हशा का खेल चल रहा था, वो हार मानने वालों में से नहीं था। अनेक प्रयत्नों के पश्चात भी क्षत्रप टस से मस न हुआ, और चींवि द्वारा स्वयं के सैनिकों के बंदी बनाये जाने की नीति से जीतकर भी हशा के हाथ कुछ नहीं लगा। हशा ने पीछे हटने में अपनी भलाई समझी। हशा को अपरोक्ष पराजय का मुंह देखना पड़ा था । क्षत्रप हद्दकुमार ने कुमार का खर बाँध लिया था, और उसपर नगर भ्रमण को निकल रहे थे । ऊपर से घोषणा कर रहे थे कि सम्राट के अश्वमेघ का अश्व बाँध लिया है । वे भी चींवि के खर को अश्व समझ कर अत्यंत प्रसन्न थे ।
चींवि ने निर्णय किया कि क्षत्रप का ही राजतिलक कर दिया जाए और अपनी सेना के कुछ सेनापतियो को उनके साथ मिला दिया जाए । धुस्सी को अब कोई नहीं पूछ रहा था । पदीजरा और उनके साथियो में अत्यंत उत्साह था जैसे, शादियों में बैंड वाले नेग मिलने की जहाँ आशा होती वहां कुछ और ज़ोर से बैंड बजाते हैं, वैसे ही पदीजरा और कारिगसा फूल के कुप्पा हुए जा रहे थे ।
हद्दकुमार की इस अल्पकालीन विजय से चिंवी का चित्त प्रसन्न हुआ, उसने राजतिलक के बहाने एक महासभा का आयोजन किया महासभा में उसने उन सब योद्धाओं को निमंत्रण दिया जो सम्राट द्वारा पराजित हो अपना अस्तित्व गँवा चुके थे । चींवि का मत था कि अब पुनः सबको इकठ्ठा कर एक सेना बना कर सम्राट के विरुद्ध मोर्चा खोला जाये ।
साईकिल वाला मयलामु नंदन श्लेखि, उसकी परम शत्रु जगत भगिनी गजगामिनी तीवयामा । बंगाल से श्वेत वस्त्र धारिणी, ज्वलंत सदा भाषिणी, तप्त मुंड आपा ताममो । बंगाल से ही रिचुये पधारे थे, जो स्वयं झंडू बाम के अवतार माने जाते थे । आपा सरदर्द थी और रिचुये बाम , परस्पर शत्रु । फिर भी साथ चले आये थे ।
उधर पाटलीपुत्र से कारावास भोग रहे चाराभक्षी के पुत्र स्वीजते पधारे थे । इनकी महिमा निराली थी, ये खेल विशारद, ज्ञान नदारद थे । एक विवाह का आयोजन जैसे छोटे मोटे कार्य में भले ही असफल रहे हों लेकिन राज काज चलाने को लालायित थे। अपनी नौ गज़ लंबी जिह्वा के साथ पाटलीपुत्र से ही दरशवाद्य पधारे थे । पहले ये स्वीजते के वंश को अपनी जिह्वा में लपेट लपेट कर मारते थे किन्तु परिस्थितियों ने दोनों को एक कर दिया था ।
जीवन के वसंत समाप्त कर पतझड़ में जीवन यापन करने वाले धनकुबेर रवा-पदरश । वे सम्राट के पद्म थे किन्तु सत्ता में भागीदार न थे । सम्राट के विरोधी तो वे थे ही । इस प्रकार कई ऐसे परस्पर विरोधी आज एक ही सभा में उपस्थित हो गए थे । कोई किसी को गले लगाता, कोई हाथ मिलाता, कोई गले में बाहें डाले अपनी करीबी का प्रमाण देता । सांप नेवले को चूमते और गरुड़ सांप को गले में डाल कर गगन की सैर कराते । बिल्लियाँ गरुड़ को भोजन कराती । अनोखा मिलन समारोह चल रहा था ।
जम्बूद्वीप के निवासियों को ही परदेशी कहकर घृणा फैलाने वाली तीवयामा वास्तविक परदेशी राजमाता के कभी गले में हाथ डालती कभी कमर में। अचानक या तो तीवयामा का कद बहुत बढ़ गया था या राजमाता का घट गया था , अन्यथा आजतक राजमाता को कोई दृष्टि उपर कर देख भी नहीं सकता था।
चींवि ने स्वीजते से कहा हे परम ज्ञानी आप ही यहाँ ज्ञान के सागर हैं, यहाँ उपस्थित लोगों की गणना कीजिये । स्वीजते बड़े ही अभिमान से खड़े हुए और गिनना प्रारम्भ किया ...वन, टू, थ्री, फोर, खाई, एक , नई, लाल टेन ।
कुमार कुल टेन लोग हैं ।
सभी ने ताली बजाकर अभिनन्दन किया ।
उधर से कंगारु देश के गुरुकुल से गुर सीख कर आये श्लेखि को शंका हुई उन्होंने पुनः गिनना शुरू किया फिर बोले इधर उतने ही लोग हैं जितने हमारे खानदान से सांसद और विधायक हैं ।
तीवयामा ने तत्काल अपने रत्न जड़ित, यूरोप से मंगाए लोमड़ी की खाल से निर्मित दो करोड़ के पर्स में से एक कागज़ का टुकड़ा निकाला और पढ़ना शुरू किया इस सभा में हम सब साम्प्रदायिक ताकतों के विरोध में इकट्ठे हुए हैं । यहाँ उपस्थित लोगों की संख्या बहुत अधिक है , जिसको गिन पाना संभव नहीं है । हम इस गिनती का विरोध करते हैं ।
इतने में आपा आपे से बाहर हो गयी थीं और उन्होंने सियापा करना शुरू कर दिया था। ई नोई चोलबे ! अम पैदल नोई चोलबे ! अमारा गूटना दूकता ए । नोई चोलबे ।
उधर राजमाता यह सब देखकर क्रोधित हो रही थीं बोलीं, रवा-पदरश आप गीनीये आपको गीन्ने का बहूत अनूभाव है ।
उन्होंने गिनती शुरू की ...
सौ करोड़, डेढ़ सौ करोड़, दो सौ करोड़ .... एक हज़ार करोड़ ।
उधर से रिचुये ने कहा क्या गिन रहे हो, सठिया गए हो?
रवा-पदरश ने कहा कभी इससे कम तो गिना ही नहीं । ऐसे ही गिनती आती है अपुन को ।
रिचुये ने कहा चुप करो । ऐसी बाते करते हो जैसे धन का खज़ाना भर रखा हो, हमारा सब्र का बाँध न तुड़वाओं।
रवा-पदरश स्मृतियों में जाते हुए बोले ...बाँध ताल तलैया तो हमारा भतीजा भरता है ।
रीजक क्रोध में आ गया , बोला तुम सब चुप होते हो कि मैं धरने पर बैठूं? उधर सम्राट कुछ नहीं करने दे रहे इधर तुम लोग लड़ लड़ के , लड़ लड़ के, लडैया हुए जा रहे हो । हम गधे हैं हो यहाँ बैठे हैं?
चींवि ने कहा चुप करो रीजक तुम अपमान कर रहे हो हमारा । काम धाम है नहीं जब देखो इधर उधर की हांकते हो ।
रीजक ने कहा रहने दो कुमार तुम खुद छुट्टी पर भाग जाते हो , खुद की सेना संभालती नहीं । नानी के लाडले ।
कुमार ने एक डिम्पलयुक्त मुस्कान दी और कुटिल होते हुए कहा तुम छुट्टी पे नहीं जाते ? किस किस बहाने से कहाँ कहाँ जाते हो सब पता है ।
रीजक ने कहा और आपके बैंकाक वाले चर्चे खूब सुने हैं हमने ।
वाकयुद्ध बढ़ते देख राजमाता ने बीच में बोला, देखो तुम दोनो मेरे अनमोल रटन हो । मिल कर राहो । मीलकर तुम दोनों को साम्राट को हारना है।
राजमाता ने सबको एक बार देखा और पूछा - जेसा की आप लोग जानते हैं , हम लोग यहाँ राजतिलक ने अलावा एक और उदेस से इकट्टा हुए हैं। अगले युद्ध में हमको सेनापाटी चून कर सम्राट से लड़ना है। कौन कौन हमारे साथ है वो खड़ा हो जाये।
सब लोग खड़े हो गए।
राजमाता ने पूछा हमारा नेत्रीतव कीसको कारना चाइये?
सब लोग ने अपना हाथ खड़ा कर दिया।
राजमाता ने पूछा - इसका क्या मतलाब है ?
तीवयामा ने फिर अपने पर्स से एक कागज़ का टुकड़ा निकाला और पढ़ना शुरू किया - हम सब बनना चाहते हैं।
राजमाता ने फिर कहा - हम लोग कुमार चींवि के नेत्रीतव में लादेंगे। जो तैयार है वो हाथ उठाओ।
सब लोग ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।
राजमाता ने पूछा - मतलाब है की आप सब तैयार हैं ?
कहीं से एक आवाज आई - नहीं , सब लोग ने हाथ खड़े कर दिए हैं, कुमार के नेतृत्व में कौन लड़ना चाहता है ? सबको सम्राट बनना है।
इससे पहले कुछ और होता सभा विसर्जित कर दी गयी।
उधर हद्दकुमार को इनकी भाषा समझ नहीं आती थी, वह चुपचाप भूरिकर्ण के साथ खेल रहा था ।
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