गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

ढाबा

सुबह सुबह कुलदेवी के दर्शन के लिए निकले और लौटते समय बड़ी तेज़ भूख लगी । सुना था रास्ते के एक गाँव के वड़े बहुत स्वादिष्ट हैं चखना ही चाहिये । अंदर गाँव में जाने का समय तो था नहीं लेकिन कुछ खाना तो था । 

ड्राईवर ने बताया कि बाहर सड़क पर ही एक जगह वैसे ही वडे मिलते हैं ।
गाडी रुकवाई गयी । एक टपरी थी, घास की छत और मिटटी का छोटा सा कच्चा प्लेटफार्म । 
एक व्यक्ति वडे तल रहा था, एक समोसे बना रहा था, एक पैसे संभाले था और एक लोगों को सामान दे रहा था । 

वडे, समोसे और मंगौड़ी सब खाया गया । तीन सौ में आठ लोगों का पेट भरा और सफ़र आगे शुरू हो गया । 
न खाने वाले ने बनाने वाले की जाति या धर्म पूछा न बनाने वाले ने । खाने वाले के लिये वो एक विक्रेता था और बनाने वाले हे लिये वो एक ग्राहक ।

वडे मंगौड़ी बेच कर चार लोग रोजगार पा रहे थे और नए बने फोरलेन हाइवे पर एक बड़ा ढाबा अपनी संभावनाएं तलाश रहा था ।



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