कैसी छवि घनश्याम तुम्हारी,
कारे में उजरी, के उजरे में कारी?
आधे हो तुम, और आधे नहीं हो,
मगर देखता हूँ, ये पूरे तुमही हो।
सब देखते हैं, दो नैना तुम्हारे,
कौन क्या मन में सोचे विचारे।
जगत को नचाती तुम्हारी मुरलिया,
दिखती है, न ही सुनाई दे छलिया।
कौन सी लीला, रचोगे मुरारी,
कोई न जाने थाह तुम्हारी।
कारे में उजरी, के उजरे में कारी?
आधे हो तुम, और आधे नहीं हो,
मगर देखता हूँ, ये पूरे तुमही हो।
सब देखते हैं, दो नैना तुम्हारे,
कौन क्या मन में सोचे विचारे।
जगत को नचाती तुम्हारी मुरलिया,
दिखती है, न ही सुनाई दे छलिया।
कौन सी लीला, रचोगे मुरारी,
कोई न जाने थाह तुम्हारी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें