शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा

एक बार की बात है, दो मित्र एक एसयूवी में बैठकर यात्रा पर जा रहे थे। उनमें से एक ने कहा "मित्र हम दिल्ली के पास हैं, मेरी मानो तो कोई बायपास लेकर बाहर से ही इस नगर को पार कर लो। इस नगर से हमें दूर ही रहना चाहिए। अंदर जाना खतरनाक है।"

दूसरे ने आश्चर्य पूछा – "क्यों मित्र?"

"यह बड़ा विचित्र नगर है। इस नगर में सबके बाप की पहचान है। यहाँ घुसने से पूर्व जानना होता है कि किसका बाप कौन है। यहाँ सबकुछ मुफ्त है। कमाई गुप्त है। शासन सुप्त है। इस नगर में अव्यवस्थाएं चरम पर हैं। कानून व्यवस्था भ्रम पर हैं। न्याय है विचित्र और हर चीज केवल दो कौड़ी की है मित्र।"

"यह तो बड़ा रोचक जान पड़ता है। एक बार तो देखना ही चाहिए कि यहाँ मुफ्त में क्या क्या मिलता है। कुछ नहीं तो दो-दो कौड़ी में मिलने वाली कुछ वस्तुएं ही खरीद  लेते हैं।"

"मित्र रहने दो, यहाँ मनुष्य के प्राण भी दो कौड़ी के ही हैं।"

"प्राण तो हर जगह सस्ते हैं। मैं तो सस्ता खाना, मुफ्त पानी, सस्ता कपड़ा और यहाँ का खेल तमाशा देखना चाहता हूँ।"

"दूर से तो अच्छा लगता है, इस सब में फंस गए तो ये नगर जकड़ लेता है। बड़े बड़े लोग कौन जाए दिल्ली की गलियां छोड़कर कहते हुए यहीं फंसे रह गए। असली नकली का भेद मुश्किल है यहाँ। सब एक जैसा लगता है। सड़कें एक सी, चौराहे एक से। नदी और नाले एक से हैं। नदी में झाग बहता है, नालियों में लाशें। सरकार और अपराधी एक से हैं। चोर और राजा दोनों के पास महल हैं लेकिन दोनों जेल में रहते हैं। आधी जनता सड़क पर और आधी रेल में रहती है। मेला और धरना सदाबहार की तरह चलते ही रहते हैं।" 

"यह शहर तो मुझे अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है। एक बार तो देखना ही है। चलते हैं कुछ खा-पी कर ही आ जाएंगे।"

"यहाँ का भोजन पचता नहीं है। चलो बाहर से ही निकल चलते हैं, किसी और राज्य की शुद्ध हवा में भोजन पानी करेंगे।"

"नहीं मैं तो जाऊंगा!"

"तो अकेले जाओ।"  ऐसा कहकर पहला मित्र गाड़ी से उतर गया।

दूसरा मित्र दिल्ली की गलियों में घूमने लगा। अपनी गाड़ी लेकर गलियों को देखता और आनंदित होता। पहली बार उसने देखा एक ही जगह उसे सौ शहरों का प्रसिद्ध खाना मिल रहा था। हर ठेला और हर दुकान मशहूर और सौ-दो-सौ साल पुरानी ही थी। हट्टियाँ थीं, भट्टियाँ थीं, लस्सियाँ थीं। खाना मुफ्त था, पानी मुफ्त था, कीमत केवल उसकी वसूली जाती थी जो गले के नीचे उतरता था। वह खाता गया। गुण गाता गया।  

फिर अचानक उसे कोतवाल ने पकड़ लिया। 

खबर थी कि एक दुर्घटना हो गई थी। एक इमारत के तलघर में पानी भरने से कुछ बच्चों की जान चली गई थी। कोतवाल अपराधी को ढूंढ रहा था। उसे यह आदमी एसयूवी चलाते मिल गया तो धर लिया। ऐसा नहीं कि जांच नहीं हुई। पूरी जांच हुई और सरकार नीति के अनुसार हुई। वर्तमान सरकार की नीति थी कुछ भी हो प्रेस-वार्ता होनी चाहिए। अगर कुछ अच्छा हो तो उसका श्रेय तुरंत ले लेना चाहिए और कुछ गलत हो तो दोष किसी पर भी मढ़कर पल्ला झाड़ लेना चाहिए। 

पहले दोष बिजली वालों पर लगा, जिन्होंने बारिश के समय बिजली नहीं काटी। उन्होंने बोला हमारा दोष नहीं, हम तो बिजली सरकारी योजना में मुफ्त बांट रहे थे, दुर्घटना तो पानी भरने के कारण हुई है। नाली टूटी, पानी भरा नगर निगम की गलती है।

आरोप मेयर पर लगा, जिसने नालियों की मरम्मत नहीं करवाई थी। मेयर ने कहा दोष हमारा नहीं, हमने तो साफ करने का आदेश दे दिया था। गलती अधिकारियों की है उन्होंने काम नहीं किया।

अधिकारियों पर दोष लगा तो अधिकारी बोले, हमारा क्या है, नेताओं से पूछिए। एक तो हमें वेतन भी नहीं देते ऊपर से ठीक से आदेश भी नहीं देते। इतने नेता हैं किसकी बात माने हमें तो यही पता नहीं। 

नेताओं तक बात पहुँची, तो नेता बोले गलती नाली की ही है। बिना अनुमति के भर कैसे गई? और हमारे कार्यकाल में तो बनी ही नहीं। पिछली सरकार वालों ने नाली मजबूत नहीं बनाई थी। दोषी वो हैं। 

पिछली सरकार पर बात पहुँची तो वे बोले, नाली तो हमारे कार्यकाल में बनी थी। लेकिन जाम इनके कार्यकाल में क्यों थी? दोष तो नगर निगम का ही है।

नगर निगम ने कहा, नाली तो अपनी जगह ठीक थी लेकिन इमारत में तलघर कैसे बना? दोष इमारत के मालिक का है। उसने बिना नक्शा पास करवाए तलघर बनाया। इमारत के मालिक ने कहा, इमारत ठीक, इमारत का तलघर ठीक, तुम ये बताओ नाली कैसे टूटी?

इसी सब आरोप प्रत्यारोप के बीच में किसी ने कहा जब बारिश हो रही थी तो ये आदमी अपनी गाड़ी लेकर इस इमारत के पास से गुजरा था। सारा दोष इसी का है। फिर तो आगे देखा न पीछे कोतवाल टूट पड़ा और उसे पकड़ लिया।

अब उसे समझ आया कि उसका मित्र इस नगर में आने से क्यों मना कर रहा था। लेकिन देर हो चुकी थी, अब वह मुख्यमंत्री का पड़ोसी था। उसी जेल में जहाँ सवा सौ एचआईवी पॉजिटिव कैदियों की संख्या गिनी गई थी और दोषी अभी तक मिला नहीं था। उसे डर यह था कि उन सवा सौ अपराधों को भी उसके सर पर न मढ दिया जाए।

उसका मित्र जानता था कि ऐसा ही कुछ होगा। उसने सोचा इन लोगों के विचित्र तर्क देकर ही जीता जा सकता है। उसने मीडिया में खबर चलवाई दोष गाडी चलाने वाले का नहीं था, दोष तो गाडी का था जो भरे पानी में भी चल रही है। आम गाड़ियां पानी भरते ही बंद हो जाती हैं। वह चल रही थी। दोष गाडी का है, जिसने नियम तोडा और पानी में बंद नहीं हुई। गाड़ियों को सड़क पर चलने की इजाज़त है पानी में नहीं। अगर उसे पानी में चलना था तो उसे अपना रजिस्ट्रेशन नाव की तरह करवाना था।  

मीडिया ने खबर चलाई। कोतवाल ने गाडी को दोषी माना लेकिन गाडी को सजा कैसे दें, तो किसी ने कहा गाडी बनाने वाली कम्पनी को पकड़ा जाए। ऐसी गाड़ी बनाई कैसे। गाडी बनाने वाली कम्पनी के मालिक को समन भेजा गया। मालिक ने कहा हमको पता होता तो कि यह पानी में बंद नहीं होती तो कीमत दो लाख ज्यादा रखते। दोष हमारे इंजीनियरों का है, हमसे पूछे बिना बना दी। उनको पकड़िए।

इंजीनियर बोले गाड़ी तो थोड़ी देर में बंद हो ही जाती लेकिन पहले यह पता लगवाइए कि तलघर में बच्चे कर क्या रहे थे?

जॉंच में पता चला कोचिंग पढ़ रहे थे। कोतवाल पढ़ाने वाले को ढूंढने लगा। पढ़ाने वाला बोला, मैं तो बस पढ़ा रहा था कोचिंग के मालिक से पूछिए, तलघर में पढ़ाने क्यों बोला। कोतवाल कोचिंग के मालिक के पास पहुँचा।  

मालिक बोला अकेला मैं कैसे दोषी हो सकता हूँ, सब कोचिंग वाले तलघर में कोचिंग चलाते हैं। ऊपर से मैं तो मंत्रियों को चंदा भी देता हूँ।

कोतवाल मंत्रियों के पास पहुँचा, सभा बैठी। सभा में चर्चा हुई, कोचिंग का मालिक निर्दोष पाया गया। मेयर और मंत्री निर्दोष पाए गए।अधिकारी और कर्मचारी निर्दोष पाए गए। बिजली वाले निर्दोष मिले। गाड़ी चलाने वाला भी निर्दोष सा ही लगा। अब दोषी बचे इमारत, नाली और गाडी। गाड़ी पहले ही जब्त हो गई थी, नाली टूट कर मर चुकी थी। लेकिन न्याय में अभी कुछ कमी सी लग रही थी किसी को तो फांसी होनी चाहिए। आखिर जान गई है और जान के बदले जान जानी ही चाहिए।

इमारत को सजा देने के लिए उसपर बुलडोजर चलाने का आदेश हुआ। इमारत का मालिक दौड़ा दौड़ा आया बोला, दोष इमारत का नहीं है। अगर इतने ज्यादा बच्चे न हों तो तलघर में पढ़ाना ही क्यों पड़े? दोष बच्चों का है। सबको कोचिंग पढ़नी ही क्यों है? अब इस मामले की जाँच मीडिया करे। कोतवाल छुट्टी पर जाएं।

मीडिया ने बच्चों के माँ-बाप को दोषी बताया, बोले इतनी दूर भेजते ही क्यों हैं, बच्चे बुरी हालत में रहते हैं। मीडिया बच्चों के पास गया, बच्चे बोले हमारे माँ-बाप भेजते हैं, लेकिन उनको दोष मत देना। प्रतियोगिता कठिन है, परीक्षा कराने वाले कठिन प्रश्न पूछते हैं हमें पढ़ना पड़ता है।

मीडिया ने शिक्षा व्यवस्था और बढ़ती प्रतियोगिता को दोषी बताया और दोष को केंद्र सरकार की शिक्षा नीति पर मढ़ दिया। केंद्र सरकार के पास इस सब का कोई उत्तर न कभी था, न है। जैसे दुर्घटनाओं का दोषी न कोई होता है, न इस बार है।

हाँ, हर अच्छे शासक के पास एक लिखी लिखाई बात होती है, जिसे सुनकर मीडिया और जनता शांत हो जाती है। हर मामला ठंडा हो जाता है। सरकार ने भी वही बात दोहराई - "दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा, कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाएगी।"

यह सब कह सुन-कर दिल्ली की सरकार वापस अपने नियमित प्रेसवार्ता वाले कार्यक्रम में व्यस्त हो गई।

कोचिंग ज्यों की त्यों चलने लगी।  जनता अपने में व्यस्त हो गई और नाली अगली बारिश में उफनने की प्रतीक्षा करने लगी, क्योंकि नालियों को अपनी भड़ास निकालने के लिए बरसात का ही तो मौसम मिलता है। फिर अगली बारिश में,  कहीं और से उफन पड़ेगी। किसी और इमारत में घुस जाएगी।

मंगलवार, 30 जुलाई 2024

जननायक की चप्पल लीला

विपक्ष से ९९ के जननायक सड़क पर निकले। वे सड़क पर अक्सर निकलते हैं। एक जगह उन्हें एक मोची मिला। मोची चप्पल सिल रहा था। जननायक का मन भी चप्पल सिलने का हुआ। जननायक ने चप्पल सिली। मोची अगर भजिए बना रहा होता तो जननायक का मन भजिए बनाने का हो जाता। जननायक का मन ही ऐसा है।

सब कहने लगे कि अब जननायक ने मोची पर कृपा कर दी है, मोची के दिन फिर गए। मोची पर कोई असर नहीं हुआ था, वह अब भी चप्पल ही सिल रहा था।
एक दिन एक जननायक की पार्टी का एक नेता उसके पास आया और बोला उसे वो चप्पल देखनी है जो जननायक ने सिली थीं।
मोची ने कहा –पता नहीं कहां हैं। तब उस नेता ने उन चप्पलों को देखने के लिए बहुत पैसा देने की बात की। मोची ने सोचा सिर्फ चप्पल देखने के पैसे?
नेता ने और उत्सुकता दिखाई, और कहा चप्पल छूने दोगे तो दुगने पैसे दूंगा।
पहले तो मोची ने सोचा पागल है। फिर मान गया। अब उसने वो चप्पल ढूंढनी शुरू की। लेकिन एक जैसी चप्पलों में कौन सी थी जिसपर जननायक ने हाथ आजमाए थे, पहचानना मुश्किल था।
उसे जैसा याद आया वैसी एक जोड़ी चप्पल लाकर उस नेता के सामने रख दीं। नेता की आंखों से आंसू बह निकले। उसने पहले तो हाथ जोड़े। फिर दंडवत लेट गया। फिर भी मन न भरा तो उन चप्पलों को उठाकर चूमने लगा, छाती से लगाकर रोने लगा। मोची यह सब देख रहा था।
अब वह नेता बोला ये चप्पल मुझे दे दीजिए। मोची पहले तो सोच रहा था कि दे दे, फिर बोला नहीं दे सकता, आप तो जानते हैं ये कितनी अनमोल हैं। मेरे पूर्वज भी चप्पल सिलते थे। मैं इन्हे पीडीयों की विरासत बनाऊंगा। मैं इनको संभाला कर रखूंगा। नेता करोड़ों रुपए की बोली लगाने लगा। मोची न माना।
वह बोला आप कहें तो ऐसी ही दूसरी चप्पल ले जाइए, एक लाख रुपए में ऐसी ही दे देंगे, कहिए तो जननायक का चेहरा भी चप्पल पर बना देंगें। ये वाली तो मेरे लिए अनमोल हैं। नेता मन मार कर दूसरी चप्पल लेने तैयार हो गया, बोला - "ये राज किसी को मत बताना कि तुमने मुझे असली वाली नहीं दी।"
नेता उन चप्पलों को एंटीक बताकर विदेश में बेचना चाहता था।
अगले दिन मोची ने एक मखमल का कपड़ा खरीदा। एक चौकी पर बिछा कर वो चप्पल रखीं। फूल बिछाए। दीप और धूप लगा दिया। जो आता उसे सुनाता कि ये वही वाली चप्पल हैं। सभी दंडवत करते। कुछ चढ़ावा चढ़ाते।
कुछ खरीदने के लिए बोली लगाते। जो ज्यादा जिद करता उसे मोची वैसी ही चप्पल बनाकर देने की बात करता। वे लेकर जाते।
कुछ ही दिनों में पार्टी कार्यकर्ताओं को कतारें लगने लगीं। केरल से भी कार्यकर्ता दर्शन को आए, साथ कम्युनिस्टों को लाए। कम्युनिस्ट सदा से माओ या मार्क्स की चप्पल पूजना चाहते थे। लेकिन मार्क्स के अवतार ने जिन चप्पलों में टांके लगाए वे भी दर्शनीय और प्रेरणादायक थीं। दो चप्पलों की अवधारणा को घोर रूढ़िवादी और अमानवीय मानते हुए वामपंथी विचारकों का मत है कि हर व्यक्ति के पास कम से कम तीन चप्पल होनी चाहिए। जहां अतिरिक्त चप्पल मोचियों के लिए अधिक रोजगार का सृजन करती, वहीं तीसरी चप्पल से किसी को भी चप्पल टूटने पर परेशान नहीं होना पड़ता। चार चप्पल होना पूंजीवादियों को फायदा पहुंचाती है और समाज में असमानता का भाव उत्पन्न कर सकती है। अतः अमीर गरीब सभी को तीन चप्पल लेकर रखना चाहिए। अमीरों के पास बहुत अधिक न हो और गरीबों के पास थोड़ा सा अतिरिक्त हो।

चमत्कारी चप्पलों ने मोची की किस्मत खोल दी थी। जननायक ने चप्पल नही सिली थीं, मोची की किस्मत सिल दी थी। मोची की दुकान के आसपास चाट पकौड़ी के ठेले लगने लगे। मोहब्बत की दुकानों में मोहब्बत का शरबत मिलने लगा। सोनू सूद ने जूठे खाने की सच्ची दुकान लगाने के लिए कड़ाही और करछुल भेजे। कुछ लोग जूता खाने आते, कुछ जूठा खाने आते।
भीड़ सभालने के लिए चार हवलदार तैनात करने पड़े। मोची की दुकान बड़ी हो गई, शोरूम जैसी। जिसमें सबसे ऊपरी तल पर पूजनीय चप्पल दर्शनार्थ रखी गई थीं। दूसरे तल पर जननायक मर्चेंडाइज मिलता था। जिसमें जननायक की फोटो वाली चप्पल, जूते आदि मिलते थे। सबसे नीचे वाले तल पर दफ्तर और बिलिंग काउंटर था। साथ ही चप्पलाकार की–रिंग, इयर रिंग, रिस्टबैंड, लॉलीपॉप आदि मिलते थे। शोरूम के बाहर छोटे छोटे बच्चे उन चप्पलों की फोटू बेचते थे। वास्तुशास्त्री उन चप्पलों को घर के ड्राइंग रूम में रखने से वस्तु दोष दूर होने के टोटके बताते थे। कुछ बाबा की रेड बुक के जानकार बताते थे कि रेडबुक टोटका नम्बर ९९ के अनुसार अगर एक बार वो चप्पल किसी के सर पर पड़ जाए तो गंजे सर पर भी बाल उग सकते हैं। प्रसिद्ध सेलिब्रिटी चावला जी ने नुस्खे की पुष्टि की। उन्होंने कहा - पहले मैं गंजा था। मैं परेशान रहता था। लोग मुझे गंजा कहते थे। मेरे सरपर बाल नहीं थे। मैं हार मान चुका था और निराश हो चुका था। फिर किसी ने मुझे इन चप्पलों के बारे में बताया। बस एक बार इस नुस्खे को आजमाया उसके बाद मेरे सर पर घने मुलायम सफ़ेद बाल उग आए।
चप्पलों की कसम खाई जाने लगी। सौगंध मुझे है चप्पल की पूंजीवाद बढ़ने दूंगा।

प्रेमी प्रेमिका कहते - जैसे एक चप्पल के बिना दूसरी किसी काम की नहीं वैसे हम दोनों भी एक दूसरे के बिना किसी काम के नहीं रहेंगे। हमारा तुम्हारा साथ इन्ही चप्पलों की जोड़ी जैसा है। बस कोई जननायक टाँके लगा दे तो हम सदा के लिए एक दूसरे के हो जाएं। कुछ कार्यकर्ता तो चप्पलों को साक्षी मानकर शादी करने लगे। पादरी नरूला ने चप्पलों को ही होली ग्रेल बता दिया। कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोगों ने चप्पलों को ही नया भगवान बता दिया। चप्पल निर्माण दिवस मनाया जाने लगा। चप्पल चालीसा और भजन के वीडियो यूट्यूबर्स ने बना कर यूट्यूब भर दिया।
चप्पल अब राष्ट्रीय विमर्श का विषय थी। टीवी पर पार्टी प्रवक्ता जननायक और उनकी चप्पल लीला का महिमा मंडन करते और सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं के पास हमेशा की तरह इसका कोई उत्तर नहीं होता। वे केवल सर पकड़े बैठे रहते। लेकिन सत्ता पक्ष के शीर्ष नेताओं की सोच कुछ और थी, सुनने में आया कि लोगों की आस्था को देखते हुए चप्पल पर्यटन पर जोर देने की बात चल रही है। चप्पल दिवस की चर्चा मीडिया में चल निकली। चप्पल सेस लगाने का प्रस्ताव वित्त सचिव ने रख दिया। चप्पल को भी कैपिटल घोषित करने की योजना बनाई जाने लगी। पाकिस्तान से भी चप्पल कॉरिडोर बनाने की मांग उठी।
जननायक की पार्टी के समर्थक विरोधी पार्टी के समर्थकों को चिढ़ाते कि भक्तों देखो हमारे जननायक की चप्पल लीला। तुम अंधभक्त लोग कभी जननायक का न्याय और क्रांति नहीं समझ सकते। दूसरी तरफ के समर्थक खीझ उठते।

कुछ ही महीनों में मोची अमीर हो चुका था, चार शोरूम खुल चुके थे।

हर शोरूम में वैसा ही चप्पलों का मंदिर उसने बनवाया था। उसके हर शोरूम के मैनेजर दावा करते कि असली चप्पल यहीं रखी हुई हैं। पित्रोदा से लेकर जुबैदा बॉस, बंटी से लेकर बंटाधार और हाफिज सईद तक के साथ उसकी तस्वीरें उसके शोरूम की दीवारों पर लगाई गई थीं। वह पार्टी की सभाओं में जाता, मंच पर चप्पल वाले के रूप में उसका सम्मान किया जाता।
यह सब देखकर वह पहला नेता जो चप्पल ले गया था एक दिन हाईकमान से मिलने गया और कहने लगा असली चप्पल तो उसके ही पास हैं, मोची धोखा करता है। हाईकमान चप्पल की महिमा जानता था। हाईकमान ने एक बिस्कुट उसकी तरफ फेकते हुए कहा - "पहले क्यों नहीं बताया?"

वह नेता बोला -" छह महीने से प्रयास कर रहा था। यही बताने के लिए लेकिन आप मिलते ही न थे।"
हाईकमान ने मोची को बुलाया और कहा -" क्यों बे ये बता कि ये महाशय तुझसे चप्पल ले गए थे?"
"हाँ ले गए थे।"
"तो फिर तेरे पास नकली चप्पल हैं?
"मेरे पास तो असली हैं। मैं तो उनकी रोज पूजा करता हूँ। कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को चरणामृत भी देता हूँ।"
"लेकिन ये महाशय तो कहते हैं असली इनके पास हैं?"
"नहीं हैं, ये झूठ बोलते हैं। मैंने तो नक़ल बना कर दी थीं। ऐसी नक़ल तो रोज दो-चार दर्जन बेचता हूँ। "
"लेकिन ऐसे तो विवाद बढ़ जाएगा। ये चप्पल अब पार्टी की संपत्ति हैं। तुम दोनों के पास जो चप्पलें हैं उन्हें पार्टी कार्यालय में जमा करवा दो। हम देखेंगे क्या कर सकते हैं।"
नेता तो मान गया, मोची न माना। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। छुट्टियों में भी आधी रात को सात जजों की बेंच बैठी। मु.न्या. ने अध्यक्षता की। पार्टी की तरफ से सिफ़र साहब और मोची की तरफ से चैंबर बाबू ने मोर्चा संभाला। मामला वर्चस्व का था।
केस पर लगातार सात दिन और सात रात सुनवाई हुई। फैसला पार्टी के पक्ष में आया। चप्पल पार्टी को और मुआवजा मोची को देने की बात हुई।
उस दिन मोची के शोरूम पर भारी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता जमा हुए, उतना ही पुलिस बल जमा हुआ। चप्पलों को बड़े से ट्रक में शान से के मोची की दूकान से पार्टी कार्यालय लाया गया। जुलूस सारे शहर में निकला। पटाखे चले, मिठाई बंटी। झबरे और तगड़े सभी कार्यकर्ताओं ने नागिन डांस किया।
मौसमी और मिश्रा ने कूद कूद कर बताया कि वो कितनी उतावली थीं - वो देखो चप्पल, वो देखो चप्पल, कहते हुए माइक लेकर छत से कूद पड़ीं।
एक पार्टी प्रवक्ता ने बताया कि - यह हमारे पार्टी में ही संभव है जहाँ आलाकमान चाहे तो किसी भी पद पर किसी को भी बिठा सकती है। अब देखिये वो चप्पल आज कार्यालय में स्थापित होकर हमारे हर कार्यकर्ता को प्रेरणा देगी। हमारे नेतृत्त्व की बात कोई नहीं टालता और पार्टी अनुशासन में रहती है।
गठबंधन के नेताओं ने इसे क्रांतिकारी कदम बताया और भरोसा जताया कि इस कदम से सबको बराबरी का अधिकार मिलेगा। हर क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी। फिलिस्तीन आज़ाद हो जाएगा और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। चीन से सम्बन्ध सुधर जायेंगे। लखनऊ की सड़कों से सांड कम हो जाएंगे। दिल्ली को नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा।
रविश ने पूरा एक घंटे का शो बनाया - ये देखिये लोकतंत्र का उत्सव है। आज वे चप्पल जो समाज के सबसे निचले तबके से उठकर आज हमारी पार्टी कार्यालय में स्थापित की जा रही हैं। यही समाजवाद है जिसकी कल्पना हम करते रहे हैं। ये चप्पल याद दिलाती रहेंगी कि एक जननायक कैसे सबकी जिंदगी में टाँके लगाने के लिए गली गली घूमा।
जर्मन ने बताया - दोस्तों क्या आप जानते हैं, अब पार्टी इन चप्पलों को हमेशा के लिए अध्यक्ष बनाकर एक बहस को समाप्त कर सकती है। ९९% देशों में चप्पल किसी पार्टी न चुनाव चिन्ह ही नहीं बन सकी हैं और आज अध्यक्ष भी बन सकती हैं। दोस्तों ... दोस्तों ... दोस्तों। चप्पल चप्पल चप्पल।
वरुण ग्रोवर अभी तक इस बात पर हंस रहे थे कि वो लोग अयोध्या हार गए। उन्हें अभी तक चप्पलों पर हंसने की फुर्सत नहीं मिल रही थी।
अजीत भारती वीडियो नहीं बना पाए क्योंकि उनके घर पर हॉन्डुरास की पुलिस नोटिस देने आई थी।
https://x.com/bstvlive/status/1818249028704088371

सोमवार, 22 जुलाई 2024

मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है

बस में चार पहिए, दो दरवाजे, बाकी का खांचा तो बाहर से दिख गया था। बस के अंदर ड्राइवर की सीट, सीट पर लटका मटमैला तौलिया, एक घिसा हुआ स्टीयरिंग, सही सलामत गियर, ड्राइवर के पीछे गद्दी वाली एक बेंच, बहुत सारी मैली सीटें, जिनपर पीला पेंट लगा था या किसी प्रकार की सब्जी कहना मुश्किल है, कुछ पर ग्रीस के दाग जरूर थे। कुछ सीटों की गद्दी उखड़कर बगल वाली विंडो सीट पर बैठने को उछल रही थीं। अनगिनत खिड़कियां जिनका कांच बंद करने और खोलने के लिए किसी न किसी सवारी के बीच लड़ाई होने की प्रबल संभावना थी। ड्राइवर की सीट के बिलकुल पीछे एक पैनल खुला था या टूटा कह नहीं सकते क्योंकि बेतरतीब नट बोल्ट से सेट या अपसेट किया गया था, जिसमें से नीचे देखने पर सड़क देखी जा सकती थी।

सड़क तो सामने से भी देखी जा सकती थी, लेकिन नीचे वाला दृश्य सड़क को अधिक निकट से दिखाता। भोपाल और सागर के बीच रोज सुबह चलने वाली इस बस में न जाने और कौन-कौन सी जुगाड़ करके चलने पर मजबूर किया गया होगा यह तो ड्राइवर ही जानता होगा या उसका सहायक। फिलहाल बस में एक ड्राइवर और तीन सहायक थे। बस चालू करने के लिए कोई स्विच या चाबी नहीं थी। हॉफ पेंट और जंग के रंग वाली टी शर्ट पहने ड्राइवर ने न जाने कौन सा मंत्र फूंक कर एक तार का गुच्छा खींचा और बस चालू हो गई।
सवारियां अपने स्थान पर बैठ गई, जिनमे एक दुल्हन, उसकी मां, बहने और परिवार के अन्य लोगों के साथ एक सहेली और दो चार पड़ोसी थे।

साथ में थे एकमेव जीजाजी। जीजाजी कहां बैठेंगे इस बात में संशय नहीं था, क्योंकि मेहमान जी थे उन्हें तो खुद चुनी हुई जगह मिलनी ही थी। उन्होंने चुनी ड्राइवर के पास सबसे आगे वाली सीट। क्योंकि यही वो सीट थी
जहां चकल्लस सबसे कम होने की संभावना थी। जय बजरंगबली के उद्घोष के साथ बस चली और साथ ही चल पड़ी चकल्लस।

देखो सब जने आ गए?
कोनऊ छूट तो नई गओ?
पानी की टंकी रख ली थी?
डिस्पोजल काय में रखे?
नारियल को बोरा आंगें ले आओ। नदी–नरवा पे चढ़ाने पड़ें।
तुमने चाबी काय में रखें।
अरे यार हमाई लिपस्टिक छूट गई।
काय अपनो लाल सूटकेस डिग्गी में रखवा दओ?

चकल्लस सुनकर ड्राइवर और उसके तीनों सहायक भी मूड में आ गए और अपनी चकल्लस करने लगे। अधिक तो समझ नहीं आया लेकिन ड्राइवर तीन में से दो को आगे उतरने को कह रहा था और तीनों उतरने के लिए तैयार नहीं थे। ड्राइवर का कहना था कि जिसके पास राजश्री हो वह बैठा रहे बाकी दो उतर जाएं और अगली गाड़ी से आएं। और तीनों सहायक बारात के साथ ही जाना चाहते थे। ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोकी और तीनों को नीचे उतर कर आपस में फैसला करने को कहा। तीनों उतरे और न जाने कैसे दो मिनट में फैसला कर लिया। एक चढ़ा और बस चल पड़ी।

तब तब सवारियां भी स्थिर हो गई थीं और ड्राइवर से गाना लगाने की मांग कर रही थीं। ड्राइवर ने सूचना दी कि बस में म्यूजिक सिस्टम नहीं है। मनोरंजन के लिए खिड़कियां खड़कती हैं, वही संगीत है।
बस के ड्राइवर का नाम था बाबू। जो भी हो बताया तो उसने यही था। बस ने जैसे ही रफ्तार पकड़ी उसकी राजश्री की तलब ने भी जोर पकड़ा।
इतने में बारात में सबसे सियाने यानी दुल्हन के भाईसाहब आगे आकर बैठ गए। ड्राइवर को कुछ नदी के पास धीमा चलने या रोकने की हिदायत देने ताकि नारियल फोड़ा या फेका जा सके।
ड्राइवर से भाईसाहब ने नाम, पता आदि पूछा। ड्राइवर ने बताया उसके पांच बच्चे हैं। और वह फलां गांव का है। ड्राइवर को कहीं बीच में नाश्ते के लिए रोकने को कहा गया।
ड्राइवर ने भाईसाहब से पूछा - "आपका ब्याह हो गया?"
भाईसाहब ने बताया - "अभी नहीं।"
ड्राइवर अगले ही क्षण कहने लगा - "आप हमको अपनई समझो, हम तो केवल आपई के हैं। आपके अलावा और कोई नहीं है हमारा।"
भाईसाहब घबराए, वैसे ही कुंवारे हैं और अब ये पांच बच्चों का बाप उनके गले पड़ रहा है। बोले - "उन पांच बच्चों का क्या होगा?"
ड्राइवर बोला –"वे भी आपई के सहारे हैं।"
भाईसाहब और घबराए, बोले -" क्या चाहिए ये बताओ।"
"बोला बीस रुपए दे दो राजश्री के लिए।"
एकमेव जीजाजी ने भाईसाहब को व्यंग्य से देखा और बोले - "दे दो, इसके मुंह में गुटका रहेगा तो चुप रहेगा, नहीं तो आज हमको सरहज मिली समझो।"

एकमेव जीजाजी का यह पहला अवसर था जब मौका मिला था मेहमान बनकर किसी विवाह में जाने का।
वैसे तो जीजाजी की इज्जत उस तरफ से उतनी ही है जितनी अपने घर में दाल बघारते हुए होती है। लेकिन फिर भी इस बार हिदायत दी गई कि थोड़ा मेहमान की तरह पेश आना, कुर्सियां उठाने मत लग जाना। अपना सूटकेस भी मत उठाना। थोड़ी अकड़ भी दिखा लोगे तो चल जाएगा क्योंकि आप उधर मेहमानजी हैं। सेवा साले करेंगे। जीजाजी के मन में भी लड्डू फूटा अगर कहो तो बैठने के लिए चक्का वाली कुर्सी ही मंगा ली जाए। न मिलने पर थोड़ा मुंह फुला लेंगे। ये तो जीजाजी को दी गई हिदायतें थीं, दूसरी तरफ भी माहौल बनाया गया कि ये थोड़े अकडू हैं, बात कम करते हैं, काम इनसे एक नहीं होता, वजन उठता नहीं और गुस्सा बहुत करते हैं। दोनों तरफ मामला ऐसा हो गया कि जैसे दोनों तरफ से सावधान रहना है।

थोड़ी देर में सब को न जाने कैसे भूख लगने लगी, नाश्ता नाश्ता की करुण पुकार और हाहाकार सुनाई देने लगा। बाबू से कोई ठीक ठाक स्थान पर रोकने की मिन्नतें की जानें लगीं। बाबू भी थोड़ा आगे, थोड़ा आगे करता हुआ पीछे तीन चार कस्बे छोड़ चुका था। अगर एकाध घंटे बस न रुकती तो शायद कोई न कोई सीट नोचकर खाने लगता। वही सीट जो उखड़कर खुद विंडो सीट पर बैठने के लिए अपनी जगह से उछल रही थी और जिसपर चटनी या ग्रीस या पेंट पहले से लगा हुआ था। राहतगढ़ से बेगमगंज के बीच की सड़क आज भी वैसी थी जैसी पंद्रह साल पहले थी। विकास के प्रकोप से बनती होगी लेकिन पहली बरसात में धुल भी गई लगती थी। या ये वाली सड़क शायद कांग्रेस का कार्यकाल याद दिलाने के लिए ऐसी छोड़ी गई थी। सड़क की खड़र बरड़ ने भूखे पेटों ने अंगों को उलटना पलटना शुरू कर दिया। गाड़ी जाकर रुकी गैरतगंज में, पहले पेट के अंग अपनी जगह पर लाने के लिए लोगों ने हाथ पैर खींचे फिर नाश्ता किया।

अबकी बार जब गाड़ी चली तो सहायक ने भाईसाहब से पूछा, शादी है किसकी? बताया गया दुल्हन उधर बैठी है।

वह कहने लगा – "आजकल उल्टो होन लगो है। पहले बरात आउत हती अब जाउत है। मानो एक बात है जो बैनर आगे लगो है ओ में तो काऊ और है।"
"नहीं इन्ही का बैनर है। यही हैं।"
"नहीं हैं भैया, कोई और हैं। इनकी तो शकल नहीं लग रही वैसी।"
"अरे जेई हैं।" दो चार लोग एक साथ बोले।
"हम नहीं मानत।"
"तुमाए माने से का!"
"रामधई कहो तो बैनर से मिलवा दएं! अलग है।"
"अरे जेई हैं!"
"हम नहीं मानत।" यह कहते हुए सहायक ने बस रुकवा दी। ड्राइवर ने मुंह में गुटका था। उम्म हम्म करते हुए रोक दी। सहायक उतरा और बस के बाहर से बैनर उतार लाया।
बस चल पड़ी। सहायक बैनर खोलकर दुल्हन और बैनर की शकल मिलाने लगा। कहता है जे बिन्ना नैय्ये।
"जेई आएं।" सब चिल्लाए।
तब ड्राइवर ने मामला संभालते हुए कहा – "काअ पीछे पाओ अय, फोटू में फिएक्टर लग जात आजकल।"
जैसे तैसे बारात भोपाल पहुंची। लड़के वालों ने ढोल, फूल और पोहे से बारात का स्वागत किया। समय तो पूड़ी का था लेकिन पोहे भी अपना काम कर गए।

कार्यक्रम की लंबी सूची थी। दुल्हन को पार्लर जाना पड़ा। तीन घंटे के मेकअप के बाद खबर मिली कि दुल्हन रो रही है। उसका मेकअप खराब कर दिया गया था। इधर दुल्हन की मां भी रोने लगी। इस विलापमयी माहौल को संभालते हुए येन केन प्रकारेण दुल्हन दूसरे पार्लर ले जाई गई। वहां दो घंटे की मशक्कत के बाद भी कोई असर न हुआ। दुल्हन अब भी दुखी थी। फिर वह तीसरे पार्लर में ले जाई गई। जहां तसल्लीबख्श तरीके से मेकअप की मरम्मत हुई और विवाह कार्यक्रम आगे बढ़ने के संकेत मिले। लगता तो यही था कि विवाह का मुहूर्त मेकअप में निकल जाएगा। जीजाजी की एक संभावित सरहज ने कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।

लेकिन पार्लर वालों की असीम कृपा से जो कार्यक्रम सात बजे होना था, ग्यारह बजे होने के आसार दिखने लगे।
इसी बीच खाने का कार्यक्रम शुरू हुआ। जीजाजी के सालों, और सालों के दोस्तों ने पैर छूने के बहाने बार बार जीजाजी के पैजामे से हाथ पोंछे। थोड़ी ही देर पहले सब उनके कमरे में तैयार होने घुसे थे और जीजाजी को आतंकित कर के निकले थे। एक तो होटलों के बाथरूम में लगे हुए तरह तरह के नल और सिस्टम आसानी से समझ नहीं आते, जब तक समझ आते हैं कमरा छोड़ने का समय आ जाता है। । दो कहकर घुसे थे बारह धड़धड़ाते आ चुके थे।
साले बाथरूम में घुसते, फिर अंदर से आवाज लगाते पानी नहीं आ रहा, दो तीन बार तो जीजाजी ने नल से पानी निकालने के इंस्ट्रक्शन ब्रॉडकास्ट किए, चौथी बार थक गए। फिर एक साले को नियुक्त किया। लेकिन अब सालों को आनंद आने लगा था। हर कोई कहता जीजाजी आप ही सिस्टम बताओ इनका बताया समझ नही आया। जीजाजी को लगा वो सुलभ शौचालय के बाहर ड्यूटी पर बैठ गए हैं। खीझकर चिल्लाने वाले थे कि उनकी शक्ल देखकर संभावित विस्फोट उन सालों की बहन को समझ आ गया। लक्षण जीजी के चेहरे पर दिखने लगे और तब जाकर सालों ने कमरा छोड़ा। इस समय अपने ये साले जीजाजी को महादेव की बारात के बाराती लग रहे थे।

फिलहाल बारात नाचते गाते पहुंच चुकी थी। बारात का जोरदार स्वागत चल ही रहा था।
नारियल, माला, लिफाफे बांटे जा रहे थे। गले मिलने वाली औपचारिकताएं चल रही थीं। डीजे की ढिंचक-ढिंचक धड़क-धम के बीच में मंगल गान चल रहा था। कि अचानक डीजे का ट्रक खुद नाचने लगा और ढलान से लुढ़ककर एक घर में घुस गया।

अब दो समारोह साथ में चल रहे थे। एक तरफ बारात का स्वागत और दूसरी तरफ डीजे ट्रक ने जो बाउंड्री तोड़ी थी उसका निरीक्षण। कौतूहल का विषय दूल्हा नहीं डीजे का ट्रक अधिक था।
फिर भी भाईसाहब और उनके मित्र दूल्हे को गोद में उठाकर मंच पर ले ही आए। ताकि दूल्हा जाकर डीजे ट्रक को न देखने लगे। जीजाजी दर्शक बने थे। उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया कि उनके विवाह में महादेव की इस सेना से उनका पाला नहीं पड़ा। अन्यथा इन शिवगणों ने दो चार बार तो उठाकर पटक ही दिया होता।

बाद में पता चला कि डीजे कांड बाबू का किया धरा था। डीजे ट्रकवाले ने टायर के नीचे एक टेक लगाने को कहा था। कोई न मिला तो बाबू से कह दिया। बाबू को कुछ न मिला तो छोटी सी ईंट लाकर ट्रक के नीचे फंसा दी। डीजे वाला आश्वस्त हो गया, और बिना गियर डाले, न्यूट्रल में छोड़कर ट्रक से उतर गया। किसी गाने की ढिंचक ढिंचक में ईंट का चूरा हो गया और ट्रक चल पड़ा।

जीजाजी की संभावित सरहज ने फिर कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।
खैर ट्रक का कार्यक्रम उधर चल रहा था, इधर वरमाला का समय (भारतीय रेल के समय अनुसार) चार घंटे देर से सही, हो गया था। दुल्हन को स्टेज पर लाने की तैयारी की जा रही थी। दुल्हन बाहर खड़ी थी, दूल्हा मंच पर विराजमान था। दुल्हन चाहती थी कि उसके भाई एक चुन्नी उसके सर के ऊपर पकड़ कर चलें, लेकिन चुन्नी नहीं मिल रही थी। समय निकल रहा था। जीजाजी की संभावित सरहज ने अपनी एक सहेली की चुन्नी मांगी और उपयोग करने के लिए दे दी यह कहते हुए कि मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है।

दुल्हन अपनी टीम के साथ अपने मिशन पर निकली। फिर भी कुछ कमी थी। किसी को कमी समझ नहीं आ रही थी। मिशन चल रहा था। दुल्हन स्टेज पर पहुंच चुकी थी। दूल्हा दुल्हन आमने सामने खड़े थे। तभी किसी को समझ आया कमी कहां थीं। इस अवसर का मुख्य आकर्षण,वरमाला गायब थी। वरमाला मंचन होना था और दुल्हन हाथ में बिना वरमाला लिए स्टेज पर खड़ी थी। रात के ग्यारह बज रहे थे।इस समय फूल वाला मिलना मुश्किल था। जीजाजी सजावट के फूलों से माला बनवाने की योजना बनाने लगे थे। अचानक माला मिल गई। आम शादियों में दुल्हन से ज्यादा सजी धजी सुंदर लड़कियां, थाल में वरमाला लेकर आती हैं। यहां केशविहीन अधेड़ गुड्डू भैया हाथ में अखबार में लिपटी हुई वरमाला लेकर पहुंचे।

संभावित सरहज ने फिर कहा मासाब के यहां की शादी में कुछ भी हो सकता है। मंडप में यह वाक्य कहने के अनेक अवसर उन्हें मिले। उन्होंने मौका न छोड़ते हुए हर बार कहा।
पंडित जी ने दूल्हा दुल्हन को वचन दिलाए, जीजाजी ने अपने साले और संभावित सरहज से भी वचन सुन लेने का इशारा किया। कहने लगे अभी मौका है इसी मंडप में निपट लो, वरना भाईसाहब पर आजकल पांच बच्चों के बाप बाबू डोरे डाल रहे हैं। दोनों ने इग्नोराय नमः कहते हुए बगलें झांकी।

पंडित जी ने भी वर वधु को आशीर्वाद दिलवाते हुए अपना भाषण समाप्त किया सब ने महावीर भगवान का जयकारा करते हुए विवाह संपन्न होने की घोषणा की।

रविवार, 31 मार्च 2024

नेता की आत्मा

चुनाव के समय आत्मा कचोटती है और अंतरात्मा जागती है। यह सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन आत्मा शरीर छोड़कर भटकने लग जाए ऐसा केस यमलोक में कभी नहीं आया था। तीन दिन पहले, पृथ्वी लोक से इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिली कि एक जीव अपने शरीर को छोड़कर खुला घूम रहा है। फाइलों में तलाशा जा रहा था कि ऐसा कोई विधान, नियम-कानून, प्रक्रिया या कोई रिफरेन्स केस मिल जाए जिसके आधार पर आगे कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। अब तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया था जिसमें कोई जीव अपनी इच्छा से शरीर से बहार निकलकर घूमने लग जाए। फोन के, बिजली के बड़े बड़े बिल और गाडी के चालान देखकर आम आदमी के शरीर से आत्मा निकलने की घटनाएं सुनी गई हैं लेकिन वे तुरंत अपने शरीर में घुस जाती हैं। भटकते हुए ऊर्जा मंत्रालय या सड़क परिवहन मंत्रालय में जाकर मंत्री के ऊपर मंडराने नहीं लगतीं।



यमराज परेशान बैठे थे। उनका सर घूम रहा था। टीवी पर चलते समाचार देखकर और घूम जाता। चित्रगुप्त पच्चीस हज़ार फाइलों को छान चुके थे। एक तरफ क्लाउड पर स्टोर किये हुए आर्काइव फाइलों में भी ढुंढाई चल रही थी और दूसरी तरफ सीसीटीवी फुटेज भी खंगाला जा रहा था। कहीं कुछ मिलता ही न था।

सिक्योरिटी के मद्देनज़र प्रोटोकॉल तो यह था कि आत्मा शरीर को तभी छोड़ सकती है जब कम से कम एक यमदूत सामने हो। यमलोक से प्रक्रिया आरम्भ होती थी, जिसमें रिटर्न आर्डर जारी होता। यमदूत प्राणी के पास पहुँचकर पहले उसका बायोमेट्रिक स्कैन करता और फिर मिलान के पश्चात चित्रगुप्त कार्यालय में अनुमोदन के लिए याचिका भेजता। चित्रगुप्त कार्यालय से ओटीपी मिलने के बाद ही यमदूत कहता चलो शरीर से बहार निकलने का समय आ गया। इसके बाद जीव को सीधा यमपुरी में डिलीवर कर दिया जाता। भटकने का अवसर ही नहीं।

अगर कभी किसी जीव से गलती से उसका शरीर छूट भी जाता तो प्रोटोकॉल के अनुसार उसे शरीर के आसपास रहने की हिदायत थी ताकि वेरिफिकेशन प्रक्रिया आसान हो सके। शरीर से दूर जाने पर उसके भटकने की सम्भावना भी रहती और किसी और भटकते जीव के उस शरीर पर अधिकार जताने की भी।

आत्माएं भटकती हैं लेकिन वो ऐसी आत्माएं होती हैं जिनका अप्रूवल चित्रगुप्त कार्यालय से नहीं आता या जिनका बायोमेट्रिक स्कैन फेल हो जाता। ऐसी आत्माओं के लिए यमलोक का जनसम्पर्क विभाग लोकअदालत के कैम्प लगाकर निपटारे की व्यवस्था भी करता था। लेकिन यह केस अलग था, यह प्राणी जिंदा था। उसका शरीर जेल में था और आत्मा बाहर भटक रही थी। शरीर घर से मंगवाकर खाना खा रहा था। उसका शुगर और बीपी घट बढ़ रहा था। अदालतों के चक्कर काट रहा था। और तो और जिन अदालतों में वकीलों को हिंदी बोलने नहीं मिलती वहां हिंदी में भाषण भी दे रहा था। निश्चित रूप से यह किसी नेता का ही शरीर था।

लेकिन जेल में रहने के बाद भी शरीर का नेतापन गया नहीं था। उसका शरीर जेल में नेतागिरी कर रहा था और आत्मा बहार भटक कर जनसमस्याओं को देख रही थी। हालाँकि जब तक आत्मा शरीर में थी, जनसमस्याएं तो तब भी दिख सकती थीं, लेकिन शरीर आलसी होता है। आत्मा को न घूमने देता है न कुछ देखने देता है। इसलिए जब आत्मा बहार निकली और घूमने लगी तब उसे गन्दी नालियाँ , पानी की सप्लाई , सड़क के गड्ढे, कूड़े के ढेर, अस्वस्थ बूढ़े, धूल में लिथुरे बच्चे और भूखे भिखारी सब दिखने लगे। याद रहे यह सब आत्मा को दिख रहा है। शरीर को तो अभी भी जेल, जेल से बहार निकलने का रास्ता और किसी तरह से आरोप प्रत्यारोप कर के बचने की ही चिंता थी।

इधर शरीर जांच एजेंसियों के सामने बातें बना रहा था उधर आत्मा उस नेता की पत्नी के माध्यम से जनसम्पर्क कर रही थी। आत्मा ने कहलवाया कि नेताजी ने कहा है कि - अब वो दिन गए जब काम करवाने के लिए अर्जियां लिखनी पड़ती थीं, दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे, नेता से मिलने और सिफारिश लिखवाने के लिए दौड़ भाग करनी पड़ती थी। अब तो सिर्फ आँख बंद कर के ध्यान लगाने पर ही नेता को अपने आसपास महसूस किया जा सकता है। बस आँख बंद करके ध्यान लगाइए और अपनी शिकायत बताइये। समाधान तुरंत होगा। जेल से आदेश देने से जनसेवा का भाव थोड़ा ज्यादा आता है।

यमराज परेशान इस बात से थे कि आखिर किस प्रक्रिया से यह जीव शरीर छोड़कर भटक रहा है और अगर जीव भटक रह है तो शरीर नेतागिरी जैसे कैसे कर रहा है। इसका अर्थ तो यह था कि आत्मा भी नेता है और शरीर भी। एक साथ दो दो नेता एक मनुष्य की तरह कैसे रह सकते हैं। इस बात से यह तो पता चलता था यह नेता बार बार पलटता क्यों है, लेकिन एक मनुष्य के अंदर दो नेता होना अवश्य कोई विभागीय त्रुटि थी। वह त्रुटि कहाँ हुई है इसी का पता लगाने के लिए सारा यमलोक व्यस्त था।

यमराज एक दूत को धरती पर भेजना चाहते थे, लेकिन डर था कि कहीं ऐसा न हो वह आत्मा उसका पीछा करते करते यमलोक में आ जाए। नेता की आत्माएं तो बहुत आई हैं लेकिन सब नेतागिरी धरती पर छोड़कर आई हैं, यह तो आत्मा स्वयं ही नेता बनी घूम रही है उसने यमलोक में नेतागिरी शुरू कर दी और यमराज को ही भ्रष्ट बताना शुरू कर दिया तो?

डर तो यह भी था कि अगर कोई कार्यवाही न की गई तो वह पृथ्वी पर यह कहता घूमेगा कि यमराज उससे डरते हैं इसीलिए उसे यमलोक में घुसने नहीं दे रहे। यमराज के लिए तो एक तरफ कुआँ और एक तरफ खाई थी। वे चाहते तो यही थे कि किसी तरह आत्मा को ढूंढकर उसे वापस उसके शरीर में ढूंस दिया जाए। दोनों कुछ साल जेल में रहें तो संभवतः उसकी नेतागिरी निकल जाए।

लेकिन किसी सीसीटीवी फुटेज में आत्मा दिखती ही न थी। अफवाह थी कि कोई न कोई आँख बंद करता और झट से आत्मा उसके पास पहुँच जाती। यमराज इसी डर से आँख बंद नहीं कर पा रहे थे कि कहीं उन्होंने आँख बंद की और गड़बड़ हो गई तो? ऊपर से कुछ शरीर ऐसे कपडे पहने घूम रहे थे जिसपर लिखा था मैं भी आत्मा, क्वांटिटी पचास। बताइये क्वांटिटी पचास। ऐसा भी कोई करता है क्या? एक शरीर में एक आत्मा का ही विधान है। जिसमें से कम से कम आत्मा से तो सदाचार की उम्मीद की जाती है। यहाँ शरीर और आत्मा दोनों कुधर हैं और क्वांटिटी पचास।

इतने में नारद जी वहाँ आ पहुँचे, परस्पर अभिवादन के बाद जब उन्होंने यमराज से परेशानी का कारण पूछा तो यमराज ने ऊपर लिखी सारी बातें कह सुनाईं। नारद बोले - "यमदूत को भेजने में समस्या है तो मैं देख आता हूँ। आत्मा मिली तो आदरपूर्वक उसे शरीर में वापस जाने के लिए कह दूँगा।"

यमराज ने उन्हें नेता की आत्मा पर एक रिपोर्ट तैयार करने धरती पर भेज दिया।

नारद जी पहले राजघाट पहुँचे। जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान में देख लिया जीव न दिखा। विधानसभा में भी गए , वहाँ की सूनी कुर्सियाँ बता रही थीं कि जीव यहाँ भी नहीं है। नारद सीधे उस मंत्री के पास पहुँचे जिसके पास नेता के आदेश पहुँच रहे थे, देखा मंत्री कुछ टाइप कर रही थी। नारद ने कहा जैसा नेता वैसी उसकी मंत्री। फिर भी उस मंत्री से पूछा - "यह क्या आदेश टाइप कर रही हो?"

