गुरुवार, 26 जनवरी 2023

गणतंत्र दिवस की झाँकियाँ

सबसे आगे पश्चिम बंगाल की झांकी - महिला सशक्तिकरण का प्रतिनिधित्त्व करती हुई, झांकी में सबसे आगे एक महिला सफ़ेद साडी पहले हुए माइक पर चीख रही है खा खा खी खी, का का छी छी।

साथ ही हाथ में हथियार लिए हुए भीड़। बदलते हुए समाज का परिचय देते हुए।

उसके पीछे चेक वाली लुंगी पहने हुए लोग तोड़ फोड़ करते हुए। आग लगाते हुए। पटरियां उखाड़ते हुए। साथ में जलता हुआ एक स्टेशन, और जलती हुई रेल।

मेहनतकश लोग, जी तोड़ मेहनत करते हुए। जी के साथ सब कुछ तोड़ते हुए। अद्भुत सौंदर्य।

बंधे हुए लोहे के तार, उसके ऊपर से कूदते और भीड़ का हिस्सा बनते हुए 1:4:16 के अनुपात वाले सुखी परिवार।अतिथि देवो भवः की भावना से ओत प्रोत दृश्य।

सेक्युलर बांगला पॉपुलर बांगला की अद्भुत भावना का परिचय उजड़े हुए पंडाल,जिसमें कोई मूर्ती इसलिए नहीं रखी गई कि किसी की भावनाएँ आहत न हो।

साथ ही बंगाल में गृह उद्योग के रूप में बनते हुए कट्टे और बम का दृश्य। राज्य ने मालदा में डालडा के उत्पादन में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। यह दृश्य राज्य के धमाकेदार भविष्य को दर्शाते हुए। 

पीछे से फिर से खा खा खी खी चीखते हुए लोग। और साथ ही पेड़ों से लटके हुए धड़ ।

झांकी राजपथ पर आगे बढ़ती हुई। दर्शक गण जय श्री राम का उदघोष करते हुए।

अगली झांकी महाराष्ट्र की। झांकी में माइक पर खड़ा हुआ एक शायर। शायर के पीछे दो टायर। टायर के ऊपर कुर्सी और कुर्सी पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ मुख्यमंत्री तो केवल शिवसेना का होगा।

उसके पीछे एक बड़ी सी कड़ाही, कड़ाही में सरकार, और करछुल हिलाते हुए तीन पार्टियाँ। म्यूजिकल चेयर खेलते हुए MLA.

भरने के लिए सूखा तालाब ढूंढता हुआ एक नेता।

पीछे सर पकड़ कर बैठी हुई जनता। झांकी राजपथ से आगे बढ़ती हुई।

दर्शक दीर्घा में बैठे हुए फडणवीस और अमितशाह सब रिकॉर्ड करते हुए।

अगली झांकी राजधानी दिल्ली की। स्कूल, स्कूल से लगे ठेके, ठेके पर कतार। सड़क, सड़क पर जाम। पंडाल, पंडाल में बुजुर्ग महिलाएं। धरना, धरने में लंगर, लंगर में पिज़्ज़ा। धरना पर्यटन की खूबसूरत तस्वीर। लालकिले पर चढ़ाई करते लोग। जेल, जेल में मसाज कराते मंत्री। सेवा सर्वोपरी का सन्देश।

सबसे आगे दिल्ली के मालिक।मालिक सत्ता की गर्मी में,कुकर से चार सीटी लगने के बाद निकले आलू जैसा गर्म। मालिक के पास आसुरी अट्टहास करती नेत्री।एक दूसरे को पीटते पार्षद।यह नई दिल्ली की उभरती हुई सांस्कृतिक विरासत है।जानता है मैं कौन हूँ से मैं दिल्ली के मालिक का गुर्गा हूँ, तक का सफर।

लाचार दिखती पुलिस। सुहाना दृश्य। सशक्त लोकतंत्र की सशक्त होती जनता का प्रतीक। सबसे पीछे सीबीआई, सीबीआई के हाथ में झुनझुना। झुनझुने की झंकार पर नाचते स्मार्टमैन और साथी।   विपक्ष झांकी से भी नदारद।

अगली झांकी बिहार से।एक कुर्सी, कुर्सी के आस पास दौड़ते लोग। लोग बदल रहे हैं।कभी भगवा कभी नीले। लेकिन कुर्सी पर बैठा व्यक्ति स्थिर, हरा।हरियाली और बाढ़ का अद्भुत संगम। गाना बजता हुआ आइये न हमरे बिहार में, ठोक देंगे कट्टा कपार में। तीर,तीर पर लटकी लालटेन।

तीर और लालटेन के बीच में घुसने की कोशिश करता हाथ, जो कभी लालटेन की लौ से जलता कभी तीर की नोक से घायल होता।  लोग दिल्ली की झांकी में धक्कामुक्की करते हुए कूद कूदकर घुसते हुए। बनाया क्या है, कुछ समझ नहीं आ रहा। कुछ है, लेकिन हमको पता नहीं है क्या है। जो भी है सो है, बिहार का सत्य।

इस बार की झांकियों में एक नई झांकी। ऐतिहासिक लोकतंत्र की झांकी। संसद भवन, संसद भवन में घुसा हुआ मीडिया का माइक, जो संसद से ऊपर निकल गया है। जो पत्रकारों की पहुँच और "सूत्रों" का प्रतिनिधित्व करता है। उसके ऊपर मीलार्ड के बाल। जो न्यायालय की सर्वोच्च सत्ता और सम्मान का प्रतीक है।


सबसे नीचे इन सबके बोझ से दबी हुई जनता। मिडिल क्लास जनता झुकी कमर से दर्शकदीर्घा में मिडल क्लास वित्तमंत्री के आगे से हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए। वित्तमंत्री वहीं से बोझ उठाने वाले करदाताओं का धन्यवाद करती हुईं।  

झांकी अपनी ठसक दिखाते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर।

रविवार, 22 जनवरी 2023

जब मैंने ये नहीं सोचा कि तीर मारने के बाद मुझे क्या मिलेगा तो मैं ये क्यों सोचता कि तीर मारना कहाँ है।

युवराज ने धनुष उठाया, और तेल की कड़ाही के पास जाकर खड़ा हो गया। उसने कड़ाही हो देखा, कड़ाही में भरे तेल को देखा, सभा में भरे लोगों को देखा, दो तीन को तो मन ही मन गले भी लगाया। ऊपर लटकती मछली को देखा और उसे अपना चुनाव चिन्ह दिखाते हुए कहा डरो मत। 

उसनें धनुष के ऊपर तीर को चढ़ाया, और निशाना लगाया। 

उसने नहीं सोचा कि उसे तीर मारने के बाद क्या मिलेगा, उसने तेल में देखा, उसे छत दिखी, छत पर लगा झूमर दिखा, छत पर बनी कलाकृति दिखी, छत पर लटकती मछली और अपनी ही परछाई दिखाई दी, फिर उसने तीर तेल में दिख रही अपनी ही आंख पर चला दिया। 

फिर सभा में खड़ा होकर कहने लगा – "मार दिया मैंने उसको, गया वो। अब तो वो है ही नहीं। जो आपको दिख रहा है वो युवराज है ही नहीं। समझो आप।"

एक राजा बोला – "तीर तो मछली की आंख पर मारना था?"

"जब मैंने ये नहीं सोचा कि तीर मारने के बाद मुझे क्या मिलेगा तो मैं ये क्यों सोचता कि तीर मारना कहां है। मुझे लगा मुझे मारना चाहिए तो मैने मार दिया।"

"लेकिन इधर उधर क्यों चलाया? लक्ष्य मछली की आंख थी, कड़ाही में देखकर ऊपर निशाना लगाना था। ऐसे थोड़ी कहीं भी निशाना लगा दो?"

"देखो सबसे पहले खुद को उधर मछली की जगह रखकर देखो। वहाँ से जो दिखता है वो अलग दिखता है। वहाँ से आपका दृष्टिकोण बदल जाता है। कड़ाही अलग दिखती है। लोग अलग दिखते हैं। धनुष-बाण अलग दिखता है।"

"लेकिन मछली को तीर थोड़ी चलाना था, आपको चलाना था।"

"आप जब धनुष उठाते हैं तो ऐसा नहीं लगना चाहिए कि तीर आपको चला रहा है, ऐसा लगना चाहिए आप तीर को चला रहे हैं। आप कड़ाही में देखते हैं तो आपको उतना ही दिखता है, जितना कड़ाही में होता है, लेकिन जो कड़ाही में है उतना ही तो नहीं होता, उससे ज्यादा भी तो बहुत कुछ होता है। उसके बाहर देखने के लिए आपको कड़ाही से बाहर सोचना पड़ता है। फिर आप धनुष पर रखकर तीर छोड़ते हैं तो तीर उड़ता है। उस उड़ते तीर को ग्रहण करने के लिए आपको तीर के आगे उड़ना पड़ता है। आप अपने आपको तीर से आगे रखकर सोचिए। तब समझ आएगा।"

सभा के सब लोग सन्न थे, बस कुछ पत्रकार धन्य धन्य कर रहे थे।

फिर भी एक राजा ने कह दिया– "कहना क्या चाहते हो?"

"समझ नहीं आया न? जब शिव को पढ़ोगे तो समझ आएगा।"

"कौन शिव?"

"शिव खेड़ा, यू कैन विन।"

"उन्होंने ये सब लिखा है?"

"नहीं,उन्होंने लिखा है कि फालतू बातों में समय खराब मत करो।"

"मुझे शंका हो रही है।  तुम हो कौन?"

"यह तपस्वियों का देश है और मैं तपस्वी हूँ।"

"तो तपस्वी महाराज, इस स्वयंवर में क्यों आए हैं?"

"देखिए यहाँ सभी धर्मों के लोग आए हैं। मैं इन सबको जोड़ने आया हूँ और मैं इन सब को जोड़ के रहूँगा।"

"यह तो बड़ी जोड़दाड़ बात कही आपने।" मगधराज ने कहा।  

"क्या जोड़दाड़ है इसमें?" एक पत्रकार बोला। 

"हमको पता नहीं है।"  मगधराज ने कहा।

"कुछ पता है भी? उधर आपके राज्य में जनता कितनी परेशान है?"

"हमको अभी पता नहीं है। हम पूछते हैं।"  

"जंगल राज आया हुआ है पूरे मगध में और आप यहाँ मछली की आँख मारने चले आए हैं ?"

"जंगलराज का हमको अभी पता नहीं है। हमारे राज्य में शिक्षा व्यवस्था बड़ी ख़राब हो रही है।"  

एक पत्रकार बोला - "इनको कुच्छौ पता नहीं है। बड़े राजा बनते हैं।"

दूसरा बोला - "शिक्षकों को फ़िनलैंड भेजकर ही देख लो, क्या पता पूरे मगध की शिक्षा व्यवस्था सुधर जाए। आपके यहाँ तो कोई फाइल अटकाने वाला भी नहीं है।"

पहले ने कहा - "लगता है आप सब जानते हैं। आप कुछ पढ़े लिखे लग रहे हैं।  लगाइए महाराज आप ही निशाना लगा दीजिये, तेल में देखकर मछली की आँख पर।"

दूसरा बोला - "धनुष हमारा, बाण हमारा, आंख मछली की, मछली हमारी, बीच में ये कड़ाही कहां से आ गई? हम किसी कड़ाही को नहीं जानते। कौन कड़ाही और कौन सा तेल। हमारे हाथ में धनुष होगा तो तीर हम मारेंगे, कैसे मारना है और कहां मारना है ये हम डिसाइड करेंगे कि कड़ाही?"

उधर से कोई स्त्री बड़े म्यूजिकल रीदम में कुकु-कू-कू-कू-कू की आवाज़ निकाल कर कहती है - स्वयंवर पर कंसन्ट्रेट कीजिये। 

सभा में से आवाज आई - "तो तपस्वी महाराज! सब जोड़ लिया? अब क्या करेंगे?"

"आज तो इस नफरत की सभा में मोहब्बत की दुकान खोलने वाला हूँ। कल का पता नहीं।"

सभा के आयोजक ने कहा - "अरे यार दुकानदारी बाद में करना कोई ढंग का निशाने बाज हो तो बताओ। आप सबको समझ भी आया है कि यह सभा किस कारण से आयोजित की गई है? " 

उधर से युवराज के सहबाला ने कहा - "भारत जोड़ो यात्रा के कारण।" 

सभा में सभी ने एक स्वर में कहा - साधो! साधो! 

अचानक सारे पत्रकार बाहर की तरफ भागे। किसी का ध्यान सभा पर नहीं था। सब धक्का मुक्की करने लगे।  एक दूसरे के स्तर को नीच महानीच, गिरा हुआ, पड़ा हुआ, सड़ा हुआ बताने लगे। 

सभा में सब बस यही सोच रहे थे कि ये हो क्या रहा है। सबका ध्यान भागेश्वर से बागेश्वर पर कैसे चला गया।  

एक शरीफ आदमी कोने में बैठा हुआ था, दबी सी आवाज़ में बोला  - "सभा में जो करना है कर लो, लेकिन महाराज! सभा के बाद ये तेल , कड़ाही और मछली हमको दे देना। खाने पीने की बड़ी किल्लत है आजकल।"

रविवार, 8 जनवरी 2023

तीर्थाटन या पर्यटन, मनोरंजन या आस्था?

कुछ मंदिर-तीर्थ जागृत होते हैं, जाकर लगता है कुछ तो दैवीय है। वहाँ के प्रभाव क्षेत्र में आते ही मन स्वतः प्रसन्न हो जाता है। सारी नकारात्मकता समाप्त हो जाती है। आप केवल मुस्कुरा रहे होते हैं। न भीड़, न धक्के आपको कुछ परेशान नहीं करता। जहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती, शक्ति का अनुभव शांति में भी होता है। ऐसे मंदिर में दर्शन कर के जब आप निकलते हैं तो कई दिनों तक उस शक्ति के प्रभाव से ऊर्जावान रहते हैं। जितने दिन आप उस ऊर्जा से जुड़े रहते हैं आपके जीवन में सबकुछ अच्छा होता जाता है। ये ही तीर्थ हैं, यही तीर्थ की महिमा है।  तीर्थ यात्रा करने वाले के मन में श्रद्धा होती है, भक्ति होती है। मन में एक पवित्र भाव होता है, कोई मनोकामना मांगने या पूर्ण होने पर आभार प्रकट होना होता है। या केवल तीर्थ स्थान की दिव्य ऊर्जा और अपने इष्ट के दर्शन से मानसिक शांति पाना ही उद्देश्य हो सकता है। तीर्थ यात्रा करने वाला अपने मन की ऊब मिटाने तीर्थ पर नहीं जाता, मन के विकार मिटाने जाता है। जिस स्थान के स्मरण मात्र से मन श्रद्धा से झुक जाए वही तीर्थ है। जहाँ जाकर ईश्वर के होने की अनुभूति होती है वह तीर्थ है।

फिर वे स्थान आते हैं जहाँ भक्ति ही प्रधान है। भक्ति ही भगवान का स्वरुप धारण कर लेती है। भक्ति ही शक्ति के रूप में आपको आनंदित कर देती है। भक्त गाते हैं, नाचते हैं।  हरे राम हरे कृष्ण के भाव में रम जाते हैं। नाचते-गाते दुर्गम पहाड़ भी चढ़ जाते हैं। 

