जैसे ही अपने घर की ओर बढ़ा, ताक लगाकर बैठे उत्पल मास्टर ने आवाज़ दी और भाई शिब्बू आओ जरा।
उत्पल मास्टर बहुत उत्साह से बाखर में लगे नीम के नीचे लोगों को जमा कर रखा था। उसी भीड़ की ओर शिब्बू को भी बुलाया तो कुछ उत्सुक होकर बिना मान मनौव्वल के जाकर खड़ा हो गया।
मास्टर ने बडे गर्व से कहा - बधाई हो भाई अब तो सरकार ने तुम्हारे काम को भी एक रोजगार की मान्यता दे दी है। अब ढोर चराना मान्यता प्राप्त रोजगार है।
शिब्बू ने कहा- जे कौन सी बात है मास्टर जी, ढोर तो हम बीस साल से चरा रहे, अब क्या नई बात हो गई।
मास्टर ने गर्व से कहा - अरे अब सरकार ढोर चराने का प्रशिक्षण भी देगी लोग प्रशिक्षित होंगे, अब गर्व से तुम कह सकोगे कि तुम ढोर चराते हो।
शिब्बू ने कहा - तो अभी कौन सी बेइज्जती लगती है? बीस साल से ढोर चरा रहे हैं बेइज्जत तो हमें कोई नहीं करता।
मास्टर ने कुछ गंभीर होते हुए कहा - अरे, तुम समझ नहीं रहे, अब नई सरकार छोटे छोटे काम को भी मान्यता प्राप्त रोजगार का दर्जा देकर तुमको सम्मान से जीवन जीने का मौका दे रही है, अब तुम चाहो तो ट्रेनिंग ले सकते हो और सरकार देगी प्रमाणपत्र।
शिब्बू ने खींसे निपोरते हुए कहा तो अब हम ढोर चराने के लिए भी सरकार से प्रमाण पत्र लें? जैसे ढोर प्रमाण पत्र देखे बिना हमारे साथ चरने न जायेंगे।
ऐसा नहीं है, लेकिन जब सरकार सिखा रही है तो सीख लो- मास्टर ने कहा।
शिब्बू अब थोडा खीझ गया था - देखो मास्टर तुम्हारी सरकार ने ढोर देखे भी हैं? भैस और बैल का फर्क न कर पाएंगे तुम्हारे नेता। हमको ख़ाक प्रशिक्षण देंगे। जितने अच्छे से हम ढोर हाँक लेते हैं उतने अच्छे से तो तुम्हारे नेता अपने विधायक भी नहीं हाँक पाते। हमारे ढोरों को खुद पता होता है कि किस सार में जाना है और तुम्हारी सरकार को बार बार बाड़े में बंद कर कर के रखना पड़ता है। अरे मास्टर जब पिछले बरस तुम बेचारे रमेश की पकोड़े की दुकान पर तंज कस रहे थे तब तुमको वो रोजगार नहीं लगता था । उसकी दुकान पर बैठकर उसी से कहते थे अरे तुम तो बेरोजगार हो ये सरकार पकौड़ा सरकार है। मंगलू को सिरजाते थे कहाँ ढोल बजाता फिरता है। तू बेरोजगार है, नौकरी होनी चाहिए, अब गाजे बाजे की स्कूल खोलने से का होगा, यहाँ सात गाँव में मंगलू से अच्छा ढोल नहीं बजा सकता। बात वही है कि तब तुम्हारी पसंद की सरकार नहीं थी तो हर आदमी बेरोजगार लगता था और आज घर में मटर छीलने वाला भी तुम्हारे हिसाब से रोजगार कर रहा है। किसी और को बनाओ मास्टर, इतना तो हम समझते ही हैं।
मास्टर का मुंह कड़वा सा हो रहा था। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई चरवाहा उन्हें ऐसे झाड़ देगा।
खम्बे पर लगी एल.ई.डी जलने लगी थी। शिब्बू ने कहा चलते हैं मास्टर जी दिया बत्ती का समय हो गया ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें