स्थान - श्रेष्ठि पदीजरा का मंत्रणा कक्ष |
समय - रात्रि का तृतीय प्रहर |
मंत्रणा गहन थी , विषय गूढ़ था | चर्चा का विषय था कि अगर दक्षिण में युवराज की पराजय होती है तो उन्हें किस प्रकार बचाया जा सके |
किस प्रकार उनकी अवश्यंभावी पराजय को विजय के रूप में परिवर्तित कर के दर्शाया जाए | युवराज का खरमेघ यज्ञ समस्त जम्बूद्वीप को हार चुका था और दक्षिण में स्थिति कुछ ऐसी ही थी | मंत्रणाकक्ष में श्रेष्ठि पदीजरा मोदी शमन मन्त्र का अखंड जाप कर रहे थे |
विशेष रूप से महिषी गारिकसा के साथ आज मोहतरमा तदखारब के साथ महाश्रेष्ठि आलुकपूडी अपने भृत्य लहुरा-लवंक के साथ पधारे थे | जातज्ञ बीशर और वींघसा भी उपस्थित थे| आलुकपूडी अपनी आलू जैसी देहयष्टि और पूरी जैसी चिकने चुपडे समाचार निर्मित करने के लिए प्रसिद्द थे |
इनका पूरा जीवन धींगा वंश की रसोई मेंआलू छीलते हुए निकला | ये सीधी से सीधी बात को मसाला लगाकर चटपटा बनाने में सिद्धहस्त थे | कुल मिला कर समाचार के नाम पर इनके पास मचा सार होता |
श्रेष्ठि पदीजरा ने डकार भरते हुए कहा - अभी अभी हुबली से सोलह मछली , बारह झींगे और बत्तीस केंकड़े खा कर आ रहा हूँ | एक में भी धींगा कुमार की विजय का स्वाद नहीं आया | महिषी कारिगसा आपका क्या अनुभव था ?
महिषी ने कहा मैंने तो बहुत रसम पी लिया | आपके लिए दो घड़े भर रसम लायी हूँ | सुनिए , आज तो कितने सुन्दर बंगले देखे, देखो चित्र खिंचवाए हैं बंगलों के साथ | एक मुझे भी दिलवा दो बांग्ला इसी प्रदेश में।
श्रेष्ठि पदिजरा ने एक और डकार भरते हुए कहा "उसी रसम में डुबकी लगा लेती जड़मति। हम अभी एक उद्देश्य से दक्षिण के इस भूभाग में आये हैं। आप कहाँ छायाचित्रों में व्यस्त हैं,छुट्टियां बिताने आयी हैं क्या?
महिषी ने एक बर्तन दिखाते हुए कहा मुझे पता है आप यहाँ पेट भर खाने आये हो और पेट भरे बिना नहीं जाओगे। देखो ये सूखी मछली का अचार लायी हूँ आपके लिए।
श्रेष्ठि के मुंह में बंगाल की खाड़ी जितना पानी आ गया। जीभ लपलपाते हुए बोले लाओ रसम , थोड़ा चावल और ये अचार लाओ। चख के देखूंगा।
महाश्रेष्ठी आलुकपूरी ने तंदूर होते हुए कहा सत्रह जन्मों की भुखमरी भरी हैं तुम लोगों में। भुक्कड़ो, धींगा कुमार के अश्वमेघ का हाल कहो। उनके यहाँ पहुँचने पर लोगों में उत्साह दिखा ?
महिषी ने अपने मुख पर लगे तवे जैसे काले चश्में ठीक करते हुए कहा , कदाचित मुझे तो काला काला दिख रहा है।
श्रेष्ठि बोले अरे जड़मति चश्मा उतार , दिन का वृतांत कह।
महिषी ने कंठ साफ़ करते हुए कहा भगवा मुक्त दक्षिण का स्वप्न साकार होता नहीं दिखता | जम्बूद्वीप के सम्राट ने जब से इधर डेरा डाला है, तब से धींगा कुमार फंसते दिख रहे हैं। सभी ने दक्षिण में कुमार के खरयान के पहिये उनके ही गले में डाल दिए हैं। सम्राट के सम्बोधन में लोग उमड़ पड़े हैं। वहां मोतीनंदन की प्रतिमा भी दृष्टि चुरा कर सम्राट की जय कहती दिख गयी थी।
श्रेष्ठि ने चौंकते हुए कहा - क्या ?? मोतीनंदन ही सम्राट की जयकार करते दिखे ?
महिषी ने कुछ लज्जा का आवरण ओढ़ते हुए कहा ये तो मेरा उनके प्रति प्रेम ही है, और उनका मेरे प्रति। उनके स्मरण के बिना मेरे जीवन में बचे ही क्या ?
आज जब सम्राट के उद्बोधन में युवराज के मतलब का मैं कुछ नहीं निकाल पायी तब मुझे मोती नंदन की प्रतिमा दिखी , तब बस यही समझ आया कि मोतीनंदन की दृष्टि को ही इस जनसभा की सफलता का श्रेय दे दूंगी , लोगों के ये बताउंगी कि लोग सम्राट को सुनने नहीं मोतीनंदन की प्रतिमा को देखने आये हैं ।
महाश्रेष्ठी ने पूछा किन्तु स्थिति कैसी है? आपको लगता है , इस प्रदेश में धुस्सी की सत्ता बचेगी ? युवराज की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।
पदीजरा ने कहा मैं मंगलुरु गया था , वहां के लोगों ने मुझे मेडिसन की स्मृति करा दी। सम्राट जनमानस को मुग्ध कर देते हैं और हमारे कुमार अपनों को ही क्षुब्ध कर देते हैं। इस बार भी युवराज की स्थिति का कुछ कहा नहीं जा सकता।
इतने में मोहतरमा तदखारब ने बीच में बोला - लाहौर विलायत कुवैत इलाहबाद डाक-बंगला , तुम दोनों अभी धुस्सी की चिंता में घुसी है , उदर वो चलता फिरता बैत-उल-खला ने फिर मुँह खोल दिया है , इस बार उसके मुंह से जिन्न निकला है।
अमको समाज में नई आता ए कि इसका मुंह कब बंद होयेगा। हर बार जुलाब करता है खबीस।
पदीजरा ने चावल और रसम का एक गोला बनाया और मछली का अचार उसपर रखकर मुंह में ठूंसा और मुष्टिका प्रहार करते हुए कहा मिल जाए तो दो दो हाथ करूँगा इसके साथ।
उधर कोने खड़ा हुआ संतरी नशेगजि झूम रहा था|उसकी आखें लाल थी,दाढ़ी में सुबह खायी हुई, नारियल की चटनी लगी थी |चेहरा भन्नाया हुआ था।
श्रेष्ठि ने उससे पूछा अब तक नशे में हो?कहाँ गए थे आज?
नशेगजि ने झूमते हुए कहा श्रेष्ठि मैं चित्तमंगलुरु गया था , लोगों ने चित्त कर दिया। मुझे जाने नहीं दिया अथवा समस्त छात्रव्यूह तोड़कर अभीमुन्नू बन जाता।
महाश्रेष्ठी आलुकपूड़ी के तंदूर में जैसे कोयला पड गया हो , बोले - तुम संतरी के संतरी रहोगे। वो स्थान चिक्कमगलुरु है ,छात्रव्यूह नहीं होता चक्रव्यूह होता है और अभीमुन्नू नहीं होता अभिमन्यु होता है। कहा था पढ़ लो पहले लेकिन नहीं,पढ़ना लिखना है नहीं आजादी चाहिए । कितने सस्ते नशे करोगे? अरे जड़मति की दुर्गति अभी वहाँ सत्ता भी अपने दुस्सी की है। अपने ही पक्ष पे वार करता है?
महाश्रेष्ठी ने पदीजरा की और दृष्टि डाली और कहा, श्रेष्ठि कुछ भी किये सम्राट के आयोजन होते बड़े आनंद दायक हैं। मैं और मेरा ये भृत्य लहुरा गए थे धुस्सी से मिलने , धुस्सी तो पिस्सू की तरह रक्त पी रहा है। इसको अपना अलग ध्वज मागने की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी ? लोग क्रोधित हैं।
इतने में श्रेष्ठि वींघसा ने कहा , स्थिति तो भयावह होती जा रही है। धुस्सी का चालीस लाख का समय सूचक यंत्र उनके गले में अटक गया है। हिन्दुओं को बांटने की नीति पर पानी फिर गया है, और उत्तर दक्षिण के विवाद को हवा देने के चक्कर में धुस्सी फुस्सी हो गए हैं। सम्राट का भाषण लोग बिना अनुवादक ऐसे सुन रहे हैं जैसे सब हिंदी जानते हों। कन्नड़ हिंदी का अंतर कहाँ रह गया है? सम्राट ने कुमार के गीले आटे में घड़ा भर पानी डाल दिया है। अब हमें लगता है कि कुमार को इस पराजय की कालिख से बचाने के उपाय ढूंढने होंगे। अभी से युवराज बचाओ अभियान चलाना होगा। हार को तो धुस्सी पर मढ देंगे। लेकिन कालिख हमें अपने मुंह पर लगवानी होगी।
इसपर जाताज्ञ ने अपने कानों से हैडफ़ोन निकालते हुए कहा, मुझे तो आदत है। बैठ जायेंगे सब काला कर के। श्रेष्ठि पदीजरा के गले में शायद कोई मछली अटक गयी थी।
भृत्य लहुरा ने हिचकिचाते हुए कहा , वो विलाप समारोह के लिए रुदालियाँ बाहर से बुलवानी है या हम सब मिलकर कर लेंगे?
