्डाकलुरु के मध्य 

खड़े होकर बचाओ बचाओ चिल्लाना और मस्तिष्क के शून्य मे ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए अंतरध्यान हो पाने के सुख रखना | 

यज्ञपशु प्रांत में प्रवेश कर चुका था । राजकुमार का खरयान राज्य के केंद्र में खड़ा था । और राजकुमार रैया-सैंया-भैया-सरैया जाने क्या क्या बड़बड़ा रहे थे और अंको के चाणक्य हशा ने राजकुमार को उसकी सेना समेत प्रांत के बीच में ही घेर लिया था ।
 वे अब भी अपनी वास्तविक इच्छा अर्थात राजकाज छोड़ देने में रूचि रखते थे । पर अश्वमेघ अभी चल ही रहा था  । उन्हें यज्ञ का संचालन अंतिम क्षण तक करना था | पीछे हटने का कोई रास्ता नही था | और यही उनके बच निकलने का रास्ता था । राजकुमार ने एक अभियान छेड़ा है #SaveConstitution नाम से | जिसमे वे विधान बचाओ के नाम पर स्वयं को बचाने का प्रयास कर रहे हैं | परिणाम अखंड अनंत अनमोल शून्य है यह सर्वविदित है | 





रविवार, 22 अप्रैल 2018

वमन विचार

रक्तवर्ण पृच्छ वाली ब्राह्मणिका जिसे ब्राहमनी या बामनि भी कहते हैं | यह लोभवश ओले निगल लेती हैं, जो उसके लिए आत्मघाती सिद्ध होते हैं | ऐसी ही काई ब्राह्मणिकाये आजकल उठते तूफान के समय निकल कर आ जाती हैं और सोचे समझे बिना ओले निगलने मे लग जाती हैं |

किसी रक्तवर्ण पृच्छ वाली ब्राह्मणिका ने मनुष्यों पर वमन की इच्छा प्रकट की है | उनकी पृच्छ के रक्तवर्ण होने का कारण वामपंथ का प्रभाव है या वामपंथ के प्रभाव से उनकी पृच्छ रक्तवर्ण हुई है यह तो उन ही को पता होगा | परंतु उनकी इस प्रकार की इच्छा को समझना अत्यंत आवश्यक है | 

वमन ग्रंथ के कुछ अंशों का अध्यन बताता है कि, वामपंथ का वमनग्रंथ से गहरा नाता है | 

जब वामपंथ आपके रक्त में प्रवाहित होने लगे । जब आपके जीवन में कटुता पद-नख से मुख तक मुखर हो । अम्ल पाचन तंत्र से उल्टा प्रवाहित हो कटु वचन स्वरूप जिह्वा तक पहुंचने लगे । तब वमन होता ही है । वमन की इच्छा कई कारणों से हो सकती है । परंतु किसी मनुष्य पर वमन की इच्छा रक्त में प्रवाहित एवं मन में समाहित विष से ही हो सकती है । 
कदाचित किसी व्यक्ति की उपलब्धियाँ आपके हृदय में रक्त के स्थान पर अग्नि का प्रवाह करती हों । आपके उदर से खट्टी डकारें आती हों और आपकी ग्रीवा ज्वलनशील प्रतीत होती हो । 
किसी अन्य की उपलब्धि को पचा पाना इतना सहज नहीं होता और अपच की इसी स्थिति को अम्लिकोद्गार कहते हैं ।
 इस स्थिति में वमन की इच्छा जागना सामान्य है । 
इसका इलाज केवल अपने मन की कुंठाओं और अन्य व्यक्तियों की सफलताओं को स्वीकार करना हो सकता है, किंतु जो वामी हो जाए उसे कोई सुखी दिख जाए तो कष्ट हो जाता है। 
वामी का सुख उसके सामने होने वाले संघर्षों में निहित है । ये वही लोग होते हैं जो चलते फिरते पार्किंग में खडे पड़ोसी के नए वाहन को केवल इसलिए खरोंचते जाते हैं कि इससे पड़ोसी को कुछ कष्ट पहुंचे ।


सुरा को असुर की भाँती पी जाने पर भी लोग वमन करते देखे गए हैं । ऐसे लोग एक एक करके इतनी सुरा पी लेके हैं कि इनका उदर इधर-उधर हो किधर से भी खाली होने के लिए बाध्य हो जाता है । अंदर ही अंदर ऊर्जा और मूर्छा का ऐसा समावेश होता है कि सुरा पान करने वाला स्थान देखता है न मान, न बिस्तर देखता है न चद्दर । न शयनकक्ष देखता है न स्नान कक्ष ।

ऐसी वमन जनक स्थिति में कौन कहाँ कैसे किसपर वमन करता है नहीं रोका जा सकता । किंतु जो साथ में बैठ कर सुरपान कर रहे हों उन्हें भी कहाँ इतनी सुध रहती है कि घृणा कर सकें । रात्रि के सुरापान समारोह के पश्चात स्नानागार के वाश बेसिन में भरी ,चादर में लिपटी उल्टी से उत्पन्न होने वाली वमनजनक स्थिति सुबह सुध आने पर ही पता चलती है ।

कभी कभी देखा गया है कि बसों और यहाँ तक की कारों में बैठते ही और कुछ लोगों को सफ़र के नाम से ही वमन की इच्छा होने लगती हैं । इस स्थिति को अंग्रेजी में मोशन सिकनेस की संज्ञा दी गयी है ।
 ये गति से संबधित रोग है । कदाचित आपका मन राष्ट्र की विकास की गति से सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा है । क्योंकि वाम का अस्तित्व तब तक है जब तक पिछड़ापन और समाज में असंतुलन है । राष्ट्र अगर संतुलित हो गया तो वामी करेंगे क्या? इसी के चलते असंतुलन ही वामपंथ की संजीवनी है ।
 अगर राष्ट्र संतुलन की ओर एक कदम भी बढ़ाये तो वामपंथी को वमन की इच्छा होती है । यह सामान्य है । थोडा शांत बैठे कदाचित आपको महसूस हो कि सबके साथ आप भी बढ़ रहे हैं और आपको कुछ बेहतर लगे ।


रामायण में एक प्रसंग आया है, हालाँकि वाम से राम की बात करना एक संग्राम है किन्तु उल्लेख किया जाना आवश्यक है ।


जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा ।

मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥

मुठिका एक महा कपि हनी ।  
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥


इसमें लंकिनी ने हनुमान को कहा कि - 
हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना जहाँ तक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। 

महाकपि हनुमान्‌जी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर ल़ुढक पड़ी॥

कहीं न कहीं राम/राष्ट्र/सत्य के सेवकों को लिब्रलत्व/असत्य/राष्ट्रद्रोह की लंकिनी इसी प्रकार ललकारती हुई अपना आहार समझती है और काटने को दौड़ती है । उसे जब तथ्य और सत्य का घूसा पड़ता तब वह रुधिर वमन करते हुए लुढक पड़ती हैं ।
 अतः वमन की इच्छा सत्य के सामने आने पर भी हो सकती है ।


वमन की इच्छा का एक अन्य कारण मातृत्त्व हो सकता है । किन्तु वाम की समस्त गतिविधियाँ जीवन लेने में विश्वास करती हुई प्रतीत होती हैं या किसी के जीवन जाने पर उसका येन केन प्रकारेण किसी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करने या लाभ उठाने में । अभी तक किसी वामपंथी द्वारा किसी को जीवन देने की बात सामने आई नहीं है । और अगर जीवन का महत्त्व समझ आ ही जाए तो किसी पर वमन करने की इच्छा ही क्यों जागृत हो । अतः यह आशा  करना उचित नहीं हैं कि नव जीवन की उत्पत्ति ही वमन का कारण है ।


आपको अगर किसी मनुष्य पर वमन करने की इच्छा जागृत हो तो अपना इलाज शीघ्र कराएं । वात-पित्त के साथ कटुता में कमी लाएं । वाम के साथ जाम लाभप्रद तो कतई नहीं हैं ।

सुरा में बसकर किसी का कल्याण नहीं हुआ ।

#गृहस्थी_के_संस्मरण 1 - पंखा



देखने में बिल्कुल सफ़ेद , गोल भरा हुआ सा मुंह । लंबे लंबे दो हाथ एक पैर या शायद दो पैर एक हाथ, बनाने वाले ने इसे ऐसा ही बनाया था । 
जब बंद होता तो ताकता रहता ऊपर से । न जाने उसने इस घर में क्या क्या होते देखा है । जब चलता ताकता तो तब भी लेकिन नज़रें ज़रा तरेर लेता ।

पंचशील के ज़माने का लगा हुआ पंखा देश की उसी समय की विकास की रफ़्तार से घूमता । ऊपर से तो हवा आती लेकिन हम तक केवल पंद्रह प्रतिशत ही पहुँचती । 
गर्मी देश के माहौल जैसी हो रही थी । कभी भड़क जाती कभी एकाध हवा के झोंके से राहत मिल जाती ।

बिजली अटल जी के भाषण की तरह थी, जब होती तो इतनी जबरदस्त कि आसपास मौजूद हर चीज़ की धज्जियां उडवा देती । 
लेकिन जब विराम लेती, तो हम मुंह खोल के इंतज़ार करते कि कब आएगी । और फिर अचानक आती और पंखा अपनी औकात से ज्यादा तेज़ चलने लगता और फिर एक विराम ।

पिछले साल सुधरवाया गया था लेकिन, इस साल फिर उसका कोई पुर्जा, किसी पार्टी से रूठे हुए सांसद की तरह स्तीफा दे गया । इस पंखे की बिजली की खपत उतनी रही होगी जितनी किसी सरकारी परियोजना में पैसे की खपत ।

कभी भन्न करके ऐसे रुक जाता जैसे कोई नेता चार घंटे की भूख हड़ताल पर बैठ जाता और भनभनाता रहता । थोड़ी देर में खुद ही चल पड़ता जैसे स्टील के ग्लास में ग्लूकोस मिल गया हो । बस ये होने के लिए था और घर में अपने होने का पूरा अहसास कराता था ।

कभी कभी जब इसे हमसे बतियाने या मन की बात कहने का मन होता तो आधी रात को ख़ट ख़ट खटर खटर की आवाज़ करता और उठा देता सबको और सब ताकते रहते मुँह बाए ।
तेल का नशा सा था उसे,जब उसे चार बूँद तेल पिलाते तो आराम से मान जाता । खटर खटर बंद करके आराम से हवा झलता,और सुलाता था बड़े प्यार से सबको ।

उतार कर ले जाया गया है उसे और उसकी जगह मेड इन इंडिया, एनर्जी एफिसेंट एक नौजवान सा पंखा आया है।रिमोट से चलता है । सुना है सिर्फ अट्ठाइस वाट खाता है और हवा, हाँ भाई पूरी देता है , अभी हवा खाते में जमा नहीं होती |

आदमी कूड़ादान है

बचपन मे जब रबीस छोटा था तो बहुत छोटा था | लेकिन बहुत ज़िद करता था |  तब उसकी अम्मा उससे कहती तुझको तो कचरे के डब्बे मे से उठा के लाए थे और रबीस और ज़्यादा रोने लगता  | पूछता क्या सच मे कचरे के डब्बे से उठा के लाया गया था मुझे ? और उसकी अम्मा उसे और ज़्यादा चिढ़ाती - तेरे काम ही ऐसे हैं |

जब वो कॉलेज मे पहुँचा लोगों ने उसका नाम ही रब्बिश रख दिया | रबीस से रब्बिश होने मे उसका कोई दोष नही था | वह  कैसी भी बात करे उसका तर्क किसी को समझ नही आता था | वह दो दूनी चार कहता लेकिन जब उसके मित्र की प्रेमिका दो दूनी पाँच लिख के नोट्स सारी कक्षा मे बाँट चुकी होती तो कोई उसकी बात पर विश्वास नही करता | धीरे धीरे वह रबीस से रब्बिश हो गया | 

हिन्दी मीडियम स्कूल से पढ़े हुए होने के कारण कॉलेज की लड़कियों से उसे कूड़े की नज़र से ही देखा |

इंजिनियरिंग की पढ़ाई मे हिन्दी मीडियम का होने के बाद भी अँग्रेज़ी मे उत्तर लिखता और ग्रामर की ग़लतियों के कारण शिक्षक भी उसकी उत्तर पुस्तिका को कूड़ा ही समझते |

ईश्वर की कृपा और बड़े बूढ़ों के आशीर्वाद और कैंपस प्लेसमेंट की जुगाड़ से जब उसकी नौकरी लगी तो उसने सीनियर और मॅनेजर ने भी उसे कचरा ही समझा |  वो जो कर सकता था, उसे वो कभी करने नही दिया गया,  जो वो करना चाहता था उसका उस नौकरी मे स्कोप नही था, और जो वो करना जानता ही नही था वह उसे सिखाया गया और जो वो करना नही चाहता था, उसे वही करने के लिए कहा जाता था | उसके खुद के अस्तित्व का कोई महत्त्व नही था और जो महत्त्व का था उसका कोई अस्तित्व नही था | कुल मिला कर मॅनेज्मेंट के लिए वह कचरा था |

जो वो करता था वह भी कचरा होता, अक्सर उसके मेल भी मॅनेज्मेंट के मेलबॉक्स के ट्रैश मे भी जगह नही बना पाते थे |

रबीस के दिमाग़ मे अब तक खुद के कूड़ेदान होने की बात सेट हो चुकी थी और अपने जीवन की हर परिस्थिति को कचरे के समान समझने मे अब उसे कठिनाई नही होती थी |

एक बार जब उसकी शादी हुई तो वह पत्नी के लिए कचरादान हो गया | पत्नी कचरे कूड़े जैसा खाना बनाती और उस बेचारे को खिलाती और वह अपने पेट मे कचरा भरता जाता  | वह धीरे रबीस से रासभ हो गया | उसका दिमाग़ छोटा और पेट मोटा होता गया और स्वयं कूड़ेदान जैसा हो गया | उसकी साल मे एक बार पूजा होती और साल भर वा बोझ ढोता रहता | उसकी जिंदगी कचरा हो गयी थी |

जब तब उसके बच्चे छोटे थे तब तक वा घोड़ा अपनी इच्छा से बनता था | लेकिन बच्चों के बड़े होने पर वह कचरा होता गया | बच्चों ने उसकी नसीहतों को कचरे के डब्बे मे डालना शुरू कर दिया |

रबीस की जिंदगी कचरे के डब्बे से उसके प्राप्त होने से शुरू हुआ और आज जब कुछ फेम-निष्ठ हस्तियाँ हर पुरुष को कचरा कहने से परहेज़ नही करती हैं, तब रबीस सोचता है , कि वह सच मे कचरा ही रहा होगा |
फेमनिष्ठ  हस्तियाँ दरअसल वे हस्तियाँ हैं जो फेम के लिए अत्यंत निष्ठा रखती हैं और फेम के लिए कुछ भी करने कहने से परहेज़ नही करती | किसी को कूड़ादान संबोधित कर फेम प्राप्त करने पर ऐसे फेमनिष्‍ठ को बधाई और रबीस समेत समस्त कूड़ेदानों को संदेश |

है नीली कभी हरी कूड़ेदान सी जिंदगी |
डालने से पहने छाँटिए घर की गंदगी |

कुछ के मन में खोट है, कुछ के मन शैतान | कितने कचरे से पटा हुआ आदमी कूड़ेदान | |






बुधवार, 18 अप्रैल 2018

ज़ॉम्बीद्वीप का "जम्बूरा"

"वैदिक समय में भविष्य में ऐसे बहुतायत धिम्मी हिंदू जाम्बियों की अपेक्षा में ही भारत का एक नाम ज़ॉम्बीद्वीप रखा गया जो अपभ्रंश में जम्बुद्वीप कहलाया ।" - @Saket71

जो ज़ॉम्बीद्वीप निवासी स्वयं सात दशक तक "जम्बूरा" बने रहे अब उन्हें उनकी बात सुनने वाला प्रधानमंत्री मिला तो उसे ज़ॉम्बीद्वीप का "जम्बूरा" बना समझ लिया और स्वयं मदारी बन बैठे। उससे अपेक्षा की जाने लगी कि डमरू बजते ही "जम्बूरा" नाच उठे ।

कहा जाए कि जम्बूरे बोल तो जम्बूरा बोले । प्रधानमन्त्री ने जब जम्बूरा न बनते हुए अपनी बुद्धि का प्रयोग करके निर्णय लेना शुरू किया, तब मदारी बनने की चाह रखने वालों की जमात को जमकर ठेस लगी और वे प्रधानमंत्री को जाम करने में लग गए । इसी बीच दो जामवंत जैसी शक्ल वाले जोम्बी भी टूट पड़े ।

अब ज़ॉम्बीद्वीप की जमीन पर जमकर विरोध होने लगा । अब जोम्बी बनाने वाले साथ मिलकर जाम बनाने लगे । इस प्रकार जोम्बी निर्माण में तीव्रता आई । रोमन साम्राज्य से आने वाले चावल की बोरियां और अरबदेश से आने वाले खजूरों ने जोम्बित्तव को बल प्रदान किया ।

देशी ज़ॉम्बी अभी भी मुंह में जम्बूफल दबाये गंगा-जमुनी तहज़ीब कहते रह गए और खजूर की मिठास में गंगा कहीं छूट गयी । देशी जॉम्बी अभी जम्बूफल का रसास्वादन ही कर रहे थे कि तरह तरह ही और ज़ॉम्बी सेनाएं उभर कर सामने आ गयीं । ये सेनाएं ज़ॉम्बीद्वीप के समस्त ज़ॉम्बीयों का प्रतिनिधि बन बैठी ।

ज़ॉम्बीयों के तीर्थस्थान jnu में ज़ॉम्बीयों पर कुछ प्रतिबन्ध लग जाने से बहुत हाहाकार मचा हुआ है । 

समस्त ज़ॉम्बी संगठनो के लोग अब मिलकर अपना एक जम्बूरा लेकर आये हैं और खेल दिखाकर कहते ये देखो हमारा जम्बूरा प्रधान बनेगा । ज़ॉम्बीद्वीप में अब नया अध्याय जुड़ने जा रहा है ।

व्यूह

महिषी कारिगसा के कक्ष में  संतरी याहैनक ने प्रवेश करते हुए कहा । ये ठीक नहीं हो रहा । ऐसे तो हमारी कमर टूट जायेगी । 

याहैनक अत्यंत क्रोधित और उत्तेजित था । 


महिषी का एक और वार निष्क्रिय कर दिया गया था । कुछ विषकन्याओं ने होलिका दहन से पूर्व किसी व्यक्ति पर आरोप लगते हुए कहा था कि उन पर किसी उद्दण्ड ने होलिका दहन के समय वायुगोलक में हीलक भर कर प्रहार किया था । चारों ओर होलिकोत्सव पर प्रतिबन्ध की मांग उठ खड़ी हुई थी । अवसर का लाभ उठा कर महिषी कारिगसा ने धर्मप्रवृत्त समाज पर प्रहार का व्यूह रचा था वह असफल रहा । प्रयोगशाला से समाचार आया था कि वायुगोलक में हीलक के अंश नहीं पाये गए । अतः समस्त प्रयोजन निस्तेज हो गया, और जनमानस महिषी का उपहास कर रहा था ।  किन्तु महिषी ने असत्यवाद में घोर तपस्या कर सिद्धि प्राप्त की थी । उन्हें उपहास से भय नहीं था । उनके तप का ही प्रताप था कि घोर से घोर असत्य बोलकर भी वे मुख पर सदैव मुस्कान बनाये रखतीं थी । गणित में ग की भी पहचान न रखने और सदा शीश-पद विहीन वार्ता करने में निपुणता के कारण महर्षि मीेडियाक्रुक ने उनको पंचमप्रवर्गजड़मति होने का वरदान प्रदान किया था । 

महिषी का विवाह पदीजरा नामक श्रेष्ठि से हुआ था । पदीजरा ने कच्छ के पूर्व सम्राट के विरुद्ध षड्यंत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था । इनके कथनुसार के वर्तमान जम्बूदीप के शासक के प्रशंसक और नागरिक स्तर विहीन हैं । दोनो पूर्णतया एक दूसरे के पूरक थे । 

दोनों में अहम् श्रेष्ठस्मि की भावना दोनों को जनमानस से अत्यंत दूर रखती थी ।


याहैनक ने भूमि पर पदाघात करते हुए कहा , ऐसे तो हमारा एक भी वार सफल नहीं होगा । 

हीलक की कथा रचने में पूरे गुरुकुल के वाम सखाओं ने अपना रक्त स्वेद एक कर दिया था । 


काश प्रयोगशाला कह देती कि उस वायुगोलक में हीलक था, तो अगले वर्ष से होली पर मैं स्वयं सम्पूर्ण लिबरलगण के साथ नग्न नृत्य करता । परंतु न जाने क्यों उनको एक अंश भी न मिला । 


मोहतरमा तदखारब का क्या विचार है कारिगसा ने पूछा, उनके किसी प्रयास को सफलता मिली ? 


वे भी असंतुष्ट ही प्रतीत होती हैं , याहैनक ने कहा, आजकल उनके प्रयोजन भी कुछ सफल नहीं हो रहे । जो भी चेष्टा करती हैं दो चार दिन में उनकी वायु भी निष्काषित हो जाती है । पिछले दिनों महिषी ने जम्बूदीप के शासन के विरुद्ध मानवों पर अत्याचार करने का आरोप लगाया और विश्वपटल पर जम्बूदीप को कलंकित करने का प्रयास किया । पर वह भी कहीं जाता नहीं दिख रहा । 

वे आजकल मुम्बा देवी नामक स्थान के एक ऑनलाइन प्रहरी पर आसक्त हैं । उसके बुद्धिबल से इतनी आसक्त है कि उससे विवाह करने की इच्छा खुल कर जाता रहीं हैं । यहाँ तक कि वे उस प्रहरी को मूल्य देकर क्रय करने को भी तत्पर हैं । 


पर उनकी आयु?