"नेता जी का आदेश है। "

"किसने आदेश दिया है, शरीर ने या आत्मा ने? शरीर से मिलने तो तुम गई नहीं और आत्मा यहाँ दिखती नहीं।"

"उनकी आत्मा तो हम सबके अंदर है। वहीं से आदेश आते हैं। "

"अच्छा, उनकी आत्मा तुम्हारे अंदर है? फिर तुम्हारी आत्मा कहाँ है?"

"हमारी आत्मा भी हमारे अंदर है, उनकी आती जाती रहती है। "

"फिर तुमको कैसे पता चलता है कि आदेश किसकी आत्मा दे रही है? "

"जब भी हमें संदेह होता है या हमारी आत्मा हम पर हावी होने लगता है, तब तो यह कसौटी आजमाते हैं :

हम उनकी शकल याद करते हैं और अपने दिल से पूछते हैं कि जो कदम उठाने का विचार कर रहे हैं, वह उनके लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेंगे? यानि क्या उससे उन लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? या पार्टी को कुछ चंदा मिल सकता है? जब स्वराज्य और चंदा शब्द सुनाई देते हैं तब हमारा संदेह मिट जाता है और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ समाप्त हो रही है। तब हम समझ जाते हैं यह नेताजी की ही आत्मा है जो आदेश दे रही है।"

"अच्छा, तो थोड़ी देर को उनकी आत्मा से बात करवा दो। कुछ पूछताछ करनी है। "

"पूछताछ के लिए जेल जाइए, शरीर अभी पूछताछ के लिए जेल में उपलब्ध है। आत्मा अभी व्यस्त है।"

"चलिए बातचीत ही कर लेने दीजिये, बुलाइए।"

"वो तो यहाँ नहीं नहीं।"

"फिर कहाँ हैं?"

"यह नहीं पता। आप जाइए यहाँ से।"

नारद वहाँ से निकले, सोचने लगे कहाँ हो सकती है वह आत्मा। एक दुखी आवाज़ सुनकर समझ गए कि हो न हो आत्मा वहीं होगी। उस कमरे में पहुँचे जहाँ प्रेस कांफ्रेंस की रिकॉर्डिंग हो रही थी। वे जानते थे, आत्मा कहीं भी भटकती रहे लौटकर इस कमरे में जरूर आएगी।

उस नेता की पत्नी ने सन्देश पढ़ना शुरू किया – "जी मैं -मैं नेताजी की पत्नी। नेताजी बड़े निडर और ईमानदार हैं, सच्चे देशभक्त। देशभक्ति उनके रोम रोम में है। रोम इटली में है। इटली से तो पता ही है कौन आया है। इटली यूरोप में है। यूरोप में यूके भी है। यूके में लन्दन है। लन्दन में आजकल हमारे एक नेता हैं। उनकी आत्मा अभी अभी उनको छोड़कर वापस आई है। शरीर उनका अब भी लन्दन में ही है। लेकिन मेरी आत्मा तो यहीं है। आपके बीच में।

नेताजी को आपकी बड़ी चिंता है। वे जानते हैं कि आपको भी उनकी बड़ी चिंता है। आप उनके लिए व्रत कर रहे हैं। मन्नत मांग रहे हैं। आप उनको आशीर्वाद दीजिये। यही हमारा अभियान होगा। आप उनको सन्देश दीजिये, आपके सन्देश उनतक टिफिन में रखकर पहुँचा दूँगी। आशीर्वाद सबको देना पड़ेगा, कोई थोड़ा दे दे कोई ज्यादा देदे, जिसको और ज्यादा देना हो और ज्यादा दे दे।"

नारद ये सब सुनकर घूम गए। कहने लगे - नारायण नारायण, गज़ब नौटंकी है।

इतने में नेता की पत्नी आँख बंद करके उसे याद करने लगी, लेकिन आत्मा वहाँ नहीं आई। नारद ने सोचा आश्चर्य है, कोई आनगांव का आदमी याद करे तो आत्मा वहाँ पहुँच जाती है, लेकिन पत्नी के याद करने पर यहाँ नहीं आई? यह आत्मा भी अन्य पतियों की तरह पत्नी पीड़ित जान पड़ती है। जब जगह घूम लेगी लेकिन पत्नी के सामने आने में प्राण सूखते हैं।

नारद जी ने सोचा अब तो जेल चलकर उस शरीर से ही मिल लेना चाहिए। ऐसे विचित्र प्राणी के दर्शन साक्षात करना चाहिए। नारद जी जेल पहुँचे। देखा तो वह नेता वहाँ पुलिस वालों से कह रहा था - "इतने छोटे घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया है तुम लोगों ने। इतने में तो चांदनी चौक का पॉकेटमार भी गिरफ्तार न हो। तुम लोगों को हाय लगेगी।"

पुलिस वाले बोले - "छोटा?"

"१०० करोड़ में होता क्या है आजकल नेताओं का?"

"वो तो तुम बताओ क्या होता है?"

"इतने तो खर्च हो जाते हैं। खर्च हो गए तो फिर कैसा घोटाला। छोड़ दो मुझे। "

"छोड़ देंगे बस फोन का पासवर्ड बता दो। "

"तुम लोग भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेज दो चलेगा, लेकिन फोन का पासवर्ड नहीं बताऊंगा?"

"जब साफ़ सुथरे हो तो बता दो। छूट जाओगे फिर अपनी नेतागिरी करते रहना।"

"नहीं दूंगा। तुम मेरा तलाक करवाना चाहते हो।"

"सच्ची बता रहे सिर्फ भ्रष्टाचार की जाँच करेंगे। बाकी कुछ नहीं देखेंगे। कुछ दिखा भी तो देखकर डिलीट कर देंगे। "

"देखकर डिलीट कर दिया होता तो पासवर्ड देने में भी क्या ही दिक्कत थी।"

"तो पड़े रहो यहीं। "

"मेरा शरीर ही कैद कर लोगे न। आत्मा को नहीं कर पाओगे।"

इतने में नारद बोले -"मुझे बता दो आत्मा है कहाँ। जरूरी काम है।"

"तुम कौन? तुमसे मतलब?" वह बोला।

"कुछ नहीं पुरस्कार देना है। सोच रहे है शरीर तो बंद है आत्मा को ही दे दें। मिल ही नहीं रही। "

"नहीं मिलेगी। जैसे इनको पासवर्ड नहीं मिल रहा।"

नारद के दिमाग की बत्ती जली। "नारायण नारायण" कहते हुए वापस यमराज के पास गए और अपनी रिपोर्ट में लिखा - "आत्मा के भटकने की बातें झूठी हैं। नेता ने फैलाई हैं। उसकी आत्मा वही जेल में है। उस फोन में जिसका पासवर्ड पुलिस उससे माँग रही है। पासवर्ड मिलते ही उसकी आत्मा अपने आप उसके शरीर में वापस घुस जाएगी।"