ईश्वर स्वामी, सखा, परिजन, आराध्य, प्रेमी, बालक कुछ भी हो सकते है। जो जिस रूप में देखना चाहे ईश्वर उसके लिए वैसा ही बनकर सामने आ जाते है। जिसने स्वामी के रूप में चाहा तो वे स्वामी बन गए जिसने शत्रु के रूप में चाहा तो वे शत्रु बन गए।
ईश्वर ने कभी यह नहीं कहा कि मेरी पूजा नहीं की तो नर्क भोगोगे, या मेरे आलावा किसी और की पूजा की तो मार दिए जाओगे। हमारे ईश्वर ने हमें चुनने के लिए स्वतंत्र छोड़ा है। जब जिसके भाग्य उदय होते हैं, उसकी मति उससे ऐसे कर्म करवा देती है कि वह स्वयं ईश्वर में लीन हो जाता है।
कितने ही नास्तिक आस्तिक हो जाते हैं। उन्हें कोई धमकाता नहीं है, न ही किसी लोभ के चलते वे इस करते हैं। न ही कोई जबरदस्ती ईश्वर की आराधना करने को कहता है। नास्तिक होना भी अपने आप में सनातन का एक पथ है जिसपर जो चाहे चल सकता है।
ईश्वर से हमारा सम्बन्ध परिजन सा ही है, गाँवों में आज भी ग्राम देवता को बाबा या दादा कहते हैं। कुलदेवी मैया ही हैं। कृष्ण को ठाकुर जी कहकर उन्हें कोई स्वामी कहता है कोई बालगोपाल स्वरुप में ह्रदय से लगाए घूमता है। परन्तु अपने आराध्य की मर्यादा कोई नहीं लांघता। अनजाने में की गई भूल ईश्वर भी क्षमा कर देते हैं।
हमारा ईश्वर बात बात पर दंड देने वाला दंडाधिकारी नहीं है, जो धमकाकर अपनी पूजा करवाता हो।
लोक परम्पराओं में ईश्वर का जिस भी रूप में वर्णन किया गया सब स्वीकार्य रहा। हास्य प्रधान लोकगीत भी प्रचलित रहे और नाट्य भी। हमारे आराध्य केवल कल्पना मात्र नहीं रहे वे हमारा इतिहास हैं।
लोग कथाओं को कई तरह से सुनते सुनाते आए हैं, लोकगीतों में लोककथाओं में नए आयाम देकर कथा को बढ़ाते आए हैं, लेकिन महिमा और महत्त्व को बनाए रखा है। बहुत लोगों ने ऐसी कल्पनाएं की हैं कि किसी विशेष परिस्थित में अगर वे रहे होंगे तो क्या हुआ होगा। उनके किसी चरित्र की विशेषता को उस परिस्थिति ने कैसे उजागर किया होगा।
उदाहरण के लिए एक लोकगीत है जिसमें राम जी हनुमान जी से विवाह कर लेने के लिए कहते हैं। यह किसी किताब में नहीं होगा। लेकिन फिर भी इसमें ईश्वर की महिमा को कम करने का प्रयास नहीं किया है।
https://youtu.be/aRBycpvjrLM
जब कृष्ण भक्त गाते हैं राधिका गोरी से बिरज की छोरी से मैया करा दे मेरो ब्याह। और उत्तर मिलता है नजर तेरी खोटी है , उमर तेरी छोटी है कैसे करा दूं तेरा ब्याह। यह किस पुस्तक, किस ग्रंथ में मिलेगा?
