एक विशाल सरोवर के निर्मल जल में नाना प्रकार के जलचर विहार करते थे । सरोवर सदैव जल से युक्त रहता जिसमे प्रचुर मात्रा में वनस्पति सभी प्राणियों का भरण पोषण करती थी । कहीं से कोई भी प्राणी सरोवर में आकर रहने लगता और सरोवर में इतनी सम्पन्नता थी कि किसी प्राणी को किसी जाने से कोई आपत्ति नहीं होती । हम रहते हैं तो तुम भी रहो हम खाते हैं तो तुम भी खाओ । इस प्रकार सरोवर में सभी प्राणियों में घनिष्टता रहती थी ।
एक समय भयानक अकाल पड़ा सरोवर सूखना आरम्भ हो गया । जल एवं वनस्पति की कमी से सभी प्रजातियों के प्राणियों पर भीषण कष्ट आया।
वीभत्स परिस्थितियों में प्राणी हाहाकार कर रहे थे, जल सूखता और मलिन पंक विस्तार पाता हुआ प्राणियों का भक्षण करता ।
एक दिन अचानक श्रावण मास में घनघोर घटा छाई और उस मृतप्रायः से सरोवर के जीव वृष्टि की आशा से आनंद विभोर हो क्रीड़ा करने लगे ।
प्राणियों में मण्डूक और पंडूक नाम के दो मेंढक थे, जो घनिष्ट मित्र थे ।
मण्डूक ने पंडूक से कहा - टर्र ! अकाल ख़त्म हुआ तो सरोवर में जल आएगा और हम आम जलचर रह जायेंगे । कुछ करो कि हम दोनों का राज इस स्थान पर बना रहे ।
इधर से पण्डूक ने भी सोचा मण्डूक एक भाग ले भी जाए तो बाकी सरोवर की सत्ता हमारी, इसलिए उसने भी हाँ में हाँ मिलाई । और बोला हाँ हाँ , बंटवारा जरूरी है ताकि हम दोनों को राज करने का बराबर मौका मिल सके । फिर मण्डूक और पण्डूक ने आपस में फैसला कर के सरोवर का बंटवारा कर दिया । अब बारी थी बाकी प्राणियों को खबर देने और अपनी अपनी तरफ लाने की ।
मण्डूक बड़ा ही हरा मेंढक था, वह जलचरों को भड़काने लगा यही मौका है हमें सरोवर में अपना अधिकार मांग लेना चाहिए । ये जलचर वाणी विहीन हैं, किन्तु हम तो टर्राना जानते हैं । हम सरोवर का एक भाग मांगते हैं, वहाँ केवल हम ही रहेंगे और उस भाग का नाम मण्डूकिस्तान होगा । सभी जीवों ने समझाया कि नहीं भाई सब मिल जुल कर सरोवर में रहते हैं यह व्यर्थ बंटवारा क्यों चाहते हो?
लेकिन मण्डूक न माना और आखिरकार सरोवर के मध्य में एक रेखा खीच दी गयी । जलचर इधर से उधर हो गए । जितने मेंढक थे कूद कर मण्डूकिस्तान में चले गए । सरोवर के दोनों और लोकतंत्र कायम हुआ ।
सभी मण्डूकिस्तानियों को शिक्षा के नाम पर पढ़ाया गया कि दुनिया में केवल मेंढक रहते है और यह कीचड ही सारी दुनिया है । कुछ पीढ़ियां बीतने के बाद अधिक समय नहीं लगा सभी मण्डूकों को कूपमण्डूक बनने में । अब उनके लिए उस कीचड से बाहर कुछ भी सोच पाना संभव न था । वे वही सोचते और वही फैलाते ।
