गुरुवार, 7 सितंबर 2023

कन्हैया ही झूले, कन्हैया झुलावे

हम चौरासी खंबा मंदिर के द्वार पर थे, मंदिरों और घाटों से घूमते हुए गोकुल पहुंचे थे। अंदर जाते हुए वहीं से फूल माला ले ली।

यह नंदबाबा का पहला घर था जहां उन्हें टोकरी में रखकर यमुना पार से वसुदेव मथुरा से लाए और योगमाया को यहां से ले गए। मंदिर के प्रांगण में हमे एक पंडानुमा एजेंट ने रोक लिया और बैठा दिया। कुछ ज्ञान दिया कि एक-एक कर के लोग जाते हैं वगैरह वगैरह। कुछ ज्ञान देने के बाद पंडितों ने कुछ शब्द दोहराने के लिए कहा, कुछ लोग दोहराते चले गए, यह जाने बिना कि उनसे दान के संकल्प करवाए जा रहे हैं। वे तोते की तरह बोले जा रहे थे। हमारी दृष्टि केवल और केवल कान्हा, उनके पालने, चेन और पीछे बने बाद विग्रह की ओर जमी हुई थी, हम ॐ नमो भगवते वासुदेवाय के बाद भूल गए पंडित क्या बोल रहे हैं।

साथ वाले परिवार के अपनी इच्छानुसार देने की बात करने पर उनका अपमान करना पंडो ने शुरू कर दिया था, यह भी कुछ दान है? जैसा दोगे वैसे भोगोगे, पुण्य–पाप, एक ग्रास भी नहीं खिला सकते क्या, तुम देने वाले ये लेने वाले तुमने संकल्प लिया है वगैरह वगैरह। मोलभाव शुरू हो गया था।
मामला वहां ११ हजार से शुरू होता है, पुण्य का अंतिम मोल ढाई हजार का है। इतना तो हमारी न जेब में था न पूरी यात्रा का बजट था। इससे पहले पंडित की दृष्टि हम पर पड़ती हमारी दृष्टि पालने में बैठे पालनहारे से मिल गई, हाथ में फूल माला थी, वही अर्पण की और उठ गए।

उठने लगे तो पंडित ने रोका - "झूला नहीं झुलाओगे?" (झुलाने की कीमत लगती है)

हमारे मुंह से निकला –

माया इन्हीं की, जगत का ये झूला,
कन्हैया ही झूले, कन्हैया झुलावे।
बैठकर पालने में जगत पालता है,
किसमें है क्षमता जो इनको झुला ले।

पंडित कहने लगा - "क्या है तुम्हारी क्षमता, उसका अर्थ था कितना दे सकते हो?"

हमारे मुंह से निकला – "जो क्षमता है, शक्ति है इनकी ही है, हमारी क्या है? यही देने वाले हैं यही लेने वाले हैं। इनका मन होगा तो दे देंगे इनका जब जैसा मन होगा तो ले लेंगे। अभी हमें फूल लाने की प्रेरणा दी थी सो फूल लाए हैं, इन्हें जो लेना होगा वैसी प्रेरणा दे देंगे।"

और हम प्रणाम कर के उठ गए। दोनों पंडे देखते रह गए फिर पहले वाले परिवार से उलझते रहे। हम जाकर दूर पीछे की तरफ खड़े हो गए। उसके बाद दो क्षण के लिए जब नेत्र बंद किए तो मन में प्रश्न आया कुछ गलत तो नहीं किया भगवान के सामने से ऐसे उठकर?

फिर तो जैसे भगवान से ही हमारी सीधी बात हो रही थी –

"जो ये पंडे तुम्हारे नाम पर धन मांगते हैं, वे क्या सही कर रहे हैं?"

"वे अपना कर्म कर रहे हैं। मेरी ही प्रेरणा से वे इस प्रकार की बातें करते हैं।"

"और देने वाले का सामर्थ्य न हो तो?"

"सामर्थ्य न होता तो यहां तक पहुंचते ही कैसे?"

