कुछ सप्ताह पहले घर में एक दृश्य देखने को मिला,जब विंग कमांडर अभिनंदन सीमा के उस पार पहुँच गए। विंग कमांडर को पीटने का वीडियो सामने आने पर मेरे पिताजी की पहली प्रक्रिया थी - "मोड़ा को मार रहे थे तो बड़ो दुःख भओ", वे बहुत दुःखी थे। जब दुःख होता है तो इंसान या तो डर जाता है या वह डर भूलकर अपनी पूरी शक्ति लगा देता है। वैसा ही कुछ होते हुए दिखाई दिया जब पिताजी का दुःख क्रोध में बदला और कहने लगे अगर जरूरत पड़ी तो हम भी बन्दूक उठा लेंगे, सरकार मौका भर दे। कब तब ऐसे हमारे बच्चों को मारते रहेंगे।
माता जी कुछ बोली नहीं लेकिन मन ही मन दुखी थीं। संभवतः यह देश के हर माता पिता की भावना थी, और उस दिन दोनों ही सोए नहीं थे। अगले दिन जब विंग कमांडर की वापसी की बात सामने आई तो घर में एक प्रसन्नता की लहार दौड़ गई। सुबह से टीवी से आँखे लगाकर दोनों बैठ गए, उनकी प्रतीक्षा ऐसी थी जैसे उनका खुद का बेटा आने वाला हो। मैंने बोला भी कि हम भी जब घर आते हैं तो इतनी प्रतीक्षा नहीं करते। उनको मेरा यह कहना पसंद नहीं आया। मैंने कहा टीवी वाले तमाशा करते हैं बंद कर दो टीवी आ जायेगा, चिंता मत करो। तो पिताजी बोले – “अपना बेटा है, एक बार देख लेंगे कि ठीक ठाक आ गया तो चैन आ जाएगा।“ मीडिया को दिनभर का कवरेज मिल गया था, पाकिस्तान देर किये जा रहा था और यहाँ शंकाएं घिरने लगी थीं, माताजी कहने लगीं -"और मारो हुइए मोड़ा को ए ही से देर कर रहे हैं, पाकिस्तानियों को कोई भरोसो थोड़ी है। कुटे बिना ने मान है, अभी छोड़ना नहीं चहिए, और कूटना चाहिए"।पिताजी बोले- "एक बार मोड़ा घरे आ जाए, फिर और बम पटक दो।" इसी बीच मीडिया को भी भरपूर कोसा जा रहा था।
जो मैं देख रहा था, वह शायद देश के न जाने कितने घरों में हो रहा होगा। देश का हर जवान हमारा भाई या बेटा है। उनके बहते रक्त की हर बूंद उतना ही कष्ट देती है जितनी अपनी औलाद को चोट लगने पर होती है। फिर वर्दी के अंदर जाति, धर्म , भाषा , क्षेत्र का भेद नहीं दिखता। बस अपनापन दिखता है। एक तरफ लोग उत्तर-भारत और दक्षिण-भारत की खाई खोदने में लगे हैं, हिंदी-तमिल की दीवार खड़ी करना चाहते हैं, उनको सोचना चाहिए कि हम भारतवासी आपस में कितने जुड़े हुए लोग हैं।
हमारे देश में बड़े ही भावुक लोग रहते हैं। भाषा, क्षेत्र, जाति, धर्म से परे एक मूलभावना है देशप्रेम की। जब बात देश की हो तो हम सब बाकी सब को एक तरफ रख देते हैं। हाँ इसमें उन कुछ गिने चुने लोगों को न गिना जाए जो खाते यहाँ का हैं और गाते वहाँ का। हमें उस एजेंडे को भी समझना चाहिए जिसके तहत विंग कमांडर को मारने, खून से लथपथ करने का वीडियो पहले सोशल मीडिया पर डाला गया था। एजेंडा साफ़ था मनोबल तोड़ने का, जब सेना युद्ध के पक्ष में है तो आम नागरिकों द्वारा दबाव बनाया जाये, उनके परिवारों को डराया जाये । हमारे देश के आम नागरिक बड़े सीधे सादे हैं, अधिकतर तो बहता रक्त देख ही नहीं सकते। रक्त बहता देखकर अधिकतर कहते हैं युद्ध नहीं होना चाहिए , यह एक मानसिकता है जो हमारे दिमागों में सदियों से भरी जा रही है । हमारे मन में डर भरा जाता रहा है, और उनके लिए त्यौहार में भी रक्तपात देखना आम है। युद्ध कोई नहीं चाहता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम आत्मरक्षा भी न करें।
पाकिस्तान ने धर्म का दांव खेला है, उनकी तरफ से आया बयान कि पाकिस्तान की बाईस करोड़ पाकिस्तानियों के साथ इस्लाम के नाम पर भारत के तीस करोड़ मुसलमान पाकिस्तान के साथ हो जाएंगे। वो जानते हैं भारत को सीधे युद्ध में नहीं हराया जा सकता, अब उनका प्रयत्न केवल देश में आतंरिक कलह उत्पन्न करने का होगा। दूसरी तरफ उसी स्तर की बात जिग्नेश मेवानी जैसो ने की। तुच्छ मानसिकता की सभी सीमाओं को लांघते हुए युद्ध के समय जातिगत भेदभाव की बात उठाना अलग ही स्तर की मूर्खता है। उतनी ही बड़ी मूर्खता वो कर रहे हैं जो इसे चुनाव से जोड़ कर बीजेपी बनाम पाकिस्तान बनाने पर तुले हुए हैं। सरकार और सेना की वर्तमान कार्यवाही को मोदी का युद्धोन्माद साबित करने में लगे हुए लोग अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं।
एक लॉबी पाकिस्तान के एजेंडे पर काम कर रही है। अनगिनत लोग हैं जो युद्ध और युद्ध के परिणामों से लोगों को डरा रहे हैं। आत्मरक्षा में किये जाने वाले प्रयासों को युद्धोन्माद का नाम देकर मनोबल तोड़ने वाले बयान अलग अलग लोगों से दिलवाये जा रहे हैं। यह युद्ध भारत ने शुरू नहीं किया, यह आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध है जो दशकों से चल रहा है। आज परिस्थिति उसे निर्णायक रूप से समाप्त कर देने की बन रही है, और हम सबको आशा है कि परिणाम सुखद होंगे, सेना और सरकार कोई कसर नहीं छोड़ने वाली है।
बहुत सही लिखा है। यह घर घर की बात है। हमारे घर भी यही हो रहा था। हमारा भी दिल टूट रहा था मगर यह दुःख दुश्मन की कमर तोड़ डालने के लिए क्रोध में तब्दील हो गया था। बस अब और नहीं। एक गलती हो चुकी थी एक भावनात्मक कमजोरी के कारण। क्या बलिदान सेना ही देगी?
जवाब देंहटाएंनागरिक को क्यों बलिदान नहीं देना चाहिए देश के लिए?
अरे मुकाबला करने का हौसला रखना था फिर जिएं या मर जायें ।
हमेशा तो हर कोई रहता नहीं न ।
पूर्ण रूपेण तथ्यात्मक सत्य के साथ देश के मनोभावों को उकेरता लेख।
जवाब देंहटाएंदेश के जन-मन को पराजित करने के कुत्सित प्रयास जितना दुश्मन देश कर रहा है, उससे ज्यादा हमारे देश में बैठे पाक प्रेमी गैंग के सदस्यों के द्वारा हो रहा है।