कुछ
लोगों के आने से घर चहक उठता है लेकिन कुछ लोगों के आने से महक उठता है। ऐसे ही एक दूर के रिश्ते के साले का कुल्लू-मनाली
से लौटते हुए आगमन हुआ। जैसे ही श्रीमान जी ने अपने जूते खोले हम उछल कर सीधे बालकनी
मे गिरे । कुल्लू मे शायद सर्दी बहुत रही होगी, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता
है कि साले ने वहाँ से लौटने के बाद भी तीन दिन तक न नहाया, वहाँ क्या खाक नहांया होगा।
तीसरे दिन जब उन्होने गुसलखाने को धन्य किया तब हमारे प्राणों मे प्राण आए।
हर
विवाहित पुरुष के जीवन में सालों का आना जाना सालों से चलता रहा है और चलता रहेगा।
पहले के समय में कुछ साले अपनी दीदी के साथ दहेज मे आते थे, और दाम्पत्य जीवन में महत्त्वपूर्ण
भूमिका निभाते थे। न जाने कितने जीजों के पाले हुए साले इधर उधर मिल जाते थे। अब साले
दहेज मे तो नही आते लेकिन आते अवश्य हैं। कभी बताकर कभी बिन बताए। बिन बताए अर्थात
सरप्राज़ देने आए हुए सालों को अचानक द्वार पर खड़ा हुआ देखकर मन मे एक ही प्रश्न उठता
है कि-ये साले कैसे आ गए? और आ गये हैं तो जाएँगे कब? और आए हैं तो किसी काम से आए
हैं कि बस आने के लिए आए हैं?
कुछ
साले तो काम से ही आते हैं और काम होते ही निकल जाते हैं। उनका आना इतना बड़ा कांड
नही होता जितना उन सालों का आना, जो आते तो किसी काम से हैं लेकिन उसके बाद इतनी फ़ुर्सत
लेकर आते हैं कि आपके जीवन मे कुलबुली करके ही जाएँ।
कुछ
साले बिना काम के यूँ ही चले आते हैं। उनके आने का न कोई समय होता है, न कारण और न
अपेक्षा। ऐसे साले आते तो हैं लेकिन जाते नही, आकर बैठ गए तो बैठ गए। उनके आने की तारीख
केवल उनको पता होती है और जाने की उनको स्वयं भी पता नही होती। विशेषकर अगर कोई साला
दूर की रिश्तेदारी का या कुछ बेरोज़गार टाइप का हो तो समझ लीजिए कि वह आपके घर की कुंडली
मे किसी ऐसे ग्रह की तरह आकर बैठेगा कि किसी विशेष पूजा के बाद ही जाएगा। उसपर टिकट
कन्फर्म होना एक अलग ही तरह का विवाद है जिसके लिए मैं रेलवे से बहुत नाराज़ हूँ। कोई
साला-साली कोटा भी होना चाहिए, जिसमें सैर सपाटे पर निकले सालों को सुविधा अनुसार जल्द
से जल्द टिकट उपलब्ध करवाया जा सके।
अधिकतर
साले अकेले आते हैं लेकिन लाव लश्कर के साथ आने वाले सालों की बात ही अलग होती है।
वे कहीं भी अकेले नहीं जाते, जब जाते हैं दस बारह को साथ लेकर ही निकलते हैं। उसके
बाद आप अपने ही घर में पाहुने हो जाते हैं।
एक
तो मुझे यह समझ कभी नही आता कि सब सालों को कुल्लू-मनाली क्यों जाना होता है। आज तक
घोर तपस्या के बाद भी यह पता नही लगा पाया हूँ की किसी न किसी साले को हर दूसरे महीने
कुल्लू-मनाली जाने की क्यों पड़ती है? तुम्हारी कोई कुलदेवी का मंदिर है वहाँ? जो दर्शन
करने निकल पड़ते हो। नही है, लेकिन नही ! जाना होता है। इसमें हमारा अपराध केवल इतना
समझिए कि मध्यप्रदेश और हिमाचल प्रदेश के बीच मे हमारा प्रदेश पड जाता है, साले महमूद
ग़ज़नवी की तरह दिल्ली को कूच करते हैं और जीवन का सुख चैन लूट पाट कर निकल जाते हैं।
इस
संसार में तरह तरह के साले होते हैं। कुछ साले तो समझ नहीं आता कि भगवान ने उन्हें
ऐसा बनाया है या वे अपने जीजा को देखकर ऐसे बन जाते हैं । और एक प्रकार के साले होते
हैं अकड़ू, जो साले अपने आप को न जाने क्या समझते हैं। कुछ साले इतने व्यवहार कुशल होते
हैं, जीजा जो चूना भी लगाते रहते हैं और जीजा को पता भी नहीं चलता। कुछ ऐसे तुर्रम
ख़ान साले होते हैं जो अपनी बहन की सगाई में ही जीजा को उसके आने वाले भविष्य की झलक
दिखा देते हैं, भूखे जीजा के सामने आकर प्लेटें भर कर आइस-क्रीम लपेट रहे होते हैं
और भूखा जीजा कुढकर चुपचाप देखता रहता है। मन मे सोचता है साले, भूख मुझे भी लगी है,
कम से कम पूछ तो लेता, तू बाद मे मिल।
हालाँकि
सालों से शिकायतें तो बहुत हैं, लेकिन फिर भी सोचता हूँ, साले हैं तो वो भी पुरुष ही।
हमारे घोर रूखेपन के बाद भी झुककर बेशर्मी से चले आते हैं तो अपनी बहन के लिए, उनकी
बहन न हो तो आयें ही क्यों? और फिर मूल बात यह कि उन सालों की बहन से कौन झगडे। इसलिए
महान संत श्री उदय शेट्टी के शब्दों में -
"सह लेंगे थोड़ा" कहते हुए अपने आप
में मग्न हो जाना ही श्रेष्ठ है।