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श्रेष्ठी पदीजरा ने रात्रि विश्राम का आदेश दे दिया । कहा जाओ कल प्रातः शीघ्र उठकर तैयारियाँ करनी हैं । समस्त रुदालियाँ आज रात्रि भर दर्द भरे गीत सुनें ताकि फूट फुट कर रोने में आसानी हो । आंसू बनावटी नहीं लगने चाहिए । विलाप जोरदार होना चाहिये । युवराज ननिहाल गए हैं या नहीं इसकी सूचना अभी तक हमें प्राप्त नहीं हुई है । सबको शयन के लिये तो कह दिया लेकिन श्रेष्ठी की निद्रा को चिंता जैसे केंकड़े की तरह खींच कर वापस धरातल पर ले आती । और स्वप्न में उनके मुंह तक आया थाल छूट जाता ।
पदीजरा के पेट से मछलियाँ, केंकड़े, कछुए ,खरगोश, सूकर , गौ, कुक्कुट आदि पशु पक्षी पेटा को पुकार रहे थे । चिंताग्रस्त श्रेष्ठी फिर भूख से व्याकुल हो रहे अपने दोनों हाथो में प्लेट लेकर बैठे थे, समझ नहीं पा रहे थे कि क्या खाएं और कैसे खाएं ।
उस तरफ महिषी वील्लप का समय काटे नहीं कट रहा था , काटे नहीं कटते दिन ये रात की तर्ज़ पर उनका ह्रदय नृत्य कर रहा था । वे सोच रही थी कि किस प्रकार ये परिणाम का दिन निकल जाए । युवराज के प्रेम में अभिभूत महिषी के मन में था कुमार हारेंगे तो उनको सबका दिल जीतने का श्रेय तो वही देंगी ।
उधर कारगिसा की साँसें ऊपर नीचे हो रही थीं। वे समझ नहीं पा रही थीं की आगे क्या होने वाला है। इस बार युवराज पर प्रहार तीव्र होंगे और रुदन समारोह बहुत जोर से रोना था। बुद्धि के साथ देह भी जड़ हो रही थी ,बस एक ही बात बड़बड़ा रही थीं, आगे आगे देखिये होता है क्या।
यह केन प्रकार रात्रि विश्राम पूर्ण हुआ और प्रातः होते ही श्रेष्ठी के सभागार में हलचल मच गयी। सुबह से युद्ध के परिणाम सामने आने लगे और और उदासी सभागार में बढ़ती जाती थी, सिसकियाँ शुरू हो गयी थीं। रुदालियाँ चूड़ियां तोड़ने में लग गयीं। सदमे से पदीजरा का मुंह सूखा था।
जातज्ञ का मुंह लटक कर वैसा हो गया था जैसा घर के आगे लटका नजर वाला जूता।धीरे धीरे रोने का माहौल बनने लगा था।आंसूं आँखों में आ गये थे।सभी रुदालियों की आँखों में इतना पानी था जितना यमुना में मिलती हिंडन में । पदीजरा की आखों में तो पूरा कालिंदी कुञ्ज समाया था । मन भारी था आवाज़ हल्की ।
बार बार कह रहे थे मैंने पहले कहा था ऐसा ही होगा। तभी अचानक एक जोर का धमाका हुआ ,उन्हें लगा सन्देश आ गया , रुदन प्रारम्भ करना है और सब फूट फूट कर रोने लगे।
उधर युद्ध में हुआ यह था की चिंवी के युद्ध में पराजित हो भाग निकले थे। युद्ध का परिणाम अत्यंत रोचक हो गया था। हशा ने तेज़ी से राज्य पर वर्चस्व बनाना प्रारम्भ कर दिया। किन्तु वहां का एक क्षेत्रीय योद्धा ने हशा का रास्ता रोक दिया। योद्धा हद्दकुमार को संयोगवश चिंवी का खर मिल गया और वो उसे अपने साथ ले गए। हद्दकुमार उस खर को अश्व मानकर उसपर अपनी सवारी निकाल रहे थे।