"तो क्या जो ये मांगते हैं दे देना चाहिए?"

"वह तो तुम्हारी इच्छा है।"

"इसमें मेरी इच्छा क्या है, जब सब तुम ही करते और करवाते हो?"

"फिर यह प्रश्न ही क्यों है? मेरी ही प्रेरणा से लोग यहां आते हैं, मेरी ही प्रेरणा से दान भी करते हैं। मेरी ही प्रेरणा से इस संसार में मांगने, देने और छीनने वाले प्राणी हैं। सब अपने कर्म कर रहे हैं या अपने कर्मों को भोग रहे हैं। किसी एक के देने न देने से इनका पालन रुक नहीं जाएगा, न ही कोई एक इन सबका पालन कर सकेगा। मैं ही अलग अलग लोगों से उनकी देने की क्षमता के अनुसार लेता हूं और देते समय उतना ही देता हूं जितना उसके भाग्य में है और जितना वह भोग सकता है। चाहे वह कष्ट हो, धन हो या कोई अन्य सुख हो। तुम बैठे रहते तो मेरी इच्छा होती, मेरे सामने से उठने का साहस कर पाए ये भी मेरी इच्छा थी।"

"फिर भी इन पंडों को ऐसे किसी को अपमानित तो नहीं करना चाहिए। यह दान लेने के लिए किया गया मोलभाव उचित नहीं लगता।"

"हो सकता है ये भी किसी कर्म का फल ही हो जो इन पंडों से उलझना पड़ता है।"

"फिर तुम इन पंडों को ऐसी प्रेरणा क्यों नहीं देते कि ये दाता से उतना ही मांगें जितना देने में किसी के हाथ न कांपे, न दे पाने की ग्लानि न रहे।"

"हाथ कांप गया तो दान ही कैसा? फिर ग्लानि किस बात की? जो दे सके उसमें देने वाले का क्या है और जो न दे सके उसमें न देने वाले का क्या है? कोई न कोई ऋण है जो लोग चुका जाते हैं। उनका ऋण मुक्त होना भी मेरी कृपा है।"

"फिर मुझपर कृपा करना कि अगर कोई अपराध हुए हों तो क्षमा करना।"

वे मुस्कुराते हुए बोले "ये को खंबे देख रहे हो, लोग हर खंबे को अलग अलग नाम से जानते हैं। तुम इस जिन चार खंबो के बीच खड़े हो इनमें लोग चार युग, चार वेद, चार धाम सब देख लेते हैं। तुमने क्या देखा?"

"मैंने तो बस खंबे देखे, अलग अलग तरह के खंबे।"

"बस यही मर्म है, जो मैं दिखाना चाहता हूं, तुम वही देखते हो। तुम्हारे सामने होते हुए भी वह नहीं जान पाओगे जो मैं नहीं चाहता।"

उनका झूला हिल रहा था। पंडित किसी अन्य परिवार से उलझे हुए थे। मैंने बस श्रद्धा से हाथ जोड़े मंदिर की परिक्रमा की और आनंद से सराबोर होकर निकल गया। यहां मैने ये लिखा –

कन्हैया मुझे अपनी शरण में बुला ले।
हृदय से नहीं तो चरण से लगा ले।

जो कुछ मिला है, तुम्हारी दया है,
जो भी दिया है, तुम्हीं ने दिया है।
आगे तुम्हारे करूं क्या मैं अर्पण?
तुम्हीं देने वाले, तुम्हीं लेने वाले।

जीवन में मुझसे जो कुछ हुआ है,
उसमें तुम्हारी ही प्रेरणा है।
तुम्हें है समर्पित सभी कर्म मेरे,
पुण्य पाप सारे, तुम्हारे हवाले।

माया तुम्हारी, जगत का ये झूला,
कन्हैया ही झूले, कन्हैया झुलावे।
बैठकर पालने में जगत पालते हो,
किसमें है क्षमता जो तुम को झुला ले।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें