शनिवार, 4 नवंबर 2023

सत्तर घंटे काम

एक बुजुर्ग सीईओ साहब सपने में घुस आए। कहने लगे - "यार हमको लग रहा है कि अब सबको हफ्ते में सत्तर घंटे काम करना चाहिए। मेहनत करेंगे तभी तो आगे बढ़ेंगे।"

हमने कहा "बिलकुल करना चाहिए। सत्तर क्या आप कहिए एक सौ सत्तर घंटे हम दफ्तर में बैठे रहें।"

"अब तुम फिर हमारी बात की गंभीरता नहीं समझ रहे हो।"

"तो आप समझाइए मालिक!"

"देखो क्या है, जवान खून होता है गरम, उत्साही, जोशीला। इसलिए जवान लोग जितना मेहनत करेंगे उतना ही आगे बढ़ेंगे। उनके साथ कंपनी आगे बढ़ेगी, कंपनी के साथ देश आगे बढ़ेगा। हमको युवा शक्ति का सही इस्तेमाल करना ही पड़ेगा। वर्ना तो आज के युवा की शक्ति नालियों में बह रही है। आज के युवा न प्रोडक्टिव रह गए हैं, न रिप्रोडक्टिव।"

"वो तो आप सही कह रहे हैं। युवाओं को मेहनत तो करनी ही चाहिए। लेकिन बस यह समझ नहीं आता कि आई. टी. वाले ज्यादा काम करेंगे तो क्या? काम तो हर एक के पास उतना ही रहेगा जितना आज है। जो बीस घंटे में निपटा लेता है वो बीस में ही निपटाएगा और जो आज भी साठ घंटे लेता है वो कल सत्तर और अस्सी भी लेगा।"

"हम ऐसे लोगों को निकाल देंगे जो अपना काम बीस घंटे में निपटा देते हैं। हमको सत्तर घंटे वाले लोग ही चाहिए।"

"फिर भी अगर समय ज्यादा हुआ तो लोग खलिहर बैठेंगे!"

"तो क्या हुआ हम उनमें से भी आधे लोग निकाल देंगे। फिर तो लोग और काम बराबर हो जाएगा।"

"निकालने की बात तो आप करो ही मत। चाह महीने पहले निकाला था आपने एक को, उसके बदले दो को नौकरी पर रखना पड़ा है। और उन दोनों  को भी पता नहीं है कि उनको क्या करना है और उनके साथ वाले क्या करते हैं। न आज तक हमको समझ आ पाया है कि इन दोनों आतापी–वातापी को रखा क्यों गया है? किसी दिन ये कंपनी का पेट फाड़ कर निकल जायेंगे।"

"इधर उधर की बात मत करो ये बताओ सत्तर घंटे काम करने को तैयार हो या नहीं?"

"हम तो पहले से सत्तर घंटे काम करते हैं मालिक। रोज़ नौ घंटे दफ्तर में और पांच घंटे दफ्तर के सफ़र में।"

"सफ़र में करते क्या हो?"

"सोचते हैं कि दफ्तर में काम कैसे करेंगे।" 

"इससे मदद मिलती है?"

"नहीं सोचते-सोचते थक जाते हैं, फिर काम नहीं कर पाते!"

"फिर काम कब करते हो?"

"शनिवार-इतवार को, जब दफ्तर नहीं जाते उन दो दिनों में काम करते हैं। बाकी दिन सफ़र करते हैं।"

"फिर तो सफ़र करना बेकार है तुम्हारा, उसे सत्तर घंटे में नहीं गिन सकते। सफ़र में और क्या करते हो?"

"वही जो सब करते हैं। सफ़र। मेट्रो में लोगों के कलेश देखते हैं। फिर गाना सुनते हैं। हालत ऐसी हो गई है कि घर पर भी कहीं जब गाना सुनाई देता है तो हमको लगने लगता है कि हम मेट्रो में हैं। गानों के बीच में अगर मेट्रो की घोषणाएं न सुनाई दें तो गाना अटपटा लगने लगता है। दिमाग में गाने फिट बैठ गए हैं। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी - अगला स्टेशन पटेल चौक है - हे नाथ नारायण - दरवाजे बाईं तरफ खुलेंगे - वासुदेव। 

सुंदरकांड दिमाग में भर गया है। शेड्यूल इतना टाइट है कि किस चौपाई पर  कौन सा स्टेशन आता है वह याद हो गया है। जैसे - प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा। सुनते ही सीट से खड़ा हो जाता हूं। कश्मीरी गेट पर प्रवेश करने का यही समय होता है। 

एम्स पहुंचते पहुंचते विभीषण रावण को छोड़कर जाने लगता है और गायक कहता है – अस कहि चला विभीषनु जबहि, आयुहीन भए सब तब ही।"

"तुमको सुंदर काण्ड सुनने के लिए दफ्तर बुलाते हैं क्या?"

"तो मालिक मेट्रो में चल रहे किसी और काण्ड पर ध्यान देने से अच्छा तो सुंदरकाण्ड पर ध्यान देना बेहतर है।"

"बोर नहीं हो जाते रोज?"

