नहीं सरकार उस ठेके पर नहीं है जिसकी कल्पना आपके मन में हिलोर लेकर बैठ गई है ।
लोकतंत्र एक विचित्र स्थिति में पहुंच चुका है वर्षों से सरकार बनती कम गिरती ज्यादा है , सरकार कब बनती है कब गिरती है पता ही नहीं चलता । सरकार कभी भी किसी भी कारण से गिर सकती है ।
कभी प्याज - कभी पेट्रोल , कभी इसबगोल किसी भी वस्तु की कीमत घटने बढ़ने पर सरकार गिर जाती है, एक बार तो सरकार इसलिए गिर गई कि बहुत दिन से चल रही थी। चल तो ठीक रही थी लेकिन लोगों को लगा बहुत दिन हुए चल रही है चलो गिरा दें।
इस तरह गिरती पड़ती सरकारों से लोग परेशान हो गए क्योंकि गिरती हुई सरकारों मे जो भी सत्ता मे आता कोई न कोई गिरा हुआ काम करके ही जाता।
ऐसे में देश के युवा नेता छगनलाल जी के मन मे एक विचित्र भाव उत्पन्न हुआ वे क्रोधित भी थे और अवसाद ग्रस्त भी। वे सदैव से नोटा सरकार चाहते थे, लेकिन उनके व्यापक प्रचार के बाद भी कभी नोटा की सरकार नही बन पाई, हालाँकि चुनावों मे विचित्र परिणाम आते रहे।
एक बार चुनाव का समय था, उनके एक अनुयायी ने प्रश्न किया -
हे परम पूज्य छगनलाल जी , मैं अब किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ, हम नोटा का बटन दबाते ही क्यों हैं, जब नोटा से राष्ट्र की राजनीति मे अस्थिरता आती है?
क्यों न किसी अन्य का पक्ष लेकर कम से कम अपने मत की वैद्यता तो बना कर रखें।
परिणाम एक ओर झुके हुए तो दिखेंगे, और जिसे मत दिया है उसे जिम्मेदार मानते हुए उसे धिक्कार कर अन्य को चुने जाने का अवसर तो देंगे। अगर कोई विकल्प नही ठीक लगता तो स्वयं ही विकल्प बन कर उपस्थित क्यों नही हो जाते ?
तब शांत भाव से महापुरुष ने कहा -
मैं तुम्हें एक जंतर देता हूँ । जब भी तुम्हें संदेह हो या कोई नेता सत्ता पर कायम दिखने होने लगे और तुम्हारी शर्तों पर काम न करे, तो यह कसौटी आजमाओ :
जो सबसे घाघ नेता तुमने प्रत्याशियों की सूची मे देखा हो, उसकी शकल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो सरकार बनाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस नेता के लिए कितना उपयोगी होगा । क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ?
क्या उससे वह अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा और लालच पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्या उससे उन सत्ता के भूखों को राज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ?
तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त हो रहा है । और तुम फिर नोटा ही दबाओगे।
किंतु इसमे उस नेता के प्रति तो कोई विचार है ही नही जो शायद बहुत नही तो कुछ काम तो कर सकने की क्षमता रखता हो? अनुयायी ने प्रश्न किया।
मेरे जंतर पर भी प्रश्न उठाते हो, तुम अवश्य ही उस नेता के ही चमचे , गट्टे और अंध-भक्त हो। अगर वह सौ प्रतिशत तुम्हारी शर्तों को न माने तब वह चुने जाने लायक नही है।
नेता को दुग्धस्नान कर युधिष्ठिर की तरह सत्यवादी और धर्म पर चलने वाला होना चाहिए, उसने अगर कुछ करने को कहा है तो तत्क्षण करना चाहिए, उसके वचन पूर्ण होने में विलम्ब होना भी तुम्हारे साथ अन्याय है मूर्ख।
अतः एक ही विकल्प नोटा के सिद्धांत पर कार्य करो। स्वयं मठाधीश न बनो।
अनुयायी ने कहा -किंतु इससे क्या लाभ होगा? केवल चुनाव के परिणाम गणना होने तक रहस्यमय बने रहेंगे। उसके पश्चात किसी एक अनिश्चित , किंचित अयोग्य प्रत्याशी को विजय तो मिलनी तय ही है।
छगनलाल उवाच - वही तो हम चाहते हैं, किसी को अंत तक पता न रहे कि कौन विजयी होगा, अतः जो निश्चित विजय देखते हैं उनके मन में संदेह बना रहे। भ्रान्तिः परमो धर्मः के सिद्धांत पर चलो और भ्रान्ति का प्रचार करो।
कई वर्षों के पश्चात गिरती पड़ती सरकारों के बीच राष्ट्र का विभाजन हुआ और जिसको जो हिस्सा मिला या समझ मे आया उसने अपने आपको वहाँ का मालिक, सम्राट और नवाब घोषित कर दिया। केवल याचक जी की याचिका अभी तक लंबित है, जिसके अनुसार उन्होने अपना अलग याचिकापुर माँगा है।