आसक्ति आयु नहीं देखती महिषी। उन्हें छोड़िये और

आगे क्या करना है यह बताइये । हम कपाल पर हाथ रखकर विलाप तो कर नहीं सकते ।


हमें श्रेष्ठि पदीजरा से पूछना होगा । उनका अनुभव ही हमें अब कुछ नया करने में सहायक होगा ।

यह बोलकर दोनों श्रेष्ठि के कक्ष की और बढ़ गए । 


श्रेष्ठि अपनी ध्यानावस्था में मोदिध्ययन कर रहे थे, वे जब तक प्रतिदिन समाधिस्थ हो दो हज़ार दो बार मोदीशमनमन्त्र का जाप नहीं कर लेते उनकी देह में रक्त प्रवाह नहीं होता ।


श्रेष्ठि हमारा एक और प्रयास असफल हुआ, अब कोई और उपाय बताइये ।


मैंने पहले ही अपने अनुभव से कहा था, वायुगोलक में हीलक की बात किसी के हलक से नहीं उतरेगी । पर पंचमप्रवर्गजड़मति को कौन समझा सकता है । अब भुगतो , लोग उपहास करेंगे । 


अब वह विषय देखो जिसपर आमजन की विशेष संवेदनाएं जुडी हों । वार्ता जितनी संवेदनशील होगी हमारे लिए उतनी ही लाभप्रद है । अंतिम उद्देश्य तो सदा से ही जम्बूदीप के वर्तमान शासक को पदच्युत करना है । कहीं ऐसा न हो कि वह सोये हुए जनमानस को  जागृत कर दे और हमारे कुमार कभी सिंहासन तक न पहुँच सकें ।

अभी दक्षिण की ओर देखो, चुनाव काल है । जो कुछ भी खबर मिले सब हिंदुओं पर मढ़ दो। मुद्रा विलोपित होने का समाचार फैला दो । अपनी सेविका से लेकर अपनी पादुका तक का साक्षात्कार पत्रों में छपवा दो । मुम्बा देवी से चार अभिनेत्रियों को कुछ मुद्राएं देकर उनके गले में पट्टिकाएं दाल दो । सन्देश एक सा होना चाहिए । 


याहैनक तुम्हारा मित्र और मेरा प्रिय रमऊ दलिख कहाँ है । 


श्रेष्ठि, वो आजकल उपस्थिति अनिवार्य कर दी है गुरुकुल में।तो मेरी प्रॉक्सी लगा रहा है।परीक्षा आने वाली है न।


श्रेष्ठि ने दोनों को जाने का आदेश देते हुए, रात्रि विश्राम पूर्व गीत का आलाप लिया । 


https://youtu.be/vhcj2fdt9Pw

एलियन



"चाचा सुने है एलियन आ रहे हैं ?" बबुआ ने माचिस की तीली कान में घुमाते हुए कहा ।

"कहाँ सुन लिए हो बे? दिनभर मुंह बाए सोते रहिते हो और अंत शंट सपना देख के हमको सुनाने चले आये, कान खुजाते हुए ! भक !"

"नहीं चाचा सही कह रहे हैं ,टीवी में देखे"

"सच में?"
"और नही तो क्या?"

"हाँ तो आन दो देख लेंगे एलियन फेलियन को । का बिगाड़ लेंगे ।
"
"अरे चाचा हमला कर देंगे हम पर ।
"
"अरे हटो बे ! इनके जैसे पचास आये और पचपन चले गए ये हमारा कुछ न बिगाड़ पाये ।
"
"अरे चाचा ये वाले बड़े खतरनाक हैं, बता रहे थे । सड़के खोद देते हैं, आग लगा देते हैं , गाड़ियाँ जला देते हैं । बम फोड़ते हैं बम |"

"
ज्यादा न बको, किसी पार्टी के कार्यकर्ता होंगे अपने नेता को चुनाव का टिकट न मिलने पर बवाल काट रहे होंगे ।"

"अरे नहीं चाचा एलियन हैं । बता रहे थे लोगों का दिमाग काबू कर लेते है, और फिर जो करवाना है करवा लेते हैं ।

"
"अबे ये सोशल मीडिया के कैम्पेन वाले रहे । कन्नौज अना लटका वाले । बहुत हुडदंग मचाये हैं । लोगों को अपना कुछ सोचने ही नहीं देते। रोज़ अपना नया बवाल मचा के जिंदगी खराब कर रखी है  ।"

"तुम्हारा मतलब कैम्ब्रिज अनालिटिका वाले ?"
"हाँ वही"
"अरे नहीं चाचा एलियन हैं, ये दिमाग काबू कर लेते है और भुच्च बना देते हैं फिर कुछ बूझता नहीं है ।"
"हमको लिबरल समझे हो? जो कुछ बूझे बिना लपर लपर बोलते फिरेंगे | इतना भूसा नही खाए हैं छुटपन में कि हम बैल बुद्धि हो जाएँ |

देखो बिटुआ हम जब छोटे थे तो अम्मा हमको अपना दूध पिलाई रही, तो हमारा दिमाग़ चलता है आदमी जैसा |
जब तुम छोटे थे तो तुम्हरी अम्मा तुमको गैया का दूध पिलाई रही, तो तुम हो गये गौ-बुद्धि और ये शहरी लिबरल जब छोटे रहे न, तो इनको मिला पावडर |
तो इनके दिमाग़ मे पावडर ही भरा हुआ है | कुछ ठोस सोच ही नही सकते | हमरे दिमाग में पावडर नहीं भरा है बबुआ |"

"अरे चाचा इन एलियनों में ग़ज़ब का पावर है | एक सिंगनल भेजेंगे और तुम उनके गुलाम जाओगे |"

"हमको तुम फिलम की हीरो-हिरोइनी समझे हो? जो सिग्नल मिलते ही खड़े हो जाएँगे तख़्ती लटकाकर |"

"चाचा इनका दिमाग अतना बंद काहे रहता है ,कोनऊ एलियन कंट्रोल करता है का?"

"का पता बबुआ कौन कंट्रोल करता है । एक आदमी गया था हमारे यहां से दुबई । का पता वही एलियन बन के इनके दिमाग कण्ट्रोल करता हो |"

"चाचा लेकिन ये एलीयन होता है, कभी देखे हैं?"

"एलीयन तो नही देखे लेकिन ईंट-एलियन ज़रूर देखे हैं | कहने को बरसों तक इसी धरती पे मूँग दलते रहे | एक दिन पूछा जो दल के ले गये हो वो दाल दिखाइए तो |

तो कहते थे - धरती हमारी थोड़ी है | अभी तो दूसरे वाले राज चला रहे हैं | जब हम कबजिया लेंगे न इस धरती को, तब पूछिएगा |"

"तो का इन ईंट-एलीयन का धरती से नाता रिस्ता नही है ?"

"बबुआ धरती को माता समझते तो सबको अपना लेती, लेकिन जो जागीर समझते हैं, वो यूएफओ ही बने उड़ते
फिरते हैं और बन जाते हैं एलीयन, और उनके दिमाग़ मे भर जाता है ईंट-पत्थर |"

इतने मे  लड़का दौड़ता आया |

"बापू जल्दी चलो | कोई ख़तरनाक एलीयन देश भर के एटीएम से नकदी गायब कर दिया है |"


ज़ॉम्बी

जो महानुभाव अपना मस्तिष्क एवं विवेक का त्याग कर किसी विषय या वस्तु के प्रति अत्यंत आसक्त हो जाते हैं , हॉलीवुड शास्त्र में इन्हें ही ज़ॉम्बी की संज्ञा दी गयी है ।

लिब्रलत्व का कीड़ा काटे हुए को लिबटार्ड ज़ॉम्बी कहा जाता है। इनका काटा हुआ पानी भी नहीं मांगता।इनकी हरकतें आदि मानव से काफी मिलती जुलती हैं।
इन्हें पशु सामान भोजन,पशु सामान नग्नता और पशु सामान आचरण अत्यंत प्रिय होता है। ये वास्तव में समस्त सामाजिक व्यवस्थाओं को धता बता कर आदम युग के खुलेपन में जीना चाहते हैं ।
लिब्रलत्व के तत्व के संपर्क में आते ही दिमाग सड जाता है और मनुष्य में पाश्विक प्रवृत्ति घर कर लेती है ।

इनमे ही एक उप प्रकार के ज़ॉम्बी होते हैं जिन्हें फेमनिष्ठ जोम्बी कहा जाता है । ये भी प्रायः अपनी बुद्धि को ताड़ पर रखकर बनते हैं । इनकी मुख्य पहचान बात बात पर स्वयं को श्रेष्ठ और सनातन की किसी भी परंपरा पर अनर्गल प्रलाप करते देखा जाना है । इनको घूंघट और साडी पिछड़ापन लगता है और बुरखा आधुनिकता ।
आधुनिकता में अपना सर धुनते देखे जाते हैं ।

एक अन्य प्रकार के ज़ॉम्बी आये है बॉलीवुडटार्डस ये अलग ही चलते हैं । इनको ऊपर वाले किसी न किसी ज़ॉम्बी या एक से अधिक ज़ॉम्बी ने काटा हुआ होता है । ये सुविधा के अनुसार किसी पर भी हमला करते हैं और दोगलाई करते हैं । ये ज़ॉम्बी अत्यंत दोगले होते हैं ।

दोगलत्व के काटे हुए ज़ॉम्बी एक अलग किस्म की ज़ॉम्बी है । इनके दो या दो से अधिक मुंह होते हैं। कब किस मुंह से कौन सी बात कह दें पता नहीं चलता ।

दूसरे प्रकार के ज़ॉम्बी होते हैं चमचत्त्व के कीड़े से डसे हुए । एक बार कोई किसी का चमचत्त्व प्राप्त कर ले तो उसके बाद उसका दिमाग उपयोगी नहीं रहता । उसे केवल एक ही व्यक्ति की बात सुनाई और दिखाई देती है । सही गलत की पहचान नहीं रहती और ये रिमोट से चलने वाले प्राणी बन जाते हैं ।

तीसरे प्रकार के ज़ॉम्बी होते हैं पोलिट्रिक्ड ज़ॉम्बी । जो किसी को नेता मान कर उसके दीवाने हो जाते हैं । उस नेता की हर बाटी सही मानते हैं और बाकी सब उन्हें गलत लगते हैं ।
पोलिट्रिक्ड ज़ॉम्बी अक्सर एक दुसरे के संपर्क में आने से कम और अपनी तर्कशक्ति के ह्रास से अधिक बनते हैं । इनके दिमाग में पोलिटिकल कचरा भर जाता है और ये पॉलिटिक्स और असली जीवन में अंतर स्पष्ट नहीं कर पाते ।

चौथे प्रकार के जॉम्बी देखे गए है। रेलिजिस्टिक ज़ॉम्बी । ये वो हैं जो होते ठीक ठाक है लेकिन किसी धार्मिक प्रवचनकर्ता के प्रवचनों को सुनकर अपनी इच्छा से अपना दिमाग धर्म के नाम पर बेच आते हैं । इनके दिमाग में अत्यंत घृणा के अंकुर होते है । इनके लिए लड़ना-मरना कोई बड़ी बात नहीं होती । इनकी सबसे बड़ी खासियत है अपने ही धर्म के लोगों को निशाना बनाना । ये अपने ही धर्म के भोले भाले लोगों का दिमाग धो धा कर ज़ॉम्बी बना देते हैं ।

इन सभी प्रकार में ज़ोम्बीत्व और ज़ोम्बीत्व प्राप्त महानुभावों से हमें निश्चित दूरी बना कर रखनी चाहिए और अपनी रक्षा करनी चाहिए ।

रविवार, 15 अप्रैल 2018

होइहि वही जो पृच्छ रूचि राखा


जिन प्राणियों की पूँछ होती है वे स्वयं को ईशतुल्य समझते और उनकी पूँछ स्वामी के शक्ति और प्रभाव के अनुसार स्वयं को उकृष्ट | ईश्वर ने तरह तरह के प्राणी बनाये और फिर बनाई उनकी पूँछ । कुछ के दिमाग में पुंछ होती है कुछ की पूँछ में दिमाग । कुछ तो वास्तव में सिर्फ पूँछ होते है लेकिन खुद को स्वामी मानते हैं ।

पूँछ कई प्रकार की देखी गई है, छोटी पूँछ, लंबी पूँछ, बाल वाली पूँछ ,बिना बाल वाली पूँछ । अधिकतर पूँछ स्थाई होती है, कुछ विशेष परिस्थितियों में अस्थाई पूँछ भी देखी गयी है । पूँछ सिर्फ होने के लिए नहीं होती बल्कि इसके कुछ विशेष कर्तव्यों को अलग अलग शास्त्रों में वर्णित किया गया है |

