रविवार, 2 जुलाई 2023

राधे-राधे

हम वृंदावन से लौट रहे थे। गाड़ी में अचानक बेटा कहने लगा इस बार एक बात तो समझ में आ गई,वृंदावन है कृष्ण का लेकिन चलती वहां राधाजी की है। सारी दुनिया में कृष्ण सबसे शक्तिशाली हैं लेकिन राधाजी तो उनसे भी शक्तिशाली हैं। सब भगवान की सेवा करते हैं भगवान तो उनकी ही सेवा करते रहते होंगे। हमने पूछा ऐसा क्यों लगा? 

तो कहने लगा वृंदावन कृष्ण का, मथुरा कृष्ण का, गोकुल कृष्ण का, नंदगांव कृष्ण का लेकिन कहते हैं सब राधे-राधे। मतलब ज्यादा शक्तिशाली तो राधा ही हुईं। कृष्ण को खुश करना है तो राधे- राधे, राधेकृष्ण बोलो। अभिवादन करना हो तो राधे राधे। भीड़ में किसी को सामने से हटने को कहना हो तो एक अलग स्वर में कह देते हैं – राधे-राधे। टीका लगाने वालों को मना करना हो अलग स्वर में कहते हैं राधे-राधे। टीका लगवाना हो तो मुस्कुराकर कह देते हैं राधे-राधे। किसी को कुछ भी माना करना हो तो न नहीं कहते, कहते हैं राधे-राधे। किसी को आगे बढ़ना हो तो इशारा करके कहते हैं राधे-राधे। 

लोग तो होटल में वेटर को बुलाने, कुछ मांगने के लिए राधे-राधे बोलते हैं सामने वाला समझ जाता है। गार्ड मंदिर में लोगों को फोटो खींचने से मना करने के लिए जोर से राधे-राधे बोलते हैं, लोगों के कैमरे बंद हो जाते हैं। यहां की भाषा में जैसे दो ही शब्द हैं राधे-राधे, उच्चारण का स्वर (टोन) और इशारे, बाकी शब्द जरूरी ही नहीं।

बच्चे आसपास की बातों पर कितना ध्यान देते हैं, यह बात हमें समझ आई। यह सब हमने नहीं बताया उसने खुद ही देख समझ लिया। फिर कहने लगा कि लेकिन ऐसा है क्यों? राधा कृष्ण को क्यों कंट्रोल करती हैं?

हमने उसे समझाने का प्रयास किया - राधा और कृष्ण एक ही हैं, जहां राधा की पूजा होती है वहां कृष्ण भी प्रसन्न होते हैं। इसको ऐसे समझो कि कन्या का सम्मान करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। यहां बात कंट्रोल की नहीं एक दूसरे में अपना सम्मान देखने की है। कृष्ण राधा के सम्मान में अपना सम्मान समझते हैं और राधा के लिए तो कृष्ण ही सबकुछ हैं।

बेटी इतने में उसे चिढ़ाने लगी – वैसे तो सारी लड़कियां ही लड़कों को कंट्रोल करती हैं। तेरी शादी होगी तो तुझे भी करेगी। तुझे भी सेवा करनी पड़ेगी।

तब बेटी से हमारी पत्नी ने कहा - इसका एक और अर्थ है, अगर कन्या का चुनाव सही पुरुष है तो वह सम्मान पाती है, पूजनीय हो जाती है। गलत चुनाव हो तो उसका जीवन अर्थहीन हो जाता है। राधा और कृष्ण की लीला में तो चुनने, न चुनने का प्रश्न नहीं था वो ईश्वर थे और सब उनकी इच्छा थी। लेकिन आज के समय में सही चुनाव, सही समय पर जरूरी है। कहते हैं राधा और कृष्ण पहली बार बहुत कम आयु में मिले थे, तब कृष्ण ने राधाजी को सही आयु और समय की प्रतीक्षा करने के लिए कहा था। फिर सही समय आने पर ही उनकी प्रेमलीला आरम्भ हुई थी।

इससे यह भी समझना चाहिए कि बच्चों को जल्दी बड़े होने का प्रयास नहीं करना चाहिए सब कुछ सही समय के अनुसार होना चाहिए। राधे–राधे से धैर्य भी सीखना चाहिए।

इतना ज्ञान सुनकर थोड़ी देर बच्चे शांत रहे, फिर पत्नी ने बेटे से कहा तो जब तुम्हारी शादी हो जाए तो तुम अपनी पत्नी की सेवा कर लेना जैसे कृष्ण राधा जी की सेवा करते हैं। इसपर हमारे ड्राइवर साहब भी मुस्कुरा दिए।