जब बहुत समय व्यतीत हो गया तब मण्डूकिस्तान से अन्य सभी जीव समाप्त कर दिए गए । जो अन्य जीव बचे भी थे उन्हें मेंढक की तरह रहना सिखा दिया गया । जो जितना ज्यादा टर्र करता था वह उतना बड़ा मेंढक कहलाता और जी मेंढक टर्र नहीं करता था उसके पास दो ही विकल्प थे , या तो वो टर्र बोले या टें । ज्यादातर तो टें बोल गए बाकियों ने गूंगा मेंढक होने का फैसला कर लिया । वे रहते तो मेंढक की तरह लेकिन टर्र नहीं बोलते ।
मेंढक कभी जमीन पर कूदते कभी पानी में इस कूदा-फांदी में पानी बहार निकलता और मिटटी अंदर आती इससे कुछ ही वर्षों में कीचड बन गया । मेंढकों को तो कीचड भी अत्यंत प्रिय था सो वे और अधिक आनंद में रहते ।
मण्डूकिस्तान के मेंढकों की एक बुरी आदत यह थी कि वहां के कीचड में सने कुछ मेंढक अक्सर सरोवर के इस ओर कूद आते और यहाँ के पानी में कीचड घोलने लगते । फिर इस तरफ के प्राणी उन्हें मार पीट के भगा देते । इसलिए दोनों और तनाव बना रहता।
मण्डूकिस्तान में लोकतंत्र चरम पर रहता और सभी मेंढकों से वोट डलवाये जाते । प्रधानमण्डूक चुना जाता । फिर मौका मिलने पर उसे जेल में डाल दिया जाता । इस प्रक्रिया को जनरल इलेक्शन कहा जाता था । मण्डूकिस्तान में अक्सर जनरल इलेक्शन होते रहते ।
इस बार भी जनरल हुए इलेक्शन हुए और जनरल साहब ने एक लंबा चौड़ा अधेड़ उम्र का नौजवान मेंढक अपना प्रधानमण्डूक चुन लिया ।
मेंढक ने प्रधानमंत्री बनते ही कहा टर्र। बाकी मेंढक टर्र टर्र कर उसका स्वागत करने लगे।
उधर नौजवान मेंढक के प्रधानमण्डूक बनते ही कुछ कूपमण्डूक उछल पड़े। उछले तो कुछ शेरी से शेरू बने मण्डूक भी थे और टर्रा टर्रा के कीचड़ में ही कूद गए ।
कुछ मेंढकियों की मेहर भी नए प्रधानमण्डूक पर हुई और वे बोलीं टर्र ! हाय कितने हैंडसम हैं हमारे मेंढक-ए-आजम ! जिनकी टर्र टर्र में टर्रूर टर्रूर होता था वे प्रधानमण्डूक पर सदके जा रही थीं।
एक बार की बात है नए नए प्रधानमंत्री बने हुए मेंढक हज़रत अपनी विदेशी मेंढकी के साथ मक्खियों के शिकार में मशगूल थे कि एक दरबारी मेंढक ने आकर कहा टर्र ! जनरल बजवा आये हैं ।
प्रधान मेंढक ने कहा टर्र ! कौन सी नई बात है जब भी सरोवर की तरफ जाते हैं बैंड बजवा कर ही आते हैं ।
दरबारी ने कहा नहीं उनका नाम ही कुछ ऐसा है। इसने में जनरल अंदर आ गए और बोले, क्या इसी रोज-ए-कयादत के लिए तुम्हें चुना था ? कुछ करो ऐसे ही मक्खियाँ न मारो । उस तरफ वालों ने सत्तर साल पहले बाँध बना लिए थे और तुम अभी तक चंदा ही माँग रहे हो ?
डांट पड़ी तो प्रधानमण्डूक को पिछले वाले मण्डूकशरीफ की याद आई । जनरल की मेहरबानी से आजकल मण्डूकशरीफ की तशरीफ़ जेल में रखी हुई थी ।
अब प्रधानमण्डूक को काम करना था सो सबसे पहले उन्होंने इकनॉमी पर ध्यान दिया । एक प्रैस कॉन्फ्रेंस बुलाई और बोले - टर्र । हम भैसों की नीलामी करके अपनी इकनॉमी मजबूत करेंगे।
एक पत्रकार मेंढक ने पूछा लेकिन फिर जिस काम के लिए भैंसे पाली गई थीं वह काम कौन करेगा ?