ट्वीट शास्त्र में पूँछ को सांसे कुटिल और जटिल पूँछ कहा गया है | इसमें कौन किसकी पूँछ है यह कह पाना अत्यंत कठिन है | हर जीव एक पूँछ है और हर पूँछ एक जीव | एक पूँछ अगर शेर से जुडी है तो बकरी से भी | ये पूँछ एकदम मुखविहीन है |  अगर ये मक्खियां भगाती हैं तो चाबुक बनकर दनादन किसी पर भी बरस भी पड़ती हैं | एक प्रकार की पूँछ का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए | ट्वीट शास्त्र में लम्बी पूँछ को ही उत्तम माना गया है | छोटी पूँछ को मद्धम माना गया है और पृच्छ न होना एक प्रकार से बोट होने का प्रमाण कहा गया है |
अतः  अगर आप बोट रूप न समझा जाना चाहते हों तो पूँछ रखना आपकी बाध्यता है |

राजनीति के शास्त्रों में पूँछ के कुछ विशेष कर्तव्य कहे गए हैं |  पृच्छ-स्वामी के पृच्छ भाग को ढांकना | पृच्छ-स्वामी पृष्ठ भाग से कोई भी क्रिया करे पूँछ का कर्तव्य है कि वह पीछे बनी रहे |  स्वामी जब बैठने को हो तो बैठने के स्थान को साफ़ करना पूँछ का परम कर्तव्य है |  पृच्छ-स्वामी की प्रसन्नता और सफलता में स्वयं को प्रसन्न जानकार स्वामी के साथ नृत्य करना और स्वामी की असफलता और कष्ट के समय स्वयं भी झुका हुआ रहना उत्तम पूंछ के लक्षण कहे गये हैं |

एक बार एक पूँछ को अभिमान हो गया कि उसका स्वामी उससे इतना अधिक प्रेम करता है कि वह उसके इशारों पर ही अपने सभी काम करता है | स्वामी भी यदा कदा पूँछ को चाट चूम कर सहला कर प्रेम जाता देता |  पूँछ को कुछ अभिमान हो आया और स्वामी की इच्छा के बिना इधर उधर खुद को पटकने लगी | स्वामी भी कभी कभी परेशान हो उठता कि ये पूँछ ऐसा कर क्यों रही है | फिर एक दिन उसने पूँछ को रोग ग्रस्त जानकार अपने हाल पर छोड़ दिया |

अधिकतर इस शास्त्र के अनुसार पूँछ के स्वामी से अपेक्षा नहीं की सकती कि वह अपनी पूँछ को पहचाने भी | अतः एक दो बार पृच्छ स्वामी अपनी ही पूँछ को काटने दौड़ते देखा गया है |

अगर स्वामी क्यूट हो तो उसकी पूँछ भी क्यूट होती है । मसलन खरगोशों की पूँछ , लेकिन ऐसे प्राणी अपनी पूँछ सहित किसी का भोजन बन जाने से अक्सर बच नहीं पाते । ये अपने भोलेपन में प्राण गंवाते हैं |

पृच्छ-स्वामी जितना छोटा होता है, पूँछ उसके लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है । जैसे जैसे स्वामी बड़ा होता है, उसकी पूँछ का महत्त्व कम होता जाता है ।

जब स्वामी बहुत बड़ा हो जाता है तब उसकी पूँछ का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता खिलवाड़ के अलावा । पूँछ उसके लिए केवल हिलाने के लिए होती है । भले ही पूँछ ये सोचे कि "होइहि वही जो पृच्छ रूचि राखा" लेकिन होता नहीं है ।

जब स्वामी हाथी हो जाये तो न तो अपनी पूँछ दिखती है और न ही उसपर पूँछ के वार का असर होता है | उसे अपनी आँखों के सामने लगी सूंड अधिक प्रिय लगती है । आखिर नाक का सवाल आ जाता है और पूँछ की पूँछ नहीं रहती ।

एक प्रकार के पृच्छ-स्वामी होते हैं जो उपयोगी होते हैं , और इनकी पूँछ होती है लंबी और गुच्छे दार । ये पूँछ मख्खी भगाने के काम आती है । कुछ हद्द तक ऐसी पूँछ की इज्जत भी होती है । इनकी इज्जत उतनी ही होती है जितनी किसी पूँछ की होनी चाहिए । ये सबसे इज्जतदार पूँछ है । कुछ पूँछ होती है बालों वाली । जिसमे लंबे लंबे बाल होते है । ऐसी पूँछ उठाने के काम तो आती है इससे इज्जत ढंकी रहती है |

कुछ पूँछ होती है टेढ़ी कुत्ते जैसी । ऐसी पूँछ का प्रयोग किसी ग्रन्थ में वर्णित नहीं है । अक्सर जीभ के साथ सीधे जुडी रहती है, एक तरफ कुत्ते की जीभ चलती है दूसरी तरफ पूँछ हिलती रहती है ।
आजादी के बाद न तो कोई कुत्तों को सीधा कर सका है न उनकी पूँछ को । कुत्ते पहले सूंघते हैं, फिर गुर्राते हैं , फिर या तो चाटते हैं या काटते हैं । यही उनकी पूँछ की हालात है । सीधी नही रह सकती ।

कुत्ते की पूँछ का कुत्ते के जीवन में कोई विशेष योगदान नहीं है, सिवा इसके की जब कुत्ते अति उत्साहित होते हैं तो पूँछ विजय पताका की तरह लहरा उठती है और जब कुत्ता संकट में होता है तब पूँछ स्वयं छिपने का स्थान ढूंढती है । कोई वैज्ञानिक कारण तो उपलब्ध नहीं है किन्तु मान्यताएं अवश्य हैं । एक दो बार यह देखा गया है कि विशेष परिस्थितियों में अगर किसी कुत्ते की पूँछ न हो तो वह अधिक भयानक हो जाता है । अतः याद कदा पूँछ नियंत्रक का कार्य भी करती है और कुत्ते को नियंत्रण में भी रखती है ।

कुछ प्राणियों में पूँछ इतनी प्रबल हो जाती है कि वह पृच्छ-स्वामी को ही तुच्छ समझती है । वह पृच्छ-स्वामी की साथियों पर गुर्राती है, गरियाती है और बस चले तो पृच्छ-स्वामी को काटने ही दौड़ पड़ती है । ऐसी पूँछ समझती है की वह है इसीलिए स्वामी है, अन्यथा स्वामी ही न रहे । ऐसा स्वामी अभी तक देखा नहीं गया है जो अपनी ही पूँछ से भय खाता रहे । अगर भय खा गया तो स्वामी पूँछ और पूँछ स्वामी हो जाये ।


एक प्रकार की पूँछ होती है लंबी और बहुपयोगी । ये होती है वानर की पूँछ, यह लटकने से लेकर मटकने तक के काम आती है । ये वो पूँछ है जिसपर वानर इतरा सकता है ।


एक होती है विषधर पूँछ जो प्रायः बरैया और बिच्छू जैसे प्राणियों में पायी जाती है । इसे डंक पूँछ कह सकते हैं । जितने छुटभैये खतरनाक ये प्राणी होते हैं उतनी ही घातक उनकी पूँछ होती है । स्वामी को भय लगा नहीं की पूँछ हरकत में आ जाती है । ऐसी पूँछ विकट अपराधिक श्रेणी में आती है ।


स्वामी की मानसिकता पर पूंछ की मानसिकता देखी गयी है | अगर स्वामी का दिमाग़ मे गोबर ओ तो उसकी पूंछ भी गोबर कीचर उछालते देखी गयी है |

एक प्रकार के पृच्छ-स्वामी है छिपकली टाइप के । जो जहाँ मख्खी देखी वहीं पहुँच जाते हैं । इनको कहाँ किस दीवार पर चिपकना है वह मौसम और मक्खियों की उप्लब्धता पर निर्भर है । और इसी प्रकार इनकी पूँछ भी डिटेचेबल होती है । सुविधा के अनुसार ये अपनी पूँछ बदलते रहते हैं । जब मोह भंग हुआ तो पूँछ छोड़ दी, जहाँ भय हुआ तो जीवन से पहले पूँछ को त्याग देते हैं । बेचारी पूँछ अपनी कीमत तलाशती रहती हैं ।


आज का हर कोई  किसी न किसी की पूँछ बन चुका है और पूँछ को समझना होगा वह केवल पूँछ है, उसकी कीमत प्राणी के पीछे रहने में है ।

अगली बार जब आप किसी की पूँछ बने तो स्वामी सोच समझ कर चुनें । ऐसा न हो कि आप गलत स्वामी की पूँछ बन जाएँ और उसके पृच्छ भाग को ढकते ढकते अपना अस्तित्व मिटा बैठें ।


शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

स्वंयवर

अहो ! कैसी सुंदरी है । सभा में बैठे हर पुरुष के चक्षु न केवल सुंदरी के रूप लावण्य पर केंद्रित थे, किन्तु मन उस सुंदरी के सानिंध्य की कल्पना में अनुरक्त था।

अत्यंत रूपवान ,गुणवान, तेजमयी रूपसी | अनेकों श्रृंगार किये हाथ में वरमाला लिए किसी सुयोग्य, समर्थ, सदाचारी एवं संपन्न वर को वरने हेतु तत्पर थी । रूपसी चिरयौवना प्रतीत होती थी, अंग अंग से यौवन अपने अभी अभी होते आगमन का आभास करा रहा था । सुशोभित वस्त्रों से शुभ्र ज्योत्स्ना प्रवाहित होती लग रही थी ।

स्वर्णाभूषणों से रूपसी का रूप पुलकित हो उठा था, और काले कुंतल मोतियों से ऐसे शुशोभित थे जैसे यामिनी का आकाश अनेकों तारामंडलों से शुशोभित हो ।
अहो ! कैसी रूपसी । एक दृष्टि पाकर ही दृष्टा  सदा  के लिए अतृप्त हो जाए  |

उसका तेज , कोटि कोटि सूर्यों को लज्जित करने में सक्षम और वह धन्य हो जाये जिसे वह वरमाला से सुसज्जित कर दे । रूपसी का सानिध्य ही पुरुष को सर्वोच्च , सर्वशक्तिमान राजपुरुषों के मध्य श्रेष्ठतम आसन दे दे ।

वह रूपसी अपने सुकोमल नाना रत्न मणिक्यों से निर्मित कंगनों से सुसज्जित हाथों में वरमाला और ह्रदय में कम्पन तथा नेत्रों में लज्जा का आभूषण धारण करे , स्वयंवर की प्रतीक्षा में थी । नवविंश प्रकार के रत्न और सप्त धातुओं से निर्मित आभूषण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे |

वह सभा में उपस्थित समस्त राजपुरुषों, वीरों और ज्ञानियों को  देख रही थी । सबका अवलोकन कर रही थी । वह कौन होगा जो उसे वर ले जायेगा ।
अहो ! वह कौन भाग्यशाली पुरुष , उसका स्वामी होगा ।

जब सभी गणमान्य उपस्थित हो गए तब स्वयंवर के नियमो की घोषणा की गयी । जो भी स्वयं को श्रेष्ठ मानता हो वह अपने गुणों से समस्त सभा को प्रभावित करे । जिसके प्रति सभा का सर्वाधिक झुकाव होगा वही वरमाला का अधिकारी होगा ।

जो वरमाला पहनेगा वह समस्त सम्पदा का स्वामि होगा । किन्तु उसे अपना जीवन केवल एक प्रकार से रणभूमि में बिताना होगा । उसे सब त्यागना होगा, विवाह के पश्चात ब्रह्मचर्य का व्रत धरना होगा । रूपसी की रक्षा ही परमधर्म मानना होगा और अपनी निष्ठा का प्रण लेना होगा । बताया गया कि कन्या को एक भयावह रोग है, और केवल वही पुरुष आगे आये जो स्वयं को पूर्ण समर्पित कर सके । इस विवाह में तपस्या अधिक है आनंद कम ।

सब ओर सन्नाटा छा गया, घोर गर्जनाएं, शांत हो गयीं । उत्तेजित मनों में अतृप्त आकांक्षाओं ने शयन करने में अपनी भलाई समझी ।

जब देखा कि सभा में कोई पुरुष आगे आने को तत्पर न हुआ तब एक ऋषि ने स्वयं को उपस्थित किया और बोले -

मैं स्वयं उपस्थित होता हूँ ,
यह विष प्याला पी लेने को,
इस रूपसी का करूँ वरण,
हूँ तत्पर प्रण अभी लेने को ।

दीप्त भाल, गौर वर्ण,  विशाल वक्ष और मुख पर तेज़ । ऋषि का स्वरुप और आभामंडल ही सभा को प्रकाशमान कर रही थी ।
रूपसी ने ऋषि को देख कर मन ही मन प्रणाम किया और सोचा, क्या ये?

उधर जब राजपुरुषों ने देखा कि यह रूपसी तो एक साधु के साथ जाती है , तो उन्होंने आपस में मिलकर निर्णय किया और सर्वसम्मति से एक कुमार को प्रस्तुत कर दिया । गौर वर्ण, देव सामान रूप। कपोलों में पड़ते गड्ढे कुमार के राजप्रासादों में ही पलने का प्रमाण देता था । कुमार के सुकोमल अंग, उन्नत देहयष्टि प्रमाण था की वे कभी सूर्य की तपिश में भी बहार नहीं निकले । पहले तो कुमार स्वयं ही छुई मुई हुए जाते थे । अदृश्य भय कम्पन उनके रोम रोम में झंझावात उत्पन्न कर देता । कुमार किसी प्रकार से विवाह हेतु तत्पर नहीं लगते थे । वे या तो स्वयंवर देखने आये थे, या उन्हें भेजा गया था । परंतु जब भद्र पुरुषों ने उन्हें ही अपना प्रतिनिधि बना दिया तब वे कर ही क्या सकते थे ।

उद्घोषक ने प्रश्न किया दोनों महानुभाव अपना परिचय दें ।

ऋषि क्योंकि पहले प्रस्तुत हुए थे सो प्रथम आमंत्रण उन्ही को प्राप्त हुआ । उन्होंने कहना प्रारंभ किया -

मैं रजकण से उत्पन्न पुरुष,
जीता आया हूँ रज में ।
पृष्ठभूमि कुछ नहीं मेरी ,
पडो नहीं कुछ अचरज में ।
अपने तप और पुण्य से,
आज ऋषि हूँ ,
अपने कर्मो के ही प्रताप से,
मैं स्वयं शशि हूँ ।
मैं विरक्त हूँ,
शक्ति भक्त हूँ,
वरमाला का अधिकारी ।
मुझमे है वह प्रताप,
कर सकूँ दूर,
रूपसी की बीमारी ।

इतना कहकर ऋषिवर ने अपना स्थान ग्रहण किया । सभा साधु साधु कर उठी ।

रुपसी अब और किसी का कुछ नहीं जानना चाहती थी, वह वरमाला ऋषि को पहनाकर उनकी हो जाना चाहती थी । उनकी बातों से वह इतनी प्रभावित हुई कि उसे अनुभव हुआ कदाचित ऋषिवर ही उसका जीवन बचा पायेंगे ।

अब कुमार को अपना परिचय देना था । कुमार प्रातः काल और रात्रि के संधिकाल की तरह धीरे धीरे खुले । फिर सकुचाते हुए बोले -

मैं राजकुल का गौरव हूँ,
मेरे परनाना राजा थे,
मेरी दादी रानी थी,
और पिता थे राजकुंवर,

मैं रात्रि को भोर,
समझ उठता हूँ,
देखो मेरे कोमल नयन नक्श,
और कपोलों के दो भंवर ।

मेरे पीछे है कुल मेरा,
सेवक मेरे, जीवन संकुल मेरा

अब उद्घोषक ने प्रश्न किया अपने गुण बताइये  प्रमाण दीजिये कि आप श्रेष्ठ हैं |

ऋषि बोले -

मैं तप्त कनक,
मैं वैरागी,
मैं कर्मयोग का अनुयायी,
सरिता स्वर्ग से लाया हूँ,
उत्तम उद्यम कर आया हूँ

कुमार बोले -

मैं राजवंश का मोती हूँ,
मेरी कीमत खुद पहचानो,
मुझपर मोहित हैं अप्सराएं,
बस मुझे योग्य वर ही जानो

उद्घोषणा हुई अब इनके साथ आये लोग समर्थन में कुछ कहे  ताकि निर्णय हो सके ।

ऋषि के शिष्य बोले -

ये बैरागी बाबा हैं ,
धर्म योग के ज्ञाता है,
ये हैं सेवक पालनकर्ता,
सबके अग्रज भ्राता हैं,
इनके हैं हम सब अनुचर
कौन इनसे सुयोग्य वर
ये जब बोलें सब सुनते हैं
इनकी ही माला गुनते हैं
बस ये समर्थ हैं
बाकि व्यर्थ हैं
अपने अंतर्मन मन की सुनो
हे रूपवती तुम इन्हें चुनो

रूपसी को लगा कि वरमाला तो ऋषि को ही पहना देनी चाहिए । उनसे प्रभावित हुए बिना रह भी कैसे सकती थी । किन्तु कुमार को सुनना अनिवार्यता थी |

कुमार के समर्थकों को लगा की किंचित कुमार पीछे रह गए हैं । अब शुरू किया उन्होंने -

कुमार ही कुलीन हैं,
शांत रहते हैं सदा,
बड़े ही शालीन हैं ।

कर लेंगे काम भी
जब सर पे पड़ेगी,
अभी अनुभवहीन हैं ।

रूपसी का रूप
इनपे ही शोभता है
बड़े नाना के नवासे हैं ।

वर रूप धरें स्वामी अब,
हम भृत्य लोग ,
देखने को प्यासे हैं ।


सभा दो पक्षों में बंट चुकी थी , कोई एक और कोई दूसरी ओर  | निष्पक्षता अपराध थी , हर किसी को एक न एक पक्ष लेना था | अब अंतिम परीक्षण बाकी था | किस पराकाष्ठा तक जाने को तत्पर हैं दोनों महानुभाव | 

उद्घोषक ने पुछा - अब ये बताएं कि अगर आपका विवाह आज रूपसी से नहीं होगा तो आप क्या करेंगे ?

कुमार समर्थक बोले -

फिर भीषण विध्वंस करेंगे , नष्ट करेंगे ये स्वंयवर । चहुँ और हाहाकार मचा देंगे । अगर या विवाह होगा तो कुमार से ही अन्यथा रूपसी का वध होगा |


और ऋषिवर आप ?
हमारा क्या है जी, परिव्राजक हैं, हमारा क्या बिगड़ेगा, हम तो झोला उठाएंगे और चल देंगे ।

इतने में रूपसी बोल उठी - ऋषिवर आप तो झोला लेकर चल देंगे । लेकिन मेरा क्या होगा जो आपको वरने को तत्पर हूँ?
क्या आप इन कुमार के भरोसे मुझे छोड़ देना चाहते है, जिनका एकमात्र गुण इनके गालों में पड़े भंवर हैं?

.... इति  ....

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

गुलामी

एक आम सी जिंदगी जीने वाले भरत की कहानी है ये | भरत पहले एक गाँव में रहता था, उसका परिवार खेती करता और एक गाँव की सीधी सादी जिंदगी व्यतीत करता |
तब परिवार बड़ा था लेकिन परिवार की जरूरतें सीमित थी | अपने गाँव की दिनचर्या, भजन में उसके दिन व्यतीत हो रहे थे | सब एक से ही थे सो कोई ऊंच नीच नहीं,
सब बराबर ही थे | जो कुछ खेत में उगता वही बेच कर खाते पीते और मस्त रहते |
एक दिन उसके गाँव में कुछ ईसाई मिशनरी आ बैठे | तब एक नया दौर शुरू हुआ | मिशनरियों को जरूरत थी उनकी भाषा समझकर उनका काम करने वालों की |
सो उन्होने शिक्षा देने के नाम पर प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया | जब तक शिक्षा चली ये सभी लोग उन मिशनरियों के गुलाम बने रहे | और जब मिशनरी चले गए तब जाकर गुलामी से मुक्ति मिली |

मिशनरियों की जगह नए साहूकार आ गए |

लेकिन वे सब बदल गए थे, भरत बदल चुका था  | शिक्षा मिलते ही खेती से भरत का मन उचट गया और भरत पर भूत सवार हो गया नौकरी करने का और वह गाँव छोड़कर शहर आ गया |
पहले तो उसे नौकरी मिली नहीं क्योंकि वह कुछ जनता तो था नहीं | उसे गुलामी करने का प्रशिक्षण तो मिशनरी दे ही गए थे ,बस इसी को अपनी योग्यता समझकर वह एक बड़े सेठ के यहाँ नौकरी पर लग गया |

उससे तरह तरह के काम लिए जाते, पगार के नाम पर मामूली रकम मिलती | लेकिन व सोचता की यह सेठ ही ने उसे नौकरी दी है, और कोई उसे नौकरी या तो देगा नहीं या उसे मिलेगी भी नहीं |
भरत को सेठ ने कभी गाँव जाने नहीं दिया और शहर में ठीक से बसने नहीं दिया | वह मिशनरियों की गुलामी से निकलकर दूसरी गुलामी में फंस गया |

लेकिन एक दिन वह जगा , उसके गांव से एक बेटा आया था उसके परिवार का उसे लेने, इस बार भारत ने हिम्मत की, वह गुलामी छोड़ कर चल दिया |
उसे अहसास हुआ की गांव में ही रहता तो शायद उसकी जिंदगी बेहतर होती |

भरत के छूटते ही सेठ तड़प उठा, उसके अहम् पर चोट लगी थी | सेठ अब साम दाम दंड भेद लगाकर अपना गुलाम वापस लाने की जुगत में लग गया और भरत को तरह तरह से चोट पहुँचाने लगा  |

सुना है सेठ के लोग तरह तरह के षड्यंत्र रच रहे हैं | उसके गांव की शांति भंग  करने के भरपूर प्रयास हो रहे हैं | उसके परिवार के लोगों में आपस में कलह के बीज बोये जा रहे हैं ताकि वे आपस में लड़ते झगड़ते रहें |
सेठ अपना गुलाम इतने आसानी से छोड़ने वाला नहीं है |
बड़े भाई को छोटे से  , छोटे को मंझले से , मंझले को पड़ोसी से और पडोसी को उसके पडोसी से लड़वाने की घटनाएं बढ़ गयीं |
कोई पानी पे से आपस ने लड़ बैठते ,कोई खेत को बाँटने के नामपर | सब दोष भरत पर मढ़ने की कोशिश करते की जबसे ये वापस आया है तब से ये सब हो रहा है |
भरत में भी आत्मग्लानि जागृत हो रही थी, कहीं उसका ही दोष तो नहीं |

लेकिन उसके परिवार और उस छोटे लड़के को भरत पर भरोसा था , गलती उसकी नहीं थी, बल्कि षड्यंत्रों की थी | और इन षडयंत्रो का अंत निकट ही था |
कुछ दिन और , उसके बाद सेठ की हिम्मत जवाब दे जाएगी | और जो होगा जीत भरत की ही होगी |

भरत को उसका परिवार छोड़ने वाला नहीं है , जल्दी ही आमने सामने की लड़ाई आने वाली है , और इसमें जीत हर तय कर देगी की भरत को फिर से अनगिनत सालों तक गुलाम बन कर रहना है , या सेठ के अहम् के साथ उसके

बिछाये हुए जाल को भी नष्ट कर  देना है | भरत हिम्मत हार गया तो फिर जकड़ा जायेगा गुलामी में |

बस इस बार जो होगा आर या पार ही होगा |

काम संगठन का

किशोरीलाल बड़ी देर से पहुंचे ,लेकिन शादी में पहुँच ही गए । उनके भांजे की शादी थी लेकिन बस बारात निकलने के कुछ समय पहले ही पहुंचे थे । आजकल बहुत व्यस्त रहने लगे थे । किसी संगठन से जुड़ गए थे शायद । उसी के काम में लगे रहते । आजकल कुछ बदले बदले से हो गए थे ।

आते ही उन्होंने अपने व्यवहार के अनुसार बैठक लगा ली और लग गए इधर उधर का ज्ञान बघारने । हंसी-मज़ाक, सरकार, धर्म, राम , रावण न जाने क्या क्या । बात करते करते दो एक नए लड़के कुछ ज्यादा ही प्रभावित लगे । गाँव के लड़के थे, ऐसी चपल बातों से प्रभावित होना कोई नई बात नहीं ।

तब किशोरीलाल जी को जैसे सुनने वाले मिल गए और फिर उन्होंने बघारना शुरू किया इतिहास से शुरू होकर वर्तमान तक । मारीच पर हुए अत्याचार से लेकर ताज़ा हिरन के शिकार तक । शबरी से लेकर राबड़ी तक । न जाने क्या क्या सुनाया समझाया । अंग्रेजों का महिमामंडन किया ।

मुगलों का गुणगान किया । जिसका करना था उसका अपमान किया । सरकार की विफलताएं गिनाई । जाति के समीकरण समझाए । आजादी और अधिकार के स्वप्न दिखाये । इस प्रकार जब दोनों लड़के बिलकुल उनके भक्त हो गए तो उनसे बोले, कहो तो अपने व्हाट्सएप्प ग्रुप में जोड़ दूँ?

उसमे तुम जैसे कई नौजवान हैं । उनके बीच तुम्हे सब राज़ की बातें पता चलेंगी । कई षड्यंत्र समझोगे । मोबाइल नंबर का आदान प्रदान कर लिया गया । इतने में बहन आ पहुंची और उलाहना दिया एक तो ऐन वक़्त पर आये हो बारात का समय हुआ जाता है और यहाँ गप्पे लड़ाते बैठे हो ,ये नहीं की हम सब से मिल ही लो ।
मिल तो रहा हूँ सबसे,वे बोले।

मेरे आने का उद्देश्य तो सफल हो ही गया है।शादी के बहाने कुछ काम संगठन का भी हो गया।दो लड़के मिल गए।बारात के बाद निकल जाऊंगा वापस, पूजा पाठ तो मैं मानता नहीं सो रुकने का क्या मतलब।देख लेना तुम ही।

बहन चुपचाप अपने काम में लग गयी।

ढाबा

सुबह सुबह कुलदेवी के दर्शन के लिए निकले और लौटते समय बड़ी तेज़ भूख लगी । सुना था रास्ते के एक गाँव के वड़े बहुत स्वादिष्ट हैं चखना ही चाहिये । अंदर गाँव में जाने का समय तो था नहीं लेकिन कुछ खाना तो था । 

ड्राईवर ने बताया कि बाहर सड़क पर ही एक जगह वैसे ही वडे मिलते हैं ।
गाडी रुकवाई गयी । एक टपरी थी, घास की छत और मिटटी का छोटा सा कच्चा प्लेटफार्म । 
एक व्यक्ति वडे तल रहा था, एक समोसे बना रहा था, एक पैसे संभाले था और एक लोगों को सामान दे रहा था । 

वडे, समोसे और मंगौड़ी सब खाया गया । तीन सौ में आठ लोगों का पेट भरा और सफ़र आगे शुरू हो गया । 
न खाने वाले ने बनाने वाले की जाति या धर्म पूछा न बनाने वाले ने । खाने वाले के लिये वो एक विक्रेता था और बनाने वाले हे लिये वो एक ग्राहक ।

वडे मंगौड़ी बेच कर चार लोग रोजगार पा रहे थे और नए बने फोरलेन हाइवे पर एक बड़ा ढाबा अपनी संभावनाएं तलाश रहा था ।



अंगीठी की सभा

सर्दियों का मौसम था ।

सुबह  की ठण्ड में चाय के साथ आग तापने जब लोग अंगीठी के आसपास जमा होते हैं तो बातों का ऐसा सिलसिला चलता है कि घंटों खत्म नहीं होता । अंगीठी जलती जाती है उसमे लकडी डलती जाती है, बातों के विषय में रूचि और अपने अपने काम के अनुसार लोग आते जाते रहते  । लेकिन सिलसिला नही टूटता । शादी के लिए सब रिश्तेदार जुड़े थे । सो अंगीठियां भी लगी थी और गप्पों का सिलसिला भी चल रहा था ।

ऐसी ही एक अंगीठी के पास उत्पल मास्टर आकर बैठे ।

"और बताओ भैया कैसा चल रहा है सब"

"राम राम भैया, सब बढ़िया है रामजी की कृपा से"

"क्या चल रहा , खेती किसानी में? अब तो सब की किसानी डूबी सी है"

"अरे नहीं भैया, ठीक ठाक है, ठीक फसल आई इस बार"

"अरे कहाँ ठीक, किसानों की हालत खराब है देश में, विद्रोह पे उतर आये हैं"

"हमारे यहाँ तो ऐसा कुछ नहीं "

"ऐसे कैसे नहीं है, देखो वो देवीदीन कितना परेशान है, पूरी फसल बर्बाद हो गयी उसकी"

"किसानी है भैया ,हो जाती है किसी किसी की खराब"

"हाँ ,तो सरकार की जिम्मेदारी तो बनती है, कि नहीं"

"दिलवाया था सरपंच ने कुछ मुआवजा लोगों को "

"अरे, मुआवजे से क्या होता है, चारो तरफ हाहाकार मचा है,जब से ये सरकार आई है"

"भैया दो चार की फसल हर साल खराब होती है, वो तो भला हो फसल बीमा का, कि आजकल मदद हो जाती है"

"अरे बीमा से क्या? वो, मनोहर तो जहर खा गया था"

"भैया मनोहर की तो अलग है,अपने घरवालों से लड़झगड़ के गुस्सा गया था, और कोई परेशानी थोड़ी है"

"अरे लेकिन है तो किसान, परेशान है तो सरकार को मदद करनी चाहिए"

"काका कैसी बात कर रहे हो, उसके घर की बातों में कहाँ घसीट रहे सरकार को"

"लेकिन गन्ना किसान परेशान तो है"

"पर हमारे गाँव में गन्ना तो होता ही नहीं"

"तो जहाँ होता है, वहां का परेशान  है, कल को तुम भी हो जाओगे"

 "पर मैं तो किसान हूँ ही नहीं, मैं तो दूकान चलाता हूँ"

"अरे तो व्यापारी भी तो परेशान है gst से "

"पर गाँव में तो हम gst के दायरे में आते ही नही, छोटी मोटी दुकानदारी है"

"अरे !तो कभी तो आओगे"

"भैया जब आयेंगे तो दे देंगे, अभी तो फ़ालतू बैठे थे, सरकारी योजना से लोन मिल गया,  तुम्हारी भौजी के नाम पर |

सो छोटी सी दुकान में बिस्कुट नमकीन बेचना शुरू कर दिया,फिर थोडा किराना,अभी हम gst में नहीं आते। जब आयेंगे तो देने लायक कमाई भी तो होगी"
"पर परेशान तो तुम होंगे ही इस सरकार से, हमें इनको उखाड़ फेंकना है ,हम सब पर अत्याचार हो रहा है। बेरोजगारी पनप रही है , त्राहि त्राहि कर रही है जनता।"

"भैया अब बतायें तो , तीन साल पहले बनी फ़ोर लेन, फिर फ़ोर लेन के किनारे बने ढाबे, फिर ये बिस्कुट की फैक्टरी लग गयी गाँव के बाहर, गांव का बहुत सा मजदूर उसमे लग गया | त्राहि त्राहि हमारे गाँव में तो नहीं दिखती "

 "पर जतिन का लड़का तो बेरोजगार है"

" वो अलग नालायक है, दस बार लगी लगाई नौकरी छोड़ चुका है, पिछली बार तो चोरी करते पकड़ा गया औ निकाल दिया गया"

"अरे तो है तो बेरोजगार"

"देखो भैया, ये सब तो हमेशा से होता आया है और होता रहेगा, सब लोग और सब दिन एक से नहीं होते, एक घर के चार लोगों में सबकी कमाई एक सी नहीं होती । कुछ न कुछ परेशानी चलती रहती है |लेकिन समाधान सब मिल के निकालते हैं न की रोते गाते हैं । गाँवों में समस्याएं हैं लेकिन आज की उपजी नहीं है । बस हम समाधान की तरफ कैसे जाते हैं ये महत्त्वपूर्ण है और अभी तो सब ठीक जाते लग रहा है"


"अरे ऐसे कैसे ठीक जा रहा है, तुमने अखबार पढ़ा है?"

"नहीं"

"टीवी पर प्राइम टाइम तो जरूर देखा होगा"

"दूरदर्शन आता है भैया वही समाचार सुनते हैं"

"तब तुम्हे क्या पता होगा"

" बस इतना पता है की अभी अपनी जिंदगी सुकून से कट रही है"

"तुम समझ ही नहीं रहे हो, परिस्थिति बड़ी विकट है"

"जाने दो भैया काम पर, फिर कभी समझाना"

"बैठो थोडा बताते है उस दिन टीवी में क्या आ रहा था"

"भैया क्या बहस करें अब तुमसे, तुम्ही जीते, दुकान खोंले जाकर, शाम को पंगत में मिलते हैं, दोने ले जाना दुकान से , राम राम"

आखिर अंगीठी की सभा उठ ही गयी ।

#angeethi
#अंगीठी

रविवार, 8 अप्रैल 2018

हसीनापुर का मालिक

एक शहर था हसीनापुर । हसीनापुर पर तात्कालीन मार्जनीदण्ड नामक वंश का शासन था ।  महाराज रीजक स्वयं को हसीनापुर का मालिक मानते थे और हसीनापुर उनके वंश की संपत्ति ।

विरोध इनका जीवन था , अवरोध बनना इनका उद्देश्य | आत्म प्रशंसा इनका ध्येय था | प्रतिवाद इनका कर्म था और विवाद इनका धर्म |  इस वंश के उत्थान की कथा भी रोचक है ।
एक बार एक ऋषि तापस्या कर रहे थे, तब रीजक जाकर चुपचाप वहां बैठ गया । जब भगवन प्रकट हुए तो ऋषि से बोला आप भोले हैं मुझे मांगने दीजिये सबका कल्याण मांगूंगा और इस प्रकार ऋषी को मूर्ख बनाकर हसीनापुर का राज्य मांग लिया ।

ऋषि पंचवटी को लौट गए और इधर प्रारम्भ हुआ रीजक का शासन काल । रीजक शासन कम और प्रतिवाद अधिक करता था । आये दिन एक नया स्वांग करता । राज्य की व्यवस्था ठप हो चुकी थी । कभी लोकपालों पर खीझता, कभी पडोसी राज्य को दोष देता । कभी जम्बूद्वीप सम्राट के प्रति कटु वचन कहता ।

रीजक के मन में इतनी कटुता थी की करेला और नीम को मिष्ठान्न घोषित कर देना चाहिये । रीजक का मन कटु और जीव्हा विषयुक्त हो गयी थी ।

विचारों लोभ और दम्भ भर चुका था । एक बार तो स्वयं का नाश करने के लिये तपस्या पर बैठ गया ।
सोचा जब ऋषि को ईश्वर ने दर्शन दिए तो मुझे भी देंगे और तब मैं हसीनापुर के साथ जम्बूद्वीप का शासन मांगूगा  । चार दिन की क्षुधा ने उसके मन से जम्बूद्वीप निकाल दिया और वह जम्बूफल मुंह में रखकर तप त्यागते हुए बोला मैं सिर्फ हसीनापुर की सेवा करूँगा ।


रीजक का मानसिक संतुलन फिर भी ठीक नहीं हुआ । और यदा कदा कुछ न कुछ ऐसा करता कि लोग स्तब्ध रह जाते की उनका राजा इतना बड़ा मूर्ख भी हो सकता है ?