लेकिन सुनकर ही माता–पुत्र का जो संवाद उभरता है, वह अपने साथ बहा ले जाता है। भक्ति केवल भक्ति नहीं है, वात्सल्य है, प्रेम है, समर्पण है, भय और हास्य विनोद भी है।
पिछली बार मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में एक दंपति सर पर भेंट लिए मंदिर में अंदर आए और ऐसे प्रसन्न हुए जैसे अपने पुत्र से मिलने आए हों। पति ने भीड़ देखकर अपनी पत्नी से कहा देखो वो हैं, भीड़ में हम उनको दिखेंगे नहीं इसीलिए हाथ दिखाओ उनको। और दोनों हाथ ऊपर करके ऐसे प्रभु ध्यान का ध्यान "इधर! इधर !यहां" चिल्लाकर अपनी ओर खींचने का प्रयास करने लगे जैसे आप किसी भीड़ के बीच में किसी अपने का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर सकते हैं। वह भाव तो तभी जागृत हो सकता है जब भक्ति और श्रद्धा अपार हो। कृष्ण जब केवल मंदिर में बैठे आराध्य नहीं बल्कि अपना ही कोई परिजन लगने लगे तब किसी का इस प्रकार का व्यवहार अचंभित नहीं करता।
नवरात्र में बुंदेलखंड में कौन सा मंदिर होगा जहां – झूम छननन बाजे माई पांव पैंजनिया न बजता हो। हमारी देवी त्यौहार में आती हैं तो उनकी कल्पना भी प्रसन्नता के साथ नाचते झूमते हुए आने की कल्पना की जाती है।
"माई हंसा चाल मृग नैन, दुलारी तोरे भुवन कहां" आज भी जो सुनता है उसके मन में श्रद्धा भर जाती है।
किसी ग्रंथ में ऐसा लिखा तो नहीं होगा, किसी न किसी की कल्पना ही होगी।
मूल बात है कि रचने वाले में श्रद्धा कितनी है और नीयत कैसी है। ईश्वर की इच्छा के बिना ग्रंथ तो क्या एक शब्द लिखने का सामर्थ्य किसी में नहीं है, फिर भी अगर किसी पर कृपा हो ही गई है तो भाषा की मर्यादा रखना उसके अपने हाथ में हैं। भाषा बिगाड़ने से ईश्वर का कुछ नहीं बिगड़ता, लिखने वाले का चरित्र पता चलता है।
आज बहती धारा में सब कुछ न कुछ लिख रहे हैं, कुछ अच्छा भी लिख रहे हैं और कुछ कथाओं का आधुनिकीकरण भी कर रहे हैं।
लोग केवल व्यवसाय की दृष्टि से कथा कहने सुनने लगेंगे तो कथाएं अपना मूल खो देंगी।
कुछ लोग आलोचनात्मक दृष्टि से भी परिभाषित कर सकते हैं और कुछ अपनी विकृत सोच में कथाओं को ढाल सकते हैं।
कथा को संभवतः समय के साथ पुनर्परिभाषित करना चलता रहेगा और चलता रहना चाहिए। समय के साथ कई चीजों को देखने का दृष्टिकोण बदलता रहता है। कल जो चमत्कार था आज नहीं है, आज जो चमत्कार हैं वो शायद कल चमत्कार न रहे। ऐसे में उन लोगों का लिखना आवश्यक है जो श्रद्धा रखते हैं, अन्यथा अगर श्रद्धा न रखने वाले व्यवसायी लिखेंगे तो वे उसे केवल वायरल होने की कसौटी पर रखकर लिखेंगे।
फिर रामकथा जैसी कथावस्तु, जो अपने मूल रूप में ही पूर्ण है उसे फिर से कहने के लिए ईश्वर की अपार कृपा चाहिए। कसौटी यह है कि अगर कोई राम कथा कह रहा है और हर घटना पर भावनाओं का ज्वार न उठे तो वह कहने में असफल है। अगर धनुष भंग के प्रसंग से उमंग न जागे तो वह दृश्य असफल है, अगर स्वयंवर में वरमाला के दृश्य के समय किसी भी पुत्री के पिता की आंखें न भर आएं तो वह दृश्य असफल है, अगर राम के वनवास के समय गले न रूंध जाएं, भरत मिलाप के समय भाई की याद न आ जाए तो कथा कहने वाला असफल है, सीता हरण के समय स्वयं जटायु हो जाने का मन न करने लगे तो कथा कहने वाले में कमी रह गई है। लंका दहन में हनुमान जी के प्रति श्रद्धा से हाथ न जुड़ें तो कथा क्या ही कही गई है, और रावण के वध के बाद भी कथा सुनते रहने की इच्छा न बची रह जाए तो कथा कहने वाला असफल है।
अतः जो कथा जन जन के मन में बसी है, फिर भी उसी को सुनने देखने के लिए लोग हर वर्ष रामलीला में पहुंच जाते हैं उस कथा को कहने के लिए बहुत मेहनत और श्रद्धा की आवश्यकता है। वह कथा कहने के पहले और बाद में लेश मात्र भी अहम उत्पन्न हो गया तो सब पानी में गया समझिए। घटनाओं की गलतियां लोग नजरंदाज कर देते हैं लेकिन जब संवाद ईश्वर के हों तो आशा होती है कि हर संवाद से प्रेरणा और शक्ति ही प्राप्त होगी। उसी के लिए लोग रामकथा सुनते हैं। फिर मौका मिलने पर भी कोई ठीक से न सुना पाए तो समझिए राम जी की इच्छा है।
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