किन्तु कुछ मंदिर और तीर्थ प्रदर्शनी की तरह हो गए हैं। जहाँ इष्ट के दर्शन से अधिक लोगों की रूचि वहाँ की लाइटिंग और लेज़र शो में हो वहाँ या तो प्रबंधन से कुछ चूक हो रही है या श्रद्धालुओं से। फिर वे श्रद्धालु ही कैसे हैं जो मंदिर जाकर केवल बाहर से मंदिर देखकर यह कहते हुए चले आते हैं कि मंदिर सुन्दर बना है। सजावट अच्छी है, दृश्य मनोरम है। अन्य कोई आध्यात्मिक अनुभूति नहीं? वे शायद श्रद्धालु हैं ही नहीं, वे पर्यटक हैं।

एक तो सरकार जहाँ मर्जी होती है विकास के नाम पर लेज़र शो आदि करवाने लगती है। सरकारें सभी मंदिरों का संचानल स्वयं करना चाहती हैं, दूसरी तरफ अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों पर कोई नियंत्रण नहीं रखतीं। अगर अन्य धर्मों को अपने धार्मिक स्थल के प्रबंधन की स्वतंत्रता है तो सभी मंदिरों के संचालन प्रबंधन की व्यवस्था में भी सरकारों को नहीं पड़ना चाहिए। क्या यह उचित नहीं होगा कि  स्थानीय प्रबंधन या उन लोगों को साथ लेकर सब किया जाए जिनकी उन स्थान से भावनाएँ जुडी हुई हैं? क्या यह उचित नहीं होगा कि जिस स्थान का इस प्रकार का विकास, करने की सरकार ने ठान ली है थोड़ा उस स्थान से भी पूछ लिया जाए कि ऐसा विकास चाहिए या नहीं?

क्या यह सोचने का समय यही आ गया है कि पर्यटन और तीर्थाटन को अलग दृष्टि से देखा जाए? अगर किसी विशिष्ट स्थान की यात्रा का उद्देश्य धार्मिक या आध्यात्मिक है तो वह तीर्थाटन है, लेकिन केवल मनोरंजन के लिए यात्रा की जा रही है वह पर्यटन है। तीर्थ वह नहीं है जहाँ का विचार आते ही मन में मनोरम दृश्य, रिसोर्ट का आनंद या संभावित मनोरंजन की अन्य गतिविधियां कौंध जाए। जहाँ लगता हो कि यह स्थान सेल्फी और रील बनाने के लिए अच्छी है, या जहाँ जाने से पहले आप यह देखते हैं कि खाने-पीने के कौन कौन से विकल्प उपलब्ध हैं वह आपके लिए तीर्थ नहीं है। वह एक पर्यटन स्थल है। 

विकास के साथ दौड़ते हुए कहीं भी निकल जाने की चाह में हम सब भूल रहे हैं कि पर्यटन और तीर्थाटन दो अलग बातें हैं। पर्यटक और तीर्थ यात्री दो अलग तरह के लोग हैं जिनकी मानसिकता अलग होती है। तीर्थयात्री स्थान की पवित्रता का विचार करता है पर्यटक से आप हर बार यह आशा नहीं कर सकते। जिस स्थान की धार्मिक मान्यता हो, पवित्रता सर्वोपरि हो, जहाँ साधु सन्यासियों का निवास हो जो तपस्या में लीन रहते हों वहाँ पर्यटकों का आना निश्चित रूप से शांति भंग कर देने वाली बात है। असली खतरा उस वर्ग से है जो स्वभाव से उद्दंड है, जो स्वभाव से मूर्तिभंजक है और जिसका एक मात्र उद्देश्य ही दूसरों की पवित्रता भंग करना है। जिस स्थान का मूल भाव ही त्याग है वहां व्यसन के साधन उपलब्ध करवाना ही अपने आप में पाप है। जैन समाज द्वारा शिखरजी को पर्यटन स्थल घोषित करने का शांतिपूर्ण विरोध हुआ और पवित्र तीर्थ को बचा लिया गया। परन्तु यह सिर्फ शिखरजी तक सीमित रहने वाला आंदोलन नहीं रहना चाहिए।

