गोरखपुर
मे चुनाव आने
वाले हैं, और
चुनावी गिद्ध मंडराने लगे
हैं | इस बार
राजनीति ने नीचता
की इतनी गहराइयाँ
नाप ली हैं
कि इस बार
के चुनाव का
मुद्दा बच्चों की लाशें
बनने जा रही
हैं |
कोई
माने या न
माने, लेकिन अगर
गहन जाँच की
जाए कहानी बड़ी
विचित्र निकलेगी | सैकड़ों मुँह
और सैकड़ों कहानियाँ
हैं
| सब अपने अपने
राजनीतिक दलों की
दालें गलाने मे
लगे हुए हैं
| इस मे लाशों
की राजनीति की
बू तब आने
लगती है, जब
नेता हादसे की
जगह झुंड मे
पहुँच कर चोंच
मारने लगते हैं
| परिजनों के ज़ख़्मों
पे मल्हम नही
लगते बल्कि, जख्म
कुरेदकर उत्तेजना बढ़ाते हैं
, भड़काने का काम
करते हैं |
जहाँ
उम्मीद ये की
जानी चाहिए की
कोई आकर सांत्वना
दे, कारणों की
विवेचना करे, और
लोगों मे शांति
बनाए रखने की
अपील करे | माहौल
को इस प्रकार
बनाए जाने की
आवश्यकता है कि
लोगों मे धैर्य
बढ़े, एक उम्मीद
जागे की ये
आए हैं तो अब
कुछ स्थिति ठीक
होगी शायद ये
कुछ मदद लेकर
आए हों | लेकिन
राजनीतिक कुटिलता और भूख
ऐसी है की
, लोगों को सांत्वना
और उम्मीद देने की
जगह लोगों मे
भय और आक्रोश
जगाया जाता है
| लोगों की मदद
करने की जगह
आरोप प्रत्यारोप का
खेल कहला जाता
है | फोटो खिचाई
जाती है और
बस निकल जाते
हैं | फिर लौट
के सुध नही
लेते | अरे अस्पताल
के माहौल को
देखिए, वहाँ जो
गुजर गये उनके
अलावा और भी
रोगी हैं,वहाँ
तमाशा बनाने की
जगह सुविधाएँ मुहैया
ही करा दें
| अगर अस्पताल मे
कोई कमी है
और आप एक
जन प्रतिनिधि की
तरह जा रहे
हैं तो उस
कमी को पूरा
करने की कवायद
करें न की
भाषण बाजी और
विरोध के चक्कर
मे सनसनी फ़ैलाएँ
|आप सरकार को
सदन मे घेर
सकते हैं, मीडीया
मे घेर सकते
हैं , लेकिन कम
से कम अस्पताल
वो स्थान नही
है | बच्चों के
वॉर्ड मे क्या
स्थिति होती है
ये पता नही
कितने लोग जानते
हैं |अक्सर जब
बच्चों को एडमिट
करते हैं, तो
बच्चों को दवा
से लेकर दूध
वो नर्स स्टाफ
द्वारा ही किया
जाता है | माँ
बाप बच्चों को
बाहर खड़े होकर
काँच की एक
छोटी सी खिड़की
से देख तो
सकते हैं लेकिन
उनके पास नही
जा सकते | अंदर
क्या दवा चल रही
है, बच्चा सो
रहा है या
खेल रहा है
या होश मे
है भी या
नही , या बेहोशी
की दवा देकर
सुलाया हुआ है
किसी परिजन को
पता नही होता
| कुछ देर के
लिए माँओं को
बच्चा देखने मिल
जाता है बस
|लेकिन बाकी समय,
परिवार
ले लोग बेसुध
वॉर्ड के बाहर
पड़े रहते हैं
| ऐसी माएँ जिन्हे
बच्चों को जन्म
दिए हुए एक
दिन दो दिन
हफ़्ता भर भी
नही होता, जिन्हे
खुद सॉफ सुथरे
स्थान और पर्याप्त
आराम की ज़रूरत
होती है, वो
माएँ भी वॉर्ड
के बाहर बेसुध
पड़ी रहती हैं
| अंदर से एक
भी बच्चे की
हालत खराब होने
की खबर आती
है तो सैकड़ों
कलेजे काँप जाते
है | बड़ा ही
भयावह होता है
वॉर्ड के बाहर
का दृश्य | अगर
डॉक्टर की ज़िम्मेदारी
है तो डॉक्टर
को सज़ा मिले
, अफ़सर की ज़िम्मेदारी
है तो अफ़सर
को सज़ा मिले
और अगर मंत्री
की ग़लती
है तो मंत्री
को सज़ा मिले
, यह ज़रूरी है
| शिक्षा और स्वास्थ्य
के क्षेत्र मे
लापरवाही बर्दाश्त नही की जानी
चाहिए | सभी डॉक्टर
एक जैसे नही
होते | मैं खुद
एक ही शहर
के डॉक्टर को
जनता हूँ, एक
वो है जो
खाँसी बुखार पे
भी भर्ती करने
की सलाह देता
है , और दूसरा
वो है जो
कहता है बच्चे
को माँ के
पास रखो , थोड़ी
दवा से ठीक
हो जाएगा | एक
कमीशन का भूखा
है सो कमीशन
लेता है और दूसरा
फीस और दुआएँ
लेता है | लेकिन
ज़िम्मेदारी से बचा
नही जा सकता
| गोरखपुर कांड को
जल्दी ही राजनीतिक
रंग दे दिया
जाएगा और बहुत
जल्दी ही धार्मिक
कोण भी निकाला
जाएगा |
लेकिन
जो योगी आदित्यनाथ
पूर्वांचल मे इस
बीमारी के खिलाफ
वर्षों से युद्ध
कर रहे है,
उनसे उम्मीद है
इस दुर्घटना को
, इस रोग से
मुक्ति का अवसर
मान कर जितनी
जल्दी हो सकेगा
लोगों के लिए
उचित सुविधाएँ मुहैया
कराई जाएगी |
व्यवस्था
सड़ी गली
है , इसमे कोई
दो राय नही
, लेकिन योगी सरकार
ही इसे सुधार
सकती है | क्यूंकी
वर्षों की
तथाकथित
सेक्युलर सरकारों मे नासूर
बनते रहे, किसी
ने कभी ध्यान
नही दिया न
मीडिया जगा न
सरकारें, लोग बरसों
से मरते रहे
मदद की पुकार
करते रहे | और
सरकारों को सब
पता था लेकिन
किया कुछ भी
नही , क्योंकि इससे
उनका फायदा कुछ
नही होना था
| ऐसे कई नासूर
हैं अभी जो
जगह जगह है,
और एक एक
करके फूटेंगे, और
योगी आदित्यनाथ को
सभी से निपटना
होगा | क्यूंकी जानकार भी
कुछ न करने
वाले हर बात
का राजनैतिक फायदा
ज़रूर उठाने की
कोशिश करेंगे |
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