गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

यह बस्ती नहीं हटेगी

अब शायद वो सीन देखने मिलें जिसमें, अदानी अपने आदमियों के साथ बुल्डोजर लेकर झुग्गी की तरफ आ रहे हैं। नंदी जी झुग्गी के लोगों को जमा कर के खड़े हो गए हैं। उधर ताजा ताजा 'आजाद’ हुए पत्रकार कुमार, झोला टांगे अपनी साइकिल से टिक कर खडे हुए हैं। आंखों पर मोटा चश्मा, बाल बिखरे।

हाथ में पेन और नोटपैड, खादी का कुर्ता और जींस पहने हुए, इस घटना का ब्यौरा लिख रहे हैं। पीछे से पाटकर भी अपनी काली इनोवा से उतर कर आ रही हैं, वही सफेद साड़ी में। 

सलीम जादौ, झोला टांगे एक दुकान पर चाय सुडक रहे हैं। आंखें सड़क पर गड़ाए हुए। संदिग्ध, जैसे झोले में कुछ बम रखा हुआ हो।

अदानी के साथ पुलिस भी है, और फिर अदानी ने चारों तरफ देखा। सामने झुग्गी। नाला। भीड़। नंगे बच्चे। हैंडपंप। सर पर पानी उठाए दो औरतें।

एक अंधे गरीब कमजोर से दिखने वाले मुल्ला जी। एक लुंगी पहने हुए छिछोरा दढियल, जिसके हाथ में एक लाठी है।

एक नारियल पानी वाला जिसके हाथ में हंसिया है।

उसने बुल्डोजर को देखा और जोर से हंसिया एक नारियल पर दे मारा है। एक कसाई की दुकान जिसमें लटकते हुए मांस पर मक्खियां भिनभिना रही है। कसाई सड़क की तरफ देखता है और सामने पड़े मांस को काटता है।

ANI वाले अभी भी केजरीवाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हैं।

शरद शर्मा NDTV छोड़कर आप के घोषित प्रवक्ता नियुक्त हुए हैं, उसी महत्त्वपूर्ण बात को केजरीवाल प्रेस कांफ्रेंस कर के बता रहे हैं।

झुग्गी में सुदर्शन टीवी वाले खड़े हुए हैं, प्रसारण चल रहा है, अब जलेगी पाप की लंका। अपराध का अड्डा है झुग्गी। अब आएगा धारावी में विकास।

अरफा ने ट्वीट कर दिया है, "रोज नया दर्द।"

टीवी चैनलों पर लाइव प्रसारण के साथ चल रही है बहस, कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे हैं यह हमारी सांस्कृतिक विरासत मिटाने की साजिश है। 

टीएमसी नाराज दिख रही हैं, कोई बंगाली कह रहा है, ऐसे तो मुंबई का फीलिंग ही खोतम हो जाएगा।

इधर राणा और तीस्ता ने झुग्गी वालों के नाम पर क्राउडफंडिंग शुरू कर दी है। सुचेता दलाल ने अदानी को घेरने की नई रणनीति कर काम शुरू कर दिया है।

उधर झुग्गी के सामने आकर बुल्डोजर घड़ घड़ घर घर चीईss की आवाज कर के रुक गया है। अदानी गाड़ी में से निकल आए हैं। आंख पर काला चश्मा लगा है।

हाथ में लाउडस्पीकर पकड़ कर अदानी ने बोलना शुरू किया, बस्ती को खाली कर के नई जगह चले जाओ यहां अब पुनर्निर्माण होगा। सरकारी ऑर्डर है, बस्ती खाली करदो नहीं तो बुल्डोजर ....!

सामने से एक आदमी ललकारता है, हम ये बस्ती छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। 

सलीम जादौ बुलडोजर के सामने आकर लेट गए।

ये बुल्डोजर मेरी लाश के ऊपर से आगे बढ़ेगा। पाटकर सामने खड़ी हो गई हैं। 

लाउडस्पीकर पर पुलिस वाला बोलता है – सामने से हट जाओ वरना मजबूरन हमें सख्ती करनी पड़ेगी।

पत्रकार कुमार ये सब नोटपैड पर नोट कर रहे हैं।

झुग्गी के पीछे कुछ लुच्चे ईंट, पत्थर, बोतल हाथ में लेकर खड़े हुए हैं।

बस ऐलान की प्रतीक्षा है। उसके बाद क्या करना है वो जानते हैं। बुल्डोजर आया तो पहियों पर चलकर है लेकिन जायेगा कल्लू कबाड़ी की दुकान में ही। 

पुलिस वाले डंडे को जोर से पकड़ते हैं, कसाई अपने कतन्ने को, नारियल पानी वाला अपना हंसिया कस के पकड़ता है। डर का माहौल है, पत्रकार ने नोट लिखा।

इतने में एक गाड़ी तेजी से आकर रुकती है। उसमें से दो काले कोट वाले वकील निकलते हैं। प्रशांत भूषण जोर से कहते हैं, रुक जाइए।

हम कोर्ट से स्टे ऑर्डर ले आए हैं। मूनबैंगल साहब ने किसी भी कार्यवाही को करने पर रोक लगा दी है। यह बस्ती नहीं हटेगी।

सिब्बल साहब कहते हैं, आपका किया धरा सब जीरो हो गया अदानी साहब।लौट जाइए।बस्ती में खुशी की लहर दौड़ जाती है।

नारियल पानी वाला एक नारियल लेकर नाचता हुआ अदानी की गाड़ी की तरफ जाता है। कसाई अपने लाल पीले दांत दिखाता है।

पत्थर बोतल छोड़कर छिछोरे मुंबईया नाच करते हुए सड़क पर आ जाते हैं।

पानी भरने वाली औरतें घरों को जाती हैं, नंगे बच्चे की नाक भी बहने लगती है। नाला जो ये सब देखने के लिए रुक गया था फिर से बहने लगता हैं। 

मुल्ला जी अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। टीवी पर बहस अब गाली गलौच पर उतर आई है।

ANI अभी केजरीवाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में व्यस्त है।

जादौ जी चिल्ला चिल्ला कर सबको बुला रहे हैं, ए भाई कोई तो रुक जाओ। थोड़ी देर तो आंदोलन कर लो। किसी भी बात पर कर लो। लेकिन तब तक सब अपने अपने काम में लग गए हैं।

पत्रकार कुमार की मुस्कुराहट बड़ी हो गई है। उन्होंने अंतिम नोट डाला – बड़ी विडंबना है। और साइकिल उठा कर चल देते हैं।

रविवार, 18 सितंबर 2022

चीताजी से बात

जैसा कि आप सब जानते हैं, हमारे बीच में चीता जी पधार चुके हैं। चीता जी विलुप्त होने से पहले भारत के मूल निवासी माने जाते थे। फिर १९५२ में उन्हें भारत में विलुप्त मानकर विदेशी घोषित कर दिया गया। चीताजी अफ्रीका में बस गए। अब वे जब वापस आए हैं तो लोग उनके आने को घर वापसी का नाम दे रहे हैं। वे हमसे बड़ी सहृदयता से मिले और हमारे प्रश्नों के उत्तर खुलकर दिए। पढ़िए कुछ अंश -

चीताजी दूर खड़े थे, पास आने के लिए उन्होंने ही पूछा  - "मैं आऊं?"

हमने कहा - "आइए आइए, स्वागत है आपका। कैसा लग रहा है आपको भारत आकर?"

इस प्रश्न पर वे केवल मुस्कुराए और चिड़िया की तरह चहचहा उठे -"चां चां चां"। उनका तात्पर्य था कि वे बहुत प्रसन्न हैं।  

फिर भी हमने शिष्टाचार में पूछा - "कैसे हैं आप?"

वे बोले - "आं म्यां आं  म्यां" 

"देखये ऐसे राम राम बोलेंगे तो सांप्रदायिक घोषित हो जायेंगे। अपने बारे में कुछ और बताइये?"

"हमारे पूर्वज थे तो भारतीय ही, फिर हम व्यापार के चलते अफ्रीका में बस गए।"

हमें यह जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई। हमने पूछा - "लोग आपके भारत आने को घर वापसी की संज्ञा दे रहे हैं।  क्या अफ्रीका में अपने धर्म परिवर्तन किया था? अब जब लौटे हैं तो क्या आपका शुद्धिकरण किया गया है?"

उन्होंने बड़े बड़े दांत दिखाते हुए बोले - "जी घर वापसी तो है। अफ्रीका में वे अफ्रीकी थे लेकिन अब पूरी तरह से भारतीय हो गए हैं।"

इस पर हमनें पूछा - "तो जब आपको नागरिकता दी गई तो क्या CAA के तहत दी गई? आप CAA को कैसा कानून मानते हैं?"

उन्होंने बड़े विस्मय से हमारी ओर देखा। बोले - "हम जैसे CAA.T.  फॅमिली वालों के लिए तो अच्छा ही है। जो भारत में बसना चाहते हैं। "

"आपको नहीं लगता CAA के माध्यम से  CAA.T. फॅमिली के आलावा अन्य फॅमिली वाले जानवरों को भी भारत में बसने का मौका मिलना चाहिए?"

वे बोले - "किसनें रोका है?"

"तो क्या उनको भी घर वापसी करनी पड़ेगी?"

" जो यहाँ का है वो यहीं का है। घर वापसी से अच्छा क्या होगा?"

"आप संघ से प्रभावित लगते हैं।  हमारे एक पाठक मंडल का मानना है कि आप अब शिकार करेंगे। आपके शिकार के लिए चीतल वगैरह छोड़े गए हैं।  आप उनकी गर्दन तोड़ेंगे और उनको खा जायेंगे? "

"आपका पाठक मंडल कतई भ्रमित प्रतीत होता है। शिकारी शिकार नहीं करेगा तो क्या - बुध्दं शरणं गच्छामि कहते हुए घास खाएगा? "

"तो क्या शिकार पाप नहीं है?"

"पाप है अपनी कुंठाओं, मनोरंजन और भय व्याप्त करने के लिए अकारण किसी पर आक्रमण करना।"

"फिर भी शिकार तो आप करेंगे ही न?"

"हाँ, भूख मिटाने के लिए।  लेकिन द्वेष तो नहीं फैलाएंगे। गधों के हिस्सों की घास तो खाएंगे ही नहीं। न गायों के हिस्से का चारा।"

"फिर लोग तो यह भी कह रहे हैं कि आपके आने से बेरोजगारी दूर नहीं हो रही? न महंगाई कम हो रही है। महिला सशक्तिकरण भी नहीं होगा।"

"वे तो कुछ भी बोल सकते हैं। वे सशक्तिकरण ठीक से बोल पाए?"

"सवाल का जवाब दीजिये - आपके आने से गरीबों को क्या फायदा होगा?"

"नुक्सान भी क्या होगा? हम तो चुपचाप जंगल में घूमते रहेंगे, और पैसे भी नहीं लेंगे। आप उनसे ही पूछिए कि वो जो AC वाले कंटेनर में जो जोड़-तोड़ करते घूम रहे हैं, उससे कितने किलोमीटर गरीबों को रोजगार मिल गया?"

"खैर छोड़िये। एक नेता जी कह रहे हैं कि आप १३ साल पहले आने वाले थे।  तब क्या हुआ था? आपका मन नहीं था?"

"हमारे दादा रहे होंगे, जरूर उस समय की सरकार को देखकर मना कर दिया होगा। वैसे भी उनके समय में कौन से निर्णय समय पर लिए जाते थे। उस समय की सरकार ने योजना बनाई होगी। योजना तो बहुत बनाते थे, पूरी कितनी करते थे?  हर योजना की तरह यह योजना भी उनकी धरी रह गई। "

"तो निर्णय में देरी से आप आहत हैं?"

"जितनी देर वो सरकार करती थी, उतने साल तो हम जीते नहीं। जो आहत हुए होंगे वो तो चल बसे। "

"इतिहास में आपके पूर्वजों का मुगलों के साथ गहरा रिश्ता मिलता है। आपके दादा कुछ सुनाते थे मुगलों के बारे में?"

"बिलकुल है। हम पहले मुगलई चीते कहलाते थे। मुगलों के साथ मुगलई चला गया। सोच रहे हैं ग्वालियर और ओरछा के जहांगीर महल पर दावा ठोक दें।"

"जैसा मोदी जी ने कहा है कि उस समय कबूतर छोड़ते थे, अब चीते छोड़ते हैं। आपका इसपर क्या विचार है?"

"ये मोदी जी के अपने विचार हैं। हम तो मानते हैं कबूतर छोड़ने वाले चाचा और चीते का च एक ही है। 

अब  मोदीजी  ने हमें छोड़ा है या नया घर दिया है समय बताएगा। बस एक शिकायत रह गई, सबको भाषण देते हैं। छोड़ते समय एक छोटा सा भाषण हम आठों चीतों को भी दे देते।  या थोड़ी देर के लिए सही फॉलो ही कर लेते। लेकिन हम कौन से उनको वोट देने वाले हैं।" 

"क्यों नहीं देंगे? फिर किसको देंगे?"

"किसी को नहीं देंगे?"

"क्यों?"

"क्योंकि वोट देने की उम्र १८ साल है। हम बारह से ज्यादा जीते ही नहीं।" 

"और किसी नेता नें आपका स्वागत किया है?"

"जी, किसी हैंडसम ने हमारे बच्चों के लिए झुनझुना भेजा है। एक नेताजी का फोन आया था वो चीतों को नंबर वन बनाने की बात कह रहे थे।  उन्होंने हमें मुफ्त हिरन और हमारे बच्चों को सर्कस ट्रेनिंग देने का वादा भी किया। 

उसके लिए वो जंगल में स्कूल बनवाएंगे। 

एक नेत्री नें हमारे ऊपर कविता भी लिख डाली जो हमको समझ में नहीं आई - 

चीता पीता, 

काटा फीता,  

कच्चा बादाम, 

पक्का पपीता।  

चीता आता कोलकाता, 

आटा बाटा खाता 

आम, जामुन, अनारस, 

चलो जाएँ बनारस। 

संतरा मौसंबी किन्नू, 

चीता का घर कुन्नू।  

एक नेता ने हमको देख लेने की बात की।"

"और किसी नेता के साथ कोई अनुभव रहा आपका?"

"कोई ट्रिन-ट्रिन करते आए थे। बिलकुल भोले बालबुद्धि वाले। आते ही जिद करने लगे - दहाड़ के दिखाओ।  हमने कहा हम नहीं दहाड़ते।"

वे बोले - "दहाड़ना तो पड़ेगा।"

हमने कहा - "हम गुर्राते हैं।  और उनको गुर्रा कर दिखाया। वे हंसने लगे, बोले हम इतने दिनों से दहाड़ का इंतज़ार कर रहे थे।  और ये तो बड़ा बिल्ला निकला।  चीता बोलके मोदी जी बिल्ला उठा लाए।"

"जी ये तो है तरह तरह के नेता, तरह तरह की बात।   अब ये कूनो ही आपका  घर है। आशा है आप ख़ुशी से रहेंगे।"

"हाँ, हम तो घर ही समझते हैं बस ये वफ्फ वाले पहले जंगल और फिर हमको ही अपनी संपत्ति न घोषित कर दें।"

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

अभक्ते नैव दातव्यं

श्री दुर्गा सप्तशती में लिखा गया है - अभक्ते नैव दातव्यं। इसका सन्दर्भ है कि यह मन्त्र स्वयंसिद्ध है, इसे अभक्त को न दें और इसे गुप्त रखें। अभक्त, आस्था न रखने वाला भी हो सकता है और अपात्र भी हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को ऐसा मन्त्र और ज्ञान मिलने पर या तो वह उसका दुरुपयोग करेगा अथवा उसके अर्थ का अनर्थ करेगा। शायद इसी कारण से पुराने समय में ज्ञान को सीमित रखा गया होगा। गुरु अपने शिष्य बहुत सोच समझ कर चुनते थे। ज्ञान किसको और कितना देना है यह गुरु निर्धारित करते थे। आरम्भ में योग्यता देखकर निर्णय लिया जाता होगा, जो समय के साथ बदलता गया। अगर हमारे पास कोई ज्ञान है, या हमारी किसी विधि अथवा आध्यात्मिक मार्ग में कोई आस्था है, तो आवश्यक नहीं किसी और की भी वैसी ही आस्था हो। आवश्यक नहीं अन्य लोग भी उस गूढ़ अर्थ या मर्म समझते हों जो हम समझते हैं। आज के समय में पुस्तकों में कथाएं छपकर सुलभ हो गईं। गुरु के बिना, पात्रों और अपात्रों ने पुस्तकों को पढ़ा, और कई सन्दर्भों के अर्थ का अनर्थ कर दिया गया। एक तो हमारे ग्रंथों में बहुत कुछ सांकेतिक भाषा में लिखा गया, हर बात के कई अर्थ निकलते हैं और सभी अर्थों पर मनन करने के पश्चात भी जो मूल अर्थ है वह बिना किसी ज्ञानी गुरु के समझना असंभव है। जो कुछ श्रुत था वह कालांतर जब लिपिबद्ध किया तो अपने मूल रूप में कितना सटीक था इसपर भी प्रश्च चिन्ह ही है। फिर मूलभाषा से अनुवाद में कितना लुप्त हुआ उसकी भी कोई सीमा नहीं है।  जब लोगों ने कथाओं की व्याख्या करनी शुरू कर दी और समय के साथ व्याख्या से कथा की आत्मा ही छूटती गई। वर्तमान समय में लोग मूल ग्रन्थ देखते भी नहीं जो कुछ सुन लिया उसपर मनगढंत व्याख्या करते हैं और ऐसे में अपनी विकृत विचारधारा के हिसाब से चित्रण करते हैं। एक तो आस्था न होने के कारण उनका कोई अधिकार नहीं बनता, दूसरा ज्ञान न होने के कारण उनकी परिभाषायें भी विकृत होती हैं।  

पिछले दिनों माँ काली का एक विवादित चित्र चर्चा में आया, विवादित होने का कारण वही वामपंथी (अ)रचनात्मकता, कुटिलता और कुत्सित मानसिकता है। विरोध होने पर वामपंथियों ने तरह तरह से बचाव करना शुरू कर दिया। किसी ने कहा यह उनकी अभिव्यक्ति की आजादी है। किसी ने कहा वो अपने देवताओं को ऐसे ही देखते हैं। एक बंगाल की सांसद ने तो यहाँ तक कह दिया कि उनकी आराध्य देवी को तो वो शराब और मांस खाने वाली देवी ही मानती हैं। जितने मुँह उतनी बातें। पर जो कहते हैं कि उनके लिए देवी का तो यही रूप है वो ये भूल गए वो माँ की बात कर रहे हैं। विशेषकर बंगाल के लोगों को माँ काली का ऐसा चित्रण कैसे सहन हुआ ये तो वही जाने। फिर, जब उनकी मुख्यमंत्री स्वयं जिहाद करने की बात करती हैं तो आगे कहने को कुछ नहीं बचता।  निशाने पर सिर्फ फिल्म की निर्माता लीना ही आईं, किन्तु उस पोस्टर में उनकी पूरी टीम के नाम थे।  जितनी दोषी लीना हैं उतनी ही बाकी टीम है। 

इस विषय में लीना ने एक चित्र यह कहते हुए साझा किया कि कलाकार तो ऐसा करते ही हैं - जिसमें देवताओं का भेष धारण कर कुछ कलाकार धूम्रपान करते दिखे। इसमें एक अंतर वो भूल गयीं, वो कलाकार केवल वस्त्र धारण किये थे, किसी मंच पर नहीं थे, और संभवतः अपना कार्य कर के लौट रहे थे।  भारत में अनेक त्यौहार, अनेक परम्पराएं है जिसमें लोग ईश्वर का भेष धारण करते हैं।  कभी मंचों पर, कभी समारोह में, कभी किसी यात्रा में। किन्तु वे ईश्वर नहीं हो जाते। विरले ही होते हैं जो सात्विक हो पाते हैं, या ईश्वर की कृपा प्राप्त कर वो अनुभव कर पाते हैं कि वो भगवान के जिस रूप और कथा का मंचन कर रहे हैं उसका अर्थ क्या है। रामलीला के मंचन में राम और हनुमान की भूमिका जो निभाते हैं उनमें से बहुतों के जीवन पर आध्यात्मिक प्रभाव पड़ने की कथायें सुनने को मिलती हैं। अरुण गोविल , नितीश भरद्वाज अपने निभाए पात्रों के बाहर निकल ही नहीं निकल पाए। एक तो लोगों ने भी उनको वैसे ही देखा और उन्होंने भी शायद उस आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव किया हो या उस छवि का मान रखने के लिए उन्होंने अपना आचरण ऐसा रखा हो। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी उसी तरह से काम करते होंगे, कुछ के लिए अभिनय, अभिनय तक ही सीमित रहता होगा और मंच से उतर कर सामान्य मानव हो जाते होंगे। जिस पर किसी ने कभी कोई आपत्ति नहीं की, और फिर ऐसे कलाकार जो भी करते हों मंच का भेष धरकर सार्वजानिक रूप से तो नहीं ही करते होंगे। कुछ अपवाद सदा रहते हैं, लेकिन हिन्दू इतना असहिष्णु नहीं रहा कि थोड़ी सी बात कर आहत होकर पीछे पड़ जाए।  

हमारे यहाँ विसर्जन की प्रथा है, हम गोबर-मिट्टी के गणेश बनाकर उसकी पूजा कर करते हैं, भोग लगाते हैं, आरती करते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण करने का आशीर्वाद मांगते हैं और फिर जब समय आता है तो उनका भी विसर्जन कर देते हैं।  फिर वही नवरात्र में देवी की प्रतिमा बनाकर करते हैं।  यह चक्र है और हम यह समझते हैं।  कोई भेष धर लेने से ईश्वर नहीं हो जाता और मंच से उतरने के बाद अगर ईश्वर की कृपा नहीं है तो उसका आचरण भी नहीं सुधर सकता।  इसलिए हमें ऐसी तस्वीरें और भेष बनाकर ढोंग करने वालों को देखकर क्रोध नहीं आता बल्कि उसका उपहास कर के छोड़ देते हैं।  

किन्तु जब एक आराध्य का चित्रण उसका उपहास करने या उसको अपने एजेंडा चलाने के लिए किया जायेगा तो उसका विरोध होना ही है। काली के चित्र को एक मंच के पीछे की घटना की तरह दिखाया जाता तो संभवतः कोई ध्यान नहीं देता, किन्तु उस चित्र में विकृत मानसिकता ही देवी को विवादित रूप में दिखाने की थी। निर्देशक विवाद खड़ा ही करना चाहती थी, इसलिए विवाद हुआ भी।  किन्तु इसका दूसरा पक्ष यह है कि जो चित्र या चलचित्र सौ-दो सौ वामपंथियों के बीच सिमट जाता उसपर प्रतिक्रिया देकर उसे फैला दिया गया।  विरोध करने के नाम पर सही, उसकी चर्चा आम लोगों तक पहुँच गई। 

आज हमारा विरोध ही उन वामपंथियों की प्राणवायु है। पर सच यह है कि विरोध न किया जाता तो उनकी हिम्मत और बढ़ती, यहाँ से न कोई फतवे निकलते हैं न किसी का सर तन से जुदा करने की  मांग उठती है। हम सरकार से ही कार्यवाही की मांग करते हैं और उसके लिए इतना विरोध तो करना ही पड़ता है।  हिन्दू पक्ष की यह समस्या है, आज विरोध कर रहे हैं, धीरे धीरे विरोध कम होगा और अंततः इस प्रकार का चित्रण आम हो जाएगा। ऐसा कई बार हुआ है। कला के नाम पर एम एफ हुसैन ने कम उद्दंडता नहीं की थी। पर उनपर किसी ने कभी कोई ठोस प्रतिक्रिया दी ही नहीं।  

एक बात जो कुछ टिप्पणियों से जो मुझे चुभी है, कि यह बात सच है कि हम स्वयं अपने आराध्यों का समुचित सम्मान नहीं कर पाते। अखबारों में देवी देवताओं के चित्र छपते रहते हैं, अंधाधुंध, उन अखबारों का क्या होता है? कोई उस अखबार में क्या लपेट रहा है उसका विरोध कर सकते हैं, लेकिन वो चित्र अखबार में छपे ही क्यों? अखबार का क्या क्या प्रयोग हमारे यहाँ होता है हम सब जानते हैं। अगर एक अखबार की एक लाख प्रतियां छपी हैं तो उन एक लाख चित्रों का सही प्रयोग होगा इसकी गारंटी कौन ले सकता है? यह प्रथा बंद करवानी होगी। बधाई संदेशों में, त्यौहारों पर, देवी देवताओं की तस्वीरें या तो छापी न जाएँ अथवा अलग पोस्टर के रूप में ही बांटी जाएँ। 

न जाने कितने उत्पाद हम प्रयोग करते हैं जिनके आवरण पर देवी देवताओं के चित्र होते हैं। पटाखों पर देवी के चित्र होते हैं, अभी समय है जब दिवाली के लिए पटाखे बनाए जाएं, ऐसे निर्देश दिए जाएँ कि उनपर देवी देवताओं के चित्र अंकित न हों। गणेशोत्सव और नवरात्र में देवी की प्रतिमाओं पर भी कुछ ऐसे ही निर्देश दिए जाना चाहिए।  बहुत प्रतिबन्ध के बाद भी हर वर्ष कहीं न कही से ट्रकों से मूर्तियां कूड़े की तरह फेकी जाती हैं। उनके समुचित विसर्जन की व्यवस्था की जानी चाहिए। पिछले वर्षों में जागरूकता आई है, और बहुत से स्थानों पर मिट्टी की मूर्तियों का ठीक से विसर्जन आरम्भ हुआ है किन्तु सब जगह नहीं। यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।  

ऐसे त्यौहार लोगों के जुड़ने, मिलने जुलने एक साथ आराधना करने का माध्यम थे, जो छोटे छोटे गुटों में और फिर घरों में सीमित हो गए।  पहले जहाँ गाँव में एक ही जगह देवी की स्थापना होती थी अब अलग अलग टोलों में अलग अलग होने लगी है।  इसे वापस सामाजिक रूप से एक किया जाना चाहिए।  जहाँ अधिक मूर्तियों की स्थापना होती हो वहाँ विशेष रूप से विसर्जन की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि एक भी मूर्ती अपमानित सी किसी नदी, नहर, तालाब के तट पर पड़ी न मिले। भले ही इसके लिए शुल्क लिया जाए।  

हमें स्वयं अपने आराध्यों का सम्मान करना सीखना होगा, अन्यथा जब अन्य लोग अपमान करेंगे तब किस मुँह से बचाव करेंगे। वे लोग अपने आराध्य के लिए किसी का गला काटने से भी नहीं चूकते और यहाँ हम सहिष्णुता के भ्रम में और लापरवाही में स्वयं ऐसे कृत्य कर बैठते हैं जो हमारे आराध्यों के अपमान का कारण बनता है। इसलिए जो समझते हैं उन्हें इन अभक्तों पर ध्यान न देते हुए क्या सही किया जा सकता है उसपर ध्यान देना चाहिए।  

मैं पुनः कहूँगा -अभक्ते नैव दातव्यं। अभक्तों को यह कथा न सुनाई जाए कि देवी को बलि चढ़ती है, वे यही निष्कर्ष निकालेंगे कि देवी मांस का भोग स्वीकार करती हैं। बलि चढ़ती है किन्तु उसकी अपनी मान्यताएँ हैं। जैसे हमारे यहाँ मान्यता है कि देवी तो हालुआ-पूड़ी-खीर-नारियल में ही संतुष्ट होती हैं, बलि उनके वाहन के लिए होती है। बाकी अलग अलग स्थानों पर अलग अलग मान्यताएं हैं। भैरों बाबा शराब का भोग स्वीकार करते हैं, किन्तु जो शिवलिंग का अर्थ ही न जानता हो उसे क्या समझाया जाये? अभक्तों को यह समझाने का प्रयास न किया जाए कि श्रीराम मानव अवतार थे अतः वे स्वयं अपकी मर्यादाओं में बंधे थे, उन्हें यह समझाने का प्रयास न हो कि श्रीकृष्ण पूर्णावतार क्यों थे।  उन्हें जो भी समझाया जाएगा वे उसका विकृत अर्थ ही निकालेंगे।  

हमारी मान्यताओं और प्रथाओं का मूल अर्थ छुपाकर, गलत अर्थों में प्रस्तुत करके हमारे समाज को उनसे विमुख करने का षड्यंत्र यही अभक्त करते हैं। गजनी-तुगलक जैसे मूर्ती भंजकों के वंशज हमारे देव विग्रहों की उपेक्षा प्रस्तुत करके आस्थावान समाज में शंका के बीज बोते हैं। मूर्तियों में जिस कथा का चित्रण है उससे अलग ही परिभाषा देते हैं। कला और अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसा अर्थ प्रस्तुत करते हैं कि हमारी आस्था पर चोट की जा सके। गज़नी तो पत्थर की मूर्तियां तोड़ता था, पर ये वामपंथी हमारे मन में बेस ईश्वर के विग्रह स्वरुप का मर्दन करने का प्रयास करते हैं, दोनों अलग कैसे हैं? औरंगजेब तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन करवाता था और आज जो ये दुष्प्रचार द्वारा लोगों को धर्म से विमुख करने वाले लोग हैं वो उससे अलग कैसे हैं? 