हाल ही में जो कुछ जोशीमठ में हो रहा है वह चेतावनी से काफी आगे निकल चुका है, हम जोशीमठ को खो देने की कगार पर हैं। घरों, सड़कों, यहाँ तक कि  खेतों तक में दरारें आ चुकी हैं। प्राचीन देवालयों में दरार आना कोई शुभ संकेत नहीं है। संभवतः जोशीमठ खाली हो जाएगा। इसके पीछे भी अंधाधुंध विकास और पर्यटन को ही दोषी माना जा रहा है। क्या सच में सरकारों ने चेतावनियों को दरकिनार करते हुए आवश्यकता से अधिक विकास का प्रयास किया? या अत्यधिक पर्यटन नें प्रतिकूल प्रभाव डाला है? पहाड़ों पर हो रहे विकास कार्यों से बहुत से लोग प्रसन्न नहीं हैं। यह प्रश्न सरकार से पूछना ही होगा कि विकास का उद्देश्य तीर्थयात्रियों को सुविधा उपलब्ध करवाना है या पर्यटकों की संख्या बढ़ाना? समस्या यह है कि पर्यटन के नाम पर वे लोग भी चले आते हैं जिनको तीर्थ की पवित्रता से कोई लेना देना नहीं होता। फिर वे अन्य श्रद्धालुओं के लिए समस्या बनते हैं।

एक समय था जब कोई तीर्थ यात्रा से लौटता तो उसका स्वागत ढ़ोल -नगाड़ों फूल मालाओं से किया जाता था।  जैसे कोई उपलब्धि हो। उसका एक कारण तीर्थों का दुर्गम होना भी था। चार धाम यात्रा सबसे कठिन मानी जाती थी, वैष्णो देवी में १४ किलोमीटर कच्चे रास्ते से पहाड़ चढ़ना कोई आसान काम न था। दृढ संकल्प से ही कष्टप्रद यात्राएं संपन्न  होती थीं।  लेकिन अब सब सुविधाजनक है।  पहाड़ों पर चढ़ने के लिए हेलीकाप्टर से लेकर उड़न-खटोला जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। जिनमें शक्ति-सामर्थ्य नहीं है उन्हें पहुँचाने की भी व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं। तीर्थ को ही पर्यटन के केंद्र में भी विकसित किया जा रहा है। सुविधाएँ बढ़ रही हैं उसी के साथ भीड़ भी।

दिल्ली जैसे शहरों के पास धन की कमी नहीं है, मनोरंजन की कमी है। एक घुटते हुए शहर में से हर कोई मौका मिलते ही खुले मैदान या पहाड़ पर भाग जाना चाहता है। यह सच भी है कि दिल्ली-हरियाणा के लोग सप्ताहांत पर भारी संख्या में गाड़ियों से पहाड़ों पर पहुँचते हैं। हृषिकेश, देहरादून, शिमला, मनाली, जम्मू अछूते नहीं है।  बढ़ती भीड़ को संभालने के लिए संसाधन  चाहिए और इन्ही संसाधनों को जुटाते जुटाते शायद पहाड़ चोटिल हो रहे हैं। पर्यटकों का शिकार, हिमालय के पहाड़ ही नहीं ब्रज के गिरिराजजी भी हैं।

