भारत
एक बड़ा राष्ट्र है
और यहाँ प्रत्येक क्षण
किसी न किसी स्थान
पर कुछ विशेष घट
रहा होता है. यह
राष्ट्र जितना विशाल है उतना ही
क्रियाशील भी है. रुकना
भारत ने कभी नहीं
सीखा, सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मृत्यु, शांति-युद्ध, बाढ़-सूखा सभी
कुछ यह दिव्य राष्ट्र
समभाव से देखता हुआ
आगे बढ़ता जाता है
और यहाँ तो इतना
कुछ एक साथ होता
रहता है कि किसी
भी घटनाक्रम को राष्ट्र घटित
होते हुए देख ही
रहा होता है और
दूसरा घटनाक्रम शुरू हो जाता
है.
किन्तु
कुछ विशेष वर्ग हैं जो
राष्ट्र को रोकने की
भरपूर चेष्टा करते हैं. कोई
न कोई बहाना चाहिए
कि गति पर विराम
लगाया जा सके. बंद
बुलाने वाले, रेल रोकने वाले,
संसद में काम रोकने
वाले, आवश्यक निर्णय टालने वाले या अन्य
प्रकार के अनावश्यक विवाद
खड़ा करने वाले सभी
इसके दोषी हैं.
विशेषकर
जब भी चुनाव आते
हैं तब सरकार के
हर कदम को केवल
और केवल चुनाव से
जोड़कर देखा जाने लगता
है और चुनाव कहीं
न कहीं होते ही
रहते हैं और आम
चुनाव कोई एक दो
दिन में तो होते
नहीं, इस बार लगभग
ढाई माह चुनाव में
लगने वाले हैं. तो
क्या ढाई महीने सारा
राष्ट्र निष्क्रिय हो जाए? चुनाव
के समय सरकार से
अपेक्षा की जाती है
कि सरकार कुछ न करे.
सरकार का हर निर्णय
संदेह की दृष्टि से
देखा जाता है.
सरकार
तो एक तरफ राष्ट्र
में होने वाली किसी
भी सामान्य घटना को भी
शंका की दृष्टि से
देखा जाता है. यह
सब इसलिए क्योंकि नेहरू के समय से
ऐसा होता आ रहा
है. अगर कोई आर्थिक
गतिविधि होती है तो
विपक्ष कहता है चुनाव
के कारण हुई है,
अगर कोई सुरक्षा से
सम्बन्धित गतिविधि सामने आती है तो
भी उसपर प्रश्न किया
जाने लगता है.
पुलवामा
की घटना होती है,
तो सरकार की विफलता बताते
हुए विपक्ष मुखर हो उठता
है और जब सरकार
उत्तर देती है तो
इसे चुनाव से जोड़कर प्रश्न
करने लगते हैं. अगर
देश में चुनाव हैं
उस समय कोई आकर
हमपर आक्रमण कर दे और
हम उत्तर भी न दें,
क्योंकि चुनाव है? राष्ट्र की
सुरक्षा को चुनाव से
अलग कर देना आज
के समय की मांग
है. सुरक्षा स्वाभाविक है और किसी
दल का नहीं सरकार
का विषय है.
उसी
प्रकार अंदर के शत्रुओं
पर जब कोई सुरक्षा
एजेंसी कार्यवाही करती है तब
भी प्रश्न क्यों उठाए जाते हैं,
यह समझ से परे
है. अगर चुनाव चल
रहे हैं तो क्या
किसी अपराधी को खुला छोड़
दिया जाना चाहिए? आयकर
विभाग की रेड हो
या किसी भी अन्य
विभाग का सामान्य कामकाज,
चुनाव से जोड़ कर
देखना कितना उचित है? इसका
एक कारण हमेशा से
इन विभागों का होता रहा
राजनैतिक दुरुपयोग है.
आज
जो कांग्रेस कर्णाटक में आयकर विभाग
के सामने बैठी है कल
तक उसने राजनैतिक लाभ
के लिए कोई कसर
नहीं छोड़ी थी. एक
दशक पूर्व ही आयकर विभाग
के छापे समर्थन लेने
देने के लिए प्रयोग
होते थे. वो तो
भला हो जनता का
जिसे समझ आ गया
कि सत्ता की चाबी अगर
एक को नहीं दी
तो सारे मिलकर नोच
लेंगे देश को और
अधिकतर सरकारें पूर्ण बहुमत के साथ आईं.
इसके
परे एक मत यह
है कि अगर ये
विभाग स्वतंत्र हों तो चुनाव
हों या न हों
अपना काम करती रहें.
जो अपराधी है सो है
, चुनाव की आड़ में
किसी को बचने देना
अपने आप में एक
अपराध है.
इसका
एक सीधा उपाय यह
है कि विभाग अपना
काम करते रहें , विपक्ष
न आरोप लगाए
और सरकार न उसका श्रेय
ले. जो विभाग कर
रहे हैं वह उनका
कर्त्तव्य है, उसपर प्रश्न
उठा कर विपक्ष स्वयं
सरकार को उसका श्रेय
लेने का अवसर देता है.
ऐसा
ही कुछ देखने को
तब मिला जब प्रधानमंत्री
ने राष्ट्र के एक अंतरिक्ष
महाशक्ति बन जाने की
घोषणा की. यह किसी
दल की घोषणा नहीं
थी, सरकार की घोषणा थी.प्रधानमंत्री
ने भी अपनी बात
रखते हुए विशेष ध्यान
रखा कि सन्देश प्रधानमंत्री
से जनता को जाए,
उसमें दल बीच में
न आए. प्रधानमंत्री ने
श्रेय वैज्ञानिकों को दिया, न
कि खुद लिया. लेकिन
बात स्वयं कही, क्योंकि उसके
बाद उत्तर उन्हें विश्व को देना है.
अगर
अन्य देशों से कुछ प्रतिक्रियाएं
आती हैं तो उनको
भी प्रधानमंत्री को ही झेलना
है. विपक्ष इसे राष्ट्र की
बड़ी उपलब्धि बता कर वैज्ञानिकों
को बधाई दे सकता
था, किन्तु विपक्ष को एक मौका
मिला उपहास करने का , और
बीच में नेहरू को
ले आए. वे
शायद इस उपलब्धि तो
काम आंक रहे हों
या समझ ही न
पा रहे हों लेकिन
उनका इसे चुनाव से
जोड़ देना अपने आप
में आश्चर्य का विषय है.
वैज्ञानिकों ने यह एक
दिन में नहीं किया
होगा इसमें वर्षों तक परिश्रम किया
होगा और जब यह उपलब्धि
प्राप्त हुई तो प्रधानमंत्री
ने राष्ट्र को तुरंत सूचित
किया. इसमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण है पूरे मिशन
को इतना गुप्त रखा
गया कि किसी ने
कल्पना भी नहीं की.
उसके बाद विपक्ष के
आरोप कि चुनाव के
समय यह नाटक किया,
तो प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता को
प्रणाम है.
जिन्होंने
इस पन्द्रह मिनट के भाषण
के लिए वर्षों पहले
ही वैज्ञानिकों को काम पर
लगा दिया, फिर कुछ माह
पहले लक्ष्य करने के लिए
एक (या एक से
अधिक भी) सैटलाइट अंतरिक्ष
में पहुंचा दिए और चुनाव
के समय उन्हें भेद
कर श्रेय ले लिया. सोचिये
उन्होंने और कितने दूर
की बात सोच रखी
होंगी. कांग्रेस इसमें स्वयं उपहास का पात्र बनी
और नेहरुजी को भी उपहास
का पात्र बना दिया. बात
को राष्ट्र के गौरव से
जोड़कर समाप्त किया जा सकता
था.
ऐसी
ही न जाने कितनी
घटनाएं होती हैं और
हमारे यहाँ एक प्रचलन
बन चुका है कि
चुनाव है तो अभी
यह नहीं करेंगे, वह
नहीं होगा. राजनीति को एक तरफ
रख कर सोचना आज
के समय की मांग
है और इस दिशा
में वर्तमान सरकार ने उम्दा कार्य
किया है. राष्ट्र निरंतर
चलता है और व्यवस्था
भी निरंतर ही चलनी चाहिए
, पदों पर बैठे हुए
नेता बदलते रहें, सत्ता में बैठी हुई
पार्टियां बदलती रहें, किन्तु राष्ट्र नहीं रुकना चाहिए.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें