गंज में वैद्य जी एकमात्र थे जिनपर गंज के बीमार निर्भर थे | गंज में बीमार तो तरह तरह के थे लेकिन इलाज हमेशा वैद्य जी की पुड़िया ही थी | वैद्य जी एक झोला रखते थे अपने पास, उनका झोला भानुमति का पिटारा था |
हाथ डालते और बीमार की देने-लेने की क्षमता के हिसाब से पुड़िया निकाल देते | वैद्य जी नब्ज देखकर ही जेब में पड़ी चिल्लर तक गिन लेते थे । चेहरा देखकर अगले क्षण आने वाले उधार को पहचान लेते थे । पेट के दांत वैद्य जी से छुपते न थे ।
इसी झोले को उठा के चल देने की धमकी देते और गंज के गंजहे "न जाओ सैयां छुड़ा के बइयाँ" का राग अलाप देते|गंजहों की छाती पे सांप लोट जाते और वैद्य जी मुस्कुरा के अपनी जगह बैठ जाते,फिर किसी को पुड़िया देने लगते |वैद्य जी अपनी विद्या के धुरंधर थे ये तो उनके शत्रु भी जानते थे |
गंज के बीमारों की भी तो मजबूरी थी , वैद्य जी की टक्कर का दूसरा दूर दूर तक कोई नहीं था | ले देके दो चार लोग थे, जो लोगों का इलाज करने का दम भरते थे ,लेकिन सब भभूति बाज थे । एक ओझा था जो वैद्य जी का किरायेदार,झाड़ फूंक करता था | लेकिन झाड़ू से झाड़ने से कौन रोग दूर हुआ है | ऊपर से खुद टीवी का मरीज तो लोग उसे वैसे ही दूर रहते थे |
एक पहलवान था जो मालिश करके रोग दूर करने का दवा करता था , लेकिन हड्डियां मरोड़ने से कितने लूले लंगड़े हो गए उसके हिसाब के लिए सरकार को अलग विभाग बनाना पड़े | अब उनके लड़के ने अखाडा संभाल लिया , लेकिन पंचर सायकल लेके पंचरवालों के चक्कर काटता फिरता है |
एक बूढ़ी फूफी है जिसने हाथी पाल रखा है, कहती है हाथी की पूँछ से झड़वा लो रोग झड़ जायेंगे धूल की तरह | जो जाता उससे हाथी के लिए एक वक्त का खाना मांगती । गंज के गरीब कहाँ हाथी को खिलाने लायक कमाते थे ?
एक बंगाली तांत्रिक है जिससे सारा गंज डरता था | उसके बगल से निकल जाओ तो रोंगनाथ, रोंगनाथ करके सबको डरा देती ।
एक वेदों के लूज ट्रांसलेशन सीख के पंडित बना जनेऊधारी , मंगल शनि राहु की दशा, बृहस्पति कि गति, बताता रहता, और हाथ फैला के दक्षिणा मांगता था | लोग इसकी ख़राब दिशाओं और दशाओं और पूर्वजों के नाम पे दक्षिणा मांगने से ही परेशान थे | असली सनीचर के बाद एक सनीचर गंज पे ये भी था |
कुल मिला कर बीमारी का इलाज करने के लिए एक ही विकल्प थे वैद्य जी | जाएं तो कहां जाएं उम्मीद केवल वैद्य जी से और वैद्य जी अगर रास्ता भटक गए तो समझ लो पूरा गंज का बंटाधार निश्चित है |
एक बार गंजहों ने कहा वैद्य जी ज़रा बीमारी नंबर ३७० का इलाज तो बताइये | वैद्य जी चल दिए कश्मीर अपना झोला उठा के | घर से निकले तो थे कि नुस्खे लाएंगे, और पक्का इलाज करेंगे । लेकिन रस्ते में मिल गयी महबूबा, वैद्यजी फंस गए मुफत में । महबूबा ने वैद्यजी को ऐसा घुमाया कि वैद्यजी पुड़िया नुस्खा सब भूल गए । ऊपर से महबूबा ने पकड़ा दी कश्मीरी बाम । अब वैद्यजी को दर्द होता है बाम लगा लेते हैं । नुस्खा याद आता ही नहीं ,कह रहे थे जड़ी बुटिये नहीं न होगी तो काहे का नुस्खा बनाएंगे । लेकिन गंवई लोग का क्या होय, उनके गांव में तो वैद्य ठहरे एकहि ।
वो तो अपनी बाम लगा के आराम पा जाते, लेकिन गंजहे कहते, नुस्खा नहीं दिये तो नोटा लगा देंगे ।
वैद्य जी को तो लोग फिर भी इज्जत देते थे ,लेकिन वैद्य जी ने पाल लिए थे एक मुंशी | मुंशी जटिल प्रसाद , बड़े ही चारपाई किसम के व्यक्ति थे | इनका काम था गाँव वालों के पैसे का हिसाब किताब |
पहले तो जब मुंशी जी पंचायत के चुनाव में खड़े हुए तो वैद्य जी के घोड़े-गदहे सब जीत गए , लेकिन मुंशीजी हार गए | हार के बाद भी , वैद्य जी ने इनको पिछले दरवाजे से पंचायत की तिजोरी पकड़ा दी | और मुंशीजी ने यहाँ से पंचायत में अपनी हार का बदला निकालना शुरू कर दिया |हिसाब किताब तो बढ़िया करते थे , वैद्यजी के कई जटिल काम भी निकलवा दिए थे मुंशीजी ने, लेकिन हिसाब किताब रखते रखते, धीरे से दारोगा की वर्दी भी पहिन ली ।गंजहों के दिल में जगह नहीं बना पाए ।
अव्वल तो लोगों को रायजादा के तबेले से बड़ी चिढ थी,क्योंकि एक तो रायजादा कुढैल आदमी था, दूध के नाम पे नाले का पानी मिला के बेचता था |
दूसरा इसकी पाली हुई भैंसो के आतंक मचा रखा था | हर आने जाने वाले पे गोबर उछालती रहती | लेकिन मुंशीजी को गोबर से जाने क्या लगाव था कि मौका मिलते ही तबेले पे जाके पसर जाते | लोग कुढ़ के रह जाते कि वैद्य जी के मुंशी, तबेले पे गोबर में खुद ही लोट रहे हैं | मुंशीजी ये सब करने के बाद नहा धो के वैद्य जी के बगल में बैठ जाते |
उनको एक और बुरी आदत थी , खाली बैठने की । वैद्यजी के बगल में जाकर खाली बैठ जाते थे, जैसे भांग घोट आये हों ।
वैद्यजी उनको खाली देखकर कहते, कुछ कर लो ।और मुंशी जी नया फरमान निकाल देते नया "कर" लेने का ।
गंजहे परेशान होते रहते कितना "कर" लेंगे ? और ये इतना "कर" लेंगे, तो वैद्य जी अकेले क्या कर लेंगे?
गंजहे देख रहे थे, वैद्य जी काम कर कर के हार रहे थे और मुंशी जी कर लगा लगा कर मार रहे थे ।
भीमखेड़ा वाले लोग वैद्यजी को देने के लिये थाली भर के परसाद लाते और मुंशी जी उसमे से झपट्टा मार के मुट्ठी भर ले जाते ।
मंदिरो के बाहर परसाद की थैली छीनने वाले बंदरों जैसी टुकड़ी बना ली थी । जिनको देखते ही लोग कहते छुपाओ नहीं तो छीनेगा । अगर बन्दर छीने न, और शांति से बैठ जाएँ, तो लोग खुद ही बजरंग बली समझ कर खिलाते रहें । लेकिन छीना झपटी में बहुत छीछालेदार हो गयी थी , मुंशी जी की तो ठीक है वैद्य जी की भद्द ज्यादा पिट रही थी ।
गंजहे सब तो सहते आये, लेकिन जब भांग घोंटने पे कर लगा दिया , तो पानी नाक तक आ गया ।ऊपर से कहते हैं, दादा परदादा के जमाने से जितनी भांग जिसने घोंटी है, वो कर देगा और जिसने मुफ़्त की भांग पी है वो भी कर देगा । ये नहीं समझते कि गंजहे कर तो देंगे , लेकिन उनकी धोतियां कौन धोएगा?
मुंशीजी समझ चुके थे,कि पंचायत चुनाव में जब वैद्यजी खड़े होंगे,गंजहे बहुमत तो देंगे लेकिन GST काट के । GST के रूप में उनका ही पत्ता कटेगा। मुंशीजी की होशियारी है,जो पहले ही अपनी कुर्सी पिछले दरवाजे पे सेट कर ली है।
मुंशी जी का उठना बैठना तो हवेली में भी है, अंग्रेजी बोलते हैं, सो वैद्यजी रहें न रहें मुंशी जी के हाथ में तिजोरी बनी रहेगी । लेकिन वैद्यजी भी चाहें तो अगली बार जब वे मुंशी जी से कहे की कुछ कर लो, तो देख लें की वे क्या कर रहे हैं । और मुंशीजी अगर वैद्यजी की सत्ता को बढ़ते देखना चाहते हों, तो अब और कुछ न करें । बहुत "कर" लिया अब वैद्यजी को देखने दें ।
#राग_दरबारी
#मुंशीजी_बहुत_कर_लिए
Excellent writing.
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