हशा ने उसे बताने का प्रयत्न किया यह खर है। किन्तु वह न माने। युद्ध के लिए ललकार पर वह न माने। खर को बांधे बिन हशा की विजय पूर्ण नहीं थी और अब हद्दकुमार न युद्ध करते न खर को छोड़ते । उधर चिंवी के क्षत्रपों ने हद्दकुमार को खरारूढ़ देखा तो उन्हें ही स्वामी मानने को तत्पर हो गए।
हद्दकुमार के पास सैंतीस सैनिक थे और धींगा की सेना में दुगने फिर भी वे हद्दकुमार की क्षेत्रीय सत्ता स्वीकार करने के लिए तत्पर थे।
दरअसल कुछ दिन पूर्व उनके सिंहपुर तीर्थ की यात्रा में , उनके साथ इस प्रकार का समझौता किया जा चुका था और उन्हें पेट भर के मुद्राएं दी जा चुकी थीं।
उन्होंने लड्डू दोनों हाथों में धरे हुए थे। बस इसी को घोषित करने के लिए नागडा बजाया जा रहा था। जिसे सुनकर पदीजरा के सभागार में अखंड विलाप प्रारम्भ हो गया था।
विलाप रुकता ही न था कि तभी एक संतरी ने समाचार दिया , युवराज हार गए किन्तु हशा भी नहीं जीते। सभी रुदालियो के सुर बदलते समय नहीं लगा। एक आँख से रोते एक से हँसते थे। दांत निकालते और हूँ हूँ करते थे। थोड़ी देर में जब सब शांत हुए तब सबसे पहले आदु नदोवि चीख रहे थे हम तो ज़ायका लेंगे,बीसेक कचौरियां करारी सिकवा दीजिये और बाकी छांछ लस्सी में नाश्ता चल जायेगा।कोई तो खाना देदो ।
अब सबने रणनीति पर विचार किया , युवराज तो चले गए हैं , पर हम इसे उनकी पराजय माने या जय ? भागने के कारण उनके सम्मान को ठेस लगेगी। क्या करें। राणनीति तैयार की गयी और एक सन्देश युवराज को भिजवाया गया ताकि उनका मनोबल ऊँचा हो ।
आप हारे नहीं है युवराज, वो तो सम्राट विजयी हुये हैं। परन्तु हद्दकुमार अब नए क्षत्रप है । आप हार नहीं सकते । ये धुस्सी का दोष है , वही हारे हैं आप नहीं । किसी एक प्रदेश की हानि आपकी हानि कदापि नहीं है। आपके आने से तो हम सब के जीवन में एक अलौकिक #दिव्य_स्पंदन हुआ है । कुमार चुनाव तो आते जाते रहते हैं । आप क्यों चिंतित होते है ? जय पराजय लगी रहती है। आप अपनी आगामी छुट्टियों पर ध्यान केंद्रित करें। नानी जी को हमारी तरफ से दंडवत प्रणाम कहिये।
इधर सभी ने यह सन्देश फैलाना शुरू कर दिया कुमार नए चाणक्य बन गए हैं। हार कर भी सम्राट को राज्य नहीं दिया। हद्दकुमार के कन्धों पर बैठकर अब राज्य चलाएंगे। हद्दकुमार अब कुमार के नए खर थे। दूषण तो उनके दल में प्रचुर मात्रा में थे। उसके पश्चात जब भी कोई कुछ भी कहता थो सभी यह कहते -
पराजय के लिए युवराज दोषी नहीं हैं, उन्हें गलत फसाया गया है। उन्होंने कोई युद्ध नहीं हारा है। वास्तव में तो युवराज युद्ध के समय घटनास्थल पर थे ही नहीं।
प्रथम दृष्ट्या युवराज कभी नहीं हारते। मतदाताओं ने गलत निर्णय दिया है।दोष-मढ कानून का गलत प्रयोग हुआ है। युद्ध भी जांच में कठिन पाए गए हैं।यह पराजय नहीं है दूसरे की विजय है। युवराज की अभी आयु ही क्या है मात्र सैंतालीस?पचास के भी नहीं हुए।यह अन्य्याय है #हमारे_युवराज_निर्दोष_हैं।
सभी श्रेष्ठिगण शयन हेतु चले गए। उधर हशा का खेल शरू हुआ था। महायुद्ध आने वाला था , पराजय स्वीकार्य नहीं थी। समय चल पड़ा था।
