नब्बे के दशक में छात्र बड़ी दुविधा में रहते थे। शिक्षक पढ़ाते थे प्रधानमन्त्री अमुक महानुभाव हैं, लेकिन परीक्षा के समय बदल जाते थे। कभी कभी तो परीक्षा और परिणाम के बीच में बदल जाते थे। छात्र बेचारे दुविधा में रहते थे कि जो पढ़ा था वो सही है, या जो लिख दिया था वो सही है या जो लिखने के बाद हो गया है वो सही है। वैसा ही कुछ शायद शिक्षकों के मन में रहा करता हो।
पारले जी के पैकेट पर छपे बालक के बाद आजीवन बालक रहने का वरदान केवल एक ही बालक को मिला वो हैं राहुल जी। राहुल जी में जो ये जी है वही उनके जीवन का ग्लूकोस है, और वही कांग्रेस का ग्लू कोष है जिससे कांग्रेस बंधी हुई है।
राहुल जी जब चुनाव की तैयारी में उतरे तो जी जान लगा दिया जी तैयारी तो उन्होंने यू.पी.एस.सी लेवल की की थी।
सिलेब्स में सब याद कर लिया नीरव मोदी, माल्या, मेहुल चौकसी आदि महापुरुषों का जीवन परिचय तो जुबानी याद था, इतना कि सोते जागते कुछ भी पूछें तो भी सुना देते थे। लेकिन इनके पूर्वजों पर लगे अभिशाप और देश पर परमेश्वर की असीम कृपा से इन महानुभावों को मुँह छुपा कर जीवन यापन करने की नौबत आ गई और एक एक कर धरे जाने लगे।
राहुल जी ने जो कुछ याद किया था उस पर पलीता लग गया। मूल समाप्त हो गया तब परीक्षा में भी इनका औचित्य समाप्त हो गया। बड़ी कठिनाई से तो यह याद किया था,
सिलेबस बदलने से दिल डूबा जा रहा था।
अब कुछ नया चाहिए था। अब परीक्षा सामने थी सिलेबस खुल गया था। यह पता नहीं था कि क्या पढ़ें क्या लिखें।
तब इन्हें बहत्तर का आंकड़ा याद आया। बहत्तर छेद वाली छलनी में से पहले लोग छाने जाएँगे जो बहत्तर साल से इनकी बातों में बहते रहे हैं। बहत्तर हूरों के लिए मर मिटने वालों को जीते जी मुफ़्त बहत्तर हज़ार मिल जाएँ और क्या चाहिए। यूँ समझिये जीते जी एक हज़ार ही एक हूर है।
अब अपना सिलेबस खुद ही लिख लिया गया है। अब कुछ भी पूछा जायेगा उत्तर बहत्तर ही आएगा। बहत्तर कहेंगे, बहत्तर लिखेंगे। भारत के बहत्तर टुकडे करने का स्वप्न पालने वाले प्रसन्न हैं और विकास की आस लगाने वाले सन्न हैं।
यहाँ छप्पन भोग की थाली परोसने में लगे मोदी के पकवान का स्वाद लोग ले ही रहे थे और उधर बहत्तर टन की बिरयानी परोसने के लिए प्लेटें लगा दी गईं। बिरयानी के लिए चावल कहाँ से आएगा यह पता नहीं, गोश्त किसका नोचा जाना है यह तय है।
कितनी सड़क, कितनी रेल, कितने रोजगार, सुरक्षा, सुविधा यह सब पीछे छूट जाएगा। परीक्षा में अब यह कोई नहीं पूछेगा कि बहत्तर के अलावा और क्या लिखा है उस आसमानी घोषणापत्र में?
पारले जी के पैकेट पर छपे बालक के बाद आजीवन बालक रहने का वरदान केवल एक ही बालक को मिला वो हैं राहुल जी। राहुल जी में जो ये जी है वही उनके जीवन का ग्लूकोस है, और वही कांग्रेस का ग्लू कोष है जिससे कांग्रेस बंधी हुई है।
राहुल जी जब चुनाव की तैयारी में उतरे तो जी जान लगा दिया जी तैयारी तो उन्होंने यू.पी.एस.सी लेवल की की थी।
सिलेब्स में सब याद कर लिया नीरव मोदी, माल्या, मेहुल चौकसी आदि महापुरुषों का जीवन परिचय तो जुबानी याद था, इतना कि सोते जागते कुछ भी पूछें तो भी सुना देते थे। लेकिन इनके पूर्वजों पर लगे अभिशाप और देश पर परमेश्वर की असीम कृपा से इन महानुभावों को मुँह छुपा कर जीवन यापन करने की नौबत आ गई और एक एक कर धरे जाने लगे।
राहुल जी ने जो कुछ याद किया था उस पर पलीता लग गया। मूल समाप्त हो गया तब परीक्षा में भी इनका औचित्य समाप्त हो गया। बड़ी कठिनाई से तो यह याद किया था,
सिलेबस बदलने से दिल डूबा जा रहा था।
अब कुछ नया चाहिए था। अब परीक्षा सामने थी सिलेबस खुल गया था। यह पता नहीं था कि क्या पढ़ें क्या लिखें।
तब इन्हें बहत्तर का आंकड़ा याद आया। बहत्तर छेद वाली छलनी में से पहले लोग छाने जाएँगे जो बहत्तर साल से इनकी बातों में बहते रहे हैं। बहत्तर हूरों के लिए मर मिटने वालों को जीते जी मुफ़्त बहत्तर हज़ार मिल जाएँ और क्या चाहिए। यूँ समझिये जीते जी एक हज़ार ही एक हूर है।
अब अपना सिलेबस खुद ही लिख लिया गया है। अब कुछ भी पूछा जायेगा उत्तर बहत्तर ही आएगा। बहत्तर कहेंगे, बहत्तर लिखेंगे। भारत के बहत्तर टुकडे करने का स्वप्न पालने वाले प्रसन्न हैं और विकास की आस लगाने वाले सन्न हैं।
यहाँ छप्पन भोग की थाली परोसने में लगे मोदी के पकवान का स्वाद लोग ले ही रहे थे और उधर बहत्तर टन की बिरयानी परोसने के लिए प्लेटें लगा दी गईं। बिरयानी के लिए चावल कहाँ से आएगा यह पता नहीं, गोश्त किसका नोचा जाना है यह तय है।
कितनी सड़क, कितनी रेल, कितने रोजगार, सुरक्षा, सुविधा यह सब पीछे छूट जाएगा। परीक्षा में अब यह कोई नहीं पूछेगा कि बहत्तर के अलावा और क्या लिखा है उस आसमानी घोषणापत्र में?
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