जब सब अपना अपना हिस्सा जाति, धर्म, भाषा, भूसा, चारा आदि किसी भी हिसाब से बाँट रहे थे तब छगनलाल जी ने अथक प्रयासों से इस राष्ट्र का निर्माण करवाया नोटा के महान सिद्धांत पर और वे उसके राष्ट्रपिता कहलाए।
उत्तर मे मुफ़्तिस्तान, पूर्व मे यादविस्तान, दक्षिण मे मूलीस्तान, और पश्चिम मे जीजापुर नामक राज्यों के बीच मे बसा हुआ यह नोटालैंड है ।
फिलहाल अभी वर्ष २०५९ चल रहा है । लोकतंत्र तंत्रलोक गया है । इस देश के सभी निवासी केवल नोटा पर वोट देते हैं। कोई नेता इन्हें कभी भरोसे लायक लगा ही नहीं , सो हर बार ये केवल मिल जुलकर नोटा दबा देते। इसीके चलते इनके देश में सरकार लोकतंत्र से नहीं नोटतंत्र से चलती है । यहाँ सरकार चुनी नहीं जाती ठेका दिया जाता है।
यहाँ के निवासी चुनाव नहीं करवाते बल्कि विज्ञापन के जरिये एक निश्चित प्रारूप में निविदाएं आमंत्रित करते हैं । प्रारूप अमूमन एक सा ही होता है, और जो उस प्रारूप में ठीक बैठता है और नियमों के अनुसार सरकार चला सकता है उसे निश्चित अवधि के लिए ठेका दे दिया जाता है ।
चाहे वह सनीचर हो या निशाचर ठेका कोई भी ले सकता है । इस बार उत्सुक लाल निविदा के नियम तय कर रहे थे ।
सोच रहे थे कि क्या लिखें जिससे कोई सरकार चलाने वाला भी मिल जाए और उनकी जेब भी बनी रहे । पड़ोस के देश मुफ्तिस्तान में लोग सब कुछ मुफ़्त होने का लुत्फ़ उठा रहे थे , वहाँ के मालिक ने सबको सबकुछ मुफ़्त देते थे । हालाँकि मुफ्तिस्तान में कोई भी अपना नागरिक नहीं था , केवल इधर उधर के मुफ़्त के चक्कर में पड़े रहते थे ।
उत्सुक लाल के विचार में ठेका इस बार कुछ कुछ मुफ्तिस्तान जैसे मालिक को ही मिलना चाहिए । फादर ऑफ नोटालैंड छगनलाल जी के दिखाए गये रास्ते और तय किए गये मानदंडों के अनुसार शर्तें तो लिखनी ही थी औ लिखनी शुरू की -
नोटालैंड के निवासी अगले एक साल के लिए सरकार चलाने हेतु निश्चित प्रारूप में इस विज्ञापन के प्रकाशित होने के सात दिन के अंदर आवेदन आमंत्रित करते हैं । इच्छुक व्यक्ति या पार्टियाँ या कम्पनियाँ दिए गए प्रारूप में आवेदन करें । सभी शर्तों का मानना आवश्यक है ।
सरकार आप अपनी मर्जी से कैसे भी चला सकते हैं इसमें नोटालैंड के वासियों को कोई आपत्ति नहीं है । केवल निम्नलिखित शर्तों का पालन आवश्यक है -
पेट्रोल शासन अवधि में किसी भी कीमत पर बीस रूपये से अधिक महंगा नहीं बेचा जा सकेगा । रुपया की कीमत 50डॉलर पर स्थिर रखनी होगी । इससे अधिक कीमत बढ़ाने पर अमेरिका को भारी नुकसान हो सकता है।
प्याज और आनाज़ की कीमत किसान को 15रुपये प्रति किलो दी जायेगी और जनता को वही 12 रूपये के भाव से सरकार बेचेगी ।
सरकार को यह बताना होगा कि अगले दो वर्षों में वह किन किन परियोजनाओं पर कार्य करेगी और कितना पूरा कर सकेगी । पूरा न कर सकने की स्थिति में , कितना जुर्माना सरकार पर लगाया जाएगा ।
देश में किसी पर किसी प्रकार का कर नहीं लगाया जाएगा । कर लगाना दंडनीय अपराध होगा। उल्टा सरकार को नागरिक की कमाई पर बीस प्रतिशत बोनस भुगतान नागरिकों को देना होगा ताकि नागरिकों का जीवन सुखमय हो सके। आखिर दाल रोटी ही जीवन में सब कुछ नहीं है।
वैसे तो सरकार सभी उद्योगपतियों को जेल में ठूंस लेगी। लेकिन अगर कोई बच गया तो उद्योगपतियों को लाभ कमाने का अवसर नहीं दिया जाएगा । उद्योगपति जेब से पैसा लगा सकते हैं किन्तु लाभ की इच्छा न करें ।
सरकार को पहले से बताना होगा देश मे कितनी बाढ़, सूखा या बरसात आएगी. और उसका खर्चा अपनी जेब से देना होगा। इन सभी शर्तों को मान सकने वाला जो भी पक्ष इच्छुक हो वह आवेदन करे।
इन शर्तो को लिखने ने पश्चात उत्सुक लाल ने मन ही मन छगनलाल जी को प्रणाम किया और विज्ञापन छपने के लिए अखबार में भेज दिया और इस प्रकार नोटालैंड मे सरकार चलाने का ठेका देने के लिए प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।