समय - रात्रि का तृतीय प्रहर |
मंत्रणा गहन थी , विषय गूढ़ था | चर्चा का विषय था कि अगर दक्षिण में युवराज की पराजय होती है तो उन्हें किस प्रकार बचाया जा सके |
किस प्रकार उनकी अवश्यंभावी पराजय को विजय के रूप में परिवर्तित कर के दर्शाया जाए | युवराज का खरमेघ यज्ञ समस्त जम्बूद्वीप को हार चुका था और दक्षिण में स्थिति कुछ ऐसी ही थी | मंत्रणाकक्ष में श्रेष्ठि पदीजरा मोदी शमन मन्त्र का अखंड जाप कर रहे थे |
विशेष रूप से महिषी गारिकसा के साथ आज मोहतरमा तदखारब के साथ महाश्रेष्ठि आलुकपूडी अपने भृत्य लहुरा-लवंक के साथ पधारे थे | जातज्ञ बीशर और वींघसा भी उपस्थित थे| आलुकपूडी अपनी आलू जैसी देहयष्टि और पूरी जैसी चिकने चुपडे समाचार निर्मित करने के लिए प्रसिद्द थे |
इनका पूरा जीवन धींगा वंश की रसोई मेंआलू छीलते हुए निकला | ये सीधी से सीधी बात को मसाला लगाकर चटपटा बनाने में सिद्धहस्त थे | कुल मिला कर समाचार के नाम पर इनके पास मचा सार होता |
श्रेष्ठि पदीजरा ने डकार भरते हुए कहा - अभी अभी हुबली से सोलह मछली , बारह झींगे और बत्तीस केंकड़े खा कर आ रहा हूँ | एक में भी धींगा कुमार की विजय का स्वाद नहीं आया | महिषी कारिगसा आपका क्या अनुभव था ?
महिषी ने कहा मैंने तो बहुत रसम पी लिया | आपके लिए दो घड़े भर रसम लायी हूँ | सुनिए , आज तो कितने सुन्दर बंगले देखे, देखो चित्र खिंचवाए हैं बंगलों के साथ | एक मुझे भी दिलवा दो बांग्ला इसी प्रदेश में।
श्रेष्ठि पदिजरा ने एक और डकार भरते हुए कहा "उसी रसम में डुबकी लगा लेती जड़मति। हम अभी एक उद्देश्य से दक्षिण के इस भूभाग में आये हैं। आप कहाँ छायाचित्रों में व्यस्त हैं,छुट्टियां बिताने आयी हैं क्या?
महिषी ने एक बर्तन दिखाते हुए कहा मुझे पता है आप यहाँ पेट भर खाने आये हो और पेट भरे बिना नहीं जाओगे। देखो ये सूखी मछली का अचार लायी हूँ आपके लिए।
श्रेष्ठि के मुंह में बंगाल की खाड़ी जितना पानी आ गया। जीभ लपलपाते हुए बोले लाओ रसम , थोड़ा चावल और ये अचार लाओ। चख के देखूंगा।
महाश्रेष्ठी आलुकपूरी ने तंदूर होते हुए कहा सत्रह जन्मों की भुखमरी भरी हैं तुम लोगों में। भुक्कड़ो, धींगा कुमार के अश्वमेघ का हाल कहो। उनके यहाँ पहुँचने पर लोगों में उत्साह दिखा ?
महिषी ने अपने मुख पर लगे तवे जैसे काले चश्में ठीक करते हुए कहा , कदाचित मुझे तो काला काला दिख रहा है।
श्रेष्ठि बोले अरे जड़मति चश्मा उतार , दिन का वृतांत कह।
महिषी ने कंठ साफ़ करते हुए कहा भगवा मुक्त दक्षिण का स्वप्न साकार होता नहीं दिखता | जम्बूद्वीप के सम्राट ने जब से इधर डेरा डाला है, तब से धींगा कुमार फंसते दिख रहे हैं। सभी ने दक्षिण में कुमार के खरयान के पहिये उनके ही गले में डाल दिए हैं। सम्राट के सम्बोधन में लोग उमड़ पड़े हैं। वहां मोतीनंदन की प्रतिमा भी दृष्टि चुरा कर सम्राट की जय कहती दिख गयी थी।
श्रेष्ठि ने चौंकते हुए कहा - क्या ?? मोतीनंदन ही सम्राट की जयकार करते दिखे ?
महिषी ने कुछ लज्जा का आवरण ओढ़ते हुए कहा ये तो मेरा उनके प्रति प्रेम ही है, और उनका मेरे प्रति। उनके स्मरण के बिना मेरे जीवन में बचे ही क्या ?
आज जब सम्राट के उद्बोधन में युवराज के मतलब का मैं कुछ नहीं निकाल पायी तब मुझे मोती नंदन की प्रतिमा दिखी , तब बस यही समझ आया कि मोतीनंदन की दृष्टि को ही इस जनसभा की सफलता का श्रेय दे दूंगी , लोगों के ये बताउंगी कि लोग सम्राट को सुनने नहीं मोतीनंदन की प्रतिमा को देखने आये हैं ।
महाश्रेष्ठी ने पूछा किन्तु स्थिति कैसी है? आपको लगता है , इस प्रदेश में धुस्सी की सत्ता बचेगी ? युवराज की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।
पदीजरा ने कहा मैं मंगलुरु गया था , वहां के लोगों ने मुझे मेडिसन की स्मृति करा दी। सम्राट जनमानस को मुग्ध कर देते हैं और हमारे कुमार अपनों को ही क्षुब्ध कर देते हैं। इस बार भी युवराज की स्थिति का कुछ कहा नहीं जा सकता।
इतने में मोहतरमा तदखारब ने बीच में बोला - लाहौर विलायत कुवैत इलाहबाद डाक-बंगला , तुम दोनों अभी धुस्सी की चिंता में घुसी है , उदर वो चलता फिरता बैत-उल-खला ने फिर मुँह खोल दिया है , इस बार उसके मुंह से जिन्न निकला है।
अमको समाज में नई आता ए कि इसका मुंह कब बंद होयेगा। हर बार जुलाब करता है खबीस।
पदीजरा ने चावल और रसम का एक गोला बनाया और मछली का अचार उसपर रखकर मुंह में ठूंसा और मुष्टिका प्रहार करते हुए कहा मिल जाए तो दो दो हाथ करूँगा इसके साथ।
उधर कोने खड़ा हुआ संतरी नशेगजि झूम रहा था|उसकी आखें लाल थी,दाढ़ी में सुबह खायी हुई, नारियल की चटनी लगी थी |चेहरा भन्नाया हुआ था।
श्रेष्ठि ने उससे पूछा अब तक नशे में हो?कहाँ गए थे आज?
नशेगजि ने झूमते हुए कहा श्रेष्ठि मैं चित्तमंगलुरु गया था , लोगों ने चित्त कर दिया। मुझे जाने नहीं दिया अथवा समस्त छात्रव्यूह तोड़कर अभीमुन्नू बन जाता।
महाश्रेष्ठी आलुकपूड़ी के तंदूर में जैसे कोयला पड गया हो , बोले - तुम संतरी के संतरी रहोगे। वो स्थान चिक्कमगलुरु है ,छात्रव्यूह नहीं होता चक्रव्यूह होता है और अभीमुन्नू नहीं होता अभिमन्यु होता है। कहा था पढ़ लो पहले लेकिन नहीं,पढ़ना लिखना है नहीं आजादी चाहिए । कितने सस्ते नशे करोगे? अरे जड़मति की दुर्गति अभी वहाँ सत्ता भी अपने दुस्सी की है। अपने ही पक्ष पे वार करता है?
महाश्रेष्ठी ने पदीजरा की और दृष्टि डाली और कहा, श्रेष्ठि कुछ भी किये सम्राट के आयोजन होते बड़े आनंद दायक हैं। मैं और मेरा ये भृत्य लहुरा गए थे धुस्सी से मिलने , धुस्सी तो पिस्सू की तरह रक्त पी रहा है। इसको अपना अलग ध्वज मागने की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी ? लोग क्रोधित हैं।
इतने में श्रेष्ठि वींघसा ने कहा , स्थिति तो भयावह होती जा रही है। धुस्सी का चालीस लाख का समय सूचक यंत्र उनके गले में अटक गया है। हिन्दुओं को बांटने की नीति पर पानी फिर गया है, और उत्तर दक्षिण के विवाद को हवा देने के चक्कर में धुस्सी फुस्सी हो गए हैं। सम्राट का भाषण लोग बिना अनुवादक ऐसे सुन रहे हैं जैसे सब हिंदी जानते हों। कन्नड़ हिंदी का अंतर कहाँ रह गया है? सम्राट ने कुमार के गीले आटे में घड़ा भर पानी डाल दिया है। अब हमें लगता है कि कुमार को इस पराजय की कालिख से बचाने के उपाय ढूंढने होंगे। अभी से युवराज बचाओ अभियान चलाना होगा। हार को तो धुस्सी पर मढ देंगे। लेकिन कालिख हमें अपने मुंह पर लगवानी होगी।
इसपर जाताज्ञ ने अपने कानों से हैडफ़ोन निकालते हुए कहा, मुझे तो आदत है। बैठ जायेंगे सब काला कर के। श्रेष्ठि पदीजरा के गले में शायद कोई मछली अटक गयी थी।
भृत्य लहुरा ने हिचकिचाते हुए कहा , वो विलाप समारोह के लिए रुदालियाँ बाहर से बुलवानी है या हम सब मिलकर कर लेंगे?
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श्रेष्ठी पदीजरा ने रात्रि विश्राम का आदेश दे दिया । कहा जाओ कल प्रातः शीघ्र उठकर तैयारियाँ करनी हैं । समस्त रुदालियाँ आज रात्रि भर दर्द भरे गीत सुनें ताकि फूट फुट कर रोने में आसानी हो । आंसू बनावटी नहीं लगने चाहिए । विलाप जोरदार होना चाहिये । युवराज ननिहाल गए हैं या नहीं इसकी सूचना अभी तक हमें प्राप्त नहीं हुई है । सबको शयन के लिये तो कह दिया लेकिन श्रेष्ठी की निद्रा को चिंता जैसे केंकड़े की तरह खींच कर वापस धरातल पर ले आती । और स्वप्न में उनके मुंह तक आया थाल छूट जाता ।
पदीजरा के पेट से मछलियाँ, केंकड़े, कछुए ,खरगोश, सूकर , गौ, कुक्कुट आदि पशु पक्षी पेटा को पुकार रहे थे । चिंताग्रस्त श्रेष्ठी फिर भूख से व्याकुल हो रहे अपने दोनों हाथो में प्लेट लेकर बैठे थे, समझ नहीं पा रहे थे कि क्या खाएं और कैसे खाएं ।
उस तरफ महिषी वील्लप का समय काटे नहीं कट रहा था , काटे नहीं कटते दिन ये रात की तर्ज़ पर उनका ह्रदय नृत्य कर रहा था । वे सोच रही थी कि किस प्रकार ये परिणाम का दिन निकल जाए । युवराज के प्रेम में अभिभूत महिषी के मन में था कुमार हारेंगे तो उनको सबका दिल जीतने का श्रेय तो वही देंगी ।
उधर कारगिसा की साँसें ऊपर नीचे हो रही थीं। वे समझ नहीं पा रही थीं की आगे क्या होने वाला है। इस बार युवराज पर प्रहार तीव्र होंगे और रुदन समारोह बहुत जोर से रोना था। बुद्धि के साथ देह भी जड़ हो रही थी ,बस एक ही बात बड़बड़ा रही थीं, आगे आगे देखिये होता है क्या।
यह केन प्रकार रात्रि विश्राम पूर्ण हुआ और प्रातः होते ही श्रेष्ठी के सभागार में हलचल मच गयी। सुबह से युद्ध के परिणाम सामने आने लगे और और उदासी सभागार में बढ़ती जाती थी, सिसकियाँ शुरू हो गयी थीं। रुदालियाँ चूड़ियां तोड़ने में लग गयीं। सदमे से पदीजरा का मुंह सूखा था।
जातज्ञ का मुंह लटक कर वैसा हो गया था जैसा घर के आगे लटका नजर वाला जूता।धीरे धीरे रोने का माहौल बनने लगा था।आंसूं आँखों में आ गये थे।सभी रुदालियों की आँखों में इतना पानी था जितना यमुना में मिलती हिंडन में । पदीजरा की आखों में तो पूरा कालिंदी कुञ्ज समाया था । मन भारी था आवाज़ हल्की ।
बार बार कह रहे थे मैंने पहले कहा था ऐसा ही होगा। तभी अचानक एक जोर का धमाका हुआ ,उन्हें लगा सन्देश आ गया , रुदन प्रारम्भ करना है और सब फूट फूट कर रोने लगे।
उधर युद्ध में हुआ यह था की चिंवी के युद्ध में पराजित हो भाग निकले थे। युद्ध का परिणाम अत्यंत रोचक हो गया था। हशा ने तेज़ी से राज्य पर वर्चस्व बनाना प्रारम्भ कर दिया। किन्तु वहां का एक क्षेत्रीय योद्धा ने हशा का रास्ता रोक दिया। योद्धा हद्दकुमार को संयोगवश चिंवी का खर मिल गया और वो उसे अपने साथ ले गए। हद्दकुमार उस खर को अश्व मानकर उसपर अपनी सवारी निकाल रहे थे।
