शनिवार, 12 मई 2018

मूंछ

अब बात मूंछ तक आ गयी है तो अब आ ही जाने दीजिये ।पुरुष के जीवन में मूंछ का इतिहास शायद तब से शुरू हुआ जब से पूँछ का खत्म हुआ होगा । 
मूंछ रखना न रखना बाबा आदम के हाथ में तो न रहा होगा । लेकिन बाबा आदम के बाद जब बन्दर से ताज़ा ताज़ा आदमी में परिवर्तित हुए मनुष्य के हाथ में जब उस्तरा उस तरह आया होगा जिस तरह मूंछ निकालने में सहायक हो सकता हो, तब मानव ने मूंछ अवश्य निकाली होगी । 
जब पहली बार किसी मानव ने मूंछ निकाली होगी तो उसे कैसा लगा होगा ?उसे तो जैसा लगा होगा, वैसा लगा होगा, उसको देखने वालों को कैसा लगा होगा ? सत्य यह है कि इसमें आज तक कोई अंतर नहीं आया है। किसी मूंछधारी को बिना मूंछ का देखना या किसी मुछमूंडे को मूंछ के साथ देखना, देखने वाले को  आज भी आनंदित करता है । 

शायद किसी समय कुछ घटा हो जिससे लोगों ने मूंछ को अपनी इज्जत से जोड़ लिया और दाढ़ी को अपनी गंभीरता से । मूंछ पर ताव देना ललकारने का सूचक हो गया । मूंछ मुडाना इज्जत उतरने का पर्याय बन गया। दाढ़ी वाले गंभीर माने जाने लगे । दाढ़ी और मूंछ दोनों रखने वाले इज्जतदार धीर गंभीर लोग कहलाने लगे । 

लेकिन अस्थिरता के युग में मानव का मन कैसे स्थिर रहता , कुछ लोगों ने गंभीरता का त्याग किया और इज्ज़त बना कर रखने में लग गए।  
कुछ लोग केवल गंभीर रहना चाहते थे इसलिए इज्जत निकाल कर एक तरफ रख दी। मुंह पर गंभीरता भर धरे रहते हैं । लेकिन यह गंभीरता समय के साथ भयावह होती गयी और आज आतंक का पर्याय बन गयी | देखा गया कि ऐसे लोग बहुत खतरनाक होते है , इन्हे किसी प्रकार की ख़ुशी बर्दाश्त नहीं होती।  लोग इनको देखकर भागने में ही भलाई समझते हैं।  

अस्सी के दशक में टीवी पर अरुण गोविल के रामावतार और नितीश भारद्वाज के कृष्णावतार में राम और कृष्ण दोनो की दाढ़ी मूंछ नहीं थी । 
हमारे घरों में मंदिरों में जो राम और कृष्ण की प्रतिमाएं  स्थापित हुईं उनमे भी मूंछ नदारद थी।  शायद इसी के कारण राम और कृष्ण के देश में राम और कृष्ण की न तो इज्जत बाकी रह गयी न उन्हें किसी ने गंभीरता से लिया।  
राम को टेंट पे पटक दिया, और कृष्ण को तो जैसे गोकुल का आवारा लड़का ही समझ लिया गया । काश दोनों की मूंछ होती , तो इज्जत होती । मूंछ नहीं तो कम से कम दाढ़ी रख लेते , लोग गंभीरता से तो सुनते ।
हमारे समाज में कदाचित स्त्रियों की दाढ़ी मूंछ न होने के कारण उनको भी आवश्यक इज्जत और गंभीरता नहीं मिलती । 

बीसवीं सदी से पहले तक मूंछ राजपूतो की शान होती थी । ऐसा प्रचलन किसने शुरू किया ये वही जाने, लेकिन कभी कभी दाढ़ी न होने की वजह से उनके नाम इतिहासकारों की दृष्टि में गंभीर नहीं बन पाये ।  

बीसवी सदी में दाढ़ी और मूंछ दोनों का होना बुद्धिजीवी होने का प्रमाण था । दाढ़ी मूंछ के बिना आप बुद्धिजीवी,पत्रकार, या लेखक नहीं हो सकते थे । कम से कम मूंछ का होना आवश्यक था अन्यथा आप लम्पटों की श्रेणी में गिने जाते । वो तो भला हो बॉलीवुड का जो मुछमुंडों के लिए राहत का पैगाम लेकर आया ।
लेकिन नत्थूलाल जैसी मूंछें होने का चलन भी बॉलीवुड ने ही चलाया । और फिल्म मोहब्बतें में अमिताभ बच्चन बिना दाढ़ी के परंपरा और अनुशासन का राग अलापते तो खुद भी लम्पट-स्वामी ही लगते।  

हालांकि इक्कीसवी सदी आते आते मूंछे और दाढ़ी फैशन हो गयी , अलग अलग रूपों में मूंछे दाढ़ी रखना टशन बन गया । लेकिन जलवा तो मूंछ दाढ़ी और चोटी तीनों रखने वालों का है । 

लेखक का व्यक्तिगत अनुभव माने तो वर्तमान पीढ़ी का ट्रेंड अनोखी दाढ़ी मूंछ रखने का है । लेकिन लेखक की पीढ़ी के सामान्य मध्यम वर्गीय पुरुषों में देखा गया कि बीस वर्ष तक दाढ़ी -मूंछ ठीक से आती नहीं, अगले बीस वर्ष तक व्यक्ति दाढी मूंछ व्यक्ति रखता नहीं, और चालीस पर पहुँचने पर आदमी को लगता है अब इज्जत हो गयी है, चलो मूंछ रखी जाए । 

मूंछ क्यों रखी जाये इसका कोई विशेष शोध पत्र  उपलब्ध नहीं है , किन्तु एक संस्मरण अवश्य है।  
एक हैदराबादी मित्र था, बेचारा जब तक दिल्ली में रहता मूंछ साफ़ कर के रहता , और जब  अपना घर जाने का रिजर्वेशन करवाता तो मूंछ बढ़ाना शुरू कर देता था।  कहता था कि घर बिना मूंछ के गया तो लोग आवारा नकारा समझ लेंगे , और उसकी शादी के लिए कोई लड़की पसंद नहीं करेगी।  बस मेरे जीवन में मूंछों का यही संस्मरण है जिसमे युवक इसलिए मूंछ रखना चाहता था कि उसका विवाह हो सके। 

एक और स्मृति है, हमारे ननिहाल में एक पडोसी थे , उनका वास्तविक नाम जो भी रहा हो उनको सारा मोहल्ला लिप्टन के नाम से जानता था । उनकी बड़ी बड़ी मूंछे हुआ करती थीं। उन्हें देखकर हम सब, जिसमे हमारे मामा मौसी भी शामिल होते थे, छत पर खड़े होकर चिल्लाते थे - लिप्टन की है बड़ी बड़ी मूंछें , तेल डाल कंघा से ऊँछें। लेकिन लिप्टन अपनी मूंछों पर ताव देते हुए निकल जाते। एक वो ही थे जिनकी मूंछें उनके कद से बड़ी थीं। लेकिन उनको देखकर कुछ लोग अवश्य मूंछ रखने के लिए प्रेरित हुए होंगे।  

व्यक्तिगत तौर पर देखा जाये तो मित्रों ने मूंछ रखने को लेखक से कहा ।  लेखन में धार लाने हेतु मूंछ का होना अत्यंत आवश्यक है । अन्यथा कोई लेखन को गंभीरता से नहीं लेगा । लेखक की सोच है कि अगर लोग व्यंग्य को भी गंभीरता से लेंगे तो कैसे चलेगा? फिर लेखक की नाक इतनी महत्त्व पूर्ण नहीं है कि रेखांकित कर के रखी जाए । हर माह जब मालिक वेतन देता है तो थोड़ी सी नाक छील लेता है और लेखक अपनी पत्नी के अकाउंट में घर खर्च को पैसा डालता है तब बची खुची नाक छिल जाती है । अतः लेखक मूंछ नहीं रखने में विश्वास करता है।  
परंतु मित्र जो न करवाएं वो कम है। लेखक ने विचार कर लिया कि मूंछ रखेगा, और यूँ ही अपने पांच वर्षीय पुत्र से पूछा मैं मूंछ रखूँगा तो कैसा लगूंगा ?
पुत्र ने उत्तर दिया सब्जी मंडी में जो अंकल ब्रश बेचते हैं उनके जैसे लगोगे। तत्क्षण लेखक का मूंछ रखने का इरादा जाता रहा और यक्ष प्रश्न उठ खड़ा हुआ -अब इस मूंछधारी समाज को क्या मुंह दिखाऊं ? 

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