शनिवार, 26 मई 2018

संभावनाएं बहुत हैं



चार वर्ष पूर्व, भारतीय राजनीति में एक ऐसा ज्वार उठा था जिसमे बहुत से लोग बह गए थे और बहुत से ऐसे लोग पार लग गए थे जिनको कोई जानता भी नहीं था। यकीन मानिए इन चार वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। राजनीति के ध्रुव बदल गए हैं, नए समीकरण बन गए हैं। जो शत्रु थे वो मित्र बन गए हैं और जो मित्र थे वो शत्रु बन गए हैं। चार वर्ष पहले लोगों में बहुत उत्साह था और बहुत सी उम्मीदें थीं, और यकीन मानिए जितनी उम्मीदें लोगों ने इस सरकार से पाली थीं , सरकार उन उम्मीदों से दवाब महसूस करती रही है। आज सफलताओं और असफलताओं की बातें बहुत से लोग करेंगे। आलोचनाएं होना स्वाभाविक है। लोग आंकड़ों के माध्यम से तुलनात्मक अध्ययन करेंगे और चुनाव के समय किये गए वादों को कितना गया इसपर भी करेंगे।
लेकिन सरकार के कामकाज के मूल्यांकन के नियम क्या होने चाहिए ? मात्र आँकड़े किसी भी सरकार का मूल्यांकन नही कर सकते, क्योंकि आंकड़े बनाये और बिगाड़े जा सकते हैं और आंकड़ों की परिभाषाऐं भी गढ़ी जा सकती हैं किसी सरकार की नीतियों से सामान्य आदमी का जीवन कितना आसान हुआ है इसपर भी विचार होना चाहिए। हालाँकि लोग अभी केवल आँकड़ों की बात करते हैं जिसमे भी यह सरकार बहुत बेहतर दिखती है।
लेकिन कुछ लोग निराश हैं, विशेष रूप से हिंदू और मध्यम वर्ग जिसने प्रधानमत्री से चमत्कारिक शासन की उम्मीद की थी वह निराश दिखता है। मध्यम वर्ग की शिकायत है कि कम से कम दस लाख तक की आय को कर मुक्त कर देना चाहिए , या कर पूर्ण रूप से समाप्त कर देना चाहिए।  थोड़ा शांत चित्त होकर सोचिए, क्या एक विकासशील देश मे यह उम्मीद करना ठीक है ? हम अभी विकसित राष्ट्र नही हैं, हमारे देश की आवश्यकताएँ बहुत हैं, हमारे पास इनफ्रास्ट्रक्चर नही है। ऐसे मे जब निर्माण कार्य और कई सरकारी योजनाएँ तेज़ी से प्रगती कर रही हों तब बिना किसी अन्य आय के साधानो के सरकार आय के पारंपरिक साधन बंद कैसे कर सकती है? शायद जब हम विकसित राष्ट्र हो जाएँ तब यह संभावना बन सकती है। वैसे भी निम्न मध्यम वर्ग से लिया जाने वाला प्रत्यक्ष आयकर काफ़ी कम है। चुनाव प्रचार मे कुछ लोगों ने अतिशयोक्ति की थी, जिसके कारण लोगों के मन मे यह बात बैठ गयी कि अब आयकर नही लगेगा, बस वही अब सरकार के गले की हड्डी बन गयी है।  लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी के अलावा किसी और राजनैतिक व्यक्ति के मुख से आयकर समाप्त करने की बात किसी से नही सुनी। इसमे एक बात अवश्य है कि सरकार अगर अव्यवस्थाओं को कुछ और नियंत्रित करे तो सरकारी खर्चे कम हो सकते हैं।  थोडा सोचिए क्या कॉंग्रेस की सरकार से यह उम्मीद कभी लगाई गई कि वे आय को कर मुक्त कर देंगे? इस सरकार से उम्मीद है, लेकिन जब तक सरकार को आय के वैकल्पिक साधन नही मिलते तब तक इंतज़ार करना होगा।
हाल ही में पेट्रोल की कीमतों के उतार चढ़ाव से बहुत हाहाकार मचा हुआ है क्या पिछली सरकार और इस सरकार मे पेट्रोल की कीमत को लेकर तुलना की जाएगी ? तब भी यह सरकार कीमतों को नियंत्रण मे रखने मे सफल हुई है।  क्या लोग वह समय भूल गए, जब पेट्रोल की कीमत दो रुपये बढ़ती थी और इधर दूध की कीमत एक रुपया बढ़ा दी जाती थी , ऐसा लगता था दोनो मे कोई प्रतियोगिता चल रही है? चार साल मे ऐसा हुआ है क्या? फिर ज़रूरत की दूसरी चीज़ों जैसे सब्जियाँ, डालें इनपर भी बात होनी चाहिए, प्याज़ जिसने सरकारें गिरा दीं थी, आपको नही लगता काफ़ी नियंत्रण मे है? पेट्रोल की कीमत पक्ष लेने का मंतव्य नही है, अगर इसे जीएसटी मे लाया जा सकता है तो लाया जाना चाहिए।  किसी वस्तु की कीमत काम करने की मांग करना जनता का संवैधानिक अधिकार है।
दूसरी शिकायत हिंदू वर्ग करता है। हिंदू वर्ग जो तुष्टिकरण का विरोध करता है, जिसके लिए राम मंदिर प्रमुख मुद्दा है और हिंदुत्व का संरक्षण ही वर्तमान सरकार को समर्थन की प्रथम शर्त।
तुष्टिकरण के मामले मे सरकार का मन्त्र शुरू से ही सबका साथ सबका विकास रहा है, और यह सरकार किसी भी प्रकार से कट्टर हिंदुओं की सरकार नही कही जा सकती है। इस सरकार के एजेंडे मे हिंदुत्त्व था रहेगा। यह बात समझनी होगी, अगर हिंदुत्त्व का राजनीति मे स्थान होगा तो केवल शांत हिंदुत्त्व का होगा। आज देश की परिस्थिति ऐसी है कि कितने धर्म कितनी जातियाँ कितनी मान्यताएँ प्रचलित हैं जिनकी गणना यह तो क्या कोई सरकार नही कर सकती।  हिंदुओं को समझना
होगा कि आज की परिस्थिति मे डंडा उठाकर काम नही हो सकता। ही डंडे के बल पर बांग्लादेशियों को भगाया जा सकता है, ही रोहिंग्याओं को। सरकार कोई कदम भी उठाती है तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं ही विपक्ष बन कर खड़ा हो जाता है। 
विदेशी एन.जी. पर लगाए गए प्रतिबंधों से मिशनरियों और उनके संरक्षकों में भारी आक्रोश है। एक यह कारण भी है कि हिंदुओं को भड़काया और बांटा जा  रहा है।   नरेन्द्र मोदी पर एक आरोप लग चुका है, और वे ऐसा कोई निर्णय नही लेंगे जिस से देश मे अशांति का माहौल बने। अगर बांग्लादेशी या रोहिंग्याओं के मसले हैं तो वे शांति से ही सुलझाए जा सकेंगे, हम इस स्थिति मे हैं कि बल पूर्वक किसी को निकाल पाना संभव नही है। ये लोग बहुत बड़ी संख्या मे हैं और कुछ राज्य सरकारों और नेताओं के संरक्षण मे हैं। 
जब सबका साथ सबका विकास की बात आएगी तो सबके हिस्से मे कुछ कुछ जाएगा, इसलिए यह शिकायत भी ठीक नही है कि किसी को कुछ दिया तो क्यों दिया?
राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट ने लटका रखा है, ये न्यायालयों की भीरूता और असक्षम होने का प्रमाण है कि एक निर्णय वर्षों से नही कर पा रहे हैं। दूसरा न्यायाधीशों पर विपक्ष ने बहुत दवाब बना कर रखा है, न्यायालय वर्षों से कांग्रेस के इशारों पर चलते आए हैं और कांग्रेस के प्रभाव से निकल नही पाए हैं। यह प्रधानमंत्री  के हाथ मे नही है कि वे इस व्यवस्था को बदल पाएँ, ऐसा नही है कि प्रयत्न नही किया। किया था लेकिन न्यायालय विपक्ष की भूमिका मे दिखते हैं।  मोदी शायद किसी को गिरफ्तार इसीलिए नही कर पाए क्योंकि अभी भी कॉंग्रेस सत्ता से बाहर होने पर भी, सिस्टम के अंदर है।  चाहे वो न्यायालय हों या हर महत्वपूर्ण संस्थान मे बैठे हुए उनके लोग। किसी के अपराधों पर गिरफ्तार करके क्या फायदा होगा जबकि न्यायालय उनको फिर छोड़ देगा? पहले उनका ईकोसिस्टम ख़त्म करना होगा, अन्यथा जेल से पहले बेल पाकर ये लोग और स्वतंत्र हो जाएँगे। लालू यादव को जेल भेजने से कौन सा फ़ायदा हुआ है, मन मर्ज़ी  से बाहर रहे है।
ऐसा नही है कि सरकार कुछ कर नही सकती थी, जॉन दयाल जैसे धर्म परिवर्तन करने वालों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सकता था, मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त किया जा सकता था। गौवध पर प्रतिबंध है, लेकिन सरकार रोकने मे असमर्थ दिखती है। शराब पर देशभर मे प्रतिबंध लगाया जा सकता था लेकिन उससे होने वाली आय बहुत अधिक है। सरकार शिक्षा के क्षेत्र मे बेहतर काम कर सकती थी, लेकिन प्रकाश जावड़ेकर जैसे निष्क्रिय व्यक्ति को शिक्षा विभाग देकर स्मृति ईरानी के कार्यकाल मे किए गये कार्यों को प्रभावहीन कर दिया। अगर इस सरकार मे कोई सबसे असफल मंत्री हैं तो वे प्रकाश जावड़ेकर हैं। उसके बाद सबसे बड़ी असफलता क़ानून मंत्रालय और अटॉर्नी जनरल की है, जो सरकार के पक्ष मे एक भी महत्वपूर्ण निर्णय नही करवा पाए। 
असफलताओं की सूची मे गंगा सफाई अभियान मे लगी हुई उमा भारती का नंबर भी है, उनसे गंगा की सफाई को लेकर बहुत उम्मीदें थीं, एक नदी को साफ़ होने के लिए अगर मिशन बना कर काम किया जाता तो चार साल बहुत होते हैं।  एक रविशंकर प्रसाद का नाम कमजोर मंत्रियों मे लिया जाएगा, उन्होने कोई खराब काम किया ऐसा नही है लेकिन जब लोग डेटा सेक्यूरिटी पर प्रश्न उठाते हैं, आधार पर प्रश्न उठाते हैं तब वे देश को साइबर सुरक्षा पर भरोसा नही दिला पाए।  
कुछ तो विपक्ष के खोजे और बनाए हुए मुद्दे हैं, जब झूठे समाचारों और मोदी के अंध विरोधियों के समूह द्वारा निर्मित समस्याओं को देखते हैं, तब यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि 2019 उनके अस्तित्व का चुनाव है। अगर 2019 विपक्ष की पार्टियाँ हारती हैं तो उनकी राजनीति समाप्ति की ओर बढ़ जाएगी। शायद बसपा , सपा जैसी पार्टियाँ बिखर जाएँ, कॉंग्रेस अपने अंत की ओर या विभाजन की ओर बढ़ जाए।  वामपंथ का देश मे अस्तित्व ख़तरे मे जाएगा और फिर इनके संरक्षण
मे जी रहा इनका ईकोसिस्टम भी ध्वस्त हो जाएगा।  इसलिए विपक्ष और मुखर होगा , आरोप और प्रखर होंगे, और असली नकली सब मुद्दे उछाले जायेंगे।  विभाजन उनकी प्राथमिकता होगी। 
कुछ मंत्रियों के असफल होने पर, लोगों को क्या उस सरकार को समर्थन देना बंद कर देना चाहिए जो वास्तव मे अच्छा काम कर रही है? अगर आप इस सरकार का मूल्यांकन करें तो अपने आसपास होते बदलाव को अवश्य देखें।   नरेन्द्र मोदी केवल देश का आर्थिक विकास नही कर रहे हैं , बल्कि लोगों की सोच मे भी परिवर्तन ला रहे हैं. लोगों को जागरूक कर रहे हैं। जब भी उनकी बातें सुनें तो ये देखें कि वे हमेशा "क्या किया जा सकता है" इस पर बल देते हैं।  वे हर क्षेत्र मे संभावनाएँ ढूँढते दिखते हैं। मोदी जी सकारात्मक बदलाव का नेतृत्व कर रहे हैं। .लोगों को अपनी दृष्टि बदलनी होगी, केवल आँकड़ों पर जाकर सरकार का काम मत आंकिए। भविष्य की संभावनाएँ भी देखिए।  बाकी निर्णय आपका ही है कि आपको किसको चुनना है।  या घर बैठकर विपक्ष की मदद करनी है।  एक वर्ष और है अभी इस सरकार का और आशा यह है कि जो काम रह गये हैं उनको जल्दी से जल्दी शुरू करे, ख़ासकर गंगा की सफाई, शिक्षा के प्रति गंभीरता, रोज़गार की कमी के आरोपों को रोज़गार देकर ही ख़त्म किया जा सकता है और इसमे सुधार की गुंजाइश है। 
सरकार को समझना होगा हिंदुओं के मन मे भय है, विश्व भर मे इस्लामिक कट्टरता और क्रिस्चियन मिशनरीयों ने भय का वातावरण निर्मित किया है और अब समय है कि हिंदुओं को भी भरोसा दिलाया जाए कि उनके साथ भी कोई सरकार मजबूती से खड़ी रह सकती है।  बात वोट बैंक की नही है , सबका साथ सबका विकास मे हिंदुओं की उपेक्षा की कोई गुंजाइश नही है। भय जितना बढ़ेगा समाज मे दूरियाँ उतनी अधिक बढ़ेंगी दूसरे धर्मों के साथ पूरा विपक्ष खड़ा दिखता है लेकिन हिंदुओं की आशाएँ केवल एक पार्टी से हैं और सत्ता मे रहते हुए ये उनकी ज़िम्मेदारी बनती है समन्वय बिठाते हुए सभी वर्गों को सुरक्षा की भावना महसूस कराएँ। 
लोग भी अब एक नई मनोस्थिति में गए हैं, लोग प्रश्न पूछने लगे हैं पहले केवल कुछ कथित बुद्धिजीवी और पत्रकार ही अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे नेताओं से प्रश्न पूछने का, लेकिन सोशल मीडिया के समय में जब नेता और जनता एक दूसरे के संपर्क में गए तो पत्रकारों की भूमिका सिमट गयी है। कुछ में तो हीन भावना जागृत हो गयी है।  लोग अब नेताओं से सीधा प्रश्न पूछते हैं और सुखद बात ये है कि उन्हें उत्तर भी मिलता है। 

एक साल बाकी है अभी और आशा है कि यह सरकार उन क्षेत्रों मे भी बेहतर काम करेगी जहाँ कुछ कमी रह गयी है। बाकी यह मानने मे मुझे परहेज़ नही कि काम वास्तव मे अच्छा हुआ है और बदलाव दिखता है। 



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