गुरुवार, 22 मार्च 2018

छठी के मास्साब

लोगों को छठी का दूध याद आना सुना होगा । कभी छठी के मास्साब याद आना सुना है? गणित का नाम सुनते ही मन में कौंध जाते हैं हमारे मास्टरजी । उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि वे याद नहीं आते बल्कि मन में कौंध जाते हैं । उनसे हमारा जीवन परिचय छठी कक्षा में हुआ था ।

जी सच समझा आपने , हमें अपने छठी के मास्साब याद आ रहे है और वो भी गणित के । संस्मरण में कुछ छात्रों के कुक्कुट स्वरुप में रूपान्तण ,और उनके अनोखे व्यक्तित्व के सिवा विशेष कुछ नहीं ।
दरअसल उनके व्यक्तिव का घनत्व हमारे गणित के ज्ञान के भार से मेल नहीं खाता था ।

वे कुंटल में पढ़ा के जाते थे, और हमारे दिमाग में मिलीग्राम बचता था । वे एलजेब्रा कहते थे हमें काली सफ़ेद धारी वाला ज़ेब्रा सदृश होता था । छोटे छोटे बाल और उनके नीचे अंडाकार मुख मंडल । बातों में ठेठ देशीपन का तड़का । साधारण कद काठी, बस उनकी बाह्य देहयष्टि की इतनी ही विशेषता थी |

एक बार बस उनके हत्थे चढ़ गए थे । उन्होंने टेबल याद करने बोला -बीस तक । अपन को याद हुई कच्ची पक्की ।  क्लास में घुसते ही उन्होंने धर लिया एक दिन । बोले टेबल याद है , मना तो कर नहीं सकते थे सो हाँ बोल गए । अब उन्होंने खेलना शुरू किया के.बी.सी ।

बताओ - 12 x 12 ? बताओ - 18 x 8 ? बताओ - 16x9 ? अब सब उत्तर निकले 144 ।

और हमारे दिमाग में इसी अंक की धारा  लग गई। उन्होंने जब चौथा पूछा 17 x 9 तो मुह से निकल गया 144 । बस क्या था करारी करारी जलेबी छानी गयी । हमारे साथ समस्या यह थी कि उनका पीरियड भी होता था छठा ।

छठा पीरियड कहने को तो छठा होता था, लेकिन लंच के बाद का पहला होता था । और खाना खाने के बाद आती थी नींद । अब आप सोच के देखिये एक तरफ मदमस्त नींद का झोका, और दूसरी तरफ से खोपड़ी की जलेबी बनाने में सिद्धहस्त मास्टरजी दोनों एक साथ क्लास में आते थे ।

खुली आँखों से सोचने की कला हम सबने वहीँ से सीखी । जैसे ही किसी को ऊंघता देखते उसकी जटाओं को मुष्टिका में धर लेते । और खोपड़ी की जलेबी बनाने की प्रक्रिया स्वरुप मुंड को घुमा घुमा कर  कुंडली बना देते ।

इनके भय से छात्रों के झुण्ड के झुण्ड अपनी जुल्फों का परित्याग कर सेना के रंगरूट की हेयर स्टाइल अपना लिए थे । अच्छा जलेबी निर्माण के साथ वह एक मन्त्र भी बोलते जाते, घुग्गू बने बैठे , घुग्गू बने बैठे , पढ़ना लिखना है नहीं घुग्गू बने बैठे ।

कसम खा रहे हैं उन्ही मास्टर जी की, कि हमें कभी समझ नहीं आया की ऐसा क्यों कहते थे । और कौन की हिम्मत की उनसे पूछे ये घुग्गु की होता है । समय बीत और घुग्गु मन में कही छिप गया । वो तो एक दिन अपने बच्चों को चिड़ियाघर घुमाने ले गए वहाँ उल्लुओं के एक पिंजरे पर पढ़ा ... घुग्गु ।

और यकीन मानिये छठी के मास्साब याद आ गए , और हम जोर जोर से ऐसे हंसे की पेट में बल पड गए ।
गणित का बड़ा पुराना सवाल आज हल हुआ था । तब पता चला था कि घुग्गु उल्लुओं की एक प्रजाति है जो दिन में ऊंघती रहती हैं ।

कभी कभी विचार आता है संसद में उंघने वालों की खबर लेने एक बार बस मास्साब पहुँच जाएँ और एक बार बाल पकड़ कर घुमाते हुए कह दें ... काम कल्ले काम ...घुग्गु बने बैठे । कसम से कोई सांसद कभी नहीं सोयेगा संसद में ।

यह कल्पना मात्र नहीं है, वास्तव में वे मास्साब हैं । कहाँ है ये पता नहीं, लेकिन हमारे मन में कौंधते रहते हैं । अब तो बुजुर्ग हो गए होंगे , उनका अभिनंदन और धन्यवाद । नाम लिख सकता हूँ किन्तु नहीं लिखूंगा क्योंकि उनका आदर सर्वोपरि है, उनका मजाक बनाना मेरा  उद्देश्य नहीं ।

यह सब तो मात्र हम सब घुग्गुओं की मनोदशा का रेखाचित्र है ।

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