हशा ने उसे बताने का प्रयत्न किया यह खर है। किन्तु वह न माने। युद्ध के लिए ललकार पर वह न माने। खर को बांधे बिन हशा की विजय पूर्ण नहीं थी और अब हद्दकुमार न युद्ध करते न खर को छोड़ते । उधर चिंवी के क्षत्रपों ने हद्दकुमार को खरारूढ़ देखा तो उन्हें ही स्वामी मानने को तत्पर हो गए।
हद्दकुमार के पास सैंतीस सैनिक थे और धींगा की सेना में दुगने फिर भी वे हद्दकुमार की क्षेत्रीय सत्ता स्वीकार करने के लिए तत्पर थे।
दरअसल कुछ दिन पूर्व उनके सिंहपुर तीर्थ की यात्रा में , उनके साथ इस प्रकार का समझौता किया जा चुका था और उन्हें पेट भर के मुद्राएं दी जा चुकी थीं।
उन्होंने लड्डू दोनों हाथों में धरे हुए थे। बस इसी को घोषित करने के लिए नागडा बजाया जा रहा था। जिसे सुनकर पदीजरा के सभागार में अखंड विलाप प्रारम्भ हो गया था।
विलाप रुकता ही न था कि तभी एक संतरी ने समाचार दिया , युवराज हार गए किन्तु हशा भी नहीं जीते। सभी रुदालियो के सुर बदलते समय नहीं लगा। एक आँख से रोते एक से हँसते थे। दांत निकालते और हूँ हूँ करते थे। थोड़ी देर में जब सब शांत हुए तब सबसे पहले आदु नदोवि चीख रहे थे हम तो ज़ायका लेंगे,बीसेक कचौरियां करारी सिकवा दीजिये और बाकी छांछ लस्सी में नाश्ता चल जायेगा।कोई तो खाना देदो ।
अब सबने रणनीति पर विचार किया , युवराज तो चले गए हैं , पर हम इसे उनकी पराजय माने या जय ? भागने के कारण उनके सम्मान को ठेस लगेगी। क्या करें। राणनीति तैयार की गयी और एक सन्देश युवराज को भिजवाया गया ताकि उनका मनोबल ऊँचा हो ।
आप हारे नहीं है युवराज, वो तो सम्राट विजयी हुये हैं। परन्तु हद्दकुमार अब नए क्षत्रप है । आप हार नहीं सकते । ये धुस्सी का दोष है , वही हारे हैं आप नहीं । किसी एक प्रदेश की हानि आपकी हानि कदापि नहीं है। आपके आने से तो हम सब के जीवन में एक अलौकिक #दिव्य_स्पंदन हुआ है । कुमार चुनाव तो आते जाते रहते हैं । आप क्यों चिंतित होते है ? जय पराजय लगी रहती है। आप अपनी आगामी छुट्टियों पर ध्यान केंद्रित करें। नानी जी को हमारी तरफ से दंडवत प्रणाम कहिये।
इधर सभी ने यह सन्देश फैलाना शुरू कर दिया कुमार नए चाणक्य बन गए हैं। हार कर भी सम्राट को राज्य नहीं दिया। हद्दकुमार के कन्धों पर बैठकर अब राज्य चलाएंगे। हद्दकुमार अब कुमार के नए खर थे। दूषण तो उनके दल में प्रचुर मात्रा में थे। उसके पश्चात जब भी कोई कुछ भी कहता थो सभी यह कहते -
पराजय के लिए युवराज दोषी नहीं हैं, उन्हें गलत फसाया गया है। उन्होंने कोई युद्ध नहीं हारा है। वास्तव में तो युवराज युद्ध के समय घटनास्थल पर थे ही नहीं।
प्रथम दृष्ट्या युवराज कभी नहीं हारते। मतदाताओं ने गलत निर्णय दिया है।दोष-मढ कानून का गलत प्रयोग हुआ है। युद्ध भी जांच में कठिन पाए गए हैं।यह पराजय नहीं है दूसरे की विजय है। युवराज की अभी आयु ही क्या है मात्र सैंतालीस?पचास के भी नहीं हुए।यह अन्य्याय है #हमारे_युवराज_निर्दोष_हैं।
सभी श्रेष्ठिगण शयन हेतु चले गए। उधर हशा का खेल शरू हुआ था। महायुद्ध आने वाला था , पराजय स्वीकार्य नहीं थी। समय चल पड़ा था।
Good Narrative..
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