लोगों के मन में आस्था पर इतनी चोट की गई है कि वे ईश्वर शब्द लिखने से भी कतराते हैं। किन्तु कितना भी विमुख हो लें अपनी सनातन जड़ों को छोड़ नहीं पाएंगे। ईश्वर को प्रकृति कहकर से प्रार्थना करने से ईश्वर बदल नहीं जाता। भू-देवी वही रहेंगी और वही परमशक्ति परमेश्वरी ही प्रकृति हैं, वही सृष्टि हैं।  

"या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः"

अतः न गजनी सफल हुआ था, न खिलजी, न औरंगजेब और न ही वामपंथी अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे।  

बुधवार, 15 जून 2022

अग्निपथ की शंकाएं

केंद्र सरकार नें युवाओं के लिए अग्निपथ/अग्निवीर योजना की घोषणा की है। जितना इस योजना का विस्तृत विवरण सामने नहीं आया है उससे अधिक इस योजना की आलोचना आरम्भ हो गई है। विपक्ष को तो मजबूरन विरोध करना ही होता है, इस बार सेना के भूतपूर्व अफसर भी इसकी आलोचना कर रहे हैं।  कुछ लोगों को ठीक भी लग रही है। 

यह योजना युवाओं के लिए है जिसके अनुसार उन्हें चार वर्ष तक सेना में सेवा का अवसर प्राप्त होगा। आर्थिक दृष्टि से देखा जाए युवाओं के लिए पैकेज अच्छा है और अवसर की दृष्टि से देखा जाए तो इससे अच्छा अवसर हो नहीं सकता। 

बहुत समय से एक वर्ग का विचार था कि सभी नागरिकों को दो या तीन वर्ष के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य कर दी जाए। किन्तु हमारे यहाँ जनसंख्या इतनी है कि सभी के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य होना असंभव है। फिर सरकार का यह सोचना कि एक वर्ष में पचास हज़ार बच्चे लेकर उन्हें ट्रेनिंग देकर चार वर्ष तक अवसर मिले। उनमें से पच्चीस प्रतिशत को सेना में ले लिया जाए बाकी को बाहर जाना होगा। इसमें लोगों ने तरह तरह की शंकाएं व्यक्त की हैं। 

पहली यह कि यह एक अनुबंध की तरह है और सेना अनुबंध के आधार पर नहीं चलती,  इससे सेना कमजोर होगी। इस पर तर्क यह दिया जा सकता है कि सामान्य नियुक्तियां तो चलती ही रहेंगी, यह एक अलग दिशा है। अनुबंध चार वर्ष का है उसके बाद जो सेना में जायेंगे वो तो नियमित ही रहेंगे।  

दूसरा लोगों का मत है कि इस तरह से आए हुए लोग सेना के प्रति समर्पण नहीं रखेंगे। वे शत प्रतिशत नहीं देंगे, प्राण दांव पर नहीं लगाएंगे। जहाँ तक सेना का सवाल है, यह एक कठोर सत्य है कि सेना में जाने के विषय में हर कोई नहीं सोचता और जो सोचता है उसके समर्पण पर शंका नहीं की जानी चाहिए। इन पचास हज़ार अग्निवीरों के लिए भी प्रतियोगिता निश्चित है। अयोग्य तो वैसे भी नहीं आएंगे, और जो आएंगे उनके समर्पण और निष्ठा पर प्रश्न उठाना कहाँ तक सही है? 

एक वर्ग वह है जो सेना में जाना ही चाहता है। वही उसके जीवन का लक्ष्य है। अगर ऐसे सभी युवा अग्निवीर बनते हैं, तो उनमें से अधिकतर को बाहर निकलने का भय रहेगा। युवाओं के विरोध का एक कारण बस यही हो सकता है।  उनको ये भी तो सोचना चाहिए, अग्निवीर योजना से उनके सेना में नियमित होने की सम्भावना अधिक होगी और न भी हुए तो चार साल का अनुभव उन्हें वैसे भी बहुत काम आएगा और फिर भी शंका है तो उन्हें सामान्य भर्तियों की प्रतीक्षा करनी चाहिए। सामान्य भर्तियां बंद करने की कोई घोषणा नहीं हुई, बल्कि एक नई, वैकल्पिक व्यवस्था की नींव डाली गई है।  

पच्चीस प्रतिशत तो सेना में ले लिए जायेंगे। संभवतः चुने गए लोगों के लिए अतिरिक्त ट्रेनिंग दी जाने की योजना हो, और सेना के स्तर के हिसाब से दी भी जानी चाहिए, क्योंकि प्रारम्भिक छह महीने की ट्रेनिंग में कोई  परिपक्व सैनिक नहीं बन जाता। अगर यह स्पष्टीकरण आता है तो भूतपूर्व सैनिकों की अग्निवीर सैनिको के समर्पण को लेकर व्यक्त की जाने वाली शंका का समाधान हो जाएगा।

लोगों की शंका है कि चार वर्ष बाद ये बचे हुए लोग क्या करेंगे? क्या वो सभी हाई स्कूल पास रह जायेंगे? आगे जीवन-यापन कैसे करेंगे? अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि सरकार की इन चार वर्षों में इन सभी लोगों को उच्च शिक्षा दिलवाने का कोई विचार है या नहीं। अगर प्रशिक्षण के साथ इनको पढ़ने का भी अवसर मिले तो बेहतर होगा। सेना के अनुशासन में रहते हुए शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा कितने बेहतरीन नागरिक होंगे, यह कल्पना पता नहीं किसी ने की है या नहीं। यहाँ सरकार को शायद बेहतर प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता थी। 

