"वैदिक समय में भविष्य में ऐसे बहुतायत धिम्मी हिंदू जाम्बियों की अपेक्षा में ही भारत का एक नाम ज़ॉम्बीद्वीप रखा गया जो अपभ्रंश में जम्बुद्वीप कहलाया ।" - @Saket71
जो ज़ॉम्बीद्वीप निवासी स्वयं सात दशक तक "जम्बूरा" बने रहे अब उन्हें उनकी बात सुनने वाला प्रधानमंत्री मिला तो उसे ज़ॉम्बीद्वीप का "जम्बूरा" बना समझ लिया और स्वयं मदारी बन बैठे। उससे अपेक्षा की जाने लगी कि डमरू बजते ही "जम्बूरा" नाच उठे ।
कहा जाए कि जम्बूरे बोल तो जम्बूरा बोले । प्रधानमन्त्री ने जब जम्बूरा न बनते हुए अपनी बुद्धि का प्रयोग करके निर्णय लेना शुरू किया, तब मदारी बनने की चाह रखने वालों की जमात को जमकर ठेस लगी और वे प्रधानमंत्री को जाम करने में लग गए । इसी बीच दो जामवंत जैसी शक्ल वाले जोम्बी भी टूट पड़े ।
अब ज़ॉम्बीद्वीप की जमीन पर जमकर विरोध होने लगा । अब जोम्बी बनाने वाले साथ मिलकर जाम बनाने लगे । इस प्रकार जोम्बी निर्माण में तीव्रता आई । रोमन साम्राज्य से आने वाले चावल की बोरियां और अरबदेश से आने वाले खजूरों ने जोम्बित्तव को बल प्रदान किया ।
देशी ज़ॉम्बी अभी भी मुंह में जम्बूफल दबाये गंगा-जमुनी तहज़ीब कहते रह गए और खजूर की मिठास में गंगा कहीं छूट गयी । देशी जॉम्बी अभी जम्बूफल का रसास्वादन ही कर रहे थे कि तरह तरह ही और ज़ॉम्बी सेनाएं उभर कर सामने आ गयीं । ये सेनाएं ज़ॉम्बीद्वीप के समस्त ज़ॉम्बीयों का प्रतिनिधि बन बैठी ।
ज़ॉम्बीयों के तीर्थस्थान jnu में ज़ॉम्बीयों पर कुछ प्रतिबन्ध लग जाने से बहुत हाहाकार मचा हुआ है ।
समस्त ज़ॉम्बी संगठनो के लोग अब मिलकर अपना एक जम्बूरा लेकर आये हैं और खेल दिखाकर कहते ये देखो हमारा जम्बूरा प्रधान बनेगा । ज़ॉम्बीद्वीप में अब नया अध्याय जुड़ने जा रहा है ।
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