ऐसा नहीं कि लोगों में आस्था नहीं है।  कुछ लोग हैं हर पूर्णिमा या एकादशी को लोग गिरिराज जी की परिक्रमा करने निकल पड़ते हैं।  दिल्ली से ही नहीं, अन्य राज्यों से भी। कोई साधारण ग्रामीण, फुर्सतिये नहीं अच्छे खासे डॉक्टर, अफसर सब काम छोड़कर पूर्णिमा को जो साधन मिलता है उससे चल पड़ते हैं। पूछो क्यों? तो कहते हैं - बस एक बार गए थे, उसके बाद बिहारी जी की ऐसी कृपा हुई कि अब हर पूर्णिमा को गोवर्धन परिक्रमा और अगला दिन बरसाने में निकलता है।  माघ, पौष, जेठ, आषाढ़, कोई माह, कोई ऋतु की बाधा नहीं।  बरसात में भी चल देते हैं, ठण्ड में भी। उनको परिक्रमा की ऐसी लगन लगी है कि जिस गर्मी में कोई घर से बाहर न निकले, वे परिक्रमा करने निकल पड़ते हैं। किसी को कुछ नहीं होता।

न जाने कैसे जाने का संयोग बन ही जाता है।  न ठहरने की चिंता होती है, न खाने की।  बाहर का खाना खाने से जो परहेज़ करते हैं, उनको भी चिंता नहीं, बिहारी जी के राज में जो मिले वही प्रसाद।  ये लोग तीर्थयात्री हैं, ये मनोरंजन के लिए नहीं जाते शायद इसलिए जाते हैं क्योंकि इन्हें बुलाया जाता है। इनका जाना  या न जाना इनके बस में नहीं है, सब अपने आप होता है। वृन्दावन में बांके बिहारी जी भी घोर अव्यवस्थाओं और भीड़ से जूझ रहे हैं। बढ़ती भीड़ को संभालने के लिए, सरकार को जो सोचना पड़ रहा है वह है कॉरिडोर का निर्माण। जितनी संकरी गलियां वृन्दावन में मंदिर के आस पास हैं, निश्चित रूप से बढ़ती भीड़ को नहीं संभाल सकतीं। कुछ बेहतर प्रबंधन की निश्चित रूप से आवश्यकता है। कॉरिडोर बनाने के लिए कुछ न कुछ तोडा अवश्य जाएगा, जो स्थानीय लोगों को अच्छा नहीं लगेगा।

पर्यटकों को तो सुविधा होगी लेकिन उसके लिए बहुत से लोगों को कुछ न कुछ खोना पड़ेगा। मूल स्वरुप से छेड़छाड़ न हो बस यही प्रार्थना लोग कर रहे हैं। ऐसे ही कॉरिडोर का निर्माण काशी और उज्जैन में भी हुआ है, दर्शनार्थियों को तो सुविधा निश्चित रूप से हुई है, कुछ लोग नाराज़ भी हुए हैं। तो क्या तीर्थ स्थलों का विकास नहीं होना चाहिए? अवश्य होना चाहिए।  अच्छी सड़कें, आवागमन की सुविधाएँ, स्वच्छ वातावरण, जल, शौचालय, विश्रामगृह, भोजन  आदि की पर्याप्त एवं आधुनिक व्यवस्था, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, डिजिटल भारत के अनुरूप आधुनिक नेटवर्क। ये सब तो यात्रियों का ही नहीं, वहाँ रहने वालों का भी अधिकार है।  दर्शन-पूजन में श्रद्धालुओं को समस्या न आए, भीड़ नियंत्रित रहे यह व्यवस्था भी निरंतर चलनी चाहिए, समय समय पर सभी व्यवस्थाओं में सुधार भी होते रहने चाहिए। लेकिन इस सब का अर्थ यह नहीं कि तीर्थ की पवित्रता से कोई समझौता किया जाना चाहिए।

सोचना सभी को पड़ेगा, किसी भी स्थान पर रहने वालों की संख्या बढे या आने जाने वालों की संख्या, दवाब बढ़ेगा ही और उस दवाब को झेलने की क्षमता तो किसी भी स्थान  की सीमित ही होती है। स्पष्ट रेखा खींची जानी जरूरी है कि लोगों को पर्यटन के लिए कहाँ जाना है और तीर्थाटन के लिए कहाँ जाना है।  लोग भी गंतव्य निश्चित करें कि उनका उद्देश्य क्या है, मनोरंजन या आस्था। इससे शायद कुछ संतुलन बन सके।