शिक्षा का यह पक्ष सरकार स्पष्ट कर दे तो बहुत सी शंकाओं का समाधान हो जाएगा, क्योकि उसके बाद ये युवा जिन भी क्षेत्रों में जायेंगे, वहां बेहतर ही साबित होंगे। वे एक ऐसे वर्ग का निर्माण करेंगे जो राष्ट्रभक्त, अनुशासित, मानसिक और शारीरिक रूप से दृढ़ होगा। साथ ही कुछ वर्षों में आपातकालीन स्थितियों के लिए उपलब्ध निष्क्रिय सैन्य बल देश के पास होगा, जिसे आवश्यकता पड़ने पर सक्रिय किया जा सकेगा। एक संभावना यह भी है कि कुछ क्षेत्रों जैसे पुलिस, प्रशासन, शिक्षा, अग्निशमन, आपदा प्रबंधन में उन्हें वरीयता मिले। असम और उत्तर प्रदेश ने ऐसे संकेत दिए हैं। किन्तु ऐसा रोडमैप केंद्र सरकार को ही बनाना होगा।  

एक शंका कुछ वोक-वामपंथी गिरोह ने भी व्यक्ति की है कि सरकार प्रशिक्षित राष्ट्रवादियों का दल  बनाने का प्रयास कर रही है। जो सत्य ही है, देश को राष्ट्रवादियों की आवश्यकता भी है। उनकी दूसरी शंका यह है कि प्रशिक्षित युवाओं को चरमपंथी बहका सकते हैं और ऐसे युवा कट्टरपंथी बन सकते हैं। सेना के प्रशिक्षण के पश्चात अगर कोई कट्टरता किसी व्यक्ति में आ सकती है तो वह राष्ट्र के प्रति ही आ सकती है। अगर ऐसा कोई व्यक्ति राष्ट्र या समाज विरोधी कट्टरपंथ से फिर भी प्रभावित होता है तो वह सेना के योग्य कभी था ही नहीं। 

शंका तो यह भी है कि समय के साथ अगर इस योजना में आरक्षण लाया गया तो भविष्य में सेना में निश्चित रूप से फूट पड़ जाएगी। अतः चयन योग्यता के आधार पर ही किया जाए, और जैसे सेना में कोई आरक्षण नहीं है वैसे ही इस योजना को इससे दूर रखा जाए। सेना को जाति-धर्म की राजनीति से दूर रखना ही उचित है।   

इस योजना का जो सामजिक पक्ष है, वह यही है कि वर्तमान युवा वोक संस्कृति का शिकार हो रहा है। राष्ट्रप्रेम पर तरह तरह की पट्टियां बाँधी जा चुकी हैं।  कानून की सीमाओं में रहना अलग बात है, किन्तु समाज में होती घटनाओं को देखकर आँख पर पट्टी बाँध लेना अलग बात है। जिस प्रकार की परिस्थितयां हमारे सामने हैं, उसमें अधिकतर लोग केवल सरकार से क़ानून का पालन करवाने की अपेक्षा करते हैं, स्वयं कुछ नहीं करते।  

जब ढाई मोर्चे के युद्ध की बात होती है तब ऐसे दृढ़ निश्चयी राष्ट्रभक्तों की बहुत आवश्यकता है, जो समाज के अंदर से आधा मोर्चा संभाल सकें, ताकि सेना बाकी दो मोर्चे ठीक से संभाल सके। केवल सीमाओं पर खड़ी सेना के बल पर न तो युद्ध लडे जाने हैं न जीते जाने हैं।  समाज के बीच में ऐसे लोगों का रहना बहुत आवश्यक है जो स्वयं प्रतिबद्ध, अनुशासित नागरिक बनकर उदाहरण बन सकें। 

सीधे शब्दों में कहें तो भारत के अंदर और बाहर पर्याप्त शत्रु हैं जो भारत को कभी भी सिविल वार की और धकेलने का प्रयास कर सकते हैं। वहां केवल सेना काम नहीं आएगी। आज नहीं तो कुछ वर्षों के पश्चात संघर्ष निश्चित है।  ऐसे संकेत समाज के एक वर्ग से स्पष्ट हो रहे हैं। समय समय पर उनका शक्तिपरिक्षण होता रहता है। छतों पर रखी फिलिस्तीन की तरह बड़ी बड़ी गुलेलें, बच्चों के पीछे से पुलिस पर पथराव और बात बात पर गुंडागर्दी पर उतर आने वाले उस हिंसक वर्ग के सामने सबल नागरिकों की आवश्यकता है। मध्यम वर्ग का व्यापारी या नौकरीपेशा व्यक्ति सभी प्रकार की हिंसा से बचना चाहता है, जो सही भी है। किन्तु भविष्य में सब ठीक रहेगा यह कैसे कहा जा सकता है। कोई नहीं चाहेगा की उसका बच्चा सड़क पर निकले, पर दूसरी तरफ सिर्फ इसी की तैयारी हो रही है।  इन अग्निवीरों के समाज के बीच रहने से समाज में आत्मबल बढ़ेगा।  

यह अपेक्षा इन अग्निवीरों से नहीं होगी कि बिना किसी आपात परिस्थिति के इन्हें सीमाओं पर जाना पड़े। जहाँ तक अनुमान है इन्हे आरम्भ में आपदा प्रबंधन में ही काम करना होगा। इनसे पहले चार वर्षों में युद्ध की अपेक्षा नहीं होगी किन्तु इनका होना अपने आप में एक बड़ी शक्ति होगी। 

बाकी सरकार ने यह एक विकल्प दिया है, न किसी पर थोपा है, न अन्य व्यवस्थाएं बंद की हैं, तो चाहें तो विवेक से काम भी ले सकते हैं और चाहें तो टायर वगैरह जलाने की परंपरा का निर्वाह कर सकते हैं।  

शनिवार, 8 जनवरी 2022

को का कर रओ!!

 को का कर रओ!!

अगर किसी मंगल-चंद्र के योग ने आपको सांसद बना दिया है तो समझ लीजिये आप स्वयंसिद्ध हैं, आपके श्राप से कुछ भी भस्म हो सकता है भस्म न होगा तो जड़ हो ही जाएगा। आप सांसद हैं तो दुनिया भर में खर्चा कीजिये बस संसद में चर्चा मत कीजिये, कागज़ फड़िये, किताबें, कुर्सियां फेकिये अध्यक्ष के सर पर चढ़ जाइये। उसपर अगर निलंबित कर दिए जाएँ तो धरना भी दीजिये। किसी कारण या काण्ड से अगर राज्य की सत्ता आपके हाथ आ गई है तो समझिये कि आप लगभग भगवान ही हो गए हैं। आप चाहें तो अपने विरोधियों को वोट देने वालों को राज्य से खदेड़ दीजिये। अपने विरोधी पक्ष ने नेताओं की हत्या कर के पेड़ पर लटकाते रहिये। जिसे चाहे जब चाहे उठवा लीजिये, जिसे चाहे जहाँ चाहे बिठा दीजिये। जिसे चाहे दबा दीजिये जिसे चाहिए उठा दीजिये। जिसे चाहे जमीन चट-पट कर के आवंटित कर दीजिये या खटपट कर के हथिया लीजिये। गली गली ठेके खुलवा दीजिये, और ठेकों के कमीशन से नशामुक्ति अभियान के विज्ञापन दीजिये। पन्द्रह-बीस लाख इधर उधर हो जाना तो इधर उधर हो जाना होता ही नहीं है। कलाबाजी, टोलाबाजी, कमीशन, हफ्ता, रंगदारी सब आय के साधन हैं, इनका भरपूर प्रयोग कीजिए।  

स्वयं भले ही रीढ़विहीन हों लेकिन जिह्वा की अकड़ कम नहीं होनी चाहिए। चाहें तो राज्यपाल को जूते की नोक पर रख लीजिये और अगर आप राज्यपाल हैं तो प्रधानमंत्री को गरिया लीजिये, और अंदर से इटालियन हैं तो देश को ही गरियाते हुए विदेश जाकर देशहित का चिंतन कीजिये, को का कर रओ। कहीं गाजे का प्रयोग कीजिये, कहीं वाज़े का। इमरान आपका भाई हो और  कनेडा से पैसा आता हो तो देश के प्रधानमंत्री का रास्ता भी रोक सकते हैं। राज्य आपका है पुलिस आपकी जब आप स्वयं सरकार हैं तो वैसे भी कोऊ का कर ले है। 

हो सकता है आप स्वयं सरकार न हों, सरकारी कर्मचारी हों। परन्तु अवसर तो बराबर ही है। आप सरकारी दफ्तर में ड्राइवर हो जाइए और कलेक्टर की गाडी चलाइये। अगर विवाहित हैं तो आप कलेक्टर की लाल बत्ती वाली गाडी लेकर अपनी साली के विवाह में जाइये या साले के ससुराल जाकर स्वयं को कलेक्टर बता आइये। चाहें तो गाडी में पत्नी समेत निकलिए और गाडी को मंडी में घुसा दीजिये। गाडी आपके हाथ में है, कलेक्टर साहब कर क्या लेंगे और गाडी  कलेक्टर साहब की है तो जनता और पुलिस क्या कर लेगी। सरकारी बाबू हैं तो दो-चार रजिस्टर-स्टेशनरी वगैरह घर ले जाने में क्या बुराई है। सरकारी स्कूल के शिक्षक या बाबू आदि के लिए तो सरकारों को विशेष रूप से अतिरिक्त ड्रेस, स्टेशनरी और किताबें भेजनी चाहिए। दो के बिल में एक मिलने वाले समोसे और बिस्कुट, सरकारी कार्यालयों में आते ही हैं। मीटिंग वगैरह में चार की आवश्यकता हो तो छह मंगवाकर दो समोसे सर्विस चार्ज की तरह चपरासी ले सकते हैं। बाल विकास जैसा कोई दुधारू दफ्तर हो और आप कायदे के आदमी हैं तो अपने विकास के अनेक रास्ते ढूंढ सकते हैं। जब आप सरकारी आदमी हैं तो निश्चित ही आप यह सब करने के बाद कह सकते हैं - को का कर रओ।  

ऐसा ही प्राइवेट संस्थान में नौकरी करने वाले भी कर सकते हैं। ब्रेक एरिया में मिलने वाली मुफ्त कॉफ़ी हो या बिस्किट दिनभर आप जी भर के खाइये। शाम को कॉफ़ी को थरमस में भरकर घर ले जाइये और पत्नी के साथ बालकनी में बैठकर कॉफ़ी का आनंद उठाइये। अगर आपकी कम्पनी आपको अपने किसी आवश्यक निजी काम के लिए एक-आध घंटे के लिए जाने के लिए बाहर जाने की अनुमति देती है तो आप आराम से किसी मॉल का चक्कर लगा सकते हैं। शुक्रवार को फिल्म देख सकते हैं। टीम बॉन्डिंग के नाम पर मिलने वाली राशि पर साप्ताहिक लंच का कार्यक्रम रख सकते हैं। जिसमे अगर आप मैनेजर हैं तो रेस्टोरेंट वालों से कुछ सेटिंग वगैरह करके बिल में दस-बीस प्रतिशत की कमाई कर सकते हैं। अगर आपके बच्चे हैं तो उनके होमवर्क और असाइनमेंट के प्रिन्टऑउट दफ्तर से निकालना आपका वह अधिकार है जिसे आपने सातवां फेरा लेते हुए पंडितजी से प्राप्त किया था। कोई चिट्ठी कोरियर वगैरह करने के लिए लिफाफा कार्यालय में मुफ़्त मिलता ही है। अगर आप थोड़े जुगाडू हैं और मैनेजर के साथ कुछ कार्यक्रम वगैरह सेट कर सकते हैं तो आपके लिए आत्म-विकास परियोजनाएँ आदि बना सकते हैं, वर्ष में एकाध ऑनसाइट का चक्कर लगाने में आपको कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। अगर कोई संशय मन में उत्पन्न हो मन ही मन दोहराइए - को का कर रओ।