अधिकतर लोग सोचते हैं कि इस मृत्युलोक में दो प्रकार के प्राणी हैं। एक वे जिनको लगता है कि मोदीजी ने किया है तो सही किया होगा। दूसरे वो जिनको लगता है कि मोदी ने किया है तो गलत ही होगा। दोनों धुर विरोधियों के बीच में तीसरा सत्य है जो दोनों परिस्थियों के बीच में कहीं है। किसी की उपलब्धियों को दिखा कर उसकी कमियां नहीं छुपाई जा सकतीं और किसी की कमियां दिखा कर उसकी उपलब्धियों से मुंह नहीं फेरा जा सकता। अधिकतर सोशल मीडिया में इसी बात का युद्ध चलता रहता है।एक वर्ग को कुछ सकारात्मक नहीं दिखता दूसरे को नकारात्मक।एक वर्ग व्यक्ति पूजा से बस एक कदम दूर है।
और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो विरोध
में पागल हो चुके हैं। इन्हें अंध विरोधी कहें, विपक्षी कहें या बौखलाया हुआ कहें समझ नही आता। कुछ का
विरोध एक पार्टी से है, कुछ का सरकार से, कुछ का एक व्यक्ति से, कुछ का उस व्यक्ति के समर्थकों से। कुछ विरोध में इतने पागल हैं कि समझ
नहीं पाते कि वे विरोध कर किसका कर रहे हैं। व्यक्ति का विरोध करते करते कब
पूरे समाज और फिर देश का विरोध करने लगते हैं इनको पता नहीं चलता। देश विरोधी
बातें करने पर इन्हें एंटी नेशनल कहा जाता है तो पिनक जाते हैं।
जैसे विरोध प्रदर्शन करते करते आजादी
मांगने लगते हैं। भाई साहब किससे आजादी चाहिए? किसने गुलाम बना रखा है?
कहने लगते हैं मनुवाद से आजादी,
मनु को गए सैकड़ों साल हो गए प्रभु। न मनु हैं न मनुस्मृति
से कोई सरकार चल रही है। जो है ही नहीं उससे आजादी कैसे दिलवा दें?
फिर न जाने किस किस से आजादी मांगते
हुए नारे लगाते हैं। पर यह समझते नहीं कि ये गुलाम तो किसी और के हैं। और जिसके ये गुलाम हैं, उसने इनको सड़क
पर बैठा रखा है। भाई साहब प्रधानमंत्री की कबर खोद कर अपनी मांगे मनवाने की कोशिश
कर रहे हो, प्रशासन तो कहेगा ही भाड़ में जाओ। तथाकथित
किसानों का आंदोलन हो या यह पहलवानों का पेशेवर आंदोलनकर्ताओं ने ही किए।
सुनियोजित।
इनको प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का
धैर्य देखना चाहिए कि इतनी उद्दंडता के बाद भी संयम बरते हुए हैं। किसी के धरने पर बैठने से लोग जेल जाने लगते तो न जाने कितने लोग सड़क पर
बैठ गए होते। भीड़ जमा करके न्याय नहीं मांग रहे हो ब्लैकमेल कर रहे हो।
ऊपर से धमकी दी जा रही है।
राज्य में तुम्हारा कुत्ता भी नही घुसने
देंगे। न घुसने दो। फिर किसके कुत्तों को घुसने दोगे और किसकी सरकार बनवाओगे?
कुल मिलाकर मामला राजनैतिक है। और
राजनैतिक होकर बात यहां पहुंची है कि जिस दिन संसद भवन का उद्घाटन होना है उस दिन
उत्पात मचाने की पूरी तैयारी कर ली गई है।
किसानों के नाम पर 26 जनवरी का खालिस्तानी उत्पात देश भूला नहीं है। लाल किला फतह
करने निकल पड़े थे, क्या भरोसा कल को संसद भवन पर आक्रमण
कर दो। यह राष्ट्रद्रोह नहीं होगा क्या? वैसे तो
तुम लोग चाहते ही हो कि जब भी देश में कुछ शुभ हो,उत्सव हो तो ऐसी परिस्थितियां उत्पन हों कि हिंसा हो।
तुम्हारा उद्देश्य ही शुभ काम में
बाधा डालना है, वैसे ही जैसे ताड़का के पुत्र ऋषियों
के यज्ञ में बाधा डालने आ जाते थे वैसे ही राक्षसों ने देश के हर उत्सव में बाधा
डालने का प्रण ले रखा है।
विरोध करने के सौ दिन हैं, लेकिन जिस दिन सारे संसार की दृष्टि देश पर हो उसी दिन कुछ
उत्पात? ट्रंप के भारत आने के समय दिल्ली में दंगे
हों, या 26 जनवरी की परेड के बाद लाल किले पर आक्रमण। कौन प्रायोजित कर रहा है?
किसका विरोध कर रहे हो मोदी का? सरकार का? या देश का?
संसद भवन का उद्घाटन देश का उत्सव है
मोदी का निजी उत्सव नहीं। मोदी सत्ता में है, सत्ता मोदी नहीं है। संसद भवन भारत की संपत्ति है, मोदी की नहीं। लेकिन तुमको प्रस्तुत करना है एक चित्र,
कि एक तरफ मोदी संसद का उद्घाटन कर रहा है और दूसरी तरफ
लोग विरोध में सड़कों पर हैं, विपक्षी
पार्टियां समारोह में नहीं आ रही हैं।
फिर कहते हैं कि विपक्ष को पूछा
नहीं। अब या तो बहिष्कार कर लो या भागीदार हो जाओ। सांसद विपक्ष के
भी हैं, संसद भवन विपक्ष का भी है।लेकिन निर्माण से
लेकर उद्घाटन तक विपक्ष ने रोड़े ही अटकाए हैं। कुछ नही
मिला तो भाई उद्घाटन में राष्ट्रपति क्यों नहीं?