रीजक की सभा में एक लपिक नामक ब्राह्मण था । एक बार लपिक ने रीजक को शास्त्र की शिक्षा देनी चाही । इसपर रीजक ने लपिक को अपने दरबार से निष्काषित कर दिया । ब्राह्मण ने रीजक के नाश की शपथ ले ली ।
 ऐसे ही जो रीजक के विरुद्ध मुंह खोलता रीजक उसे राज्य से निकलवा देता । कई लोग त्राहि त्राहि करते उसके राज्य से बहार निकल गए ।

लपिक रोज दरबार में पहुँचता और रीजक से प्रश्न पूछता और रीजक के विश्वस्त लपिक को गद्दा समझकर धुनते और यह सिलसिला निरंतर चलता था ।

रीजक का एक विश्वास पात्र था हसींयजसं । वह एक सवा दो कुंटल का भारी भरकम नरपशु था । विषाक्त मन, विषाक्त वाणी, विषाक्त जिह्वा और विषाक्त दृष्टि उसकी पहचान थी ।
वह इतना वामी था कि उसके शरीर का केवल बायां भाग काम करता । रीजक को रोज विषपान कराता और सभा में द्वेष भरता जाता । हंसीय एक कुटिल कुत्सित मानसिकता वाला व्यक्ति था । वह कहता कि उसकी पूँजी शून्य है परंतु वह व्यय इतना करता कि राजकोष हिल जाता |

हसींय ने ही सभा से दाढ़ीधर वदया समेत हर उस व्यक्ति को राज्य से निष्कासित करवा दिया था जो उसके और रीजक के बीच मे आने का प्रयत्न करता | हंसीय को धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्तिओं और धर्म से विशेष घृणा थी | जो भी उसे धर्म पर चलता दिखता उसका उपहास करता |


पड़ोस के राज्य उत्तमदेश में एक महंत का राजतिलक हुआ तब हसींय के हृदय पर उसका ही मित्र शतोशुआ लोट गया |  शतोशुआ एक अत्यंत कुटिल विषधर था | मन, क्रम, वचन और वाणी से कलुषित | पहले टीवी पर विषवमन करता था किंतु बाद मे महाराज रीजक का दास बन गया |

एक अन्य राज्य के शासक ने अपनी सभा मे एक साधु को स्थान दे दिया इससे हसींयजसं इतना चिढ़ा कि समस्त साधुवर्ग के साथ उस शासक भी खूब उपहास किया |

मार्जनीदण्ड वंश और हसीनापुर के प्रति हंसीय का योगदान केवन विष वमन करना था | जिसको रीजक और उसके चाटुकार पीकर बेसुध रहते |


रीज़क को चाटुकरिता अत्यंत प्रिय थी, अपनी प्रसंशा सुनकर रीजक अत्यंत प्रसन्न होता | उसने अपने आसपास चाटुकारों की ऐसी मंडली बना ली थी जो रीजक को कुछ देखने ही नही देते
और रीजक भी कुछ और देखने मे कोई रूचि नही दिखाता |


जब राज्य के किसी कार्य की बात आती तो रीजक किसी न किसी पर दोष मढ़ देता | जब कोई जल माँगता तो कहता की पड़ोस के राज्य ने नही दिया , कब कोई बिजली माँगता तो कहता पूंजीपति नही देते |
हालाँकि सत्तारूढ़ होते समय रीजक ने जल और बिजली जनसुविधा कम कीमत पर देने की घोषणा की थी | पर अब रीजक मुकर जाता है | लपिक भी इसकी पुष्टि करता |

जब कोई अधिक गंभीरता से पूछता तो कहता कि उसे लालजी नामका व्यक्ति कुछ करने नही देता | लालजी क्योंकि जम्बूदीप के सम्राट का प्रतिनिधि था, तो दोष जम्बूदीप पर मढ़ने से रीजक स्वयं को दोषरहित घोषित कर देता |

रीजक की सभा चल रही थी | एक विषदंत ने प्रस्ताव रखा रामनवमी को बंद किया जाए क्योंकि इससे ख़तरा है | लोग राम का नाम लेकर सनातन को बढ़ावा देना चाहते हैं | इससे पहले यह विष सभा से निकल कर जनमानस तक पहुँचता लपिक ने लपक कर प्रस्ताव छिन्नभिन्न कर दिया | पर इसपर लपिक पुनः गद्दा बना दिया गया |

ऐसी कितनी ही घटनाएँ होती और हर विरोधी को पीटपाटकर रीजक कहता लोकतंत्र ख़तरे मे हैं |

पिछली बार जब अपने प्रतिनिधि जम्बूदीप मे भेजना था तब रीजक ने हंसीय और गुप्त रूप से एक अजगरधारी को वरिष्ठों की सभा मे भेज दिया और इसी के साथ विष वहाँ भी पहुँच गया जहाँ शांति से सोचने का काम होना चाहिए | वरिष्ठ सभा तब से ही चल नही पाई |
इसी घटना से कुपित हो रीजक के भक्ति गीत गाने वाले कवि ने सभा का त्याग कर दिया | कवि रीजक का आवरण था, जो अपनी वाणी से रीजक की कुटिलता को भी ओजपूर्ण भक्तिभाव मे परिवर्तित कर देता |
कवि के जाने से रीजक आवरण हीन हो गया | अब कवि रीजक को आत्ममुग्ध और लोलुप कहते हुए मद्धम विरोध मे कविताएँ पढ़ते दिख जाता | जो उसके आवरण को प्याज की तरह परत-परत छीलता जाता |

रीजक के राज्य मे अराजकता बढ़ती जा रही थी और लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे | लोगों को आशा थी की रीजक को सद्बुद्धि आए और हमारी कोई बात सुने | और इतने मे रीजक की ओर से घोषणा आई - ग्रीष्म ऋतु है |
महाराज को शीतलता की आवश्यकता है. अतः शायद किसी दक्षिण के पंचतारा रिज़ॉर्ट मे छुट्टियाँ बिताने जा रहे हैं और रीजक एक पखवाड़े के लिए राज्य से अंतर्ध्यान हो गये |

हसीनापुर के लोगों के मुख से हँसी लुप्त है और अपने राजा के कारण वे सब हँसी का पात्र बने हुए हैं | लोगों सोच रहे हैं यह शासन ख़त्म कब होगा और जम्बूदीप का शासन सोच रहा था चलो अच्छा है ये सब जम्बूदीप मे ही सीमित हैं | मुक्त होते तो तांडव करते फिरते |

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

बदलाव

हम वर्तमान सरकार को कुछ विशेष दृष्टि से ही देख रहे हैं । कहीं न कहीं बहुत कुछ हमारी खुद की दृष्टि को बाधित कर रहा है । हम कोई न कोई घटना , विचार, आंकड़ा , वक्तव्य या किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना को ही इस सरकार की सफलता या असफलता का पैमाना मान कर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन कर रहे हैं ।

आज बात आंकड़ों की नहीं , न ही विरोधियों की आलोचना की , न ही किसी वक्तव्य की । कुल मिला कर हम समाज और अपने जीवन में आये बदलाव पर एक नज़र डालते हैं ।


2014 से पहले एक नैराश्य था, लोगों को कुछ ख़ास उम्मीद नहीं थी । ऊपर से दिखते शहरी विकास, और महलों के प्रकाश से लोग अचंभित थे मुग्ध थे लेकिन कोई आशा नही करता था कि जो दिल्ली के महलों में है वो उसके घर में होगा ।

बिजली को लीजिये , पहले बिजली होना एक सुविधा की तरह था जहाँ थी वहां थी, और जहाँ नहीं थी वहां के लोगों को उम्मीद नहीं थी । उत्तर प्रदेश में लोगों के मन में नैराश्य था, बिजली मिलने की आशा नहीं थी । इन्वर्टर जनरेटर के इंतेज़ाम कर लिए जाते थे बिना शिकायत के । यहाँ तक कि लोग सोचते थे बिजली आती ही नहीं है और यह सामान्य बात है ।

लेकिन अब सोच बदली है, बिजली को सुविधा से बढ़कर आवश्यकता की तरह देखा जाने लगा है । पहले जहाँ छह से बारह घंटे की कटौती सामान्य बात थी अब एक दो घंटे कटौती होने पर भी लोगों ने शिकायत करना शुरू कर दिया है । जो दर्शाता है कि लोगों ने इसे अपना आधिकार समझना शुरू कर दिया है । यह बदलाव हैं ।


सुबह सुबह कान में एक गीत पड़ता है एक गाडी "इरादा कर लिया वादा" गीत बजाते हुए निकलती है और घर घर से कचरा उठाती चली जाती है । बड़े शहरों में कुछ ऐसी ही परंपरा पहले से थी । अब यह एक आम शहर की आम बात बन गयी है । आपको नहीं लगता यह एक बड़ा बदलाव है , शहर की सफाई के प्रति बहुत बड़ा कदम है?   स्थानीय निकायों ने अपनी अपनी रफ़्तार से लागू किया है लेकिन बदलाव दिखता है ।

स्वच्छता के प्रति लोगों में जागरूकता बहुत बढी है । शहर पहले से अधिक साफ़ हैं । बाज़ारों  में शौचालय काफी तेज़ रफ़्तार से बने हैं । बड़े तो पीछे है, स्वच्छता के एम्बेसेडर बने हैं छोटे छोटे बच्चे । जब एक छोटा बच्चा ट्रेन में बैठकर बिस्किट खाने के बाद पूछता है ये रैपर कहाँ फेकना है तो समझ लीजिये स्वच्छ भारत अभियान सफल हुआ है । स्वच्छता को सरकार सहयोग कर सकती है, लेकिन गंदगी लोगों की जागरूकता ही हटा सकती है और यह मेरी समझ में बदलाव की और बड़ा कदम है ।

घर घर शौचालय बनाने की जो मुहिम चली , उसमे गाँव गाँव के घर घर तक शौचालय बनते देखे गए  । गाँवों में स्वच्छता के प्रति नज़रिये में बदलाव साफ़ दिखता है । मैंने ऐसे लोगों को शौचालय बनवाते देखा जो अस्सी नब्बे साल के हैं , लेकिन इतने सालों में अब जागरूक हुए हैं । देखिये किसी ऐसे जागरूक हुए परिवार को अपने आसपास आपको बदलाव दिखेगा  ।

अब की बार जब आप रेल से सफर करें तो थोड़ा गौर करें । क्या आपको स्टेशन साफ लगते हैं? क्या स्टेशनों पर शौचालय साफ है ?  रेलगाड़ी में सफाई की स्थिति कैसी है ? पिछली बार आपने तत्काल के प्रति हाय तौबा कब देखी थी ? अगर सर्दियों में कोहरे के अलावा किसी और कारण से बहुत लेट हो रही है ? क्या गाड़ियों का किराया इतना बढ़ गया है जितना 5 साल में नहीं बढ़़ना चाहिए?

जरा गौर कीजिए रेलगाड़ी में सफाई, सुविधा और रेलमंत्री द्वारा जरूरतमंद लोगों तक जरूरत का सामान पहुंचाना,  उनकी समस्याओं का समाधान  करना ।चलती रेलगाड़ी में आपने ऐसा होते देखा सुना है?

जब हम सड़क पर चलते हैं खासकर लंबी दूरी के लिए तब आपको कोई बदलाव महसूस होता है ?आपको नहीं लगता कि यह सफर अब अधिक सुविधाजनक हो गया है । सड़कों की स्थिति पहले से बेहतर है आपको नहीं लगता कि जो सड़कें सालों से लंबित थी, वो अचानक कब बन गई पता ही न चला ।

ऐसे ही देश में न जाने कितने हवाई अड्डे कितनी उड़ाने  शुरू हो गई धीरे धीरे , जिनकी जीवन में एक बार हवाई जहाज में बैठने की इच्छा पूरी हुई है शायद उनके लिए बड़ी बात होगी ।

ये सब होता गया और हम इसे सामान्य घटनाक्रम में लेते गए । बदलाव शायद महसूस नहीं हुआ ।

जब आप दूध लेने जाते हैं और दूध वाले को पेमेंट किसी वॉलेट के माध्यम से करते हैं तब आपको नहीं लगता कि हम काफी आगे  आ गए हैं यहां तक की छोटे शहरों में छोटे-छोटे कारीगर तक विमुद्रीकरण के  समय में Paytm अपना गए । आपको नहीं लगता की दशकों तक आम जनता को अनपढ़ और मूर्ख समझा गया और उसे आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया और जब डिजिटल इंडिया की बात आई तब वही अनपढ़ गरीब आसानी से यूपीआई भीम वॉलेट द्वारा डिजिटल ट्रांजैक्शन महीने भर में सीख गया ।

लोग कहते रह गए अनपढ़ आदमी डिजिटल ट्रांसक्शन नहीं समझ सकता, वह कैसे कर पायेगा और  हुआ उल्टा जिस तेजी से डिजिटल ट्रांजैक्शन बढे हैं और लोगों ने सीखा है वह यह बताता है कि वर्तमान सरकार  ने लोगों पर भरोसा करके डिजिटल इंडिया को बढ़ाया और लोगों ने उस भरोसे को कायम रखा ।

जिनके पास था शायद उनको बैंक अकाउंट का महत्व नहीं पता होगा, जिनके पास नहीं था और 2014 के बाद खुला वे जानते हैं के खाते में सीधा पैसा पहुंचना उनके लिए कितना फायदेमंद है। बैंक कर्मियों ने जबरदस्त काम किया लोगों को बैंक से जोड़ने में और मिशन मोड में वह कर दिखाया जो शायद पुरानी रफ्तार से अगले 20 साल में भी ना हो पाता यह बदलाव है ।

बहुत छोटी सी चीज आई है आजकल सिम एक्टिवेट करने का तरीका देखा है आपने? बस डिजिटली वेरीफाई करो एक दिन में ही सिम एक्टिवेट हो जाती है 2 से 3 दिन लगते थे ।

पिछले 4 साल में कितने लोगों ने पासपोर्ट बनवाया या रिन्यू किया यह बता सकते हैं कि पासपोर्ट बनवाना कितना आसान हो गया है।

शायद सब्सिडी का गणित आम आदमी को समझाना बड़ा कठिन हो । क्योंकि इसका असर सीधा सीधा उसकी जेब पर पड़ता है ।

लेकिन आज वास्तव में गैस पर सब्सिडी बहुत कम हो गयी है । पहले आपको चार सौ में सिलेंडर मिलता था लेकिन सरकार को बरह सौ का पड़ता था । अब सोचिये एक सिलेंडर पर सीधा आठ सौ रूपये आपको सब्सिडी देती थी । लेकिन फिर किसी और तरह से वसूल लेती थी । आज के समय में सिलेंडर बाजार भाव से मिल रहा है । कुछ लोगों ने सब्सिडी छोड़ भी दी है । उससे फायदा हुआ कि गरीबों तक उज्जवला योजना के जरिये  गैस पहुंची । सोचिये इतने सारे सिलेंडर कनेक्शन धारी अचानक कहाँ गायब हो गए? कहीं न कहीं सब्सिडी लीक होती थी वह बंद हुई है ।
कुल मिला कर बात ये है कि सरकार का सब्सिडी का बोझ कम हुआ है । अब बारह सौ का सिलेंडर लगभग आठ सौ का सरकर को ही पड़ता है । और उसमे से कुछ सब्सिडी आपको मिल जाती है । लेकिन इसका फायदा सरकार ने गरीबो तक पहुँचाया है ।

समाज में चरित्र निर्माण की प्रक्रिया धीमी है पर दिखती है । लोग चीज़ों को बारीकी से देखते हैं । प्रश्न करते हैं । जनप्रतिनिधियों के जनता के बीच में जाने की ख़बरें भी आती हैं और सोशल मीडिया पर भी जनप्रतिनिधि संपर्क में बने रहते हैं । यह बदलाव है ।

हाँ यह बात अलग है कि कुछ स्थानीय सरकारों ने काम को तेज़ी से बढ़ाया है और कुछ सुस्त पड़ी रही ।कुछ विरोध के नाम पर हरकत में ही नहीं आयीं । जिससे अलग अलग जगहों पर अलग अलग रफ़्तार दिखती है ।

दुकानदार अब खुद आपको रोककर बिल देते है । अधिकतर मेडिकल स्टोर वाले बिल स्वतः देते हैं । दवाइयाँ सस्ती हुई हैं । जहाँ जहाँ नहीं हुआ है, वहां समय के साथ होगा ।

सेना का मनोबल इस समय बहुत ऊँचा है । हमले होते हैं, लेकिन सेना उत्तर दुगनी शक्ति से देती है ।

देश के सम्मानों को देख लीजिये, पिछले सालों में पद्मभूषण, पद्मविभूषण सेलेब्रिटी लोगों से ज्यादा आम लोगों को मिल रहे हैं । जिन्होंने वास्तव में जान सेवा की है । यह सराहनीय है ।

बीमा योजनाएँ और स्वास्थ्य की ओर सरकार के कुछ अच्छे कदम हैं | हमारे यहाँ अब तक स्वास्थ्य सेवा को एक सुविधा की तरह देखा गया है | अस्पताल होना एक आवश्यकता नही एक विशेष सुविधा मानी जाती है | अब हेल्थकेयर के माध्यम से शायद हमारी दृष्टि यहाँ बदलेगी | अब स्वास्थ्य सेवाएँ सुविधा नही अधिकार बनने जा रही हैं | अगर नमोकेयर सफल होता है तो हमारे समाज का खाका बदल जाएगा | जहाँ आज काई परिवार अपनी समस्त जमापूंजी किसी एक बीमार सदस्य पर खर्च कर देते हैं इस सुविधा से लोगों को बहुत राहत मिलेगी | और सरकार ने अस्पतालों को सुविधा नही आवश्यकता की तरह बनाने का प्रयास किया है | नये एम्स और मेडिकल कॉलेज इसकी पुष्टि करते हैं |

आजकल आपने गौर किया हो तो ख़बरे आती हैं कि बहुत बड़ा आंदोलन हो रहा है , इतने हज़ार लोग चलकर राजधानियों मे पहुँच रहे हैं | लेकिन अगर लोग बिना उत्पात के सरकार के साथ सहयोग करते रहे हैं तो बड़े बड़े आंदोलन शांति से निपट गये हैं | उनको छोड़ दीजिए जिनका उद्देश्य ही हिंसा फैलाना था | सिस्टम का लोगों को संभालने का तरीका बहुत बदल गया है |

आपको नहीं लगता कि सरकार से सबसे बड़ी शिकायत अब यह है कि काम कम हुआ है, ये नहीं है की बिलकुल नहीं हुआ है, शायद काम छूट गए हों । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की होंगे नही । बदलाव यह है कि नाउम्मीदी नहीं है अभी ।

लोगों के एजेंडे पर मत जाइये । बस अपने आसपास देखिये । अगर कुछ बदला हुआ दिखे तो आप जानते हैं कि आपको क्या करना है |



#बदलाव

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

अंत्योदय, बरिस्ता और बैरिस्टर


अंत्योदय दीन दयाल जी का स्वप्न था , उनका अंत्योदय बस्तियों से बरिस्ता तक कब पहुँचा पता ही न चला ।
ऐसा नहीं है कि बरिस्ता नहीं पहुंचना चाहिए, पर बस्तियों से नहीं हटना चाहिए ।
चाय के नुक्कडों से शुरू हुआ यह सफ़र बरिस्ता तक पहुंचा बड़े आनंद की बात है |


दीन दयाल जी अगर होते तो तपती धूप में बदन जलाकर पसीने से नहाये हुए मजदूरों को चाय के नुक्कड़ों की जगह बरिस्ता में कॉफी पीते देखकर झूम उठते।
हालाँकि बरिस्ता का लोगो और अंबीएन्स ही ऐसा है कि जैसे भगवा रंग में रंगा हुआ भाजपा का कार्यालय हो । सब भगवा रंगा हुआ है ।

चुनाव के गरम माहौल में बरिस्ता की आइसक्रीम जीवन में ठंडक ला सकती है ।
हो सकता है अगले चुनाव ,जो कि मई में होंगे, उसको बरिस्ता ही स्पोंसर कर दे । हर वोट देने वाले को एक आइस क्रीम ही मिल जाये ।
हालाँकि भारत के लोग चाय तो कितनी भी गर्मी हो पीते ही हैं ।

और चाय के नुक्कड़ भी देश भर में बरिस्ताओं से तो कम नही होंगे । शायद वहां पार्टी का झंडा उठाने के लिए चार से ज्यादा लोग मिल जाते ।
अब देश में पैसा भी तो ले दे के चार लोगों के पास ही है बरिस्ता में जाने लायक।बरिस्ता से झंडा उठाने का फायदा यह है की आपका ऊपर वालों से रिश्ता बना रहेगा |

लेकिन जब झंडा उठाने के लिए कोई गरीब न मिले तो टटोलना चाहिए कि कहीं गरीबों से कट्टी तो नहीं हो गयी?
पार्टी का झंडा गरीब के हाथ में वैसा ही ट्रेडिशनल लगता है जैसा कॉर्पोरेट में दीवाली के एक दिन पहले HR पर साडी ।


ऐसा नहीं है की पूरी पार्टी ही ऐसी जगह पर अपने बर्थडे की पार्टी कर रही हो, कुछ तो होंगे जो अभी भी जमीन पर चल रहे होंगे ।
बस ऐसा न हो कि अंत्योदय के लिए निकले और कैफे से काफी मय होकर लौट आए ।

अटल जी ने जो अँधेरा छटने की बात की थी वह LED बल्ब से छट चुका है और कमल भी कमाल का खिला है ।
बस अब कमल और कमलासना को बस्ती बस्ती ,देहरी देहरी पहुँचाना आपका काम है । देखिये कमलासना बरिसताओं में न सिमट जाए ।
कॉफी हो गया शायद । पार्टी के बैरिस्टर लोग इसे बैर भाव से न लें ।
बैरन सत्ता बैर ला ही देती है और इस पार्टी के इतने लोगों से इतने बैर हैं की बैरिस्टरों से भर गयी है पार्टी ।
बैरिस्टर लोगों का काम ही बैर के स्तर को बनाये रखने का होता है । और पार्टी के कुछ बैरिस्टर जनता से बैर कर बैठे हैं ,और अंत्योदय के दूसरे छोर पर नज़र आते हैं ।

इस बैर को यहीं दबा देना होगा वरना ऐसा न हो दो चार उम्मीवारों को जनता बैरंग लौटा दे । अंत्योदय के दोनों छोरों को संतुलित रखने के लिए शुभकामनाये ।

आशा है जब बरिस्ता में बैठकर बैरिस्टर लोग देश के उत्थान की बात करेंगे , तब गरीबों के लिए काफी बात होगी ।