"होता हूँ, फिर बालकाण्ड सुनने लगता हूँ। धनुष टूटते–टूटते दफ्तर पहुँच जाता हूँ।"

"बड़े फालतू काम हैं तुम्हारे।"

"हमारे छोड़ो ये बताओ, ये HR वालों को सत्तर घंटे रोककर क्या करवाओगे? चालीस घंटे में ही रंगोली, अंताक्षरी करवा लेते हैं। सत्तर घंटे तक ये लोग करेंगे क्या?"

"तुम अपने काम की बात करो, सत्तर घंटे करोगे या नहीं?"

"करवाओगे तो कर लेंगे मालिक। विकल्प ही क्या है?"

"विकल्प तो कुछ नहीं। तुम तो जानते हो आईटी के दिन ठीक नहीं चल रहे। रिसेशन सर पर खड़ा है। आय उतनी है नहीं। शेयरों के भाव भी टूटे हुए हैं। समझ नहीं आता क्या करें। फिर विकल्प तो खोजने ही पड़ते हैं।"

"विकल्प मतलब क्या? क्या सच में लोगों को निकालने की योजना बना रहे हैं?"

"नहीं नहीं, जितने लोग हों उतना अच्छा।"

"फिर आय कैसे बढ़ाएंगे?"

"आज तुमको राज़ की बात बताते हैं। ये आईटी बिजनेस तो सब साइड बिजनेस है। हमने जब आईटी में नौकरी शुरू की तो दूसरे ही साल  समझ आ गया असली काम तो कैंटीन का है और हमने कैंटीन खोल ली। लेकिन कैंटीन में तब लोग नहीं आते थे, इसलिए हमने साइड में एक आईटी कंपनी भी खोल ली। 

आज भी हमारा असली काम तो कैंटीन और हॉस्टल का है। आईटी डूब जाएगी लेकिन कैंटीन का धंधा अजर अमर है।  

लोग जब दफ्तर में चौदह घंटे रुकेंगे तो उनको कैंटीन में खाना ही पड़ेगा। कुंवारों से तो भरपूर कमाई है। शादीशुदा लोग थोड़ा नुकसान करते थे, घर से खाना ले आते थे। चौदह घंटे रुकेंगे तो कम से कम दो बार की चाय और एक बार का खाना तो खाना ही पड़ेगा। कुछ लोग तो घर ही नहीं जायेंगे और तीनों समय का खाना हमारी कैंटीन में ही खायेंगे।"

"तो आपकी असली कमाई Vertica नहीं भजिया है? शेयरपोइंट नहीं डोसा प्वाइंट है? सर्विस-नाउ नहीं वड़ा पाव है?Tally नहीं थाली है?"

"हाँ दोस्त,  python में दिमाग खपाने वाले खाते तो आखिर उतप्पम ही हैं। कैंटीन का धंधा न हो तो हमारा EBIDTA आधा रह जाए।"

"लेकिन आपके दोस्त तो कह रहे हैं, कि चालीस घंटे कंपनी के लिए और तीस अपने लिए लगाने चाहिए। हमको तो वो बात ही ठीक लग रही है।"

"हाँ तो तीस घंटे हमारी कैंटीन में ही बैठो। अपने लिए खाओ पियो। दोस्तों के साथ गप्पबाजी करो। गप्पबाज़ी के बीच बीच में जूस, पकौड़े, पॉपकॉर्न आदि लेते रहो।"

"मालिक सत्तर घंटे कैंटीन में खाने पीने के बाद बीमार न पड़ जायेंगे।"

"उसके लिए ही तो हमने अस्पताल का धंधा भी खोल रखा है। पूरी सुविधा है।"

"माफ करो मालिक। समझ गया और कोई विकल्प नहीं। घर परिवार का क्या है, चल ही जाएगा।"

"देखो तुम अपना सब कुछ कंपनी को देदो, लेकिन टर्म इंश्योरेंस जरूर ले लेना।"

"साइड में वो धंधा भी खोला है क्या? वैसे इतना समय दफ्तर में लगाने के बाद इंसान जीकर करेगा भी क्या। टर्म इंश्योरेन्स ही सही है।"

वे दांत दिखाते हुए बोले "मैने भी अपने दिनों में ऐसे ही सत्तर अस्सी घंटे काम किया है। मुझसे प्रेरणा लो और लग जाओ।"

"वो आपकी खुद की कंपनी है मालिक। खुद की दुकान में आदमी चौबीस घंटे काम भी करे तो कम है।"

"तो तुम अपनी दुकान खोल लो।"

"इतनी औकात होती तो इस नौकरी को कब का छोड़ दिया होता। नहीं है इसलिए जैसा कहोगे वैसा ही करेंगे। 'जहाँ ले चलोगे वहीं मैं चलूँगा, जहाँ नाथ रख लोगे वहीं मैं रहूँगा।"

वे कहने लगे - "तो उठो इस भजन के शुरू होने तक तुम्हें रिक्शे में होना था। आज देर हो गई।"

हम हड़बड़ाते हुए उठकर गुसलखाने में घुस गए। नहा धो कर पूजा पाठ करके तैयार हो गए। देखा तो पत्नी अभी भी सो रही थीं। हमने उन्हें उठाया – चाय ही बना दो।

उन्होंने एक आँख खोलकर घड़ी देखी। फिर दोनों आखों को बंद करके घूरते हुए बोली सो जाओ अभी रात के ढाई बजे हैं और आज शनिवार की छुट्टी है।