गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

गुलामी

एक आम सी जिंदगी जीने वाले भरत की कहानी है ये | भरत पहले एक गाँव में रहता था, उसका परिवार खेती करता और एक गाँव की सीधी सादी जिंदगी व्यतीत करता |
तब परिवार बड़ा था लेकिन परिवार की जरूरतें सीमित थी | अपने गाँव की दिनचर्या, भजन में उसके दिन व्यतीत हो रहे थे | सब एक से ही थे सो कोई ऊंच नीच नहीं,
सब बराबर ही थे | जो कुछ खेत में उगता वही बेच कर खाते पीते और मस्त रहते |
एक दिन उसके गाँव में कुछ ईसाई मिशनरी आ बैठे | तब एक नया दौर शुरू हुआ | मिशनरियों को जरूरत थी उनकी भाषा समझकर उनका काम करने वालों की |
सो उन्होने शिक्षा देने के नाम पर प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया | जब तक शिक्षा चली ये सभी लोग उन मिशनरियों के गुलाम बने रहे | और जब मिशनरी चले गए तब जाकर गुलामी से मुक्ति मिली |

मिशनरियों की जगह नए साहूकार आ गए |

लेकिन वे सब बदल गए थे, भरत बदल चुका था  | शिक्षा मिलते ही खेती से भरत का मन उचट गया और भरत पर भूत सवार हो गया नौकरी करने का और वह गाँव छोड़कर शहर आ गया |
पहले तो उसे नौकरी मिली नहीं क्योंकि वह कुछ जनता तो था नहीं | उसे गुलामी करने का प्रशिक्षण तो मिशनरी दे ही गए थे ,बस इसी को अपनी योग्यता समझकर वह एक बड़े सेठ के यहाँ नौकरी पर लग गया |

उससे तरह तरह के काम लिए जाते, पगार के नाम पर मामूली रकम मिलती | लेकिन व सोचता की यह सेठ ही ने उसे नौकरी दी है, और कोई उसे नौकरी या तो देगा नहीं या उसे मिलेगी भी नहीं |
भरत को सेठ ने कभी गाँव जाने नहीं दिया और शहर में ठीक से बसने नहीं दिया | वह मिशनरियों की गुलामी से निकलकर दूसरी गुलामी में फंस गया |

लेकिन एक दिन वह जगा , उसके गांव से एक बेटा आया था उसके परिवार का उसे लेने, इस बार भारत ने हिम्मत की, वह गुलामी छोड़ कर चल दिया |
उसे अहसास हुआ की गांव में ही रहता तो शायद उसकी जिंदगी बेहतर होती |

भरत के छूटते ही सेठ तड़प उठा, उसके अहम् पर चोट लगी थी | सेठ अब साम दाम दंड भेद लगाकर अपना गुलाम वापस लाने की जुगत में लग गया और भरत को तरह तरह से चोट पहुँचाने लगा  |

सुना है सेठ के लोग तरह तरह के षड्यंत्र रच रहे हैं | उसके गांव की शांति भंग  करने के भरपूर प्रयास हो रहे हैं | उसके परिवार के लोगों में आपस में कलह के बीज बोये जा रहे हैं ताकि वे आपस में लड़ते झगड़ते रहें |
सेठ अपना गुलाम इतने आसानी से छोड़ने वाला नहीं है |
बड़े भाई को छोटे से  , छोटे को मंझले से , मंझले को पड़ोसी से और पडोसी को उसके पडोसी से लड़वाने की घटनाएं बढ़ गयीं |
कोई पानी पे से आपस ने लड़ बैठते ,कोई खेत को बाँटने के नामपर | सब दोष भरत पर मढ़ने की कोशिश करते की जबसे ये वापस आया है तब से ये सब हो रहा है |
भरत में भी आत्मग्लानि जागृत हो रही थी, कहीं उसका ही दोष तो नहीं |

लेकिन उसके परिवार और उस छोटे लड़के को भरत पर भरोसा था , गलती उसकी नहीं थी, बल्कि षड्यंत्रों की थी | और इन षडयंत्रो का अंत निकट ही था |
कुछ दिन और , उसके बाद सेठ की हिम्मत जवाब दे जाएगी | और जो होगा जीत भरत की ही होगी |

भरत को उसका परिवार छोड़ने वाला नहीं है , जल्दी ही आमने सामने की लड़ाई आने वाली है , और इसमें जीत हर तय कर देगी की भरत को फिर से अनगिनत सालों तक गुलाम बन कर रहना है , या सेठ के अहम् के साथ उसके

बिछाये हुए जाल को भी नष्ट कर  देना है | भरत हिम्मत हार गया तो फिर जकड़ा जायेगा गुलामी में |

बस इस बार जो होगा आर या पार ही होगा |

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