रविवार, 22 अप्रैल 2018

आदमी कूड़ादान है

बचपन मे जब रबीस छोटा था तो बहुत छोटा था | लेकिन बहुत ज़िद करता था |  तब उसकी अम्मा उससे कहती तुझको तो कचरे के डब्बे मे से उठा के लाए थे और रबीस और ज़्यादा रोने लगता  | पूछता क्या सच मे कचरे के डब्बे से उठा के लाया गया था मुझे ? और उसकी अम्मा उसे और ज़्यादा चिढ़ाती - तेरे काम ही ऐसे हैं |

जब वो कॉलेज मे पहुँचा लोगों ने उसका नाम ही रब्बिश रख दिया | रबीस से रब्बिश होने मे उसका कोई दोष नही था | वह  कैसी भी बात करे उसका तर्क किसी को समझ नही आता था | वह दो दूनी चार कहता लेकिन जब उसके मित्र की प्रेमिका दो दूनी पाँच लिख के नोट्स सारी कक्षा मे बाँट चुकी होती तो कोई उसकी बात पर विश्वास नही करता | धीरे धीरे वह रबीस से रब्बिश हो गया | 

हिन्दी मीडियम स्कूल से पढ़े हुए होने के कारण कॉलेज की लड़कियों से उसे कूड़े की नज़र से ही देखा |

इंजिनियरिंग की पढ़ाई मे हिन्दी मीडियम का होने के बाद भी अँग्रेज़ी मे उत्तर लिखता और ग्रामर की ग़लतियों के कारण शिक्षक भी उसकी उत्तर पुस्तिका को कूड़ा ही समझते |

ईश्वर की कृपा और बड़े बूढ़ों के आशीर्वाद और कैंपस प्लेसमेंट की जुगाड़ से जब उसकी नौकरी लगी तो उसने सीनियर और मॅनेजर ने भी उसे कचरा ही समझा |  वो जो कर सकता था, उसे वो कभी करने नही दिया गया,  जो वो करना चाहता था उसका उस नौकरी मे स्कोप नही था, और जो वो करना जानता ही नही था वह उसे सिखाया गया और जो वो करना नही चाहता था, उसे वही करने के लिए कहा जाता था | उसके खुद के अस्तित्व का कोई महत्त्व नही था और जो महत्त्व का था उसका कोई अस्तित्व नही था | कुल मिला कर मॅनेज्मेंट के लिए वह कचरा था |

जो वो करता था वह भी कचरा होता, अक्सर उसके मेल भी मॅनेज्मेंट के मेलबॉक्स के ट्रैश मे भी जगह नही बना पाते थे |

रबीस के दिमाग़ मे अब तक खुद के कूड़ेदान होने की बात सेट हो चुकी थी और अपने जीवन की हर परिस्थिति को कचरे के समान समझने मे अब उसे कठिनाई नही होती थी |

एक बार जब उसकी शादी हुई तो वह पत्नी के लिए कचरादान हो गया | पत्नी कचरे कूड़े जैसा खाना बनाती और उस बेचारे को खिलाती और वह अपने पेट मे कचरा भरता जाता  | वह धीरे रबीस से रासभ हो गया | उसका दिमाग़ छोटा और पेट मोटा होता गया और स्वयं कूड़ेदान जैसा हो गया | उसकी साल मे एक बार पूजा होती और साल भर वा बोझ ढोता रहता | उसकी जिंदगी कचरा हो गयी थी |

जब तब उसके बच्चे छोटे थे तब तक वा घोड़ा अपनी इच्छा से बनता था | लेकिन बच्चों के बड़े होने पर वह कचरा होता गया | बच्चों ने उसकी नसीहतों को कचरे के डब्बे मे डालना शुरू कर दिया |

रबीस की जिंदगी कचरे के डब्बे से उसके प्राप्त होने से शुरू हुआ और आज जब कुछ फेम-निष्ठ हस्तियाँ हर पुरुष को कचरा कहने से परहेज़ नही करती हैं, तब रबीस सोचता है , कि वह सच मे कचरा ही रहा होगा |
फेमनिष्ठ  हस्तियाँ दरअसल वे हस्तियाँ हैं जो फेम के लिए अत्यंत निष्ठा रखती हैं और फेम के लिए कुछ भी करने कहने से परहेज़ नही करती | किसी को कूड़ादान संबोधित कर फेम प्राप्त करने पर ऐसे फेमनिष्‍ठ को बधाई और रबीस समेत समस्त कूड़ेदानों को संदेश |

है नीली कभी हरी कूड़ेदान सी जिंदगी |
डालने से पहने छाँटिए घर की गंदगी |

कुछ के मन में खोट है, कुछ के मन शैतान | कितने कचरे से पटा हुआ आदमी कूड़ेदान | |






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