गुरुवार, 10 मई 2018

कश्मीरियत

एक छोटे से खूबसूरत जंगल मे छोटे छोटे प्यारे प्यारे खरगोश रहते थे ।  खरगोश अपनी खुशी मे मगन रहते, कंद, मूल, फल खाते । झील का मीठा पानी पीते ।  फूलों पे चलते ।  बर्फ मे फुदकते  | पंछी गाना गाते और खरगोश मस्ती मे सोते । 

जब सूरज निकलता तो पहाड़ों पे ऐसा रंग बिखरता कि पहाड़ सोने के और धरती चाँदी की हो जाती | केसरिया क्षितिज पुकारता और खरगोश बिना डर के क्षितिज तक दौड़ लगाते | फूलों से चारों तरफ खूबसूरत रंग बिखरते और केसर की खुश्बू से हवाएँ महकती रहतीं | 

जो भी राहगीर उधर से गुजरता बस वही खो जाता।  खरगोशों की कोमलता और मिलने मिलाने की फितरत और चारों तरफ बिखरी सुंदरता हर किसी से कहती बस कहीं स्वर्ग है तो यहीं है।  और हर कोई वहीँ बस जाने की तमन्ना करता।  

एक दिन कुछ जंगली भेड़िए वहाँ घूमने के बहाने आए और ललचा गए | धीरे धीरे वहीं बसने लगे , खरगोशों से कहते तुम जो खाते  हो वही खाएंगे , तुम्हारे साथ खेलेंगे | खरगोशों ने सोचा रहने दो क्या फ़र्क पड़ता है , बहुत बड़े पहाड़ है , बहुत जगह है । 

भेड़िए कब तक कंद मूल खाते, कब तह अपनी फितरत छुपाते।  अभी भूख कब तक सह पाते।  पहले उन्होने धीरे धीरे अपना कुनबा बढ़ाना शुरू किया , और जब वो गिनती में ज्यादा हो गए तब खरगोश गायब होने लगे ।  
रोज भेड़िये एक खरगोश को खाते और अपना कुनबा दो दूनी बारह के हिसाब से बढ़ाते जाते। धीरे धीरे खरगोश कम होने लगे और भेड़िए बढ़ते रहे।  भेड़ियों की भूख और कुनबा दोनो बढ़ते ही जाते, न आदि न अंत | 

एक दिन खरगोशों को अचानक अहसास हुआ कि उनके पड़ोसी बदल गये हैं ,उनके रिश्तेदार मारे गये हैं , उनके खाने के खेत उजड़ गये हैं।   

झील मे खरगोशों की खालें और हड्डियां तैरती हैं। हवाओं मे केसर की जगह खून की महक आने लगी है | पहाड़ों पर धुआँ रहने लगा है | परिंदों के गाने की जगह भयानक गुर्राहट सुनाई देने लगी है।  कुछ तो बदल रहा था, एक दिन जंगली भेड़ियों ने खुलकर कहा जंगल हमारा है और ये खरगोश हमारा खाना।  
कुछ खरगोश जान बचा कर भाग गये , कुछ रह गये।  जो रह गये वो भी भेड़ियों के झुंड मे शामिल हो गये या उनका खाना बन गए।  

मौका देखकर भेड़ियों ने पड़ोस के जंगल से कुत्तों, गीदड़ों और लोमडियों को साथ रहने बुला लिया | अब चारों तरह एक ही तरह के जानवर दिखाई देने लगे | जब चाहे खरगोश को कुनबे समेत खा जाते और जो चाहे करते। जंगल मे किसी का बाहर निकलना मुश्किल हो रहा था , जो निकलता उसके  वापस आने की संभावना तब तक नहीं होती जब तक कि वो वापस नहीं आ जाता ।राहगीरों का आना काम हो गया और चारों तरफ भयानक सन्नाटा छा गया।  

जब बाहर के जंगलों मे ये खबर फैली तो भेड़ियों को लगा कि फ़ज़ीहत हो रही है।  कोई एक तो जंगल में आता नहीं और भेड़ियों को कोई मन लगाता नहीं। क्या किया जाए , तब उन्होने धोखा देने के लिए एक नया राग अलापा।  भेड़िए और खरगोश भाई भाई हैं। हमारी नियत अच्छी है | सब अमन के पुजारी है | आतंक तो उन शेरों का है जो जंगल की सीमाओं पर खड़े होकर जंगल बचा रहे हैं।

पड़ोस के जंगल से कुछ सियार भेड़ियों से मिली भगत कर बैठे। सियार भेड़ियों की फेकी हड्डियां खाते, मांस नोचते और बहार के जंगलों में हुआं -हुआं कर कहते सब ठीक है।  भेड़िये शांति बनाये हुए हैं। जिन सियारों को मुफ़्त की हड्डियाँ मिल रहीं थी वो भेड़ियों के चमचे बन गए। भेड़ियों का फरेब रुका नहीं और भागे हुए खरगोशों ने दुनिया को आप बीती सुनाई तब भेड़ियों को लगा हम तो मुफ्त बदनाम हुए जाते हैं।  ये सियार अपना फ़र्ज़ क्यों नहीं निभाते हैं।  

सियारों को भी तो चुकानी थी उन हड्डियों की पूरी कीमत, तब उन्होने भेड़ियों के धोखे को नया फैंसी सा नाम दिया  - कश्मीरियत | 

कश्मीरियत का नाम मिलते ही भेड़िए सफेद हो गये, कत्ल जायज़ हो गये और लहू को आब कहा जाने लगा। खरगोश बाहरी और भेड़िये मालिक बन बैठे। फिर कश्मीरियत का नंगा नाच शुरू हुआ। कश्मीरियत कभी पत्थरों की बरसात करती , कभी भी किसी को भी कुचल देती।  कभी घूमते परिंदों को मार देती।  कभी गुज़रते राहगीरों का खून पीने दौड़ती। कश्मीरियत रात भर खून पीकर सुबह बड़ी मासूमियत से दुनिया के सामने आती और कहती मुझे बदनाम कर रहे हैं सब।  

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