सोमवार, 26 मार्च 2018

मेघ-सेवा का ब्रह्मज्ञान

महामुनि स्काइप से नदारद थे  , सो उनको उनके द्वारा रखी मीटिंग में प्रकट होने का आह्वान 
व्हाट्सएप्प पर किया गया । कुछ देर में मुनि प्रकट हुए और आत्मप्रसंशा , व्यंग्य और औपचारिक क्षमायाचना के मिले जुले स्वरुप में बोले मैं तनिक व्यस्त था ।
दरअसल महामुनि ने यह मीटिंग, डेवर्षियों  के साथ मेघ-सेवा का ब्रह्मज्ञान प्रदान करने के लिए रखी थी ।
अगर आप डेवर्षि न समझे हों तो बता दूं, डेवलपमेंट यज्ञ करने वाले ऋषिओं को डेवर्षि कहा गया है ।
ये सभी वेबर्षि के पोते परपोते हैं । 
नारद मुनि डेवर्षियों से बोले - 
अहम् ब्रह्स्मि । कल ही ब्रह्मदेव् से मिला । बढ़िया लग रहे थे ।
मैं नारायण से तो हफ्ते में दो तीन बार मिलता ही हूँ । नारायण भी बढ़िया लग रहे थे । कह रहे थे डेवर्षि कोई यज्ञ नहीं कर रहे आजकल ?
इंद्रलोक से इंद्रदेव आजकल वरुणदेव के साथ मेघों में जल भर रहे हैं ।
एक ने पूछने की कोशिश की किंतु मेघ में जल भरने की प्रक्रिया हमें भी तो बताइये । हम डेवर्षि है, हमें भी ट्रेनिंग दीजिये ।
डेवर्षि सोच रहे थे कितना बोल रहे हैं ,कुछ काम का बोल दें । पूछ बैठे  ... "मुनिवर... वो ब्रह्मज्ञान ?"
एक आईडिया बृह्मदेव को दिया हैं। अगर उन्हें अच्छा लगा तो करोड़ों बचेंगे ।

अभी अभी गणपति से मिल कर आ रहा हूँ ।

डेवर्षि समूह के दो अन्य भेद भी हैं, ऑप्सर्षी जो ऑपरेशन्स सँभालते हैं और टेस्टरर्षि जो टेस्टिंग के यज्ञ करते हैं । 

थोड़ी दाढ़ी बढ़ा ली है । मैं भी दाढ़ी बढ़ाउंग और हरे रंग के बाल उगाऊंगा ऊगा तो सफ़ेद भी सकता हूँ लेकिन सफ़ेद दाढ़ी में स्कोप नहीं है । 

मैं भोलेनाथ से प्रायः मिलता ही रहता हूँ । आजकल मगन है ध्यान में । बस मैं ही हूँ , जो इन सबसे मिलता रहता हूँ नहीं तो पता नहीं इन त्रिदेवों का क्या हो ।

बस एक बार जल भर जाये तो हम जहाँ चाहेंगे वहाँ बरसा देंगे । हमें इस बार मेघों का ऑप्टीमल प्रयोग करना है ।

महामुनि बोले हाँ बताता हूँ , जो मेघ होता है वह मे.घ. होता है । और उसमे जल होता है । जल मेघ में वरुण देव भरते हैं , मैं नहीं बस उनको भरते हुए देखता हूँ ।जल ही जीवन है । और जीवन की रक्षा करते हैं सूर्यदेव , मैं गया था उनसे मिलने ।
मैंने उनको अपने विचार बताये, तो बड़े प्रसन्न हुए । प्रसन्न तो मुझे शंघाई में बैठे डेवर्षी भी लगे । उनसे मेरी रोज बात होती है ।
मुनि बोले हाँ बड़ा जटिल है । बड़ी मुश्किल से समझ आता है । इंद्रलोक वाले जानते हैं । मैं तो जनता ही हूँ । पहले मैं भी एक वेबर्षि था । सब यज्ञ और मन्त्र जनता था । अब मैं सबको केवल आइडिया देता हूँ । 

देख लो मैं बढ़ रहा हूँ पहले वेबर्षि था, मन्त्र पढता था । फिर डेवर्षि बना और बहुत यज्ञ किये । और अब देखो महामुनि हूँ । सबसे मिलता हूँ और मीटिंग करता हूँ । तुम लोग भी कुछ कर लो तो दृश्यमान हो जाओ । तुम लोग तो सप्तलोकों में सदृश हो ही नहीं ।
डेवर्षि सोच रहे थे फालतू टाइम ख़राब कर रहा है कोई चुप कराये इन्हें । ब्रह्मज्ञान तो दूर इन्हें भ्रम ज्ञान भी नहीं है । बस टाइम पास कर रहे हैं।
सवा घंटे तक जब आत्ममुग्ध मुनिवर ने अपनी वाणी को विराम नहीं दिया और मेघ-सेवा के स्थान पर आत्मप्रसंशा के स्तोत्र पढ़ते रहे, तो डेवर्षि का धैर्य उत्तर दे गया और बोले मुनिवर पुनः पधारिएगा अभी हमें काम से जाना है । और मुनिवर के स्काइप मीटिंग से अंतर्ध्यान हो गए ।

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