कांग्रेस सरकार होती तो उद्घाटन कौन
करता? निश्चित रूप से कोई गांधी। फिर न राष्ट्रपति बड़ा होता न प्रधानमंत्री। तब गांधी परिवार से कोई
प्रश्न पूछता? कुछ विपक्षी कह रहे हैं कि सत्ता
बदलने पर दोबारा उद्घाटन करवाएंगे। यही आशा है आपसे, जब तक देश की हर सड़क, मोहल्ला, हर इमारत गांधी या नेहरू के नाम से न हो उसे enemy
property act के तहत जब्त कर लें। फिर
समस्या आई सेंगोल। ये नया डंडा मोदी कहां से ले आया। नेहरू जी की सुनहरी छड़ी थी
सुनहरी छड़ी रहने देते, जबरदस्ती सत्ता के हस्तांतरण से जोड़
रहे हैं। किसी को दकियानूसी, ब्राह्मण वाद और
न जाने क्या क्या दिख रहा है सेंगोल में।
इससे एक बात प्रमाणित अवश्य होती है
कि नेहरू को भारतीय परंपराओं और आस्था की लेशमात्र भी चिंता नहीं थी। न ही समझ।
उन्हें सत्ता के प्रतीक के रूप में धर्मदंड सौंप कर ईश्वर का प्रतिनिधि बनाया गया
था, और उन्होंने उसे एक छड़ी कहकर संग्रहालय में
रखवा दिया। अब धर्म और आस्था के उस प्रतीक का उपहास कर के विपक्षी पुनः
प्रमाणित कर रहे हैं कि उन्हें भारतीय संस्कृति से कितना मोह है। संभव है उन्हें
किसी बर्बर घुसबैठिये की तलवार सत्ता का प्रतीक अधिक लगती हो क्योंकि उनकी आस्था
उस तरफ झुकी हुई है। धर्म संस्कृति एक तरफ रख भी दें तो विचार करें कि चोल साम्राज्य की संस्कृति का प्रतीक संसद में लाया जा रहा है वह ऐसे
समय में कितना महत्त्वपूर्ण हैं जब विपक्ष ने देश को क्षेत्र, भाषा, धर्म, जाति, यहां तक कि दूध
पर भी बांटने के सभी प्रयास कर लिए हैं। यहां तमिल संस्कृति को भारत का अभिन्न
हिस्सा दर्शाने का प्रतीक है सेंगोल।
दक्षिण में द्रविड़ संस्कृति के नाम
पर द्रविडनाडु की मांग पर सीधा विराम लगाने वाला कदम है। सेंगोल या धर्मदंड तमिल संस्कृति नहीं उत्तर से दक्षिण तक एक भारत,
एक संस्कृति का प्रतीक है। भाषा भले अलग है लेकिन हम एक
हैं। कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस से अमूल बनाम नंदिनी का विवाद
छेड़कर
लोगों को भड़काने की जो कोशिश की वह
अब स्टालिन तमिलनाडु में लाने का प्रयास कर रहे हैं। कहां ग्लोबल ब्रांड बनाने की
बात हो रही है और कहां कांग्रेस और स्टालिन जैसे लोग कर्नाटक बनाम गुजरात का विवाद
खड़ा कर रहे हैं।क्यों यह स्थापित करने कर लगे हैं कि राज्य भारत का हिस्सा नहीं
हैं। दक्षिण में हिंदी को लेकर लोगों को भड़काया जाता है, बंगाल में उत्तर प्रदेश के लोगों को बोहिर्गतो कहकर भड़काया
जाता है, पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद को बढ़ावा
दिया जाता है, हरियाणा में खिलाड़ियों के चेहरे के
पीछे से राजनैतिक दांव पेंच चले जाते हैं। रोहिंग्याओ और बांग्लादेशियों के प्रति इतनी
सद्भावना और हिंदुओं के प्रति इतनी नफरत क्यों भरी है इन विपक्षी पार्टियों में?
क्यों हिंदू हिंदू न होकर ओबीसी,दलित,यादव,कुर्मी, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ बनाया जाता है। बांटना जरूरी
है क्या? कर्नाटक मंत्रिमंडल की सूची आई है देखने
लायक है।
केवल और केवल फूट डालो और राज करो की
नीति पर चलते हुए विपक्ष भारत में फूट डालने का भरपूर प्रयास कर रहा है। कर्नाटक
में जाकर उत्तर भारतीयों को बाहर का बताते
हैं। पंजाब में जाकर बिहारियों को भैये
बोलकर अपमान करते हैं। कश्मीर में आजादी के सपने दिखा कर पीढ़ियां खराब कर दी हैं। गुजरात को तो जैसे ये देश का हिस्सा मानते ही नहीं। मोदी गुजराती है तो
मोदी के विरोध में सारे गुजरात के प्रति द्वेष है। गुजरात के उद्योगपतियों के
प्रति द्वेष है। पालते रहें। देश में जो बोलते हैं सो बोलते हैं देश के बाहर जाकर जब कहते हैं आप हमारी
राजनीति में हस्तक्षेप कीजिए। तब लगता है नहीं साहब आप एंटी नेशनल ही हैं।
और आपका विरोध मोदी से नहीं इस देश से है। इस देश की एकता से है। आप इस देश को
तोड़ने का भरकस प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में सेंगोल जैसे प्रतीक आपके सभी प्रयासों पर पानी फेरने के लिए काफी
हैं।
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