प्रधानमण्डूक बोले शौक तो बकरियों से भी पूरे हो सकते हैं । हम बकरियां पालेंगे क्योंकि - ईमानदार सरकार , टर्र ।
इकनॉमी सुधारने के लिए और भी कदम उठाये गए , मेंढकों की टीम को क्रिकेट खेलने भेजा गया । लेकिन वहाँ जाकर भी सारे कूपमण्डूक बोले - टर्र और हार कर वापस आ गए । इकनॉमी मजबूत करने का यह दांव भी खाली गया । एक मैच जीत जाते तो साल भर की इकनॉमी चलती रहती।
उन्होंने सोचा चलो सरोवर वालों से ही बात की जाए और फिर सरोवर की सरकार को फ़ोन लगा कर बोले -टर्र । बात करोगे?
इधर से जवाब मिला जब तक कीचड उधर से इधर आता रहेगा कोई बातचीत नहीं । टर्राते रहो टर्ररिस्टो । पहले उधर से इधर कूदना बंद करो फिर तुमसे बात करेंगे ।
प्रधानमण्डूक का दिमाग हो गया खराब फिर ट्विटर्र पर बोले - टर्र । हमारा दोस्ती का हाथ ठुकरा किया । छोटे लोग बड़े पद। टर्र ।
सरोवर में रह रहे कुछ मेंढक और झींगुरों ने भी उनके स्वर में स्वर मिलाया ।
सरोवर से आवाज़ आई अरे ओ मण्डूक-ए-आजम -
जब तक बरसात है टर्रा लो ।
जब तक हम शांत है गर्रा लो ।
अगर बात करने की औकात रखनी है ,
तो इस कीचड बाजी से अलग तुर्रा लो।
उधर से एक ही आवाज़ आई - टर्र ।
मण्डूकिस्तान के कुछ जलचरों को याद आया कि सरोवर में उनके मण्डूक-ए-आजम के मित्र पण्डूक का राज था , उनके वंशज और समर्थक तो अब भी सरोवर में हैं और उनके टर्रक् भी समझते हैं । तब सरोवर से पण्डूक वंशियों से संपर्क साधा गया । पण्डूक वंशियो के हालाँकि दिन ठीक नहीं थे उनका राजपाट जाता रहा था , समर्थन जहाँ से मिले उनके लिए अच्छा ही था, भले ही मण्डूकिस्तान का हो । उन्हें वापस सत्ता पाने की आशा जागी।
मण्डूकिस्तान के मंत्री मण्डूक बोले टर्र और इधर से पण्डूक वंशी बोले टर्र । इस तरह दोनों ने टर्र में टर्र मिलाई । इस टर्र टर्र में सम्पूर्ण सरोवर में दिव्य स्पंदन हुआ और सब सरोवर में कीचड घोलने के लिए पुनः एक हो गए ।
एक समय भयानक अकाल पड़ा सरोवर सूखना आरम्भ हो गया । जल एवं वनस्पति की कमी से सभी प्रजातियों के प्राणियों पर भीषण कष्ट आया।
वीभत्स परिस्थितियों में प्राणी हाहाकार कर रहे थे, जल सूखता और मलिन पंक विस्तार पाता हुआ प्राणियों का भक्षण करता ।
एक दिन अचानक श्रावण मास में घनघोर घटा छाई और उस मृतप्रायः से सरोवर के जीव वृष्टि की आशा से आनंद विभोर हो क्रीड़ा करने लगे ।
प्राणियों में मण्डूक और पंडूक नाम के दो मेंढक थे, जो घनिष्ट मित्र थे ।
मण्डूक ने पंडूक से कहा - टर्र ! अकाल ख़त्म हुआ तो सरोवर में जल आएगा और हम आम जलचर रह जायेंगे । कुछ करो कि हम दोनों का राज इस स्थान पर बना रहे ।
इधर से पण्डूक ने भी सोचा मण्डूक एक भाग ले भी जाए तो बाकी सरोवर की सत्ता हमारी, इसलिए उसने भी हाँ में हाँ मिलाई । और बोला हाँ हाँ , बंटवारा जरूरी है ताकि हम दोनों को राज करने का बराबर मौका मिल सके । फिर मण्डूक और पण्डूक ने आपस में फैसला कर के सरोवर का बंटवारा कर दिया । अब बारी थी बाकी प्राणियों को खबर देने और अपनी अपनी तरफ लाने की ।
मण्डूक बड़ा ही हरा मेंढक था, वह जलचरों को भड़काने लगा यही मौका है हमें सरोवर में अपना अधिकार मांग लेना चाहिए । ये जलचर वाणी विहीन हैं, किन्तु हम तो टर्राना जानते हैं । हम सरोवर का एक भाग मांगते हैं, वहाँ केवल हम ही रहेंगे और उस भाग का नाम मण्डूकिस्तान होगा । सभी जीवों ने समझाया कि नहीं भाई सब मिल जुल कर सरोवर में रहते हैं यह व्यर्थ बंटवारा क्यों चाहते हो?
लेकिन मण्डूक न माना और आखिरकार सरोवर के मध्य में एक रेखा खीच दी गयी । जलचर इधर से उधर हो गए । जितने मेंढक थे कूद कर मण्डूकिस्तान में चले गए । सरोवर के दोनों और लोकतंत्र कायम हुआ ।
सभी मण्डूकिस्तानियों को शिक्षा के नाम पर पढ़ाया गया कि दुनिया में केवल मेंढक रहते है और यह कीचड ही सारी दुनिया है । कुछ पीढ़ियां बीतने के बाद अधिक समय नहीं लगा सभी मण्डूकों को कूपमण्डूक बनने में । अब उनके लिए उस कीचड से बाहर कुछ भी सोच पाना संभव न था । वे वही सोचते और वही फैलाते ।
जब बहुत समय व्यतीत हो गया तब मण्डूकिस्तान से अन्य सभी जीव समाप्त कर दिए गए । जो अन्य जीव बचे भी थे उन्हें मेंढक की तरह रहना सिखा दिया गया । जो जितना ज्यादा टर्र करता था वह उतना बड़ा मेंढक कहलाता और जी मेंढक टर्र नहीं करता था उसके पास दो ही विकल्प थे , या तो वो टर्र बोले या टें । ज्यादातर तो टें बोल गए बाकियों ने गूंगा मेंढक होने का फैसला कर लिया । वे रहते तो मेंढक की तरह लेकिन टर्र नहीं बोलते ।
मेंढक कभी जमीन पर कूदते कभी पानी में इस कूदा-फांदी में पानी बहार निकलता और मिटटी अंदर आती इससे कुछ ही वर्षों में कीचड बन गया । मेंढकों को तो कीचड भी अत्यंत प्रिय था सो वे और अधिक आनंद में रहते ।
मण्डूकिस्तान के मेंढकों की एक बुरी आदत यह थी कि वहां के कीचड में सने कुछ मेंढक अक्सर सरोवर के इस ओर कूद आते और यहाँ के पानी में कीचड घोलने लगते । फिर इस तरफ के प्राणी उन्हें मार पीट के भगा देते । इसलिए दोनों और तनाव बना रहता।
मण्डूकिस्तान में लोकतंत्र चरम पर रहता और सभी मेंढकों से वोट डलवाये जाते । प्रधानमण्डूक चुना जाता । फिर मौका मिलने पर उसे जेल में डाल दिया जाता । इस प्रक्रिया को जनरल इलेक्शन कहा जाता था । मण्डूकिस्तान में अक्सर जनरल इलेक्शन होते रहते ।
इस बार भी जनरल हुए इलेक्शन हुए और जनरल साहब ने एक लंबा चौड़ा अधेड़ उम्र का नौजवान मेंढक अपना प्रधानमण्डूक चुन लिया ।
मेंढक ने प्रधानमंत्री बनते ही कहा टर्र। बाकी मेंढक टर्र टर्र कर उसका स्वागत करने लगे।
उधर नौजवान मेंढक के प्रधानमण्डूक बनते ही कुछ कूपमण्डूक उछल पड़े। उछले तो कुछ शेरी से शेरू बने मण्डूक भी थे और टर्रा टर्रा के कीचड़ में ही कूद गए ।
कुछ मेंढकियों की मेहर भी नए प्रधानमण्डूक पर हुई और वे बोलीं टर्र ! हाय कितने हैंडसम हैं हमारे मेंढक-ए-आजम ! जिनकी टर्र टर्र में टर्रूर टर्रूर होता था वे प्रधानमण्डूक पर सदके जा रही थीं।
एक बार की बात है नए नए प्रधानमंत्री बने हुए मेंढक हज़रत अपनी विदेशी मेंढकी के साथ मक्खियों के शिकार में मशगूल थे कि एक दरबारी मेंढक ने आकर कहा टर्र ! जनरल बजवा आये हैं ।
प्रधान मेंढक ने कहा टर्र ! कौन सी नई बात है जब भी सरोवर की तरफ जाते हैं बैंड बजवा कर ही आते हैं ।
दरबारी ने कहा नहीं उनका नाम ही कुछ ऐसा है। इसने में जनरल अंदर आ गए और बोले, क्या इसी रोज-ए-कयादत के लिए तुम्हें चुना था ? कुछ करो ऐसे ही मक्खियाँ न मारो । उस तरफ वालों ने सत्तर साल पहले बाँध बना लिए थे और तुम अभी तक चंदा ही माँग रहे हो ?
डांट पड़ी तो प्रधानमण्डूक को पिछले वाले मण्डूकशरीफ की याद आई । जनरल की मेहरबानी से आजकल मण्डूकशरीफ की तशरीफ़ जेल में रखी हुई थी ।
अब प्रधानमण्डूक को काम करना था सो सबसे पहले उन्होंने इकनॉमी पर ध्यान दिया । एक प्रैस कॉन्फ्रेंस बुलाई और बोले - टर्र । हम भैसों की नीलामी करके अपनी इकनॉमी मजबूत करेंगे।
एक पत्रकार मेंढक ने पूछा लेकिन फिर जिस काम के लिए भैंसे पाली गई थीं वह काम कौन करेगा ?
प्रधानमण्डूक बोले शौक तो बकरियों से भी पूरे हो सकते हैं । हम बकरियां पालेंगे क्योंकि - ईमानदार सरकार , टर्र ।
इकनॉमी सुधारने के लिए और भी कदम उठाये गए , मेंढकों की टीम को क्रिकेट खेलने भेजा गया । लेकिन वहाँ जाकर भी सारे कूपमण्डूक बोले - टर्र और हार कर वापस आ गए । इकनॉमी मजबूत करने का यह दांव भी खाली गया । एक मैच जीत जाते तो साल भर की इकनॉमी चलती रहती।
उन्होंने सोचा चलो सरोवर वालों से ही बात की जाए और फिर सरोवर की सरकार को फ़ोन लगा कर बोले -टर्र । बात करोगे?
इधर से जवाब मिला जब तक कीचड उधर से इधर आता रहेगा कोई बातचीत नहीं । टर्राते रहो टर्ररिस्टो । पहले उधर से इधर कूदना बंद करो फिर तुमसे बात करेंगे ।
प्रधानमण्डूक का दिमाग हो गया खराब फिर ट्विटर्र पर बोले - टर्र । हमारा दोस्ती का हाथ ठुकरा किया । छोटे लोग बड़े पद। टर्र ।
सरोवर में रह रहे कुछ मेंढक और झींगुरों ने भी उनके स्वर में स्वर मिलाया ।
सरोवर से आवाज़ आई अरे ओ मण्डूक-ए-आजम -
जब तक बरसात है टर्रा लो ।
जब तक हम शांत है गर्रा लो ।
अगर बात करने की औकात रखनी है ,
तो इस कीचड बाजी से अलग तुर्रा लो।
उधर से एक ही आवाज़ आई - टर्र ।
मण्डूकिस्तान के कुछ जलचरों को याद आया कि सरोवर में उनके मण्डूक-ए-आजम के मित्र पण्डूक का राज था , उनके वंशज और समर्थक तो अब भी सरोवर में हैं और उनके टर्रक् भी समझते हैं । तब सरोवर से पण्डूक वंशियों से संपर्क साधा गया । पण्डूक वंशियो के हालाँकि दिन ठीक नहीं थे उनका राजपाट जाता रहा था , समर्थन जहाँ से मिले उनके लिए अच्छा ही था, भले ही मण्डूकिस्तान का हो । उन्हें वापस सत्ता पाने की आशा जागी।
मण्डूकिस्तान के मंत्री मण्डूक बोले टर्र और इधर से पण्डूक वंशी बोले टर्र । इस तरह दोनों ने टर्र में टर्र मिलाई । इस टर्र टर्र में सम्पूर्ण सरोवर में दिव्य स्पंदन हुआ और सब सरोवर में कीचड घोलने के लिए पुनः एक हो गए ।