अर्जुन दातून चबाते हुए सोच रहे थे कि कल जो अंतिम तीर उन्होंने चलाया था अगर दो डिग्री साइड से निकाल देते तो दुर्योधन की नाक में लगता और वो नकटा हो जाता। सोचते ही चेहरे पर हंसी आ गई। वे दातून का स्वाद ले ही रहे थे कि अचानक Whatsapp पर मैसेज आया – "आज चक्रव्यूह रचा गया है। पंद्रह मिनट में Standup Meeting है। ऑनलाइन आओ।"
अर्जुन के मुंह से निकला "अरे दद्दा रे।"
दातून वहीं फेक दी, कुल्ला करने का भी समय नहीं था। आनन फानन में ऑनलाइन हो गए। मीटिंग चालू हो चुकी थी।
मेनेजर कह रहे थे – "चक्रव्यूह कोई बड़ी बात नहीं है। हमने ऐसे बहुत से चक्रव्यूह देखे हैं। अर्जुन इन सबको पंद्रह मिनट में चक्रव्यूह का ओवरव्यू दे दो। मैं चाहता हूं सब लोग Participate करें, Team work दिखना चाहिए।"
अर्जुन ने कहा – "चक्रव्यूह भेदना मैं जनता हूं, मैं लीड करता हूँ।"
मैनेजर ने कहा – "तुमको लीड करने की बहुत जल्दी रहती है। मैं अपर मैनेजमेंट से बात कर रहा हूं, और जैसा होगा बता दूंगा।"
अर्जुन बोले – "अरे पोजिशन नहीं मांग रहा हूं। ये कह रहा हूं ये काम मेरे को आता है मुझे कर लेने दो।"
मैनेजर ने लगभग डांटते हुए कहा –"इसीलिए तो तुम लीडर नहीं बन पाए अब तक। लीडर वो होता है जो अपने नीचे काम करने वालों को ग्रूम करे। जो तुम्हें आता ही है तो वो दूसरों को सीखने दो। मेंटर बनो।"
"अरे लेकिन ये ट्रेनिंग का टाइम नहीं इंसीडेंट का टाइम है।"
"तुम एक काम करो उधर ये गुरुग्राम वाले सुशर्मा को फॉलो करो और मुझे रिपोर्ट करो। चक्रव्यूह मैं देख लूंगा। मेरे को भी आता है।"
"अरे लेकिन..."
"जो कहा वो करो।"
"सोच रहा हूं सिक लीव ही ले लूं फिर।"
"मैं तुम्हें कुछ बड़ा करने के मौका दे रहा हूं। तुम चक्रव्यूह पे अटके हो! ऐसे बड़े मौके पर सिक लीव कायर लेते हैं। सुशर्मा पूरे त्रिगर्त का मामला है। उसके पीछे जाओ!"
" सुन तो लीजिए..."
"पहले ये बताओ ये बनियान पहन में मीटिंग में कैसे आए? आए तो आए वीडियो भी ऑन कर रखा है।"
"सॉरी" कहते हुए अर्जुन चुपचाप निकल गए।
मैनेजर ने गुरु द्रोणाचार्य को फोन लगाया। "गुरुजी ये क्या घिटोरनी फैला दी आज? ये क्या चक्कर चलाया है?"
"चक्कर नहीं है चक्रव्यूह है। समझ लो प्रोग्राम लाइफ साइकिल में दिक्कत आ रही है। अपने सबसे बढ़िया रिसोर्स को भेजो! ये बहुत कठिन काम है।"
"पर थोड़ा आइडिया तो दे देते तो तैयारी करके आते! वैसे स्कोप ऑफ वार में आता है ये?"
"जब SOW sign हो रहा था तब ध्यान कहां था? अब तो आपने बेस्ट रिसोर्स को भेजो वरना हार मान लो!"
मैनेजर ने दूसरी मीटिंग बुलाई। "देखो अर्जुन आज अर्जनगढ़ गया है। चक्रव्यूह में कौन जाएगा?"
नकुल ने कहा - "आप करने वाले थे?"
"हां लेकिन मैं तुम लोगों को खुद को Prove करने के मौका देना चाहता हूं। ऐसे ही समय में लीडर्स बनते हैं। बताओ कौन जाएगा?"
सहदेव ने दाढ़ी सहलाते हुए कहा - "कर तो हम लेंगे लेकिन हमको पता नहीं है कि करना क्या है। कुछ पता ही नहीं कि क्या करना है तो जाकर क्या करेंगे?"
"अरे इतना एक्सपीरियंस है सबको, सब महारथी हो। जाओ!"
इतने में अभिमन्यु का प्रवेश होता है।
"क्या चर्चा हो रही है?"
"कुछ नहीं एक चक्रव्यूह भेदना है! सोच रहे हैं कौन जाएगा।"
"मैने बूटकैंप में सीखा था। कहो तो चला जाऊं?"
"तुम तो फ्रेशर हो लेकिन जा सकते हो। हमको ऐसे लोगों की जरूरत है जो मुसीबत के समय आगे आते हैं।"
"करना क्या है?"
"अभी पता नहीं।"
"कुछ पता है?"
"जितना तुमको पता है उतना ही हमको पता है।"
"आपको क्या पता है?"
"वही पता है जो तुमको पता है।"
"आपको क्या पता है कि मुझको क्या पता है?"
"हमको पता है कि तुम नए हो तुमको तो पता होना ही चाहिए।"
"हमको पता है कि आपको नहीं पता है कि हमको क्या पता है।"
"जलेबी मत बनाओ, ये बताओ जाओगे या नहीं?"
"घुस तो जाऊंगा लेकिन निकलना नहीं आता।"
"घुसना इंपोरेंट हैं अभिमन्यु। निकलने का क्या ही जिस रास्ते जाओ उसी से वापस आ जाना!"
"कोई एस्केलेशन हुआ तो?"
"बाकी महारथी ऑनकॉल रहेंगे। सब का कैलेंडर बुक है नहीं तो तुमको नहीं जाना पड़ता।"
इस तरह फ्रेशर अभिमन्यु को क्लाइंट के चक्रव्यूह में अकेले भेज दिया गया। परिणाम वही हुआ हो ऐसी परिस्थिति में होता है। सारे सीनियर रिसोर्स जयद्रथ के साथ मीटिंग में बिज़ी हो गए। भीषण escalation के बाद अभिमन्यु को टर्मिनेशन लेटर पकड़ा दिया गया।
अगले दिन जब मामला बिगड़ा तो अर्जुन ने ही कहा, मैं End of day तक Resolve कर दूंगा नहीं तो रिजाइन कर दूंगा। फिर अर्जुन ने भयंकर troubleshooting की, अर्जुन को root cause नहीं मिला।
अंत में थक हार कर जब अर्जुन रेजिग्नेशन मेल डालने ही वाला था कि उसे root cause दिख गया और उसने Issue fix कर दिया। इश्यू का root cause जयद्रथ ही था जो छुपा बैठा रहा।
मैनेजर ने सुसम्पादित मेल लिखा और बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया।
इसका लब्बोलुआब यह है कि एक होता है अर्जुन, जिसे पता है कि क्या करना है, उसे हर समय किसी उटपटांग काम में व्यस्त रखा जाता है।
फिर होते हैं नकुल और सहदेव, जो बस होते हैं। वे क्या करते हैं और क्या जानते हैं यह और कोई नहीं जानता। उसके बाद आते हैं इंटर्न, जो आत्मविश्वास में सरप्लस और ज्ञान में डेफिसिट होते हुए भी हर काम में कूद जाना चाहते हैं।
भयंकर escalation में काम अर्जुन ही आता है लेकिन तब तक दो चार अपनी नौकरी गँवा चुके होते हैं। अंत में वेरिएबल अर्जुन का भी कटता है क्योंकि टीम Zero escalation वाला goal achieve नहीं कर पाती।
इन सबके ऊपर होता है मैनेजर, जिसका तो आप सबको पता ही है क्या करता है।
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